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News Clipping on 17-08-2018

Date:17-09-18

Unfinished Story

India’s HDI ranking shows success in poverty reduction but failure on equality

TOI Editorials

India’s ranking in UN’s Human Development Index (HDI) went up by just one from last year, to 130th. But the country has made appreciable strides on its HDI value since 1990. India’s HDI value was only 0.43 in 1990. In 2017, this grew to 0.64 – an increase of around 50%. Consider that India’s life expectancy in 1990 was 57.9 years. In 2017, it went up to 68.8 years. Over the same period, India’s per capita income in PPP terms saw an increase of a whopping 267% from $1,733 to $6,353. Similarly, expected years of schooling went up from 7.6 years to 12.3 years.

All of which isn’t surprising given that it was in 1991 that India initiated economic liberalisation. The HDI improvement over this period essentially captures the benefits that accrued to Indian society from that historic decision. That India’s HDI value is higher than the South Asian average of 0.638 exemplifies this point. Yet, the very fact that India went up just one spot from its 2016 HDI ranking shows that improvement has been part of a larger global trend where other countries too have made considerable achievements in bettering their citizens’ lives.

Plus, development hasn’t been spread evenly, with India’s income inequality the highest at 18.8% – compared to 15.7% for Bangladesh and 11.6% for Pakistan. In fact, when corrected for inequality India’s HDI value falls by 26.8% to 0.468. This means that most of the improvements have flowed to the top of the social pyramid while those at the base have only just been lifted out of poverty. This also means that the middle class hasn’t grown as much as it should have, while small and medium enterprises have failed to transfer the agrarian workforce to manufacturing. Add to this gender inequality which glaringly shows up in the per capita income parameter, and we are looking at a really mixed picture.

This indicates India’s economic liberalisation is an unfinished story, and that our socialist political DNA has held us back rather than create a more equal society. Thus, it’s high time that the existing development paradigm is challenged and economic reforms undertaken on a war footing. In fact, it’s by really opening up the economy and further improving ease of doing business that all sections of society can grow. Socialist interventions like reservations and archaic labour laws only hold India back from realising its true potential.


Date:17-09-18

लगन के साथ मेहनत करें तो कामयाबी मिलना तय है

वरुण बरनवाल

मेरी सफलता के पीछे मेरी मां, रिश्तेदार और दोस्तों का खास योगदान है। इन लोगों का मुझे पर ऐसा भरोसा रहा कि कि पढ़ाई जारी रखने के लिए कोई मेरी फीस भर देता था तो कोई किताबों, फॉर्म का इंतजाम कर देता था। कारण यह था कि मेरा जीवन बेहद गरीबी में बीता। पिताजी की साइकिल सुधारनेे की दुकान थी। उसी की कमाई से हमारा घर चलता था। इसी आमदनी में से कुछ पैसे मेरी पढ़ाई पर खर्च हो जाते थे। पहले ही आमदनी कम और उस पर पढ़ाई का खर्च। इससे हमारे घर की हालत और खराब हो जाती थी। लेकिन, मेरे भीतर पढ़ाई की बहुत ललक थी। पैसे के संघर्ष के बावजूद मेरा पढ़ाई करने का बहुत मन होता था, लेकिन गरीबी के चलते स्कूल की फीस भरना कठिन था।

हाईस्कूल में एडमिशन के लिए हमारे घर के पास एक ही अच्छा स्कूल था। वहां दाखिले के लिए 10 हजार रुपए डोनेशन लगता था। मैं जानता था कि इतने पैसे मेरी मां के पास नहीं थे। इसलिए मैंने मां से कह दिया कि रहने दो एक साल का गैप ले लेता हूं। अगले साल पैसे जुटाकर दाखिला ले लूूंगा। फिर हुआ यूं कि जो डॉक्टर मेरे पिता का इलाज करते थे, वे हमारी दुकान के सामने से गुजरे तो मेरे दाखिले के बारे में पूछ लिया। मैंने अपनी कठनाई बता दी। यह सुनने के बाद उन्होंने अपनी ओर से 10 हजार रुपए देकर कहा- जाओ दाखिला करवा लो। यही वह पल था जिसने मेरे सपनों को हवा दी और नया आत्मविश्वास पैदा किया। अब लगने लगा कि पढ़ाई करके मैं कुछ कर सकता हूं। दाखिला तो डॉक्टर साहब ने दिला दिया, लेकिन इसके बाद टेंशन यह था कि स्कूल की हर महीने की फीस कैसे दूंगा? मैंने स्कूल के प्रिंसिपल से अनुरोध किया तो उन्होंने मेरी फीस माफ कर दी। 2006 में पिताजी का निधन हो गया। उसके बाद तो जैसे मेरे परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा।

पिता बहुत मेहनत करके थोड़ा कुछ कमा लेते थे। 10वीं का परिणाम आया तो जैसे जीवन में नया संचार हो गया। मैंने स्कूल में टॉप किया था लेकिन, आगे की पढ़ाई के लिए पैसे जुटा पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल काम था। पांच भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ा था, इसलिए पिता के जाने के बाद घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आ गई। मैंने फैसला कर लिया था कि अब आगे नहीं पढ़ूंगा। साइकिल की दुकान पर ही काम करूंगा, ताकि घर खर्च चल सके। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मेरे स्कूल में टॉप करने पर मां सबसे ज्यादा खुश हुईं, उन्हें लगा जैसे वे पास हो गई हों। वे उत्साह में भरकर बोलीं, घर के हम सभी लोग कुछ न कुछ काम कर लेंगे। मैं दुकान संभाल लूंगी, तू तो बस आगे की पढ़ाई पर ध्यान दे। मां के ये शब्द सुने तो मुझे नई दिशा मिल गई। मन उत्साह से भर गया। 11वीं-12वीं की पढ़ाई के दो वर्ष मेरे जीवन के सबसे कठिन रहे। कोई भी मौसम हो, मैं सुबह 6 बजे उठकर स्कूल जाता था। फिर दोपहर 2 से रात 10 बजे तक बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था। उसके बाद दुकान पर हिसाब-किताब करता था।

मेरे घर की स्थिति देखते हुए मेरे टीचर ने मेरी दो वर्ष की फीस भर दी। इस तरह मैंने साइंस विषय के साथ 12वीं पास की। आगे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पहले साल की फीस 1 लाख रुपए थी। मैं ट्यूशन कर रहा था, घर के सभी सदस्य कुछ न कुछ करके मेरी पढ़ाई के लिए पैसे जोड़ रहे थे लेकिन, इतना काफी नहीं था। घर का खर्च और कई जरूरतें भी होती थीं। कोई सिर्फ मेरी पढ़ाई के लिए ही सारे लोग काम थोड़ी कर रहे थे। इसलिए जब इंजीनियरिंग में एडमिशन के लिए पैसे की जरूरत पड़ी तो हमारे परिचित सुकुमार भैया, परिवार और कुछ लोगों ने पैसे इकट्‌ठा करके पुणे के एमआईटी कॉलेज में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेक्नोलॉजी में मेरा एडमिशन करा दिया। इंजीनियरिंग के पहले टर्म की एग्जाम में टॉप करने पर मुझे आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति मिल गई लेकिन, उसे हासिल करने में भी मुझे दो साल लगे। बिना अड़चन मेरा कोई काम नहीं होता था।

लेकिन प्रश्न खड़ा हुआ था कि आगे के वर्षों की फीस कहां से आएगी? मैंने कॉलेज टीचर से निवेदन करके कहा कि मैंने प्रथम वर्ष में 86 फीसदी अंक हासिल किए हैं जो कॉलेज में एक रिकॉर्ड है। क्या मेरी फीस माफ हो सकती है? इसके बाद टीचर ने मेरी गुजारिश पर ध्यान दिया और मेरी सिफारिश डीन व डायरेक्टर से कर दी। लेकिन सेकंड ईयर तक मेरी बात उनके द्वारा ठीक से सुनी नहीं गई। इस बीच दोस्त बीच-बीच में पैसे देकर मेरी मदद करते रहे। बदले में मैं भी दोस्तों की पढ़ाई में मदद कर दिया करता था। इस प्रकार आर्थिक परेशानियों से जूझते हुई मैंने 2012 में इंजीनियरिंग पूरी की। मेरी प्लेसमेंट अच्छी हो गई, कई कंपनियों से मुझे नौकरी के ऑफर आने लगे। इधर, मैंने सिविल परीक्षा देने का मन बना रखा था, लेकिन समझ नहीं आ रहा था कि तैयारी कैसे करूं? मैंने जब नौकरियों के ऑफर ठुकरा दिए तो सबसे ज्यादा नाराज मेरी मां हुई। उन्होंने कई महीनों तक मुझसे बात नहीं कि। कारण वही था कि घर की स्थिति इतनी खराब है, ऐसे में मैं नौकरियों के ऑफर ठुकरा रहा था। जब 2013 मे यूपीएससी मे 32वी रैंक आई तो सबसे ज्यादा खुश मेरी मां ही थी। परिणाम सुनकर मुझे तो यकीन नहीं आ रहा था। अगर मेरी मां ने मुझे सहारा नहीं दिया होता तो शायद आज मैं एक साइकिल मैकेनिक ही होता। मेरा सोचना है कि आप लगन से साथ मेहनत करते हैं तो दुनिया की कोई ताकत आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती।


Date:17-09-18

गंदगी के खिलाफ लंबी लड़ाई

संजय गुप्त, (लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)

आज दुनिया में भारत लोकतंत्र के प्रति समर्पण, युवा आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ अन्य अनेक अच्छी बातों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी के साथ उसकी पहचान इस रूप में भी है कि यहां साफ-सफाई के प्रति उतनी जागरूकता नहीं जितनी होनी चाहिए। गांवों और शहरों के सार्वजनिक स्थलों में गंदगी की समस्या को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही गंभीरता के साथ लिया। तमाम चुनौतियों के बाद भी उन्होंने 2 अक्टूबर 2014 को राजपथ से स्वच्छ भारत का नारा दिया। उन्होंने देशवासियों को महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने की याद दिलाते हुए यह संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया कि वे सप्ताह में कम से कम दो घंटे सफाई के लिए समय निकालें। उनकी अपील का असर हुआ। राज्य सरकारों के साथ स्थानीय निकायों और सामाजिक संगठनों के अतिरिक्त कॉरपोरेट जगत ने भी स्वच्छ भारत अभियान को अपनी-अपनी तरह से गति देनी शुरू की। इसी क्रम में दैनिक जागरण समूह ने भी स्वच्छता के इस अभियान को अपनाया। आज चार साल बाद यह कहा जा सकता है कि देश का शायद ही ऐसा कोई नागरिक हो जो स्वच्छता अभियान से परिचित न हो। साफ-सफाई के प्रति जागरूकता एक बड़ी उपलब्धि इसलिए है, क्योंकि आम तौर पर हमारे देश में लोग सार्वजनिक स्थलों में गंदगी को लेकर बेपरवाह ही दिखते रहे हैं। चूंकि गंदगी के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई लंबी चलेगी इसलिए प्रधानमंत्री ने एक बार फिर स्वच्छता ही सेवा के तहत देशवासियों को प्रेरित करने का काम किया।

गत दिवस उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये 17 जगहों पर विभिन्न लोगों से संवाद किया। इनमें नामचीन उद्योगपति, अभिनेता से लेकर आध्यात्मिक गुरु, मीडियाकर्मी, छात्र, ग्रामीण आदि शामिल थे।स्वच्छता अभियान के बीते चार साल में कई उल्लेखनीय कार्य हुए हैं। इस दौरान करीब नौ करोड़ शौचालय बनाए गए। 2014 में महज 39 प्रतिशत आबादी शौचालय का इस्तेमाल करती थी। आज यह आंकड़ा 90 प्रतिशत तक पहुंच गया है। अभी तक 20 राज्य खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। 20 राज्यों की इस उपलब्धि के बावजूद उत्तर और पूर्वी भारत के राज्यों में अभी काफी कुछ किया जाना शेष है। हमें इस पर ध्यान देना होगा कि स्वच्छता एक संस्कार के रूप में हमारी जीवनशैली में कैसे शामिल हो। इसके लिए हमें अपनी आदतों में परिवर्तन लाना होगा। आदत के कारण ही तमाम लोग शौचालय होने के बावजूद खुले में शौच की प्रवृत्ति नहीं छोड़ पा रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 40 प्रतिशत लोग गंदगी के कारण बीमार पड़ते हैं। इस कारण उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। हालांकि स्थिति में बदलाव भी दिख रहा है। डायरिया के मामलों में कमी आई है।

करीब तीन लाख बच्चों की जान बचाने में भी स्वच्छता अभियान की भूमिका मानी जा रही है। दरअसल लोगों को घर ही नहीं, आसपास भी सफाई की चिंता करनी होगी। आखिर क्या वजह है कि औसत नागरिक सड़क पर चलते अथवा ट्रेन-बस में सफर करते समय साफ-सफाई का ख्याल नहीं रखता? अपने घर का कूड़ा बाहर फेंक देना शिक्षित समाज की निशानी नहीं। देश के अन्य शहरों को इंदौर से सीख लेनी चाहिए। सफाई के मामले में इंदौर की सफलता लगन और समर्पण की कहानी है। सफाई के मामले में 2016 में यह शहर 25वें स्थान पर था, लेकिन अब सिरमौर है। यहां हर घर और दुकान से कूड़ा इकट्ठा करते समय ही सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग करने की व्यवस्था है ताकि उसका खाद और पशु चारे के तौर पर उपयोग किया जा सके। इंदौर की कायापलट इसलिए हो सकी, क्योंकि स्वच्छता अभियान ने लोगों की सोच बदलने का काम किया।  अगर यह काम इंदौर या फिर भोपाल में हो सकता है तो फिर देश के दूसरे शहरों में भी तो हो सकता है। अगर दूसरे शहरों में ऐसा नहीं हो पा रहा है तो इसका प्रमुख कारण साफ-सफाई की ठोस योजनाओं का अभाव है। स्वच्छता अभियान के कई आयाम हैं। जरूरी केवल यह नहीं कि सड़कों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों की नियमित सफाई हो।

इसी के साथ सीवर सिस्टम को भी दुरूस्त करने की जरूरत है। सीवर सिस्टम के अभाव या फिर उसमें खराबी के कारण लाखों लोग नारकीय स्थितियों में रहने को विवश हैं। नियोजित बस्तियां तो अपेक्षाकृत साफ-सुथरी दिखती हैं, लेकिन अनियोजित अथवा अवैध बस्तियों में गंदगी का ही आलम नजर आता है। हमारे शहरों की एक बड़ी समस्या कूड़ा निस्तारण की है। कूड़े के निस्तारण का उपयुक्त तंत्र न होने के कारण जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे होते हैं। अंतत: इससे ड्रेनेज सिस्टम जाम होता है और बीमारियों का प्रकोप बढ़ता है। बरसात के दिनों में ड्रेनेज जाम होने से सड़कें तालाब बन जाती हैं। कई शहरों का नियोजित विकास नहीं हो पाने से वहां का सीवेज सिस्टम ध्वस्त हो चुका है। अगर सीवर लाइनें हैं भी तो उनके गंदे पानी के शोधन की ठोस व्यवस्था नहीं है। इस मामले में सरकारों को कहीं अधिक ध्यान देना होगा। गंदगी के कारण शहरों की बदहाली का एक बड़ा कारण स्थानीय निकायों की निष्क्रियता है। यह नगर निकायों की जिम्मेदारी है कि वे शहर साफ रखें, लेकिन वे इस जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं। निकायों में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है। यह ठीक है कि उन्हें स्वायत्तता मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें अपनी कार्यप्रणाली भी दुरुस्त करनी होगी।

कई निकाय तो अपने कर्मियों को वेतन देने भर की आमदनी भी नहीं जुटा पाते। बहुत कम स्थानीय निकाय ऐसे हैं जिनके पास पर्याप्त संसाधन हैं। बेहतर होगा कि स्थानीय निकायों का नेतृत्व करने वाले यह समझें कि ईमानदार कोशिश की कभी हार नहीं होती। स्वच्छ समाज के निर्माण का हमारा सपना तब साकार होगा जब हम अपनी सोच में बुनियादी बदलाव लाएंगे। हम सभी को अपने आप से यह सवाल करना चाहिए कि क्या देश को गंदगी से मुक्त करना केवल सफाई कर्मियों का काम है? जिन सफाई कर्मियों को इस कारण विशेष महत्व मिलना चाहिए कि वे दूसरों की गंदगी साफ करते हैं उनके साथ अस्पृश्य सरीखा व्यवहार समझ से परे है। यह सबकी जिम्मेदारी है कि सफाईकर्मियों को यह आभास कराएं कि वे एक बड़ा काम कर रहे हैं। अभी हम इसके प्रति सचेत नहीं, इसका पता इससे भी चलता है कि रह-रह कर सीवर साफ करने वाले सफाई कर्मियों की मौत की खबरें आती रहती है। इन मौतों का एक बड़ा कारण सफाई कर्मियों की अनदेखी होती है। आखिर उन्हें आवश्यक उपकरण दिए बिना सीवर साफ करने के काम में लगाने का क्या मतलब? अगर स्वच्छ भारत के सपने को साकार करना है तो सफाई कर्मियों को मुख्यधारा में शामिल करने के साथ उन्हें समुचित संसाधन भी उपलब्ध कराने होंगे। एक मीडिया समूह के नाते दैनिक जागरण का यही प्रयास है कि जहां सफाई कमिर्यों को समुचित महत्व और मान मिले वहीं हर व्यक्ति इस भावना से लैस हो कि सार्वजनिक स्थलों को साफ-सुथरा रखना खुद उसकी भी जिम्मेदारी है।

News Clipping on 16-08-2018

Date:16-09-18

अमीर सांसद, गरीब खिलाड़ी

शशि शेखर, (प्रधान संपादक, हिन्दुस्तान)

सर आप हमें बुलाना चाहते हैं, तो कुछ पैसा लगेगा। हमें कोई कुछ देता-वेता नहीं। खिलाड़ी को पदक जीतने के लिए काफी मेहनत और रुपये की आवश्यकता होती है।’ मेरे वरिष्ठ सहयोगी एशियाड खेलों से पदक जीतकर लौटी महिला खिलाड़ी के कोच के मुंह से यह सुनकर हैरान थे। वह ‘हिन्दुस्तान’ द्वारा आयोजित ऐसे समारोह में उसे बुलाना चाहते थे, जिसमें सिर्फ नामचीन हस्तियां हिस्सा लेती हैं। क्या कोच ने कुछ गलत कहा था? वह जिस खिलाड़ी के कोच हैं, उसके पिता रिक्शा चलाते थे। बमुश्किल 200 रुपये रोज कमा पाते थे। इतने में एक भरे-पूरे परिवार का लालन-पालन भला कैसे होता? ऊपर से बेटी ने ओलंपियन बनने का सपना पाल लिया। हर ओर अभाव, दारिद्र्य और निराशा का घटाटोप, पर उसके नन्हे कदम डगमगाए नहीं। हर चुनौती से उसकी आंखों में दृढ़ता और मांसपेशियों में कसावट आती गई।

आज स्वर्ण पदक जीतकर वह अपने खेल के शीर्ष पर है। उसे मालूम है कि राज्य सरकार बहुत जल्दी मुझे 10 लाख रुपये प्रदान करेगी। जल्दी ही उसे किसी बड़े कॉरपोरेट घराने अथवा राज्य सरकार की नौकरी भी मिल सकती है, पर यह ‘सेलिब्रिटी’ बनने के बाद की बात है। लाल जब गुदड़ी के बाहर आ जाए, तो उसकी चकाचौंध सबको आकर्षित करती है, परंतु इस स्थिति तक पहुंचने के लिए जो यातना उसने झेली है, वह शब्दातीत है। आज वह स्टार बन चुकी है। बेहतर भविष्य उसका इंतजार कर रहा है, पर उसके कोच का क्या? अधिक से अधिक उसके हिस्से में कुछ तालियां और स्टार शिष्या के कुछ आदरपूर्ण शब्द आने वाले हैं। सिर्फ आदर से उदरपूर्ति हो जाती, तो क्या बात थी? हमारा गणतंत्र अपने सीने पर खिले गुलाब टांकने का तो आदी है, पर उसे उगाने वाले बागबां के बारे में सोचने का वक्त उसके पास नहीं। यही वजह है कि 125 करोड़ की आबादी वाला यह महान देश एशियाई खेलों में कुल 69 पदक पाकर इतरा रहा है। क्या यह इठलाने का मुद्दा है? इंडोनेशिया और ईरान जैसे अपेक्षाकृत छोटे देश हमसे आगे रहे।

मगर शर्म हम हिन्दुस्तानियों को आसानी से नहीं आती। आती होती, तो दिल्ली का हरीश कुमार सेपक टाकरा में कांस्य पदक जीतकर मजनूं का टीला में चाय न बेच रहा होता। स्पेशल ओलंपिक में स्वर्ण पदक अर्जित करने वाले राजेश वर्मा राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में मनरेगा मजदूरों की टोली में खडे़ नजर नहीं आते। अधिकांश पदक विजेताओं का यही हाल है। उनके परिवारों पर दरिद्रता का अखंड कब्जा है। किसी का भाई दिहाड़ी मजदूर है, तो अन्य के घर का हर सदस्य हर रोज सिर्फ एक जद्दोजहद का शिकार होता है कि रात को पेट कैसे भरे? 4×400 मीटर की रिले रेस में दौड़ रही भारत को स्वर्ण पदक दिलाने वाली सरिता गायकवाड़ की कहानी भी ऐसी है। जकार्ता के बाजारों में वह हसरत भरी निगाहों से बाजार और बिकाऊ सामानों को देखती रह गई। वह घरवालों के लिए ‘गिफ्ट’ खरीदना चाहती थी। उसकी अपनी भी कुछ ख्वाहिशें थीं, पर जेब तमन्नाओं का गला घोंट रही थी। अब इनमें से हरेक लखपति या करोड़पति होने जा रहा है, लेकिन जैसा मैंने पहले अनुरोध किया कि विजेता बनने के बाद सम्मान देने से जरूरी है कि अपने बच्चों को जीत के लिए तैयार किया जाए। हमारे देश में अभी तक इसकी मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। यहां यह जान लेने में भी हर्ज नहीं कि देश के 10 राज्यों में समूची बेशर्मी बरती जाती है।

यहां जन्मे लोगों को पदक जीतने के बाद भी कुछ नहीं दिया जाता। इस दुर्दशा के बावजूद अगर भारत की तरुणाई साधन संपन्न देशों के खिलाड़ियों पर जीत हासिल करती है, तो इसे देश के आम आदमी की विजय यात्रा माना जाना चाहिए। मैंने आम आदमी शब्द का इस्तेमाल जान-बूझकर किया। हमारे देश में साफतौर पर दो वर्ग हैं। एक वे, जो हुक्म चलाते हैं और दूसरा वर्ग, जो चुपचाप इस बेजारी को जीते हैं। आजादी के बाद साल-दर-साल यह त्रासदी मजबूत हुई है। अब राजवंशों की जगह राजनीतिक घरानों ने ले ली है। नतीजा, अरबपति नेताओं के यहां जन्मे बच्चे पहले दिन से ही न केवल अतुल संपत्ति के मालिक होते हैं, बल्कि हुकूमत खुद-ब-खुद दरवाजा खोलकर उनका इंतजार कर रही होती है। राजनीति की बात चली, तो बता दूं कि हमारी लोकसभा के 543 माननीय सदस्यों में से लगभग 450 करोड़पति हैं। राज्यसभा के सांसदों की औसत दौलत 55 करोड़ रुपये से ऊपर बैठती है। कभी विद्वानों, विचारकों अथवा विशारदों के लिए बनाए गए इस सदन में महज पांच सदस्य ऐसे हैं, जिनके पास 10 लाख रुपये से कम की दौलत है। ये करोड़पति ‘माननीय’ खेल, खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के लिए गए 70 सालों में कोई सार्थक नीति नहीं बना सके हैं। हम अपना यह शिकवा बिसरा सकते हैं, अगर इनमें से हरेक सिर्फ एक खिलाड़ी को गोद ले ले।

यकीन मानिए, हर प्रतियोगिता में हम पदक जीतते दिखाई पड़ेंगे। यहां एक विसंगति की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा। हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों में तमाम क्रिकेट संघों और संबंधित संगठनों पर कब्जे के लिए जी-जान लड़ा देते हैं। कुछ अन्य खेलों पर भी इनकी इनायत बरसती है, मगर एथलीट आमतौर पर उनकी कृपा से वंचित रह जाते हैं। वजह? क्रिकेट जैसा ग्लैमर और पैसा अन्य खेलों के नसीब में नहीं। इसके बावजूद मेरा अनुरोध है कि ग्लैमर और धन के लिए न सही, पर देश की खातिर वे इस पर विचार करें। हमारे खिलाड़ियों का हौसला बड़ा और जरूरतें छोटी हैं। ‘माननीयों’ की सत्ता, संपदा और साधनों का छोटा सा हिस्सा उनके लिए संजीवनी साबित होगा। वे चाहें, तो तत्काल शुरुआत कर सकते हैं, क्योंकि एशियाड की जंग जीतने वाले नौजवान अब ओलंपिक की तैयारी कर रहे हैं। वे अपने दम-खम का प्रदर्शन कर चुके हैं। अब बारी सत्ता और समाज की है। क्या हमारे ‘माननीय’ जागेंगे? या, उनकी आंखें सिर्फ संपदा और शक्ति के स्रोतों को ही निहारती रहेंगी?


Date:16-09-18

सार्क, बिम्सटेक और भारत

डॉ. दिलीप चौबे

पुणे में चल रहे ‘‘बिम्सटेक’ के पहले संयुक्त सैनिक युद्धाभ्यास के लिए अंतिम क्षणों में अपनी फौज भेजने से इनकार करके नेपाल ने इस क्षेत्रीय समूह को कमजोर करने की कोशिश की है। इस बात की संभावना ज्यादा है कि काठमांडू ने बीजिंग के दबाव में यह फैसला लिया है। नेपाल के कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली वैचारिक दृष्टि से चीन के ज्यादा करीबी हैं और वह भारत के बरक्स चीनी कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी ने बिम्सटेक शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए संयुक्त सैनिक अभ्यास की घोषणा की थी। असलियत में नेपाल के शामिल होने से चीन नाराज हो सकता था और काठमांडू बीजिंग से मधुर रिश्ता चाहता है। मगर भारत और नेपाल के रिश्तों के बीच जो रुकावटें पैदा हो रहीं हैं, उससे बिम्सटेक जैसे क्षेत्रीय समूह का भविष्य प्रभावित हो सकता है। पाकिस्तान का सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति के कारण दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन (सार्क) धीरे-धीरे अप्रासंगिक होता जा रहा है।

हालांकि, पाकिस्तान के नवनिर्मित प्रधानमंत्री इमरान खान सार्क शिखर सम्मेलन को दोबारा शुरू कराने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं। इस्लामाबाद सार्क सम्मेलन की मेजबानी के लिए अन्य सदस्य देशों का समर्थन जुटा रहा है। श्रीलंका, मालदीव और नेपाल ने अपना समर्थन दिया है। लेकिन उम्मीद है कि भारत अपने रुख पर डटा रहेगा, जब तक पाकिस्तान का आतंकवाद के प्रति अपना रुख बदलता नहीं है। दो हजार सोलह में सार्क का 19वां सम्मेलन पाकिस्तान में होना था, लेकिन उरी में पाक समर्थित आतंकवादी संगठनों के हमले के बाद भारत ने इसका बहिष्कार कर दिया था। इसके बाद से अभी तक इसकी कोई बैठक नहीं हो पाई है।भारत के लिए सार्क और बिम्सटेक दोनों की अहमियत है। लेकिन बिम्सटेक समूह भारत की मौजूदा विदेश नीति के लिहाज से विशेष कूटनीतिक महत्त्व रखता है; क्योंकि इसमें शामिल म्यांमार और थाईलैंड नई दिल्ली की ‘‘एक्ट-ईस्ट नीति’ का अहम हिस्सा है।

इस क्षेत्रीय संगठन की अहमियत इसलिए भी अधिक है कि यह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया को जोड़ने के लिए पुल का काम करता है। सार्क सम्मेलन के स्थगित होने के कारण भारत बिम्सटेक को मजबूत करने की दिशा में अग्रसर है। परंतु नेपाल के रुख से लगता है कि वह सार्क को ज्यादा अहमियत देना चाहता है। दो हजार सोलह में जब भारत ने पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन का बहिष्कार किया था, तब नेपाल पाकिस्तान के साथ सम्मेलन के पक्ष में खड़ा था। इधर नेपाल में सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड दहल ने भी सार्क सम्मेलन को शुरू करने की इच्छा व्यक्त की है। नेपाल की यह सद्इच्छा सार्क को पुनर्जीवित करने के लिए है या पाकिस्तान को इस क्षेत्रीय संगठन में पुनप्र्रतिष्ठित करने के लिए कहना मुश्किल है। हालांकि नई दिल्ली को ऐसी राजनीतिक जमीन तैयार करनी चाहिए कि दोनों क्षेत्रीय समूहों की प्रासंगिकता कायम रहे। निसंदेह भारत उभरता हुआ महाशक्ति है। इसलिए इन दोनों क्षेत्रीय समूहों के सदस्य देशों के बीच आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाना उसकी महती जिम्मेदारी है। साथ ही दक्षिण एशिया का नेतृत्व भारत के ही हाथों में रहेगा।


Date:15-09-18

Performing moderately

A new state of democracy report records a significant dip in India’s record on civil liberties, personal integrity and security, freedom of association, media integrity, gender equality

S Y Quraishi

Today, the world celebrates the 11th International Day of Democracy in pursuance of a UN resolution. This is an appropriate occasion to have a look at the state of democracy in South Asia, especially India. The world saw a huge wave of democratisation after World War II. The newly-liberated states in Latin America, Africa and Asia adopted democratic forms of government after centuries of colonial subjugation. Today more people live under various forms of democracy than ever before. More than 120 of the 192 countries in the world have some form of democracy — only 11 parliamentary democracies existed in 1941. This indicates the appeal of democratic ideas and systems.

South Asia is home to 3 per cent of the world’s area and 21 per cent of the world’s population. It’s significant that 50 per cent of the world’s population living under some form of democratic rule resides in this region. Despite the democratic upsurge, there are significant challenges like poverty, inequality, gender injustice, nepotism and corruption. Elected despots and authoritarian leaders are weakening democracies across the world. Political experts have argued that democratic values are on the decline, especially in the West. The International Institute for Democracy and Electoral Assistance (IDEA), an inter-country organisation, tried to evaluate the state of democracy in the world in the light of such worrying claims.

The Global State of Democracy Index (GSoD) looks at the trends in democratisation from 1975 to 2017. With the help of a set of 98 indicators, IDEA aims to study the factors which threaten democracy throughout the world and those that make it strong and resilient. The study covers a variety of important indicators such as representative government, fundamental rights, checks on the government, impartial administration and participatory engagement. These have many sub indicators for an in depth indices-based analysis. When it comes to representative government, India and Sri Lanka have maintained relatively high scores.

Afghanistan, Bangladesh, Nepal and Pakistan have had periods of non-elected regimes. The general trend in South Asia in this respect has, however, been positive. With respect to ensuring fundamental rights, the region’s score matches that of Asia Pacific but it is slightly below the global average. At the country level, Afghanistan and Nepal have seen the most improvement. Sri Lanka and Pakistan saw a slight decline in the 1970s and 1980s. India’s score has been stable since the late 1970s. However, a decline has been observed since 2015. South Asia shows a steady improvement on the yardstick that measures gender equality with Nepal standing out. India’s score was better than the world average till 2003 but there has been a dip in the country’s performance on the gender equality yardstick since then. When it comes to checks on government, South Asia has shown a steady increase from 1975 to 1994. Afghanistan, Nepal and Pakistan have shown the most improvement. Bangladesh, India and Sri Lanka have remained relatively stable with scores in line with the global average.

In the yardstick on impartial administration, South Asia follows both the regional and global trends with no significant change, except in Nepal, which has seen a significant improvement. However, the “absence of corruption” sub-indice within the “impartial administration” category shows a worrying tendency in South Asia. The region has the lowest scores in the world despite a slight improvement between 2012 and 2015. A robust civil society is essential for deliberative decision making. Civil society participation has increased in India by leaps and bounds between 1978 and 2012 after which it declined drastically to fall below the average of Asia Pacific and that of the World. In 2017, it was the lowest since 1975. In 2017, the gap between the Indian score and the world average in the yardstick that measures “personal integrity and security” was the widest since 1977.

This is worrying. In the past 10 years, South Asia’s scores for electoral participation are in line with the global average but slightly below the Asia Pacific average. Recently, there has been a decrease in voter participation in Bangladesh but a slight increase in India and Sri Lanka. One of the major challenges to democracy is people losing faith in it. There are many reasons for such disillusionment, including corruption, nepotism and unemployment. This often leads to people disengaging with key public policy issues which, in turn, makes those in power less accountable. Other factors, in contrast, contribute to the popularity of democracies. These include transparency in political processes, accountability of elected representatives, basic freedoms for all citizens, equal rights for women and minorities and high rates of voter participation.

The GSoD report analyses India’s performance on all the above-mentioned indicators and shows that the country has done moderately well. On yardsticks such as elected government, effective parliament and impartial administration, the country’s scores hover around the world average but in the last decade, there has been a significant dip in the country’s record on civil liberties, personal integrity and security, freedom of association, media integrity, gender equality and basic welfare. In fact, India’s performance on the yardstick to measure media integrity was better than the global and South Asian average between 1994 and 2012. However, the country’s score has fallen below the global and Asia-Pacific average in 2017. Given that a free and fair media is crucial to a meaningful democracy, this is a worrying tendency. The Election Commission has played an important role in conducting free and fair elections in the country. The Commission’s Systematic Voters Education for Electoral Participation Programme role has been crucial in this respect.

An independent judiciary is another reason for the resilience of democracy in India. The apex court has given judgments that keep a check on the government and ensure a transparent and accountable system. Democracy does not merely mean voting rights for people, it means empowering people by granting them equality. It also means the creation of mechanisms to resolve differences through dialogue and with mutual respect and understanding. India does have the highest rating among South Asian democracies. But its performances on several yardsticks makes it a flawed democracy. If we want the largest democracy to count among the world’s greatest, there must be serious introspection among all stakeholders.

News Clipping on 15-08-2018

Date:15-09-18

दहेज कानून की ताकत फिर पहुंची पुलिस के पास

संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही एक फैसले को पलटते हुए दहेज उत्पीड़न रोकने के लिए बनी भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए के तहत सीधे गिरफ्तारी का अधिकार फिर पुलिस के पास देकर अपनी सीमाएं रेखांकित कर ली हैं। इस फैसले के तहत अब दहेज की शिकायत की सत्यता जांचने वाली परिवार कल्याण समितियों का हस्तक्षेप खत्म हो जाएगा और यह पुलिस ही फैसला करेगी कि शिकायत सही है या गलत।  अदालत ने यह फैसला देते हुए एक महत्वपूर्ण बात यह कही है कि संविधान अदालत को यह अधिकार नहीं देता कि अगर किसी कानून में कोई कमी रह गई है तो वह उसे पूरा करे। उसे पूरा करने का अधिकार विधायिका को है। एक साल पहले 2017 के जुलाई में न्यायमूर्ति एके गोयल और न्यायमूर्ति यूयू ललित ने यह मानते हुए कि दहेज की फर्जी शिकायतें बहुत आ रही हैं और उसके कारण परिवार के बूढ़े और रिश्तेदारों को भी परेशान किया जाता है, फैसला दिया था कि अब दहेज की शिकायत आने पर एक कल्याण समिति जांच करेगी। जांच करने वाली समिति जब मामले को सही पाएगी तभी पुलिस गिरफ्तारी करेगी। इस निर्णय के तहत हर जिले में ऐसी समितियां बनाए जाने का आदेश हुआ था। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने न्यायाधार नामक एनजीओ की याचिका पर फैसला सुनाते हुए उन कल्याण समितियों को भंग कर दिया। एक तरह से अदालत दहेज पीड़ित महिला और कानून पीड़ित परिवार वालों के बीच एक संतुलन बनाने की दुविधा में थी और उसने आखिरकार संबंधित कानून के पक्ष में अपने पुराने फैसले को वापस ले लिया। पता नहीं यह हाल में आए एससीएसटी कानून के बाद का असर है या फिर महिला अधिकार संगठनों का लेकिन, अदालत मानवाधिकारों का हवाला देकर उन कानूनों को कमजोर करने से बचती नज़र आ रही है, जिन्हें सामाजिक न्याय के लिए बनाया गया है। शायद अदालत को यह अहसास हो रहा है कि सामाजिक न्याय की आवश्यकता और उसके पक्ष में खड़े आंदोलन उसके फैसले की आलोचना और विरोध कर सकते हैं इसलिए यह मामला विधायिका के पास ही छोड़ना उचित है। हालांकि, अदालत ने यह कहा है कि दहेज कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए सीआरपीसी में धारा 41ए और अग्रिम जमानत के प्रावधान पहले से मौजूद हैं।


Date:15-09-18

अखरने वाली है नेपाल की बेरुखी

नेपाल ने पुणे में बिम्सटेक के संयुक्त सैन्याभ्यास से ऐन मौके पर पीछे हटने का जो पैंतरा दिखाया, वह हैरान करने वाला था।

डॉ. रहीस सिंह , (लेखक विदेश संबंधी मामलों के जानकार हैं)

बीते अगस्त के आखिर में जब बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन) का चौथा शिखर सम्मेलन काठमांडू में आयोजित हुआ, तब ऐसा लग रहा था कि नेपाल पुरानी कड़वाहटों को भूलकर पुन: भारत के साथ आगे बढ़ने की राह चल पड़ा है। लेकिन उसके बाद नेपाल ने पुणे में बिम्सटेक के संयुक्त सैन्याभ्यास से ऐन मौके पर पीछे हटने का जो पैंतरा दिखाया, वह हैरान करने वाला था। उससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह कि नेपाल उस चीन के साथ सैन्याभ्यास के संकेत दे रहा है, जिससे भारत की प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है।

नेपाल ही नहीं, अन्य पड़ोसी देश भी धीरे-धीरे हमसे दूर छिटक रहे हैं। आखिर इसकी क्या वजह है? क्या यह नेपाल सहित हमारे तमाम पड़ोसियों की अदूरदर्शिता है, जो वे चीन की छद्म उपनिवेशवादी नीति को न समझते हुए उसके जाल में फंसते जा रहे हैं? अथवा, जैसा कुछ आलोचक मानते हैं कि भारत इस समय भ्रामक कूटनीतिक रास्ते पर चल रहा है और इस वजह से ऐसा हो रहा है?

दुनिया की महाशक्तियां हों या फिर उभरते शक्तिशाली देश, सभी अपनी विदेश नीति के प्रतिपादन एवं संचालन में पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता देते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि दुनिया के अन्य देश हमें अपने पड़ोसियों की नजर से भी देखते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि पड़ोसियों के साथ प्रतिकूल संबंध वैश्विक कूटनीति में हमें इच्छित भूमिका पाने से वंचित कर देते हैं या फिर उनमें बाधाएं उत्पन्न् करते रहते हैं, जिससे हमें अतिरिक्त प्रयास करने पड़ते हैं। फिलहाल, भारत इन दोनों स्थितियों से गुजरता रहा है, क्योंकि पाकिस्तानी ‘स्टेट एक्टर्स भारत को अपना दुश्मन नंबर-1 मानते हैं, इसलिए उनका हरसंभव प्रयास हमें नुकसान पहुंचाने का रहता है। इधर, अन्य छोटे पड़ोसी देश भी भारत से दूर हटते दिख रहे हैं। तो क्या वे स्मॉल स्टेट सिंड्रोम के शिकार हैं या इसकी वजह कोई और है?

भारत शुरू से ही सह-अस्तित्व, एफ्रो-एशियाई भ्रातृत्व और ‘पड़ोसी पहले की नीति का पक्षधर रहा है, बावजूद इसके परिणाम भारत के पक्ष में जाते नहीं दिख रहे। पाकिस्तान तो घोषित रूप से भारत विरोधी रहा ही है, लेकिन अब नेपाल भी उसी राह पर आगे बढ़ता दिख रहा है। भारत और नेपाल की सीमाएं खुली हैं। दोनों देशों में लगभग प्रत्येक स्तर पर समानता पाई जाती है और नेपाल के लोग प्राचीन दौर से ही भारत को अपना दूसरा घर मानते रहे हैं। लेकिन नेपाल के सत्ता-प्रतिष्ठान की ओर से इस समय जो संकेत मिल रहे हैं, उन्हें कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता। पिछले 15 दिन के घटनाक्रम पर नजर दौड़ाएं, तो नेपाल की ओर से भारत को तीन झटके दिए गए। पहला झटका वह था, जब नेपाल ने पुणे में हो रहे बिम्सटेक संयुक्त सैन्याभ्यास में शामिल होने से इनकार कर दिया और अपनी सैन्य टुकड़ी वापस बुला ली। नेपाल की तरह से भारत को दूसरा झटका तब लगा, जब नेपाल ने यह घोषणा की कि उसकी सेना इसी महीने 17 से 28 सितंबर के बीच चीन के साथ सैन्याभ्यास में हिस्सा लेगी। नेपाल का चीन के साथ यह दूसरा सैन्याभ्यास (सागरमाथा फ्रेंडशिप-2) है, जो चीन के ‘चेंग दूमें होगा। भारत को तीसरा झटका तब लगा, जब पुणे में 16 सितंबर को होने जा रहे बिम्सटेक देशों के सेनाध्यक्षों के सम्मेलन का आमंत्रण नेपाल के सेना प्रमुख पूर्ण चंद्र थापा द्वारा ठुकरा दिया गया। संयुक्त सैन्याभ्यास और बिम्सटेक देशों के सेनाध्यक्षों की बैठक में थाईलैंड की भागीदारी भी नेपाली पैटर्न का अनुसरण करती दिख रही है। तब किस आधार पर कहा जा सकता है कि ये उपक्षेत्रीय संगठन भारतीय हितों के अनुरूप पड़ोसी देशों को कनेक्ट करने में सफल हो पाएगा या भारत अपने पड़ोसियों में पैठ बनाकर उपक्षेत्रीय नेतृत्व हासिल करने में सफल हो जाएगा? आखिर क्या वजह है कि भारत के पड़ोसी देश कुछ कदम साथ चलकर दूसरी दिशा पकड़ लेते हैं?

पड़ोसियों के इस रवैये का एक कारण तो चीन है। चीन इन देशों को भारत से दूर ले जाने की भरपूर कोशिश कर रहा है। चीन के इसके पीछे दो उद्देश्य हैं। पहला, उन देशों के इन्फ्रास्ट्रक्चर और प्राकृतिक संसाधनों में निवेश कर उनकी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कायम करना एवं सरकार पर दबाव की रणनीति अपनाना। दूसरा, इन देशों के जरिए भारत को घेरने की रणनीति को साधना। चूंकि सार्क और बिम्सटेक जैसे संगठनों के जरिए भारत एशियाई महाद्वीप में अपना असर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, इस स्थिति में चीन भारत को उसके पड़ोसियों के जरिए ही रोकना चाहेगा। यही हो भी रहा है। तब क्या हम मान लें कि भारत की विदेश नीति चीन के मुकाबले अनसुलझी, अस्थिर, तदर्थवादी अथवा भ्रम की शिकार है। हम नेपाल की तरफ चलते हैं। नेपाल सही अर्थों में चीन के साथ सैन्याभ्यास कर भारत की उत्तरी सीमाओं तक चीनी सैन्य गतिविधियों को खींच कर लाने का काम कर रहा है, जो भारत के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। यही नहीं, अब तक पाकिस्तान ही एक ऐसा देश था, जहां राष्ट्रवाद भारत के विरोध पर पनपता है, लेकिन अब उसी तरह की स्थितियां नेपाल में भी दिखनी शुरू हो गई हैं। यह भारत के लिहाज से हितकर नहीं।

आखिर इसकी वजह क्या है? इसकी सबसे अहम वजह तो वर्ष 2015 में भारत की तरफ से अघोषित नाकेबंदी रही। ध्यान रहे कि वर्ष 2015 में नेपाल में चले मधेशी आंदोलन के दौरान भारत की तरफ से अघोषित नाकेबंदी की गई थी, जिसकी वजह से नेपाल में जरूरी चीजों की भारी दिक्कत पैदा हो गई थी। नेपाल को उस समय चीन की तरफ देखना पड़ा था और चीन ने तत्काल आपूर्ति भी सुनिश्चित करा दी थी। इस घटना के बाद से अब तक भारत और नेपाल के बीच संबंधों में पुराना भरोसा नहीं लौट पाया। बाद में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने चीन की यात्रा की और दोनों में हुई पारगमन संधि के बाद चीन ने नेपाल के लिए थियान्जिन, शेंजेन, लिआनियुगैंग और श्यांजियांग पोर्ट खोल दिए। यही नहीं, चीन ने नेपाल को लैंड पोर्ट लोंजोऊ, लासा और शिगैट्से के इस्तेमाल पर भी सहमति जता दी है। इसके दोतरफा नतीजे होंगे। एक तरफ नेपाल की भारत पर निर्भरता कम होगी और दूसरी ओर चीन नेपाल में भारत की तुलना में अपनी मौजूदगी कहीं अधिक बढ़ाने में सफल हो जाएगा।

कुल मिलाकर नेपाल और चीन के मध्य बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती हैं। दूसरी बात यह है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना अपने पूर्ववर्ती महिंदा राजपक्षे द्वारा बनाए गए उस रास्ते पर मुड़ चुके हैं, जिसकी दिशा बीजिंग की ओर है। मालदीव आज भारत के हेलिकॉप्टर रखने को तैयार नहीं है, लेकिन चीन एवं पाकिस्तान के फाइटर उसके एक्सक्लूसिव जोन की सुरक्षा कर रहे हैं। डोकलाम प्रकरण के बाद भूटान भी विचलित है, तो वहीं बांग्लादेश चीन की ओर अधोसंरचनात्मक विकास की खातिर देख रहा है। यह देखकर यही लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के साथ ‘नेबर्स फर्स्ट जो नीति अपनाई थी, उसमें उलझनें पैदा हो गई हैं। ऐसे में जरूरी यह है कि भारत तदर्थवादी या प्रतिक्रियात्मक नीति अपनाने के बजाय अग्रसक्रिय नीति अख्तियार करे।


Date:14-09-18

बच्चों को मिले मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार

अमिताभ पाण्डेय

मानव सभ्यता के विकास में भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भाषा केवल संवाद करने का शशक्त माध्यम नहीं है। यह मनुष्य के भावों, संवेदनाओं के प्रकटीकरण के लिए आवश्यक है। भाषा के माध्यम से हमारी परंपराओं, संस्कृति और संस्कार का भी पता चलता है। भाषा मनुष्य को सभ्य और ज्ञानवान बनाने में सहयोग करती है। सभ्य और ज्ञानवान मनुष्यों से मिलकर श्रेष्ठ राष्ट्र की रचना का सपना साकार होता है। बेहतर देश की कल्पना को साकार करने के लिए पहले बेहतर मनुष्य होना जरूरी है। यह भाषा ही है जो अपने साथ विचार, भाव, संवेदना, संस्कार, संस्कृति का ज्ञान शिशु को प्रदान कर उसे श्रेष्ठ मनुष्य बनने की ओर अग्रसर करती है। हम जिस भाषा का उपयोग बोलने, बताने, आपसी बातचीत में करते हैं, वही भाषा बच्चे आसानी से समझ सकते हैं। इसी भाषा को बोलने में बच्चों को अधिक सुविधा होती है। ऐसी भाषा में ही बच्चे अपेक्षाकृत अधिक बेहतर तरीके से शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

आजादी के बाद हमारे देश के नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों ने भाषा के महत्व को गंभीरता से समझा और विदेशी भाषा अंग्रेजी के स्थान पर शासकीय कामकाज को भी हिन्दी भाषा में महत्व दिया। हिन्दी को राजभाषा बनाये जाने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। वर्ष 1955 में प्रथम राजभाषा आयोग का गठन हुआ। वर्ष 1956 में इस आयोग द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर संसद के दोनों सदनों में विचार किया गया। इसके बाद रिपोर्ट राष्ट्रपति के पास भेज दी गई। राष्ट्रपति की अनुशंसा पर प्रथम राजभाषा आयोग की रिपोर्ट के अनुसार अनुच्छेद 343 के अधीन संसद ने राजभाषा अधिनियम 1963 बनाया। अनुुच्छेद 351 के अधीन यह स्वीकार किया गया है कि हिन्दी के विकास के लिए हार संभव प्रयास किये जायेंगे।

हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार और इसके अंतर्गत विभिन्न राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों की सरकारें अपने-अपने स्तर पर लगातार प्रयास कर रहीं हैं। इसके बाद भी गुलामी का प्रतीक मानी जाने वाली अंग्रेजी भाषा से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है। हालात इतने इतने चिंताजनक होते जा रहे हैं कि जो अंग्रेजी भाषा पहले उच्च अधिकारियों तक, ईसाई मिशनरी के स्कूलों तक ही सीमित थी, वह अब सरकारी स्कूलों से लेकर गांव, शहर के गली मोहल्लों तक फैले निजी स्कूलों तक जा पहुंची है। इसका सर्वाधिक नुकसान हिन्दी के साथ ही विभिन्न राज्यों में बोली जाने वाली उन क्षेत्रीय भाषाओं को हो रहा है जिनके बोलने, बताने वाले लगातार कम हो रहे हैं। अंगेे्रजी के विस्तार ने विभिन्न राज्यों के अलग-अलग इलाकों में बोली जाने वाली स्थानीय भाषाओं, बोलियों का प्रचनल सीमित कर दिया है। हाल यह हो गया है कि हमारी स्थानीय भाषाऐँ और बोलियां हम से लगातार छूटती जा रही है। स्थानीय भाषाओं, बोलियों में जो भाव, संस्कृति और परंपरायें हैं, वे भी इसके साथ खत्म होती जा रही है।

अंग्रेजी भाषा को साजिशन पूर्व प्राथमिक और प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों में इस प्रकार डाल दिया गया है कि इसके कारण क्षेत्रीय भाषाएँ और बोलियां स्कूलों से बाहर हो रही है। अंग्रेजी का बढ़ता प्रचलन हिन्दी भाषा को कमजोर करने में लगा है। इसके कारण क्षेत्रीय भाषाओं, बोलियों, जनजातीय समुदाय में बोली जाने वाली भाषाओं के अस्तित्व पर ही संकट गहरा गया है। यह धीरे-धीरे खत्म होने की ओर बढ़ रही है। इनको जानने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। आजाद देश के अंग्रेजी बोलने वाले लोग खुद को श्रेष्ठ वर्ग का मानकर हिन्दी को निचले दर्जे का बताने का कोई मौका नहीं छोडते। अंग्रेजी बोलने वालों की यह मानसिकता हिन्दी बोलने वालों के मन में हीन भावना पैदा करने की कोशिश कर रही है।

अंग्रेजी को बचपन से बच्चों के दिमाग में घुसाने की स्वार्थपूर्ण साजिश के कारण बच्चों की परेशानी बढ़ गई है। वे अपने घरों में माता-पिता, परिवारजनों से जिस भाषा में बात करते हैं, उसी में शिक्षा ग्रहरण करना चाहते हैं। ऐसा करना आसान भी है। यह जानते हुए भी हम अपने बच्चों को पहली कक्षा में दाखिल करने के पहले से ही अंगेे्रजी भाषा के पाठ पढ़ने-पढ़ाने पर मजबूर कर रहे हैं। जो भाषा उनके लिए समझना कठिन है उसे बच्चों के मन, मस्तिष्क पर जबरन डाला जा रहा है। इस संदर्भ में अंतराष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के उन सिद्धांतों का जिक्र करना जरूरी होगा जिसमें कहा गया है कि बच्चे को उसकी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाना चाहिए। यदि बच्चे को मातृभाषा में शिक्षा नही दी जाए तो यह उसके अधिकारों का हनन माना जाएगा।

यहां यह बताना जरूरी है कि जो भाषा अपने घरों में बोलते, सीखते हैं, उसमें उन्हें सीखने, समझने में ज्यादा आशानी होती है। यदि प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई के लिए मातृभाषा अथवा श्रेत्रीय भाषाओं, बोलियों को अनिवार्य कर दिया जाए तो इसके अवश्य ही अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। बच्चे अपने परिवार में बोलने वाली भाषा का उपयोग स्कूलों में होते देखेंगे तो इससे उनकी प्रतिभा और अधिक बेहतर हो सकेगी। इसका कारण यह है कि प्राथमिक शिक्षा में स्थानीय भाषा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। अब समय आ गया है कि बच्चों को केवल शिक्षा के अधिकार दिये जाने की बात कह कर ही अपनी जिम्मेदारी पूरी ना कर ली जाए बल्कि हर बच्चे को उसकी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिले। सरकार और समाज के नीति निर्धारकों को बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए इस दिशा में परिणामदायक प्रभावी प्रयास करना चाहिए ।


Date:14-09-18

A higher policy burden

Top-down, centrally managed policies oppress India’s education sector. More autonomy, radical restructuring of goals, enlightened leadership are necessary for a turnaround

Dinesh Singh , [ The writer is former vice-chancellor, University of Delhi and distinguished senior fellow, Advanced Hackspace, Imperial College. ]

Two recent events seem like missteps in India’s efforts to chart a mature and productive path in the realm of higher education. The first of these events is the effort of the government to produce an education policy and the second is its intent to foster “institutions of eminence”. The idea of an education policy has socialist, and even communist, overtones that are not in tune with a government that leans to the right. I wonder what logic prompted the top-down effort to create institutions of eminence in such a selective manner that leaves the vast majority of educational institutions struggling and mired in the deathly quicksand of bureaucratic control and mediocrity.

At one time, the IITs were created with exactly the same intentions and in a similar manner. But the performance of the IITs has been largely uninspiring. Three factors can be blamed for this situation — too much government control, largely mediocre faculty and no programme or activity to connect with India’s challenges and needs so as to inspire students. As an example of government meddling, consider this amusing two-line cryptic resolution adopted for all the IITs a year ago by the IIT Council: “It was decided that each IIT may adopt at least one National Laboratory near to it and enter into an MoU mutually beneficial to both”.

Of course, the public at large perceives an IIT to be a sort of super institution meant for talented children. And they do attract very smart students. But smart students must be matched by highly inspiring faculty, and by creating programmes of learning that are in tune with societal challenges. Further, these institutions must be given time, freedom and an enlightened leadership to mature. In the initial phase, the IITs failed to meet the urgent need of grasping the special aspirations and requirements of an independent India; they failed to invent and innovate to address the country’s needs. Not one IIT aided our space or nuclear programmes. When it came to building bridges, roads or dams, there was hardly any creative input from any IIT.

Of course, each of the first five IITs was, in the initial years, tethered to a well-known institution abroad and did adopt in limited ways some aspects of a reasonable curriculum. But it was not done in a well-thought out manner that would have allowed originality to flourish in the Indian context. The one change, dictated by the American model, which the IITs adopted to break the colonial mould, was to have a semester system. But they failed to allow their students to truly imbibe and flourish under a trans-disciplinary system, which the semester system can allow with greater ease than an annual mode of examination. And over time, the faculty tended to settle into harmonious mediocrity with the usual, but few, outstanding exceptions. The tragedy is these exceptions failed to create lasting and great traditions.

Also, the IITs and the government neglected to put in place a major virtue of the American system that attracts, recognises and rewards good faculty at the global level. The IITs also failed to recognise that diversity is the key to survival and they could not develop outstanding qualities and features that would distinguish one IIT from another. For instance, the IITs have a joint entrance examination that looks for identical attributes and abilities in every aspirant. This, in itself, denotes that there is nothing special that any individual IIT offers. The entrance examination does not differentiate between any special qualities that would make the abilities required of a civil engineering aspirant stand out and be recognised as different from the abilities needed of an electrical engineering aspirant.

Contrast this with MIT, Harvard and Caltech, which admit students into their respective engineering programmes but through differing selection processes even while relying a great deal on SAT. Incidentally, SAT itself has come under criticism in recent times. Another illustration of their diversity is how these notable US institutions teach freshman calculus, but in ways that differ from each other. Has any of our IITs created an economically powerful entrepreneurial ecosystem in its immediate neighbourhood or elsewehere? No path-breaking knowledge-based idea of practical import, such as the search engine Google, seems to have emerged from the IITs. They are largely teaching institutions and if someone of the stature of N R Narayana Murthy bemoans the inadequacies of IIT graduates, then we need to be worried.

Indian universities have an even more disappointing track record. Their only major innovation in recent years is the adoption of a semester mode exemplified by the fact that, more often than not, the courses they teach have been mechanically split from an annual mode into two halves. It would have been a magical transformation had they taken advantage of the semester system to breed a pedagogy that engenders trans-disciplinary learning blended with project-based activities for real-world knowledge acquisition and creation. The best way to gauge the lacklustre quality of Indian universities is to ask if any Nobel laureate from any part of the world has ever expressed willingness to join any of our universities as faculty.

In addition, the restrictive and overbearing policies of government agencies have made true innovation and experimentation near impossible. For instance, the choice-based credit system, a mutilated version of an American concept, has forced universities to collectively drop diversity and adopt a largely common curriculum imposed from above, compelling them to sink to abysmal levels. Universities are failing at an alarming pace in their responsibility to foster research. India has consistently put its money on specialised research institutes that lack students and do not deliver the way a university can, as in the US. Another mechanism India has not paid attention to is the use of government funding agencies to raise and foster high quality research. These funding agencies have not nudged research in the universities towards the needs and challenges of the nation, and of society, as much as they could have.

We must not fail to recognise that the American system of higher education has generated its own set of serious problems and drawbacks. So, India must chart its own original path. Some valuable lessons could be imbibed from our own heritage: Ask what allowed the calculus to be discovered by Bhaskaracharya and Madhavacharya hundreds of years before the time of Isaac Newton. In modern times, much can also be learned from the Indraprastha Institute of Information Technology at Delhi. It is truly autonomous, serves the society well, has good and wise leadership and faculty and students to match. Its outstanding record may be because two successive state governments wisely left it alone and did not burden it with any policy!

News Clipping on 14-08-2018

Date:14-09-18

Sinking Deeper Into the MSP Mire

Farming’s global competitiveness at risk

ET Editorials

The political compulsion to be seen to be doing something earnest to address farm distress is entirely understandable, but expanding the scheme of minimum support prices (MSP) for crops is not the right solution. The government already runs a very expensive MSP scheme for the grains covered by the National Food Safety Act: rice, wheat and coarse grains.Offering MSP for crops without reference to efficiency prices is the surest way to kill the global competitiveness of Indian farm produce. For the government to procure huge amounts of any farm produce without a plan for how to offload the stocks is a prescription for financial loss and waste.

Schemes for the government to make good the difference between the MSP it announces and the market price end up in traders colluding to beat down the market price so as to get a liberal handout from the government. India has to move out of the MSP paradigm to boost agricultural productivity.MSP is computed as a mark-up over the cost of production. The cost can be computed in either of two ways. One is dubbed in the jargon as A2 + FL — the actual cost of all purchased inputs and the imputed cost of unpaid family labour.

A broader measure is C2 + FL, in which, the imputed rental of the land used for cultivation and the income forgone from alternative uses of other fixed capital used in cultivation is added to A2 + FL. If costs are reimbursed via MSP, the incentive to minimise costs is eroded. The way to support agriculture has to shift to something else. Farmers can be given income support linked to how much land they cultivate, regardless of crop, as the government of Telangana has started to.

Choice of crop and the cost of cultivation should be left for the farmer to determine, in response to price signals emanating from an efficient market for agricultural commodities, in which global prices play the role they place for tradable industrial goods. The bulk of state assistance for farming must go into investment, not subsidy. The subsidy strategy, diligently followed hitherto, has only produced distress. It is time to accept it.


Date:14-09-18

26 वर्षों में देश का 34 फीसदी तटीय इलाका समुद्र में डूबा

देश में कुल तटीय रेखा में से 6,031 किमी का ही सर्वेक्षण किया गया। पश्चिमी तट के मुकाबले पूर्वी तट पर यह समस्या ज्यादा गंभीर है और इस मामले में पश्चिम बंगाल का तटवर्ती इलाका सबसे संवेदनशील है। सबसे ज्यादा भूमिकटाव यहीं हुआ है। बंगाल की खाड़ी के तटीय इलाकों में यह समस्या ज्यादागंभीर है। इसके बाद पुडुचेरी, केरल और तमिलनाडु का स्थान है।

 

नुकसान की भरपाई मुश्किल

चेन्नई स्थित एनसीसीआर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक तटीय इलाकों में भूमिकटाव आसपास रहने वाली आबादी के लिए बड़ा खतरा बन गया है। अगर शीघ्र इस पर अंकुश की दिशा में पहल नहीं की गई तो और ज्यादा जमीन व आधारभूत ढांचा समुद्र में समा जाएगा। इस नुकसान की भरपाई मुश्किल है। इससे तटीय इलाकों में स्थित गांवों व शहरों में रहने वाली आबादी, इमारतों और होटलों को भारी नुकसान पहुंचेगा। एनसीसीआर के निदेशक एमवी रामन्ना मूर्ति की मानें ताे तटीय इलाकों के पानी में समा जाने से खेती को भी काफी नुकसान होता है। रिपोर्ट के मुताबिक नौ राज्यों और दो केंद्रशासित क्षेत्रों में भूमिकटाव का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 1990 से 2016 के बीच देश के तटवर्ती इलाकों में 34 फीसदी यानी एक-तिहाई जमीन को भूमिकटाव की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा है।

विशेषज्ञों के अनुसार देश के पूर्वी तट पर कटाव का खतरा पश्चिमी तट के मुकाबले गंभीर है। बंगाल में बीते 26 वर्षों के दौरान 63 फीसदी तटीय रेखा समुद्र में समा चुकी है। इसके बाद पुडुचेरी (57 पीसदी), ओडिशा (27 फीसदी) और आंध्र प्रदेश (27 फीसदी) का स्थान है। वैसे हर राज्य में भूमिकटाव के कारण अलग-अलग हैं। लेकिन लहरों के पैटर्न में आने वाला बदलाव, उसकी तीव्रता, तूफान और निम्न दबाव की वजह से होने वाली भारी बारिश के कारण नदियों से आने वाले गाद में कमी, बढ़ता जलस्तर और तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियां ही मुख्य रूप से इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं।

सुंदरवन के दो द्वीप डूबे

पश्चिम बंगाल में तटीय इलाकों के समुद्र में समाने का खतरा सबसे गंभीर है। भूमिकटाव के चलते सुंदरबन इलाके के लोहाचारा और सुपारीभांगा नामक दो द्वीप हमेशा के लिए बंगाल की खाड़ी में समा चुके हैं। अब सुंदरबन इलाके को दुनिया में डूबते द्वीपों की धरती के नाम से जाना जाता है। इसरो की ओर से सैटेलाइट के जरिए जुटाए गए ताजा आंकड़ों से साफ है कि इस इलाके में बीते एक दशक के दौरान 9,900 हेक्टेयर जमीन पानी में समा चुकी है। बंगाल देश में दूसरा सबसे घनी आबादी वाला राज्य है। तटीय इलाके में स्थित मैंग्रोव जंगल वाले सुंदरबन में प्रति वर्ग किमी एक हजार लोग रहते हैं। यह आबादी आजीविका के लिए समुद्र और जंगल पर ही निर्भर है, लेकिन लगातार तेज होते भूमिकटाव और समुद्र के बढ़ते जलस्तर की वजह से इलाके से लोगों का पलायन तेज हो रहा है।

45 लाख आबादी पर

बढ़ा खतरा

पर्यावरण विज्ञानी कह रहे हैं कि सुंदरबन के विभिन्न द्वीपों में रहने वाली 45 लाख की आबादी पर खतरा लगातार बढ़ रहा है। इलाके में कई द्वीप पानी में डूब चुके हैं और कई पर यह खतरा बढ़ रहा है। पर्यावरण विज्ञानियों के मुताबिक खतरनाक द्वीपों के 14 लाख लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट करने के साथ ही बाढ़ और तटकटाव पर अंकुश लगाने के लिए मैंग्रोव जंगल का विस्तार करने को प्राथमिकता देनी होगी। यहां समुद्र का जलस्तर 3.14 मिमी सालाना की दर से बढ़ रहा है। इससे कम से कम 12 द्वीपों का वजूद संकट में है।

आखिर क्यों बढ़ी भूमि

कटाव की समस्या

एनसीसीआर के निदेशक रामन्ना मूर्ति की मानें तो तटीय इलाकों में मानवीय गतिविधियां तेज होने की वजह से भी भूमिकटाव की समस्या तेज हुई है। बंदरगाह इलाकों में बड़े पैमाने पर गाद या तलछट निकालकर उसे गहरे समुद्र में फेंक दिया जाता है, लेकिन इनको तटीय इलाकों में फेंका जाना चाहिए। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर ने जहां समस्या की गंभीरता बढ़ा दी है, वहीं नदियों के बेसिन पर बनने वाले बांधों की वजह से तटीय इलाकों तक गाद का प्रवाह कम हो गया है।

कटाव रोकने के लिए ठोस

आंकड़े जुटाना जरूरी

रिपोर्ट तैयार करने वाले एम राजीवन कहते हैं, तट कटाव की समस्या पुरानी है, लेकिन इस पर अंकुश के प्रभावी उपाय तैयार करने के लिए इसकी माप-जोख कर ठोस आंकड़े जुटाना जरूरी है। उनके अनुसार हर राज्य में भूमिकटाव के कारण अलग-अलग हैं। इन वजहों का पता लगाने के लिए राज्यवार विश्लेषण के लिए दूसरे दौर का अध्ययन शुरू किया गया है। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि समस्या के बारे में तो सबको पता है, लेकिन संसद व सेमिनारों में बहस करने की बजाय इस पर अंकुश लगाने के लिए ठोस एकीकृत उपाय जरूरी है।

40% तक पहुंचा दक्षिणी राज्यों में भूमि कटाव

केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य भी भूमिकटाव की समस्या से जूझ रहे हैं। केरल के तटीय इलाकों में भूमिकटाव का आंकड़ा 40 फीसदी तक पहुंच गया है। रिपोर्ट के मुताबिक अरब सागर के मुकाबले बंगाल की खाड़ी में निम्न दबाव और तूफानों की वजह से पूरे साल मौसम खराब रहता है। इससे भूमिकटाव के मामलों में तेजी आती है। लेकिन दूसरे पश्चिमी राज्यों के मुकाबले केरल में भूमिकटाव की समस्या गंभीर इसलिए है कि अरब सागर के दक्षिणी हिस्से में लहरों की तीव्रता ज्यादा होने की वजह से केरल के तटीय इलाके ज्यादा प्रभावित हैं। पश्चिमी तट के दूसरे राज्यों मसलन गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, दीव व दमण में यह समस्या गंभीर नहीं है।


Date:14-09-18

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर भ्रम और दुविधा बरकरार

कनिका दत्ता

भारतीय अर्थव्यवस्था के उपभोक्ताओं से जुड़े दो क्षेत्र एक के बाद एक सरकारों के कार्यकाल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के मामले में पिछड़े रहे। इनमें विमानन क्षेत्र और खुदरा शामिल हैं। व्यापक नीतिगत रुख की बात करें तो वह कारोबारी हकीकतों से दूर नजर आती है। विदेशी डॉलरों का स्वागत है लेकिन विदेशी स्वामित्व और प्रबंधन का नहीं। कुछ अपवाद भी हैं जो संभावित निवेशकों को नीतिगत निर्देशों को लेकर भ्रमित रखते हैं। पिछले सप्ताह मंगलवार को कतर एयरवेज के सीईओ अकबर अल बकर ने कहा कि उनकी कंपनी एक साल तक देश में विमान सेवा शुरू करने की अनुमति की प्रतीक्षा करेगी, उसके बाद वह दूसरे बाजार तलाश करेगी। कतर ने इस वर्ष मई में विमानन कंपनी खोलने के लाइसेंस की चाह जताई थी लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई है। उन्होंने दिल्ली में संवाददाताओं से बातचीत में देश की विमानन नीति की अतार्किकता की ओर संकेत किया।

यह किसी भी सूचीबद्ध विमानन कंपनी के लिए 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात करती है लेकिन केवल तभी जबकि निवेशक विदेशी विमानन कंपनी न हो। विदेशी विमानन कंपनियां देश के उभरते विमानन बाजार में हिस्सेदारी चाहती हैं लेकिन उनको संयुक्त उद्यम में भारतीय कंपनियों के साथ 49:51 की हिस्सेदारी करनी होती है।  अल बकर को शायद सन 2013 के ‘कॉमा विवाद’ के बारे में जानकारी नहीं है। उस वर्ष के प्रेस नोट क्रमांक 6 के चलते नई भारतीय विमानन कंपनियां कारोबार में शामिल हो सकती थीं। इससे पुरानी घरेलू विमानन कंपनियां परेशान थीं क्योंकि वे प्रतिस्पर्धियों को दूर रखना चाहती थीं। नोट में कहा गया है, ‘भारत सरकार ने यह इजाजत देना तय किया है कि विदेशी विमानन कंपनियां भी भारतीय कंपनियों, में पूंजी लगा सकती हैं, जो अधिसूचित और गैर अधिसूचित विमान परिवहन सेवा चला रही हों, यह चुकता पूंजी के 49 फीसदी के बराबर होगा।’

यहां भारतीय कंपनियों के बाद लगा अद्र्घविराम एक ऐसी बात थी जिसकी उम्मीद देसी प्रतिस्पर्धियों ने नहीं की थी। केवल मौजूदा भारतीय विमानन कंपनियों को विदेशी निवेश का हकदार होने के बजाय इस विराम चिह्न ने नीति को किसी नई घरेलू विमानन कंपनी के लिए भी खोल दिया था। पुरानी कंपनियों की चिंता जायज थी क्योंकि इसने हालात को बदल दिया था। इसके बाद ही सिंगापुर एयरलाइंस और टाटा समूह ने साथ मिलकर विस्तारा शुरू की। उस वक्त जब मीडिया ने तत्कालीन विमानन मंत्री अजित सिंह से इस अद्र्घविराम के बारे में सवाल किए तो उन्होंने बस इतना कहा कि उन्हें भी अंग्रेजी आती है। देश की विमानन नीति ऐसी व्याकरणात्मक चतुराई पर निर्भर थी। घरेलू बाजार में अगर एक पूर्ण विदेशी स्वामित्व वाली विमानन कंपनी भी हो तो इससे क्या समस्या है? सरकार ने कभी इस बारे में साफ तौर पर कोई बात नहीं की। आखिर, 49 फीसदी हिस्सेदारी भी विदेशी प्रबंधन भागीदारी को शायद ही कम करेगी। कतर ने इंडिगो के साथ गठजोड़ करने में रुचि दिखाई थी लेकिन देश की सबसे बड़ी घरेलू विमानन कंपनी ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। अल बकर का कहना है कि उनकी कंपनी अल्पांश हिस्सेदारी में रुचि नहीं रखती। उन्होंने संकेत दिया कि कतर भारत में विमान परिचालन में प्रमुख भूमिका निभाना चाहता है।

अमेरिका और कुछ यूरोपीय बाजारों में विदेशी विमानन कंपनियों को घरेलू मार्गों पर सीमित पहुंच उपलब्ध कराना सुरक्षा से जुड़ा मसला है जबकि भारत में यह भारतीय प्रबंधन से जुड़ी अस्पष्ट चिंताओं का मसला है। हालांकि इंडिगो समेत अधिकांश घरेलू विमानन कंपनियां विदेशी सीईओ द्वारा ही संचालित की जा रही हैं और वे कई विदेशी विमान चालकों की सेवाएं भी लेती हैं। एफडीआई को लेकर दुविधा की बात करें तो खुदरा कारोबार को छोड़कर शायद ही कोई क्षेत्र नीति निर्माताओं की दुविधा को इस कदर प्रकट करता होगा। यहां नीतियां चार स्तरों पर काम करती हैं।  पहला, थोक खुदरा जो अन्य खुदरा कारोबारियों को आपूर्ति करता है। सरकार ने इस क्षेत्र में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी है। दूसरा, बहुब्रांड खुदरा में एफडीआई की सीमा 51 फीसदी है लेकिन इसके साथ ढेर सारी शर्तें भी हैं। तीसरा, है एकल ब्रांड। इसमें 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत दी गई है लेकिन स्वचालित मार्ग से। यह भी कुछ शर्तों के अधीन है। जनवरी तक एकल ब्रांड में एफडीआई खुदरा पर 49 फीसदी की सीमा थी (शेष 51 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए इजाजत की आवश्यकता थी)। इसे एक बड़ा सुधार माना गया।

चौथा है, ई-कॉमर्स बाजार के लिए पूरी तरह अलग नीतिगत ढांचा। इसमें बी2बी (बाजार आधारित मॉडल) और बी2सी (इन्वेंटरी मॉडल) शामिल हैं। इनमें से पहले में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत है। एमेजॉन और वॉलमार्ट इसी आधार पर काम कर रही हैं। परंतु दूसरे के लिए एफडीआई पर पूरी तरह रोक है। ये कई शर्तों के अधीन हैं। खुदरा क्षेत्र में वैश्विक रुझान अभिसरण का है लेकिन हमारे यहां ऐसी नहीं प्रतीत होता। बात चाहे विदेशी विमानन कंपनियों की हो या खुदरा क्षेत्र की, चिंता का विषय यही है कि घरेलू कारोबार को कैसे बचाया जाए। खासतौर पर छोटे कारोबारियों और किराना स्टोर को। कोई सरकार यह बताने में सफल नहीं रही है कि आखिर क्यों बड़ी घरेलू खुदरा शृंखलाएं वह प्रभाव नहीं छोड़ पाई हैं जो विदेशी खुदरा शृंखलाएं। अगर उपभोक्ता राष्ट्रवाद से प्रभावित होते तो ओनिडा और वीडियोकॉन के टीवी आज भी सबसे अधिक बिक रहे होते। कारों के बाजार में हिंदुस्तान मोटर्स का दबदबा होता और विमानन में एयर इंडिया का। इतना ही नहीं मैकडॉनल्ड्स और डोमिनोज पिज्जा बहुत पहले भारत छोड़ गए होते। क्या लोकतांत्रिक सरकारें इसकी चिंता भी करती हैं कि लोग क्या सोचते हैं?


Date:13-09-18

नेपाल की अपरिपक्वता

संपादकीय

नेपाल ने पुणो में चल रहे ‘‘बिम्सटेक’ देशों के पहले संयुक्त सैनिक युद्धाभ्यास के लिए अपनी फौज भेजने से इनकार करके कूटनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया है। पिछले महीने ही नेपाल की राजधानी काठमांडू में इस क्षेत्रीय समूह का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसमें भाग लेते हुए संयुक्त सैनिक युद्धाभ्यास की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य क्षेत्र में आतंकवाद की चुनौती से निपटने में आपसी सहयोग बढ़ाना है। समूह के सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव का समर्थन किया था, लेकिन इस बीच ऐसा क्या हो गया है कि नेपाल को इसका बहिष्कार करना पड़ा। जाहिर है, नेपाल के इस कदम ने भारत समेत इस क्षेत्रीय समूह को दुविधाजनक स्थिति में डाल दिया है। हालांकि भारत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि नेपाल ने बिम्सटेक के सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव का उल्लंघन किया है। नेपाल की ओर से दी गई सफाई भी कम हास्यास्पद नहीं है। कहा गया है कि विरोधी दलों और मीडिया के विरोधी रुख के कारण यह फैसला लेना पड़ा।

दरअसल, सचाई यह है कि इस क्षेत्रीय समूह के बीच सुरक्षा और प्रतिरक्षा सहयोग बढ़ाने के भारतीय प्रस्ताव से नेपाल का वर्तमान नेतृत्व सहमत नहीं है। सच यह भी है कि नेपाली प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली दो हजार पंद्रह की आर्थिक नाकेबंदी की घटना से अब तक उबर नहीं पाए हैं। ओली इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को जिम्मेदार मानते रहे हैं। नेपाल का चीन के करीब जाने के पीछे आर्थिक नाकेबंदी की निर्णायक भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। ध्यान रखने वाली बात है कि नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी के समय ओली वहां के प्रधानमंत्री थे। अभी पिछले दिनों ही चीन ने नेपाल की वस्तुओं की आवाजाही के लिएअपने चार बंदरगाह खोल दिए हैं। जाहिर है कि चीनी बंदरगाहों की सुविधा मिलने के बाद नेपाल की भारत पर निर्भरता कम हो जाएगी। लेकिन नेपाली नेतृत्व को ध्यान रखना चाहिए कि चीन और नेपाल की भौगोलिक दूरी एक बड़ा मुद्दा है। बिम्सटेक के फौजी युद्धाभ्यास का बहिष्कार और चीन के साथ इसी महीने युद्धाभ्यास की अनुमति देकर नेपाल के नेतृत्व ने अपने को अविश्वसनीय बना दिया है। अब नेपाल के प्रति भारत का रुख भी वैसा ही रहेगा।


Date:13-09-18

भारत और चीन को संतुलित करने में नाकाम होता नेपाल

राजीव मिश्र, पूर्व सीईओ, लोकसभा टीवी

नेपाल ने चीन से उसके चार बंदरगाहों व तीन लैंड पोर्ट के इस्तेमाल की इजाजत हासिल कर ली है। नेपाल भले ही इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के कुछ और वैकल्पिक रास्ते बनाने की बात कह रहा हो, लेकिन इस कदम को भारत की सामरिक चिंताएं बढ़ाने वाला ही माना जाएगा। हालांकि काठमांडू में एक चर्चा यह भी है कि इस कदम के बाद नेपाल को भारत के साथ चल रही परियोजनाओं में अधिक मोल-भाव करने का मौका हासिल हो सकेगा। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस वर्ष की शुरुआत में यह कहा भी था कि वह चीन के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाकर नए अवसर तलाशेंगे और भारत के साथ पहले हुए समझौतों में अधिक फायदा लेने की कोशिश करेंगे।

लेकिन इससे जुड़ा हुआ असल सवाल यह है कि क्या चीन के इन बंदरगाहों का इस्तेमाल नेपाल के लिए व्यापारिक रूप से फायदेमंद है? चीन ने नेपाल के लिए जो बंदरगाह आवंटित किए है, उनमें सबसे करीबी तियानजिन नेपाली सीमा से लगभग 3,000 किलोमीटर दूर है। वहीं, भारत के कोलकाता की दूरी नेपाल सीमा से करीब 700 किलोमीटर और विशाखापट्टनम की दूरी लगभग 1,200 किलोमीटर है। जाहिर है कि यह दूरी आयात और निर्यात, दोनों मामलों में नेपाल को महंगी पड़ने वाली है। यह दूरी एक ही सूरत में फायदेमंद हो सकती है, जब चीन नेपाल के लिए कुछ अतिरिक्त ढांचागत सुविधाएं तैयार करे। यह भी कहा जा रहा है कि चीन अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड परियोजना में भारत को शामिल करने के लिए दबाव बना रहा है और नेपाल को दी जा रही सुविधाएं उसी का हिस्सा हैं।

लेकिन फिलहाल मुद्दा भारत के प्रति नेपाल के बदलते रवैये का है। नेपाल ने बिम्सटेक शिखर सम्मेलन के दौरान भारत के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में भाग लेने पर सहमति जताई थी और फिर अचानक फैसला बदल दिया। ऐसा नहीं है कि ये सारी चीजें अचानक हो रही हैं। केपी शर्मा ओली की सरकार बनते ही यह साफ हो गया था कि नेपाल की नीतियों में अब चीन के प्रति झुकाव दिखाई देगा। यह कहा जाता है कि मधेसी आंदोलन और नाकाबंदी को भारत की रणनीति बताकर ओली नए नेपाली राष्ट्रवाद के नायक बने थे। अब चीन की मदद को पहाड़ी नेपालियों के बीच फायदेमंद सौदे के तौर पर प्रचारित कर इसका राजनीतिक लाभ लेने का मौका भी वह शायद छोड़ना नहीं चाहते।

नेपाल का व्यापार घाटा पहली बार 10 अरब डॉलर को पार कर गया है। महज पांच वर्ष पहले नेपाल का व्यापार घाटा 4.87 अरब डॉलर था, यानी पांच वर्ष में दोगुने से ज्यादा हो गया है। इस दौरान आयात भी दोगुना बढ़ा है, जबकि निर्यात में मामूली वृद्धि ही हुई। नेपाल का आयात 2013-14 में 5.57 अरब डॉलर का था, जो अब 11.28 अरब डॉलर का हो गया है। निर्यात 2013-14 में 70.31 करोड़ डॉलर था, अब 73.75 करोड़ डॉलर ही पहुंच सका है। अब आयात व निर्यात के लिए नेपाल ने चीन में जो वैकल्पिक रास्ते खोजे हैं, वे उसकी आर्थिक समस्या को बढ़ा देंगे। एक तरफ उसे आयात के लिए ज्यादा रकम खर्च करनी होगी, तो वहीं दूसरी तरफ उसका निर्यात महंगा हो जाएगा।

नेपाल दुनिया की दो बड़ी आर्थिक ताकतों का पड़ोसी है और इनमें से किसी से भी उसके शत्रुतापूर्ण रिश्ते नहीं हैं। वह चाहे, तो समझदारी दिखाकर इस स्थिति का फायदा उठा सकता है। शुरू में नेपाल ऐसा करता हुआ दिखा भी। नेपाल और चीन के बीच इस वर्ष टापनी प्रवेश बिंदु को शुरू करने को लेकर समझौता हुआ और केरूंग और रासूवगढ़ी में बेहतर आधारभूत ढांचा खड़ा करने पर भी सहमति बनी। एक समझौता दोनों देशों में रेल ढांचा विकसित करने को लेकर हुआ है। लेकिन समस्या तब शुरू हुई, जब नेपाल ने इसे संतुलित करने की बजाय रिश्तों को चीन के पक्ष में झुकाना शुरू कर दिया। वह भी उस समय जब भारत को नजरंदाज करना उसके लिए कई तरह से महंगा सौदा साबित हो सकता है। नेपाल के कुल विदेशी व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 66 प्रतिशत की है। इसके अलावा भारत में करीब 60 लाख नागरिकों को रोजगार मिला हुआ है। फिर भी उसके लिए नेपाल का महत्वपूर्ण हो जाना अच्छा संकेत नहीं।


Date:13-09-18

Sage advice

Raghuram Rajan’s suggestions on preventing a financial crisis must be heeded

Editorial

Former RBI Governor Raghuram Rajan’s note of caution on the next financial crisis that could be building up needs to be taken in all seriousness. In his note to Parliament’s Estimates Committee on bank non-performing assets (NPAs), Mr. Rajan has flagged three major sources of potential trouble: Mudra credit, which is basically small-ticket loans granted to micro and small enterprises; lending to farmers through Kisan Credit Cards; and contingent liabilities under the Credit Guarantee Scheme for MSMEs, run by the Small Industries Development Bank of India. The disbursement under Mudra loans alone is ₹6.37 lakh crore, which is over 7% of the total outstanding bank credit.

These loans have been sanctioned under the Pradhan Mantri Mudra Yojana, which aims to ‘fund the unfunded’, and is a signature scheme of the NDA government. Given that these are small loans up to ₹10 lakh each, with the borrowers mostly from the informal sector, banks have to monitor them very closely. It is debatable whether banks have the resources and manpower to do this when they are chasing the bigger borrowers for business and, increasingly these days, recoveries. The risk is that these small-ticket loans will drop under the radar and build into a large credit issue in course of time. The same logic holds true for crop loans made through Kisan Credit Cards. Mr. Rajan’s advice on loan waivers has been made by him and others in the past. But the political class has chosen to turn a deaf ear to this advice, vitiating the credit culture and creating a moral hazard where farmer-borrowers assume that their loans will invariably be waived off.

The former RBI Governor has strongly defended the RBI against criticism, often unfair, over its policies on NPA recognition and resolution. He rightly termed as “ludicrous” the allegations that the economy slowed down because of the RBI. Recognition is the first step in a clean-up, and unless banks are cleaned of their non-performing loans, they cannot make fresh loans. The Central government should also take note of some forward-looking statements that Mr. Rajan has made on the governance of banks. Among his suggestions to avert a recurrence of the current mess are, professionalising bank boards with appointments done by an independent Banks Board Bureau; inducting talent from outside banks to make up for the deficit within; revising compensation structures to attract the best talent; and ensuring that banks are not left without a leader at the top. It is a comment on the state of our polity that despite the important issues that Mr. Rajan raised, political parties have chosen to pick only the points that are convenient to them — about the period when these bad loans were made and the purported inaction over a list of high-profile fraud cases highlighted by him.


Date:13-09-18

Prison of patriarchy

Why India’s female workforce participation is so low

Veena Venugopal, (The writer is an Associate Editor with The Hindu in New Delhi)

Last week Ram Kadam, a BJP MLA from Maharashtra, told the men in an audience that if they were interested in women who didn’t reciprocate the feeling, he would help kidnap the women, so they could marry. While the video of this speech provoked outrage when it leaked on social media, the truth is that Mr. Kadam was only describing in crude terms the reality of marriage for a large percentage of Indian women, where usually the preferred form of spousal captivity is financial. Marriage is a career stopper for the majority of Indian women and this cultural abhorrence towards women working is a not-so-subtle way of ensuring that the escape routes out of a marriage are minimised, if not entirely closed. India’s female workforce participation is among the lowest in the world.

The Economic Survey 2017-18 revealed that women comprise only 24% of the Indian workforce. In fact, as India grows economically, the number of women in workplaces is declining steadily. This, even though the enrolment of girls in higher education courses is growing steadily — to 46% in 2014 from 39% in 2007. In India’s leaking pipeline of women employees, the first and most significant drop-off point is between the junior and middle management levels. A survey by Catalyst, a management consultancy firm, pegged this number at a whopping 50%, compared to 29% in other Asian economies.

When plotted against life milestones, this often corresponds to the time women choose to get married. The cultural baggage about women working outside the home is so strong that in most traditional Indian families, quitting work is a necessary precondition to the wedding itself. Also, counter-intuitively, this phenomenon is far more significant in higher income demographics, implying that the richer the family is, the lower the chances that they allow women to pursue a career. In low-income families, economic pressure sometimes trumps social stigma. Childbirth and taking care of elderly parents or in-laws account for the subsequent points where women drop off the employment pipeline.

On the macroeconomic level, this suggests that we’re giving up on a 27% boost to the country’s GDP. At the individual level, without any recourse to financial means, women stay tethered to the family. Ending a marriage is such a daunting task — socially and legally — that even the thought of embarking on it without financial independence is terrifying. The Supreme Court has set a benchmark of 25% of a husband’s net salary as a “just and proper” amount for alimony, leaving divorced women with full custody of the children at a quarter of the family income. Much credit for India’s low divorce rate goes to this Stockholm syndrome-like situation of Indian marriages. In that sense at least, MLA Kadam should be credited for simply getting straight to the point.


Date:13-09-18

Drawing a curtain on the past

In striking down Section 377, the Supreme Court has recognised the Constitution’s extraordinary transformative power

Suhrith Parthasarathy, (Suhrith Parthasarathy is an advocate practising at the Madras High Court)

In a rousing address to the Constituent Assembly on November 25, 1949, Dr. B.R. Ambedkar laid out his transformative vision for the Constitution. The document, he said, ought to serve as a lodestar in the endeavour to make India not merely a political but also a social democracy. He saw liberty, equality and fraternity as principles of life, as a collective “union of trinity”. “To divorce one from the other,” he said, “is to defeat the very purpose of democracy.” Now, 71 years after Independence, these values that Ambedkar saw as integral to India’s republic, find new meaning in a remarkable judgment of the Supreme Court in Navtej Singh Johar v. Union of India. Not only has the court struck down the wretchedly wicked Section 377 of the Indian Penal Code, insofar as it criminalises homosexuality, but it has also recognised the Constitution’s enormous and extraordinary transformative power. In doing so, the court has provided us with a deep expression of democratic hope. And perhaps we can finally believe, as Nehru said, in his famous midnight speech, that “the past is over, and it is the future that beckons to us now”.

Macaulay’s shadow

Plainly read, Section 377 punishes with imprisonment for life or for a term of up to 10 years any person who voluntarily has “carnal intercourse against the order of nature with any man, woman or animal”. Over the years, the term, “against the order of nature”, has been used to persecute members of the LGBTQ community, treating any non-procreative sexual act by them as acts of crime. Thomas Macaulay, the law’s drafter, despised the idea of even a debate on the legislation’s language. “We are unwilling to insert, either in the text, or in the notes, anything which could give rise to public discussion on this revolting subject,” he wrote in his chapter on “unnatural offences”. “…We are decidedly of the opinion that the injury which would be done to the morals of the community by such discussion would far more than compensate for any benefits which might be derived from legislative measures framed with the greatest precision.”

Like many other colonial-era laws, therefore, Section 377 was inserted with a view to upholding a distinctly Victorian notion of public morality. But post-Independence, the law remained on the books, as an edict that the Indian state saw as intrinsic to the enforcement of its own societal mores. The criminal law, the government believed, was a legitimate vehicle through which it could impose and entrench in society its own ideas of what constituted a good life. Societal morality, to it, trumped constitutional guarantees of equality and liberty.

Long road to freedom

In July 2009, however, the Delhi High Court, in a judgment delivered by a bench comprising Chief Justice A.P. Shah and Justice S. Muralidhar, rejected this vision, and declared Section 377, insofar as it criminalised homosexuality, unconstitutional. In the court’s belief, the law was patently discriminatory. It offended not only a slew of explicitly guaranteed fundamental rights — in this case, Articles 14, 15, 19 and 21 — but also what the judgment described as “constitutional morality”. “Moral indignation, howsoever strong, is not a valid basis for overriding individual’s fundamental rights of dignity and privacy,” the court wrote. “In our scheme of things, constitutional morality must outweigh the argument of public morality, even if it be the majoritarian view.”

At the time this was a grand statement to make. Indeed, barely four years later, the Supreme Court reversed the findings in Naz, and rendered the judgment’s radical vision nugatory. In a shattering verdict, the court, in Suresh Kumar Koushal, once again declared homosexuality an offence. LGTBQ persons, to the court, constituted only a “miniscule minority”, and they enjoyed, in the court’s belief, neither a right to be treated as equals nor a right to ethical independence, a freedom to decide for themselves how they wanted to lead their lives.

But now, in Navtej Singh Johar, the court has restored both the quotidian and the outstanding glories of the judgment in Naz. Unexceptionally, Section 377, it has found, infringes the guarantee of equality in Article 14, the promise against discrimination in Article 15, the right to free expression contained in Article 19, and the pledges of human dignity and privacy inherent in Article 21. But, perhaps, more critically, the court has taken inspiration from Naz in bringing to the heart of constitutional interpretation a theory that seeks to find how best to understand what equal moral status in society really demands, a theory that engages profoundly with India’s social and political history.

Interpreting the Constitution

The question of how to interpret a constitution, any constitution, is an age-old one. The Indian Constitution couches its guarantee of fundamental rights in abstract terms. For instance, the Constitution doesn’t expressly tell us what equality, in Article 14, means. Does it mean merely a formal equality, or does it promise a more substantive equality, demanding the state’s proactive participation?

Until now, in the absence of a coherent theory of interpretation, judges have vacillated in answering such questions. But the four separate opinions in Navtej Singh Johar, written respectively by Chief Justice of India Dipak Misra and Justices R.F. Nariman, D.Y. Chandrachud and Indu Malhotra, collectively espouse an interpretive model that gives to India’s history its full consideration. The Constitution “was burdened with the challenge of ‘drawing a curtain on the past’ of social inequality and prejudices,” Justice Chandrachud wrote, invoking Professor Uday Mehta. The document, therefore, was an “attempt to reverse the socializing of prejudice, discrimination and power hegemony in a disjointed society.” Or, as Chief Justice Misra put it: “The adoption of the Constitution was, in a way, an instrument or agency for achieving constitutional morality and [a] means to discourage the prevalent social morality at that time. A country or a society which embraces constitutional morality has at its core the well-founded idea of inclusiveness.” The idea, therefore, is, similar to what the South African courts have held, to eliminate all forms of discrimination from the social structure, and to usher society from degrading practices of the past into an egalitarian future.

There is a danger, many believe, that this theory of interpretation could allow judges to turn into philosopher-kings, allowing them to impose their moral convictions on society. But, as Ronald Dworkin has observed, a strategy of interpretation which partakes a consideration of both text and history is really a “strategy for lawyers and judges acting in good faith, which is all any interpretive strategy can be”.

Future disputes will certainly have to be guided by the court’s general rule prescribed in Navtej Singh Johar. The court has already reserved its judgment in a number of cases that will tell us how it intends on applying this theory. Its decision in cases concerning the entry of women into the Sabarimala temple, on the practice of female genital mutilation of minor girls in the Dawoodi Bohra community, on the validity of the Indian Penal Code’s adultery law, will all prove telling. Yet, much like the challenge to Section 377, the issues at the core of these cases are scarcely controversial as a matter of pure constitutional interpretation. Ultimately, therefore, the true value of Navtej Singh Johar will only be seen when the court sees this theory as integral to its ability to judge clashes between the naked power of the state and personal liberty, to cases such as the challenge to the Aadhaar programme, which seek to reverse the transformation that the Constitution brings. There too, as Chief Justice Misra has written, the court must be “guided by the conception of constitutional morality”.

News Clipping on 13-09-2018

Date:13-09-18

रघुराम राजन के बयान का आर्थिक इस्तेमाल हो

संपादकीय

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय आकलन समिति के सामने जो बयान दिया है उसका राजनीतिक इस्तेमाल न करके आर्थिक इस्तेमाल होना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि उस रिपोर्ट का ज्यादातर मीडिया समूहों और राजनेताओं ने एक ही निष्कर्ष निकाला है कि बैंकों का बट्‌टा खाते का कर्ज यूपीए सरकार की गलत नीतियों की देन है। यह सही है कि रघुराम राजन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ज्यादातर बट्‌टा खाते का कर्ज 2006 से 2008 की देन है और उस दौरान कोयला घोटाला होने के कारण सरकार कोई भी कठोर निर्णय लेने से झिझकने लगी थी। इसके बावजूद यह कैसे भुलाया जा सकता है कि 2014 का बट्‌टा खाते का कर्ज 2018 में तीन गुना हो चुका है। राजनेता और मीडिया ज्यादातर आंकड़ों और घटनाओं का सरलीकरण करते हैं लेकिन, समस्याओं की जड़ उससे कहीं ज्यादा उस व्यवस्था में होती है जो कुछ विशेष शक्तियां मिलकर तैयार करती हैं। इसीलिए रघुराम राजन ने यह भी माना है कि बट्‌टे खाते का कर्ज बैंकर, प्रोमोटर और परिस्थितियों से मिलकर तैयार होता है। उन्होंने जिन तीन बातों को सबसे ज्यादा दोषी बताया है कि वे हैं अतिआशावादी बैंकर, नीतिगत सुस्ती और बड़ा कर्ज देने में बरती गई असावधानी। उनका मानना है कि 2006 में ढांचागत परियोजनाएं समय से पूरी हो गईं और उनसे उत्साहित बैंकरों ने कर्ज देने में वास्तविक स्थिति का आकलन करना जरूरी नहीं समझा। राजन की बातों का जवाब अर्थशास्त्री और देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को स्पष्ट तरीके से देना चाहिए। इसके बावजूद रघुराम राजन ने दूसरी बात भी कही है और उस पर गौर किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि उन्होंने बैंक के कर्ज न देने वालों के नाम यूपीए और एनडीए दोनों सरकारों के कार्यकाल में पीएमओ को भेजे थे लेकिन, किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब 2016 में रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और दूसरा कार्यकाल चाहते थे तो मोदी सरकार ने ही उन्हें मना किया। रघुराम राजन चाहते थे कि बैंक अपना बहीखाता दुरुस्त करें और उससे इस सरकार को भी परेशानी हो रही थी। इसलिए रघुराम राजन की बातों को पूरे परिप्रेक्ष्य में ही लिया जाना चाहिए।


Date:13-09-18

मुस्लिम ब्रदरहुड विवेकानंद का विश्व बंधुत्व नहीं

आध्यात्मिक जीवनदृष्टि से समाज को जोड़ने वाले संघ की तुलना जेहादी गुट से करना देश का अपमान

डॉ. मनमोहन वैद्य सहसरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ के साथ करने पर संघ से परिचित और राष्ट्रीय विचार के लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक है। भारत के वामपंथी, माओवादी और क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्र विरोधी तत्वों के साथ खड़े तत्वों को इससे आनंद होना भी अस्वाभाविक नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि राहुल जेहादी मुस्लिम आतंकवाद की वैश्विक त्रासदी से अनजान हैं। ऐसा भी नहीं है कि वे समाजहित में चलने वाले संघ कार्यों तथा उसे बढ़ते समर्थन के बारे में नहीं जानते। फिर भी वे ऐसा क्यों कह रहे हैं?

इसकी वजह यह है कि उनके राजनीतिक सलाहकारों ने उन्हें यकीन दिला दिया है कि संघ की बुराई करने से, संघ के खिलाफ बोलने से उन्हें राजनीतिक फायदा हो सकता है। आरोपों को साबित करने की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं है। वास्तव में संघ भारत की परम्परागत अध्यात्म आधारित सर्वांगीण और एकात्म जीवनदृष्टि के आधार पर संपूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य कर रहा है। इसकी तुलना जेहादी मुस्लिम ‘ब्रदरहुड’ से करना समस्त भारतीयों और देश की महान संस्कृति का घोर अपमान है। वास्तव में जेहादी मुस्लिम मानसिकता और उनके कारनामें देखें तो उसके साथ ‘ब्रदरहुड’ शब्द बेमेल है। यह कथित ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ सलाफी सुन्नी मुसलमानों के अलावा अन्य मुसलमानों को भी स्वीकार नहीं करता, उन्हें मुसलमान मानने से ही इनकार करता है।

दो दिन पहले 11 सितंबर को स्वामी विवेकानंद के विश्वविख्यात शिकागो व्याख्यान को 125 वर्ष पूरे हुए। उन्होंने भारत की सर्वसमावेशी एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि के आधार पर विश्वबंधुत्व का विचार रखा था। स्वामी विवेकानंद ने अपने ऐतिहासिक उद्‌बोधन की शुरुआत ही ‘मेरे अमेरिकन भाइयो और बहनो’ से की थी, जिसे सुनकर पूर्ण सभागार अचंभित और उत्तेजित हो उठा और तालियों की ध्वनि से गूंज उठा था। उन्होंने कहा था- ‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं। मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे यह बतलाते हुए गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था’ वे आगे कहते हैं- ‘साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है। वह पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है, उसको बारम्बार मानवों के रक्त से नहलाती रही है, सभ्यताओं का विध्वंस करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है। यदि ये वीभत्स दानवता न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता।’ डॉ. अाम्बेडकर ने ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में स्पष्ट कहा है- ‘इस्लाम एक बंद समुदाय है (closed corporation) और वह मुसलमान और ग़ैर-मुसलमान के बीच जो भेद करता है वह वास्तविक है। ‘इस्लामिक ब्रदरहुड’ यह समस्त मानवजाति का समावेश करने वाला ‘विश्वबंधुत्व’ नहीं है। यह मुसलमानों का मुसलमानों के लिए ही ‘बंधुत्व’ है। जो उसके बाहर है उनके लिए तिरस्कार और शत्रुता के सिवा और कुछ भी नहीं है।’ मुस्लिम ब्रदरहुड सर्वत्र शरिया का राज्य लाना चाहता है। संघ हिंदू राष्ट्र की बात करता है, जो सभी को स्वीकार करते हुए स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रतिपादित ‘विश्वबंधुत्व’ (यूनिवर्सल ब्रदरहुड) का प्रसार करता है।

सोचिए, जेहादी कट्टर ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की तुलना स्वामी विवेकानंद के विश्वबंधुत्व के साथ कैसे हो सकती है! ऐसे महान विचारों को लेकर चलने वाले संघ के बारे में राहुल गांधी बार-बार ऐसा वैमनस्यपूर्ण विचार क्यों रखते होंगे? एक ज्येष्ठ स्तम्भ लेखक ने दो वर्ष पूर्व लिखा था, ‘कांग्रेस किसी भी हद तक जाकर सत्ता में आने का प्रयास करती है और पार्टी की बौद्धिक गतिविधि उन्होंने कम्युनिस्टों को सौंप दी है।’ कांग्रेस की बौद्धिक गतिविधि जब से कामरेडों ने संभाल ली है तब से पार्टी ऐसी असहिष्णुता का परिचय देते हुए राष्ट्रीय विचारों का घोर विरोध करने लगी है। स्वतंत्रता के पूर्व कांग्रेस में हिंदू महासभा, क्रांतिकारियों के समर्थक, नरम, गरम आदि सभी प्रकार के लोगों का समावेश था। बाद में भी 1962 के चीन के आक्रमण के समय संघ के स्वयंसेवकों ने जान की बाजी लगाकर सेना की जो सहायता की उससे प्रभावित होकर पंडित नेहरू ने 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए संघ के स्वयंसेवकों को निमंत्रित किया, जिसमें 3 हजार स्वयंसेवक शामिल हुए थे। 1965 में पाकिस्तान के आक्रमण के समय देश के प्रमुख नेताओं की आपात बैठक प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्रीजी ने बुलाई, जिसमें सरसंघचालक गुरुजी को बुलाया गया। इस बैठक में एक कम्युनिस्ट नेता द्वारा शास्त्रीजी से बार-बार ‘आपकी सेना क्या कर रही थी?’ पूछने पर श्री गुरुजी कहा- ‘ये आपकी सेना क्या कह रहे हैं? हमारी सेना कहें। आप क्या किसी दूसरे देश के हैं?’

क्या यह कम आश्चर्य की बात है कि माओवाद प्रेरित जितने आंदोलन हुए उन्हें कांग्रेस ने खुला समर्थन दिया है। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे- इंशा अल्लाह, इंशा-अल्लाह अथवा ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी’ जैसे नारे लगाने वालों का खुला समर्थन कांग्रेस के नेताओं ने किया है! समाज में जातीय विद्वेष भड़काकर संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए की गई हिंसा का समर्थन जब कांग्रेस करती है तब इस पार्टी के शरीर का कब्जा कर बैठी माओवादी आत्मा का स्पष्ट परिचय मिलता है। ऐसी देश विघातक ताकतों को कांग्रेस का समर्थन देखकर आश्चर्य कम और दुःख अधिक होता है।

125 वर्ष पहले विवेकानंद ने समुद्र पार जाकर भारत की इस सनातन सर्वसमावेशी संस्कृति की विजय पताका फहराई। आज उसी देश का एक नेता समुद्र पार जाकर इसी भारतीय संस्कृति की तुलना ‘इस्लामिक ब्रदरहुड’ से कर विवेकानंद का, इस भारत की महान संस्कृति का और भारत का अपमान कर रहा है। लोकतंत्र में विभिन्न दलों में मतभेद तो हो सकते हैं पर राष्ट्रीय हित के मुद्‌दों पर अपनी राजनीतिक पहचान से भी ऊपर उठकर एक होने से ही राष्ट्र प्रगति करेगा और अंतर्गत और बाह्य संकटों को मात देकर अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढ़ सकेगा।


Date:13-09-18

द्विपक्षीय वार्ता के बहुआयामी निहितार्थ

टू प्लस टू वार्ता में रक्षा के मोर्चे पर कई अहम कदम उठाए गए, तो कुछ क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर दोनों देशों का रुख-रवैया समान रहा।

विवेक काटजू , (लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं)

कूटनीतिक लिहाज से बीते कुछ दिन काफी अहम रहे। इस दौरान भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू वार्ता का पहला दौर संपन्न् हुआ। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पेंपियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस से मुलाकात की। असल में यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग की उपज है कि द्विपक्षीय वार्ता के लिए ऐसे अनूठे प्रारूप को तैयार किया जाए। यह आयोजन दर्शाता है कि दोनों देश अपने रिश्ते को वास्तविक रूप से रणनीतिक साझेदारी में बदल चुके हैं। अमूमन द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं का दारोमदार विदेश मंत्री पर होता है। जब सतत एवं सुनियोजित रूप से इसमें रक्षा मंत्री भी शामिल हो जाएं, तो इसका अर्थ होता है कि दोनों देश प्रतिरक्षा एवं सुरक्षा के अहम क्षेत्रों में विशेष ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। आज भारत और अमेरिका कई साझा खतरों के मुहाने पर हैं, विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उनके लिए ज्यादा जोखिम हैं। ऐसे में परस्पर सहयोग से दोनों को लाभ होगा। टू प्लस टू वार्ता में रक्षा के मोर्चे पर कई अहम कदम उठाए गए, तो कुछ क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर दोनों देशों का रुख-रवैया एक जैसा रहा।

दिल्ली आगमन से पहले पोंपियो कुछ घंटों के लिए इस्लामाबाद में भी रुके। उनके साथ अमेरिकी सेना प्रमुख जनरल जोसेफ डनफोर्ड भी थे। पोंपियो और डनफोर्ड ने नए प्रधानमंत्री इमरान खान और पाक सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा से मुलाकात की। इस समय अमेरिका-पाकिस्तान संबंध मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य मदद रोककर अपनी नाखुशी भी जाहिर की और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ के जरिए उस पर दबाव भी बढ़ा दिया है। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार सिकुड़ रहा है। उसे आर्थिक मदद की दरकार है। इसके लिए वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शरण में जाने की तैयारी कर रहा है। आईएमएफ में अमेरिका का तगड़ा रुतबा है। उसने पहले ही संकेत दिए हैं कि वह यह गवारा नहीं करेगा कि आईएमएफ से मिली रकम से पाकिस्तान चीनी कर्ज चुकाए। ऐसे संकेतों के बावजूद अमेरिका यह चाहता है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में स्थायित्व लाने में उसकी मदद करे, यानी इस्लामाबाद तालिबान को अफगान सरकार के साथ शांति वार्ता के लिए तैयार करे। इस्लामाबाद में पोंपियो ने इमरान खान सरकार से अफगानिस्तान में शांति लाने की दिशा में और अधिक प्रयास करने के लिए कहा, लेकिन तथ्य यह है कि पाकिस्तान की मदद रोकने और तीखे तेवर दिखाने के बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान पर शिकंजा उतना कड़ा नहीं किया, जितना जरूरी था। ऐसा शायद इसलिए किया गया, क्योंकि अफगान-पाकिस्तान सीमा पर तालिबान की शरणगाहों का सफाया करने के लिए अमेरिका वहां अपनी फौज भेजने का इच्छुक नहीं है। चूंकि पाकिस्तान जानता है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां उसे आर्थिक दलदल में नहीं धंसने देंगी, इसलिए वह अपने रवैये से पीछे नहीं हट रहा है। चूंकि पाकिस्तान परमाणु हथियारों के जखीरे पर बैठा है, इसलिए शायद अमेरिका भी उसके स्थायित्व की चिंता कर रहा है।

टू प्लस टू वार्ता के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण रहा कि उसकी धुरी रक्षा क्षेत्र पर टिकी रही। खासतौर से हिंद-प्रशांत क्षेत्र और भारत के पश्चिम में जारी घटनाक्रम पर विचार हुआ। रक्षा क्षेत्र में भारत-अमेरिकी सहयोग द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका भारत को उच्च तकनीक वाले हथियार देने के साथ ही उनकी तकनीक भी साझा करने को तैयार है, ताकि उन्हें भारत में भी तैयार किया जा सके। इसके लिए अमेरिका चाहता है कि भारत कुछ समझौतों पर दस्तखत करे। ये समझौते यह सुनिश्चित करेंगे कि भारत अमेरिकी हथियारों और तकनीक की प्रणालियां दूसरे देशों को लीक नहीं करेगा। संचार क्षेत्र से जुड़ा कोमकोसा ऐसा ही एक समझौता है, जिस पर काफी लंबे समय से बात चल रही थी। इस पर टू प्लस टू वार्ता के दौरान मुहर लग गई। यह समझौता भारतीय और अमेरिकी सुरक्षा बलों के बीच संचार के मोर्चे पर बेहतर तालमेल बनाएगा।

टू प्लस टू वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में दोनों देशों ने पाकिस्तान को आईना दिखाते हुए कहा कि वह सुनिश्चित करे कि दूसरे देशों में आतंक फैलाने के लिए उसकी धरती का इस्तेमाल न हो। नि:संदेह पाकिस्तान के लिए यह कड़ा संदेश है, लेकिन और बेहतर स्थिति तब होती, जब अमेरिकी मंत्रीद्वय अपने बयानों में भी इसका जिक्र करते। उन्होंने मुंबई आतंकी हमलों के दोषियों को सजा दिलाने की कवायद को आगे बढ़ाने के अलावा आतंक का कोई और उल्लेख नहीं किया। मुंबई हमले का जिक्र शायद इसलिए किया गया, क्योंकि उसमें अमेरिकी नागरिक भी मारे गए थे। वास्तव में अमेरिका अभी भी भारत व पाकिस्तान को लेकर संतुलन साधना दिख रहा है। अमेरिकी मंत्रियों के बयान इसी कड़ी का हिस्सा जान पड़ते हैं। दरअसल महाशक्तियां इसी तरह कूटनीति के जरिए अपने राष्ट्रीय हितों को पोषित करती हैं।

साझा बयान अफगानिस्तान पर भी रोशनी डालता है। इसमें अमेरिका ने अफगानिस्तान के विकास और वहां स्थायित्व लाने में भारत की अहम भूमिका का स्वागत किया। यह भी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका पाकिस्तान को संदेश देना चाहता है कि यदि वह अपनी अफगान नीति में बदलाव नहीं करता तो वह अफगानिस्तान में व्यापक भूमिका के लिए भारत को बढ़ावा देगा। पाकिस्तान इससे खुश नहीं होगा, क्योंकि वह अफगानिस्तान में भारत की कोई भूमिका नहीं चाहता। इसकी संभावना कम ही है कि पाकिस्तान अपनी अफगान नीति में बदलाव करेगा।

साझा बयान में अमेरिकी मंत्रियों ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में आवाजाही के लिहाज से खुला क्षेत्र बनाने की पैरवी की। कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर बयान में कहा गया कि इन्हें दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करते हुए विकसित करना चाहिए और यह तय किया जाए कि इसकी आड़ में कुछ देश कर्ज के मकड़जाल में न फंस जाएं। इसके जरिए चीन पर निशाना साधा गया जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी आक्रामक नीतियों के चलते भारत और अमेरिका के लिए चुनौती बन रहा है। साफ है कि चीन को काबू में रखने के लिए अमेरिका भारत को अपने करीब लाना चाहता है। भारत को चीन से चौकस रहने की जरूरत है, लेकिन इसके साथ ही उससे सहयोग के भी संकेत दिखाने होंगे।

रणनीतिक साझेदारों के सामने सहयोग वाले क्षेत्रों के साथ कुछ ऐसे मुद्दे भी होते हैं, जहां उनके हित मेल नहीं खाते। ऐसे मामलों में दोनों को एक-दूसरे के प्रति संवेदनाएं दिखानी होती हैं। ऐसा न होने पर साझेदारी दम तोड़ देती है। ईरान और रूस को लेकर अमेरिका को यह बात ध्यान रखनी चाहिए। इन दोनों देशों से भारत के व्यापक हित जुड़े हुए हैं। अमेरिका को चाहिए कि वह रूस से रक्षा खरीद और ईरान से तेल खरीद के रास्ते में अड़ंगा न लगाए।


Date:13-09-18

भविष्य के जोखिमों के आकलन की चुनौती

श्याम सरन

यह बात स्पष्ट है कि हमारी धरती की पर्यावास पूंजी निहायत संगठित तरीके से और लगातार नष्टï हो रही है। इसमें हमारी भूमि, वन, नदियां, समुद्र और हवा सभी शामिल हैं। इससे आने वाली पीढिय़ों का अस्तित्व खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। जिस तेजी से हमारे प्राकृतिक संसाधन नष्ट हो रहे हैं, उसकी भरपाई होना बहुत मुश्किल नजर आ रहा है। इसकी वजह तो एकदम स्पष्टï है लेकिन ऐसी नीतियों का क्रियान्वयन करना खासा मुश्किल है जो पर्यावास को हो रहे इस नुकसान को कम कर सके या पर्यावरण सुधार में स्थायित्व ला सके। दरअसल हमारी आकलन व्यवस्था में ऐसे पूर्वग्रह निहित हैं जिनके आधार पर आर्थिक गतिविधियों और लागत लाभ अनुपात का आकलन किया जाता है। उदाहरण के लिए वनों की कटाई तब तक जारी रहेगी जब तक लकड़ी बाजार में अच्छे दाम पर बिकती रहेगी। लकड़ी कीमत जंगल में उगे वृक्ष की तुलना में तो अधिक ही होती है।

लकड़ी जब वृक्ष की अवस्था में होती है तो वह वातावरण में फैले कार्बन का अवशोषण करती है और हवा में नमी पैदा करती है। उसकी जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं। इन तमाम पर्यावास संबंधी सेवाओं का मूल्यांकन नहीं हो सकता है क्योंकि उनकी कीमत का आकलन करना खासा मुश्किल काम है। अर्थशास्त्री बाह्यता की अवधारणा से वाकिफ हैं। इसे ऐसी लागत या ऐसे लाभ के रूप में व्याख्यायित किया जाता है जो किसी ऐसे पक्ष को प्रभावित करे जो लागत या लाभ के लिए खुद काम न कर रहा हो। स्थायित्व से जुड़ी अधिकांश चुनौतियों में बाह्यïता बतौर कारक मौजूद रहती है। मिसाल के तौर पर जो कारक हमारी नदियों में प्रदूषक तत्त्व डाल रहे हैं वे हमारे समाज पर एक किस्म का बोझ डाल रहे हैं। यह बोझ उनके बहीखातों में नजर नहीं आएगा। जलवायु परिवर्तन इसलिए घटित हो रहा है क्योंकि पृथ्वी के वातावरण में ग्रीनहाउस गैस एकत्रित हो गई हैं।

इसके लिए औद्योगिक राष्ट्रों द्वारा दशकों तक जीवाश्म ईंधन जलाया जाना उत्तरदायी है। परंतु इस चुनौती की कीमत तो समूची पृथ्वी चुका रही है। मौजूदा लेखा व्यवस्था इतनी तैयार नहीं है कि वह बाह्यता का आकलन कर सके, क्योंकि लागत और लाभ को कुछ देशों पर लागू नहीं किया जा सकता है। ऐसे में वैश्विक चुनौतियों से निपटने की प्रभावी प्रक्रिया तय कर पाना मुश्किल होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन जैसी समस्या से निपटने के लिए समग्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। इसके बोझ को भी साझा तरीके से बांटना होगा। जोखिम के आकलन और उसे कम करने की बात करें तो ये हमारी अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। हम निरंतर लाभ के अनुमान को जोखिम के समक्ष तोलते हैं। परंतु हम जिन लेखा उपकरणों का प्रयोग करते हैं वे प्राय: तत्काल प्रभाव और प्रमाण को लेकर पूर्वग्रह से ग्रस्त होते हैं।

यानी कम परिमाण वाली बातों की कई बार अनदेखी कर दी जाती है। परंतु परिमाणात्मक प्रमाण की अनुपस्थिति का यह अर्थ नहीं होता है कि उनका प्रभाव नहीं होगा। परंतु दिक्कत यह है कि हमारा जोखिम का आकलन अक्सर ऐसी ही बातों पर आधारित होता है। हमारी लेखा व्यवस्था की यह अंतनिर्हित कमी अक्सर पर्यावास से संबंधित चुनौतियों के कमतर मूल्यांकन की वजह बनती है। इस तरह धीरे-धीरे इसका आकार काफी बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए हिमालय में बर्फ का पिघलना। अंटार्कटिका और आर्कटिक में बर्फ की चादर भले ही धीरे-धीरे पिघल रही हो लेकिन एक सीमा के बाद इसमें काफी तेजी आ सकती है। हमारे आकलन के उपाय ऐसे नहीं हैं कि वे दीर्घावधि के इन जोखिमों का सही आकलन कर सकें। जैसा कि हमने पहले भी देखा है ये कारक भी बाह्यता का हैं। इनका वास्तविक प्रभाव सामने आने में समय लगेगा।

यही वजह है कि केरल में आई बाढ़ जैसी अप्रत्याशित घटनाएं हमारे सामने अचानक आती हैं। पश्चिमी घाट में घने जंगलों के कटने से संभव है कि खनन उद्योग और छोटे मोटे औद्योगिक केंद्र विकसित हुए हों। इससे पारंपरिक संदर्भ में रोजगार और समृद्धि भी आए होंगे लेकिन इस क्रम में पर्यावरण को जो बेतहाशा नुकसान पहुंचाया गया उसकी कीमत केरल के लोगों को इस भयावह बाढ़ रूपी आपदा के रूप में चुकानी पड़ी। जाहिर सी बात है हमारे पास इस नुकसान के आकलन का कोई उपाय नहीं था। यह मानना सही नहीं है कि हम जिस चीज का आकलन नहीं कर सकते, उसका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसा सोच आपदा को न्योता देता है।

पर्यावरण के स्थायित्व का एक और पहलू है जो पारंपरिक आकलन व्यवस्था के लिए चुनौती बना हुआ है। अगर हम संयुक्त राष्ट्र के स्थायी विकास लक्ष्यों पर विचार करें तो अलग-अलग क्षेत्रों के बीच जानकारी का आंतरिक संबंध चौंकाने वाला है।  खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने के क्रम में हम बीज, उर्वरक, कीटनाशक और पानी आदि का आकलन करते हैं लेकिन यह भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक किसानों और उनके परिजनों के स्वास्थ्य के लिए खासे नुकसानदेह साबित हो सकते हैं।

यह स्वास्थ्य सुरक्षा को खतरा है लेकिन स्वास्थ्य की लागत को कृषि उत्पादन की लागत में शामिल ही नहीं किया जाता। खेती में पानी का प्रचुर उपयोग होता है इससे भूजल स्तर में कमी आ रही है। इससे जल सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो रहा है लेकिन यह लागत भी कृषि उत्पादन लागत में शामिल नहीं की जाती है। स्थायित्व की एक जटिल अवधारणा है जो विभिन्न आर्थिक गतिविधियों से संचालित होती है। हमारी आकलन व्यवस्था इनको समेट पाने में नाकाम है, खासकर जब विविध स्रोत इसमें शामिल हों तब।

दुनिया इस समय पर्यावरण को लेकर आपात स्थिति से दो-चार है। हो सकता है हमें तब तक संकेत न मिले जब तक हालात बहुत खराब न हो जाएं। जरूरत इस बात की है कि हम तत्काल ऐसे शोध और डिजाइन व्यवस्था को अपनाएं जो पर्यावास के संबंध में स्थायित्व हासिल करने में हमारी सहायता करें, बजाय कि मौजूदा खपत के आधार पर अपने भविष्य को जोखिम में डालने के। भारत को अपनी पहल इस दिशा में ले जानी चाहिए क्योंकि पर्यावास की चुनौतियां दिन पर दिन कठिन रूप ग्रहण करती जा रही हैं। मानव जाति के लिए बेहतर और स्थायित्व भरा भविष्य तैयार करने के लिए यह आवश्यक है कि हम वैश्विक प्रयासों में अपना योगदान दें।


Date:12-09-18

फसल खरीद के लिए पीएम-आशा को मंजूरी

संजीव मुखर्जी

केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों की कटाई का सीजन शुरू होने से पहले आज गेहूं एवं चावल से इतर फसलों की अपनी बहुप्रतीक्षित खरीद प्रणाली की घोषणा कर दी। इन फसलों की खरीद बढ़े न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर की जाएगी। इसके अलावा मध्यवर्ती शीरे और गन्ने के रस से उत्पादित एथनॉल की खरीद कीमतें बढ़ाई गई हैं। फसल खरीद की खातिर अगले दो वित्त वर्षों के लिए 150 अरब रुपये से अधिक आवंटित किए गए हैं। इस राशि में से 62 अरब रुपये इस साल खर्च किए जाएंगे। इसके अलावा नेफेड जैसी खरीद एजेंसियों को 160 अरब रुपये से अधिक की अतिरिक्त बैंक गारंटी मिलेगी। यह गारंटी वर्तमान 290 अरब रुपये के अलावा होगी।

इस खरीद योजना को प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम आशा) नाम दिया गया है। योजना में तीन विकल्प दिए गए हैं। पहला, मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस)। दूसरा, मध्य प्रदेश की भावांतर जैसी कीमत अंतर भुगतान योजना (पीडीपीएस)। तीसरी, दाम घटने पर प्रायोगिक आधार पर निजी कारोबारियों से खरीद कराकर स्टॉक करना। राज्य इन तीन योजनाओं में किसी को भी अपनाने के लिए स्वतंत्र होंगे, लेकिन एक ही फसल के लिए एक साथ दो योजनाएं नहीं चला सकते। सूत्रों ने कहा कि कीमत अंतर भुगतान योजना में 25 फीसदी तक के सरप्लस उत्पादन के लिए धन मुहैया कराया जाएगा। वहीं निजी कारोबारियों से खरीद कराने की योजना में उन्हें एमएसपी पर 15 फीसदी तक प्रोत्साहन राशि मुहैया कराई जा सकती है।

हालांकि किसान संगठनों ने एमएसपी खरीद घोषणा की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इसमें कुछ नया नहीं है और इन योजनाओं के बारे में लोग पहले ही जानते हैं। जय किसान आंदोलन के अविक साहा ने कहा, ‘इस फैसले में कुछ नया नहीं है। यह पुरानी योजनाओं की रीपैकेजिंग है। जहां तक निजी कारोबारियों की भागीदारी का सवाल है, पूरी समस्या की जड़ ही मंडी हैं, जो एमएसपी का भुगतान नहीं करती हैं। इसके अलावा धन मुहैया कराने का तरीका भी बहुत स्पष्ट नहीं है।’

उन्होंने कहा कि खरीफ सीजन की उड़द की फसल बड़ी मात्रा में बाजार में आ चुकी है और इसके दाम एमएसपी से 40 फीसदी कम बने हुए हैं। बाजरे का भी यही हाल है। हालांकि सरकार को भरोसा है कि नए प्रस्ताव से किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी। कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा, ‘पीएम-आशा का मकसद उपज की लाभप्रद कीमतें मुहैया कराना है, जिनकी घोषणा 2018 के केंद्रीय बजट में की गई है। यह एक ऐतिहासिक फैसला है।’ सरकार ने कहा है कि मध्य प्रदेश की भावांतर योजना की तर्ज पर बनाई गई कीमत अंतर भुगतान योजना केवल तिलहनों के लिए होगी।


Date:12-09-18

Dial A Service

Delhi government has made a new promise. Its success, and failure, will be tracked in a fast urbanising country.

Editorial

Delhi government’s ambitious phone-a-sahayak scheme to get doorstep delivery of government services within a limited time frame is set to be an eye-catching exercise in urban-centric administration. The scheme, launched on Monday, promises to offer 40 services at Rs 50 each and has roped in VFS, a global outsourcing agency, to execute it.

The services, so far, include applications for caste certificates, registration of marriages, Delhi family benefit scheme, learner’s and driver’s licences, new water and sewer connections and old-age pension schemes, among others. But, unlike the selection of pizzas, which makes the anticipation of their 30-minute-delivery promise so exciting, the test of Chief Minister Arvind Kejriwal’s new initiative will not be the range of services it offers. Instead, it will depend on how efficiently it guides consumers past administrative red tapes, that often straitjacket such application procedures.

Of course, Delhi — and Kejriwal — are not the first to try and mobilise the Right to Service Act (RSA) to greater efficacy. Only recently, the Manipur government announced a single-window services centre in Imphal, to be operational from November, that will also include door-to-door delivery of government services. In August 2010, Madhya Pradesh had become the first state in India to enact the RSA. Bihar enacted the bill next, in July 2011, followed by several other states, including Punjab, Kerala, Rajasthan, Himachal Pradesh, West Bengal and Jharkhand. Most states, however, have failed to fully capitalise on the RSA’s potential, meeting with moderate to poor success rates. Will the Delhi government succeed where others have not done very well so far — that will be the question.

In a country where policy-making has largely addressed itself to, and focussed upon the rural electorate, the Delhi government’s endeavour indicates a recognition of the changing dynamics of new India, where urban migration is fast reworking the rules of engagement between the metropolitan and the rural. It also marks the ruling Aam Aadmi Party’s (AAP) return to what fuelled its striking rise in the political landscape, despite the high bar set for new entrants, in the first place — a party born of and in the city, and committed to combating its malaises, including corruption and infrastructural failure — embracing in its fold the migrant labourer, the working class and the city’s elite in one sweep.

Like it has made visible efforts towards revitalising the educational infrastructure in government schools, if AAP can make a success of this new scheme in the national capital, it could contribute to the still evolving template of urban politics in a fast urbanising country.

News Clipping on 12-09-2018

Date:12-09-18

At Your Doorstep

If AAP government can make home delivery of public services work, it will be a blow to corruption

TOI Editorials

Delhi’s AAP government has launched a scheme this week to deliver 40 public services at the doorstep of citizens. This is an important innovation if it works out successfully. The exercise spans a wide range of primary public services such as getting a driving license, water connection or ration card. Launched in association with a private agency, it envisages a mobile ‘sahayak’ visiting homes for a nominal fee to help people avail of these services. As the current dispensation of public services in India is a source of harassment and petty corruption, this is an important step towards ease of living if it succeeds.

Lower levels of government engaged in providing essential public services are notorious for corruption. Opacity of processes and low levels of accountability, which result in long queues and uncertainty, make things worse. The CMS-India Corruption Study 2018 identifies attempts to access primary public services as the most common reason why people pay bribes. In this context, the Delhi government scheme is an encouraging experiment in not only making life easier but also partially neutralising situations which encourage corruption.

One hopes the AAP government can make this experiment succeed, which will lead to replication by other state governments. The experiment also comes on the heels of governments thinking about how to use technology to reduce direct interface between citizens and babus. For instance, direct benefits transfer can substantially minimise corruption when it comes to delivery of welfare benefits. Curbing this kind of corruption can render patronage politics of one kind irrelevant. This, in turn, will benefit the political system by reducing the need for strongmen who are often criminals but nevertheless derive importance from being able to offset poor delivery of services and governance failures.


Date:12-09-18

Nepal Reset

India must be subtler and deliver on projects in its neighbourhood

TOI Editorials

Nepal’s decision to pull out of the first joint military drill by member countries of the Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation (Bimstec) stands in sharp contrast to Nepal army’s slated participation in a 12-day long military exercise with China later this month. The Bimstec exercise was announced by Prime Minister Narendra Modi at the Bimstec summit in Kathmandu last month. But following opposition from various Nepali political quarters, Nepal’s Prime Minister KP Oli instructed his army not to participate in the multilateral exercise. At the very least, the cancellation indicates Nepal’s reluctance to see Bimstec take on a significant security role. At worst, it underlines Nepal’s strategic drift away from India and towards China.

Notwithstanding many issues with its economic policies, the Narendra Modi government has largely done well on the foreign policy front. But relations with Nepal appear to be an exception to the latter. From India’s response to the 2015 adoption of a new Nepali constitution to the subsequent Madhesi blockade that was seen to have an Indian hand, New Delhi has got its Nepal calculations wrong. This in turn has given China an opening to increase its footprint in Nepal. And with deeper pockets, Beijing can offer big-ticket projects that New Delhi won’t be able to match.

Against this backdrop, India should warn Nepal about the dangers of falling into China’s debt trap in the pursuit of infrastructure development. After all, countries from Malaysia to Pakistan are having second thoughts about China’s marquee Belt and Road Initiative of transnational connectivity. But this by itself won’t be enough to dissuade Nepal from being lured by Chinese promises unless India delivers on its own promises to Nepal and in the region. A slew of Indian projects in Nepal have been hanging fire for years. These include big hydro-power projects like Pancheshwar, Arun III and Upper Karnali.

Demonstrating similar lethargy, the motor vehicle agreement inked under the Bangladesh-Bhutan-India-Nepal framework too has hit a roadblock thanks to Indian bureaucracy. One way out could be to involve the Indian private sector in delivering on projects in the neighbourhood, rather than depending on Indian public sector undertakings which are notoriously lethargic. Speed is of the essence if India is to offer Nepal alternatives to Chinese projects. India needs a sophisticated Nepal policy that combines reliability with subtlety.


Date:12-09-18

Gays And Colonial Brainwashing

Learn from India’s open, exuberant past and respect those who differ from us

Gurcharan Das, (Bestselling author Gurcharan Das is a former CEO of Procter & Gamble India. He was VP & MD, P&G Worldwide)

My son is gay and i no longer feel reluctant to admit it. He has been in a loyal, happy relationship with his partner for 20 years and my family and close friends have accepted it gracefully. I didn’t dare speak about it in public, however, for fear of bringing him any harm – that is until 12.35pm on Thursday when the Supreme Court (SC) decriminalised homosexuality. My wife and i suddenly feel as if a great burden has lifted. The chief justice’s wise words continue to ring in my ears, “I am what I am. So, take me as I am.” For 157 years, Indians have lived under a tyrannical colonial law that was contrary to our country’s ancient spirit.

Meanwhile, the English realised their mistake – that “sexual orientation is natural and people have no control over it” (as the court’s judgment said) – and they discarded the law in Britain long ago. Tragically, the colonial brainwashing went so deep that this un-Indian imposition remained on India’s statute books for 71 years after the colonisers left. I was too young in August 1947 to understand what it meant to be politically free but i was certainly old enough to celebrate our economic independence in July 1991. And on September 6, 2018, i was not too old to applaud our ‘emotional independence’. India is a country in transition from tradition to modernity and it is just as important to speak and act freely about our emotional life as our economic and political lives. For too long we have repressed emotions and lived with patriarchal stereotypes.

Secrecy is unhealthy for a wholesome society. Although the judges quoted great Western writers in support of their historic judgment, they could also have cited classical Indian texts, which show remarkable tolerance for gender ambiguity. The epics are full of stories about men turning into women and vice versa, and they are told matter of factly without guilt or shame. There are plenty of examples in Vanita and Kidwai’s book, Same-Sex Love in India: Readings from Literature and History. India’s is the only civilisation to have elevated kama or desire and pleasure to a goal of life. Along with the three other aims – artha, ‘material well-being’, dharma, ‘moral well-being’, and moksha, ‘spiritual well-being’, we are expected to cherish kama’s ‘emotional well-being’.

We are constantly reminded about dharma, our duty to others but the thought escapes us that kama is a duty to ourselves. The extreme pleasure of sex is, perhaps, recompense for the loneliness of the human condition. In the Christian tradition, in the beginning was light (in Genesis). In the Rig Veda, in the beginning was kama and the cosmos was created from the seed of desire in the mind of the One. Desire was the first act of consciousness and ancient Indians called it shakti, the source of the sexual drive and the life instinct. In contrast, desire was associated with ‘original sin’, guilt and shame in Christianity.

We blame the Victorians for the prudishness of today’s Indian middle class but lurking deep in the Indian psyche is also pessimism about kama. More than 2,500 years ago in the forests of north India, ancient yogis, renouncers and the Buddha were struck by the unsatisfactory nature of kama. The yogis sought ways to quiet this endless, futile striving. Patanjali taught us chitta vriti nirodha to still the fluctuations of the mind. The ascetic god, Shiva, burnt the god Kama when the latter disturbed his thousand-year meditation; hence, desire exists ananga, ‘bodiless’ in the mind. Bhagavad Gita’s answer is to learn to act without desire but it is difficult to achieve it when ‘man is desire’ according to the Brihadaranyaka Upanishad. Opposed to the pessimists were optimists, who thought of kama as a ‘life force’, a cosmic energy that animated the cell and held it in place.

Since kama is the source of action, creation and procreation, their optimism culminated in the first millennium in Sanskrit love poetry and an erotic text of manners, the Kamasutra, which is not a sex manual but a charming, surprisingly modern guide to the art of living. In the clash between the optimists and pessimists emerged kama realists, who offered a grand compromise in the dharma texts, stating that sex is fine as long as it is within marriage. Into this pre-modern world entered the British with a pessimistic overhang of what George Bernard Shaw contemptuously called ‘Victorian middle class morality’, and they enacted laws such as Section 377. Fortunately, a more optimistic age began in India in the 1990s when the minds of the urban young began to get decolonised, reaching a peak in 2009 with the landmark judgment of Justice AP Shah of the Delhi high court on same sex relationships.

There was a regression for a while after 2013 when the higher court reversed course, but after Thursday’s SC judgment, a new era of kama optimism has begun. It will take time for a court ruling to overcome prejudice in society, especially at a time when right-wing vigilantes appear to lose their rational faculties over ‘love jihad’, Valentine’s Day (which should be renamed ‘Kamadeva Divas’, as Shashi Tharoor has suggested) and ‘Romeo squads’ run amuck. The SC judgment implies that to be civilised is to say: I prefer the opposite sex but I do not object to you preferring the same sex. In a free, civilised country we must learn to respect those who differ from us. The state should stay out of the bedroom and let us learn from our open, exuberant ancient traditions, where the secret to a rich, flourishing life lies in the harmonious equilibrium between the four goals of life.


Date:12-09-18

Financial buffet for municipalities

Hardeep Singh Puri, (The writer is Union minister of housing and urban affairs)

India has embarked upon what can be called the most ambitious and comprehensive programme of planned urbanisation undertaken anywhere in the world. This development is also a recognition of the fact that by 2030, 600 million Indians, or 40 per cent of India’s population, will live in urban spaces. Under the leadership of PM Narendra Modi, the government has allocated over Rs 4 lakh crore across five flagship urban missions: Pradhan Mantri Awas Yojana (PMAY), Smart Cities Mission, Swachh Bharat Mission, Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation (AMRUT) and Heritage City Development and Augmentation Yojana (HRIDAY). This is over and above the three-fold increase in grants to urban local bodies under the 14th Finance Commission, amounting to Rs 87,000 crore.

The government recognises that to meet the urban infrastructure gap, increasing contributions will need to be made by state governments and municipalities themselves. A distinct feature of the Rs 4 lakh crore outlay is the underlying philosophy of using these funds on the lines of risk capital that can be further leveraged by states and cities. The Smart Cities Mission has been structured to give cities flexibility to envision their own projects and leverage the mission’s funds to raise private capital. They are empowered to raise private funds through the entire gamut of instruments available — municipal bonds, public-private partnership, value capture finance and term loans — which are available to the 100 cities selected under the mission.

Specifically on municipal bonds, a series of measures have been undertaken by the ministry of housing and urban affairs (2 per cent interest subvention), ministry of finance (pooled debt obligation fund) and Sebi (issuance of guidelines for municipal bond issuances and a series of clarifications and improvements to them) to facilitate municipal bond issuances. Pune, Hyderabad and Indore have issued municipal bonds cumulatively amounting to over Rs 600 crore — constituting close to 30 per cent of issuances over the last two decades. Further, four measures that will give a push to the municipal borrowings market in general, and the municipal bond market in particular, deserve mention. States and cities, particularly of the top 500 one lakh-plus cities coveredunder AMRUT, need to strengthen their own sources of revenue. This requires better financial management by both state and city governments.

Cities also need to better leverage land and property to gain a share of the economic growth, which can be reinvested in infrastructure. Project selection and execution need to inspire confidence in potential investors, who need to be convinced that project cash flows are sufficient to meet debt service obligations, and that project timelines will be met. Cities should draw up a list of ‘bankable’ projects as a subset of their Smart Cities and AMRUT projects that meet this criteria. States need to design a robust fiscal responsibility and budget management framework for cities that will bring transparency and accountability to financial reporting by municipalities. Drawing up five-year medium-term fiscal plans, which lay out capital investment plans and revenue sources, is a critical need. States need to strengthen administrative capacities at the city level through better-quality workforce across both finance and engineering functions.

The need of the hour is a modern workforce and reviewed through position-specific performance indicators. The Union ministry for housing and urban affairs is committed to creating an enabling ecosystem for states and cities. Creating an online marketplace for municipal financial information, laying down comprehensive standards and frameworks for easy replicability and use by states and cities, close engagement with the ministry of finance, regulators, and the full spectrum of market players on further policy action required to sustain and grow the municipal borrowings market, are some of the areas where we will make tangible progress in the next three to six months. The Smart Cities Mission has created a new paradigm in facilitating large-scale access to capital markets to fund urban infrastructure within a framework of cooperative federalism, which will stand us in good stead over the next few decades.


Date:12-09-18

नेपाल पर कूटनीति कमजोर, चाहिए नए किस्म की पहल

संपादकीय

नेपाल ने चीन के साथ सैन्य अभ्यास करने का निर्णय करके भारत को दूसरा झटका दिया है। इससे पहले उसने पुणे में भारत के साथ बिम्सटेक के सैन्य अभ्यास में हिस्सा लेने से मना कर दिया था। हालांकि, अगस्त में काठमांडू में हुए बंगाल की खाड़ी से लगे देशों के संगठन बिम्सटेक के शिखर सम्मेलन में नेपाल ने ऐसा कोई इरादा नहीं जताया था। बिम्सटेक के सैन्य अभ्यास को छोड़कर चीन के साथ सागरमाथा फ्रैंडशिप-2 अभियान में शामिल होने की सहमति देकर नेपाल ने एक बार फिर यह जताने की कोशिश की है कि भारत उसे कितना भी अपने नज़दीक लाना चाहे लेकिन, वह चीन की ओर झुक रहा है। दरअसल, चीन ने नेपाल को चार समुद्री बंदरगाह और तीन मैदानी बंदरगाहों से जोड़कर उसकी वह साध पूरी कर दी है, जिसे भारत लंबे समय से लटकाए हुए था। दो साल पहले नेपाल तब भी नाराज हुआ था, जब मधेशियों के आंदोलन के समय भारत से नेपाल को होने वाली तेल और जरूरी सामानों की आपूर्ति रोक दी गई थी।

भारत ने चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ पहल को जवाब देने के उद्‌देश्य से बिम्सटेक अभियान में नेपाल बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड को शामिल किया है। लेकिन, इन देशों पर चीन भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इसी नाते जहां नेपाल ने सैन्य अभ्यास में शामिल होने से मना कर दिया वहीं थाईलैंड ने भी अपने पर्यवेक्षक भेजने की बात की है। जब से केंद्र में भाजपा सरकार आई है तबसे उसने उसे नेपाल को हिंदू राष्ट्र मानकर ज्यादा नज़दीकी रिश्ता जताना शुरू किया। यह नेपाल को ठीक न लगा और वहां की माओवादी सरकार आंतरिक आलोचना को देखते हुए बिम्सटेक में सैन्य अभ्यास के प्रस्ताव को हजम नहीं कर सकी। हालांकि, भारतीय सेना में 30,000 गोरखा सैनिक हैं और उन्हें हर तरह की सुविधा और सम्मान प्राप्त है लेकिन, गोरखा अपने को पैसे के लिए लड़ने वाले सैनिक मानते हैं। वे पूरी दुनिया में इसी तरह से जाते और लड़ते हैं। निश्चित तौर पर नेपाल का यह रुख भारत को कष्ट देने वाला है। इसके बावजूद भारत को किसी तरह की झटका देने वाली प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करनी चाहिए। उसे अपनी आर्थिक व सामरिक ताकत बढ़ाते हुए चीन के साथ सकारात्मक प्रतिस्पर्धा जारी रखनी चाहिए और उसी में इन पड़ोसी देशों से आधुनिक आर्थिक और राजनीतिक शर्तों पर अच्छे रिश्ते कायम करना चाहिए।


Date:12-09-18

जरूरी विमर्श के दायरे में ‘दलित’

बद्री नारायण,  (लेखक जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के निदेशक व समाज विज्ञानी हैं)

भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हाल में एक एडवाइजरी जारी कर मीडिया व संबंधित संस्थानों से आग्रह किया कि वे दलित सामाजिक समूहों तथा जातियों के लिए दलित के स्थान पर अनुसूचित जाति या एससी शब्द का उपयोग करें। इससे मीडिया, राजनीतिक विश्लेषकों, अकादमिक वर्ग और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच एक विमर्श छिड़ गया। उनकी ओर से यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि इससे क्या हासिल होगा? इसके क्या राजनीतिक निहितार्थ हैं? क्या सत्तारूढ़ दल द्वारा यह कदम उठाने के पीछे कोई राजनीतिक मंशा छिपी हुई है?इन सवालों के बीच यह जानना जरूरी है कि पिछले दिनों मप्र हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में सभी सरकारी प्रपत्रों में दलित के स्थान पर एससी शब्द का ही इस्तेमाल करने का सुझाव दिया था। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट एवं कई अन्य विधिक संस्थानों के माध्यम से भी ऐसे सुझाव सामने आ चुके हैं। एससी शब्द एक प्रशासनिक शब्दावली है। इसके तहत उन सामाजिक समूहों की अस्मिता निर्धारित होती है जिनका निर्धारण औपनिवेशिक जनगणना एवं गजेटियर्स के माध्यम से अंग्रेजी काल में किया गया था। आजादी के बाद शेड्यूल्ड की गई जातियों की सूची में समय-समय पर संशोधन किया जाता रहा।

जबकि दलित शब्द एक व्यापक सामाजिक एवं राजनीतिक श्रेणी है। इसमें अनुसूचित जातियों के अतिरिक्त जनजातियां, निम्न ओबीसी, मुस्लिम एवं महिला सहित वे सभी सामाजिक समूह आ सकते हैं, जो हमारे जाति प्रधान समाज में दलन यानी दमन के शिकार रहे हैं। ऐसे में दलित शब्द एससी से ज्यादा व्यापक रूप में उपयोग में लाया जाता है। जब हम दलित शब्द का उपयोग करते हैं, तो दो अर्थ सामने आते हैं- एक तो वह जो उपेक्षित, प्रताड़ित एवं दमित है, दूसरा वह जो अपनी इस स्थिति से उबरने के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संघर्ष में रत है। इसके विपरीत एससी शब्द एक निरपेक्ष भाव पैदा करता है। महाराष्ट्र से उभरी उपेक्षितों की राजनीति में दलित शब्द एक अस्मिता से जुड़े शब्द के रूप में सामने आया जिसे ज्योतिबा फुले एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे दमितों के विचारकों ने संघर्ष से नया राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अर्थ दिया। अब यह शब्द अनुसूचित जाति के लोगों एवं अन्य उपेक्षितों के लिए उनकी अस्मिता का प्रतीक शब्द बन गया है। दलित शब्द का उपयोग अनुसूचित समाज का मध्य वर्ग, पढ़ा-लिखा तबका, शहरी दलित संवर्ग, दलित नेतृत्वकारी समूह लगातार करते रहे हैं। महाराष्ट्र में तो यह शब्द गांवों, कस्बों, झुग्गी बस्तियों के साथ ही मुंबई, पुणे, सतारा, नागपुर जैसे नगरों की अनुसूचित जाति की आबादी का लोकप्रिय शब्द बन गया है। इस शब्द का लंबा इतिहास रहा है।

महाराष्ट्र की तुलना में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में दलित शब्द अभी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है। गांवों में अनुसूचित जाति के लोग अपनी जाति के नाम से अपनी पहचान को जोड़ते हैं। जब वे सरकारी कार्यालयों में आवेदन करते हैं, पुलिस में रपट लिखाते हैं या सरकारी योजनाओं में अपनी हिस्सेदारी की मांग करते हैं तो वे अपने लिए अनुसूचित जाति शब्द का प्रयोग करते हैं। इन्हीं राज्यों में अनुसूचित जाति के लोग जब बहुजन समाज पार्टी या ऐसे ही अन्य राजनीतिक अथवा सामाजिक संगठन की रैली इत्यादि में जाते हैं तो वे अपने लिए दलित या बहुजन शब्द का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार अनुसूचित सामाजिक समूह का एक ही व्यक्ति एक साथ अनेक अस्मिताओं को लेकर चलता है, जिनका वह वक्त और संदर्भ के हिसाब से अलग-अलग इस्तेमाल करता है। कांशीराम अपने राजनीतिक संदर्भ में दलित शब्द का प्रयोग कम से कम करते थे। इसके बजाय वह बहुजन शब्द का ज्यादा इस्तेमाल करते थे। बहुजन शब्द दलित शब्द से भी ज्यादा व्यापक है। इसके दायरे में ऊंचे एवं प्रभावी सामाजिक समूहों को छोड़कर सभी आ जाते हैं। कांशीराम का तो यहां तक मानना था कि ब्राह्मणों में गैर मनुवादी सामाजिक व्यवहार में विश्वास करने वाले लोग बहुजन कोटि में आ सकते हैं। बहुजन समाज पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग का आधार उनका यही विश्वास था।

बहुजन बुद्धवादी विमर्श से उभरी शब्दावली है, जो पहले महाराष्ट्र के दलित विमर्श की शब्दावली का हिस्सा बना। इसे बाद में कांशीराम ने उप्र एवं देश के अन्य भागों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना दिया। कांशीराम की तरह मायावती ने भी दलित शब्द का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विमर्श में कम से कम किया है। बिहार के तमाम गांवों में आज भी अनुसूचित सामाजिक समूह के लोग अपनी पहचान के लिए अक्सर हरिजन शब्द का प्रयोग करते हैं। हरिजन शब्द महात्मा गांधी ने अनुसूचित सामाजिक समूह के लोगों के लिए इस्तेमाल किया था। कुछ सामाजिक शोधकर्ताओं का मानना है कि आधार तल पर और ग्रामीण अंचलों में आज भी अनुसूचित जाति के लोग दलित से ज्यादा हरिजन शब्द का इस्तेमाल करते हैं। प्रश्न उठता है कि एससी शब्द से उपेक्षित समूहों की कैसी अस्मिता निर्मित होती है और उनकी इस अस्मिता पर क्या असर पड़ता है? एक सवाल यह भी है कि राज्य के प्रयोजन एवं सामाजिक समरसता के निर्माण में इसके क्या परिणाम होंगे? कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एससी शब्द के प्रयोग से अनुसूचित जाति समूहों की आक्रामक अस्मिता प्रभावित होगी।

यह अस्मिता सक्रिय अस्मिता से धीरे-धीरे निष्क्रिय अस्मिता में बदल सकती है। तब इस अस्मिता की अपने हक एवं हकूक के लिए लड़ाई लड़ने की क्षमता भी प्रभावित होगी। ऐसे में अनेक उपेक्षित समूहों की अपने अधिकारों के लिए दबाव बनाने की क्षमता प्रभावित होगी। अनुसूचित समाज के बुद्धिजीवियों का यहां तक कहना है कि इससे हम धीरे-धीरे राज्याश्रित समूह में बदल जाएंगे। हालांकि राजसत्ता की चाहत भी तो यही होती है कि सत्ता से अपने हक के लिए टकराते रहने वाले सामाजिक समूह ऐसी अस्मिता में बदल जाएं, जिससे सत्ता को उन्हें संयोजित करने में आसानी हो। राज्य की चाहत तो यही होगी कि ऐसी अस्मिताएं विकसित हों जो संविधानपरक संस्कृति के अनुरूप चलें। वे ऐसी हों, जिन्हें आसानी से नियंत्रित एवं नियोजित किया जा सके और वे आपस में टकराती हुई अस्मिताओं का रूप न ले लें। आज यह कहना कठिन है कि भारतीय समाज की एकबद्धता के निर्माण में अस्मिता निर्माण की राज्य निर्देशित प्रक्रिया कहां तक मददगार होती है, लेकिन अगर हमारे मीडिया विमर्श में दलित शब्द का प्रयोग घटेगा तो धीरे-धीरे इस शब्द से बनने वाली अस्मिता भी प्रभावित होगी। इसके साथ ही सामाजिक आंदोलनों एवं विचार-विमर्श द्वारा निर्मित अस्मिता कमजोर होगी। यह भविष्य बताएगा कि दलित के बजाय अनुसूचित जाति शब्द के इस्तेमाल से सामाजिक समरसता के निर्माण में क्या असर होगा?


Date:12-09-18

गिरता रुपया और चढ़ता तेल

डॉ. भरत झुनझुनवाला, (लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आइआइएम बेंगलूर के पूर्व प्रोफेसर हैं)

आज से एक वर्ष पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 64 के स्तर पर था। यानी एक डॉलर के बदले हमें 64 रुपये चुकाने पड़ रहे थे। आज उसी एक डॉलर को हासिल करने के लिए हमें 72 रुपये देने पड़ रहे हैं। जब रुपया गिर रहा है तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्य बढ़ना कहीं बड़ी समस्या है। रुपये की हैसियत एक वर्ष में 10 प्रतिशत से अधिक गिर गई है। इसका मूल कारण यह है कि हमारे माल की उत्पादन लागत ज्यादा है। मान लीजिए कि एक खिलौना अमेरिका में एक डॉलर में उत्पादित होता है। यदि इसी खिलौने को भारत में 50 रुपये में उत्पादित कर लिया जाए तो एक डॉलर के बदले में हमें 50 रुपये ही देने पड़ेंगे। इससे रुपये का मूल्य बढ़ जाएगा। इसकी तुलना में यदि उसी खिलौने का उत्पादन करने में भारत में लागत 80 रुपये आती है तो रुपये का दाम गिर जाएगा, क्योंकि खिलौने का आपस में लेनदेन हो सकता है। मूल चिंता का विषय यह है कि हमारी प्रतिस्पर्धा क्षमता क्यों घट रही है?

विश्व आर्थिक मंच यानी डब्लूईएफ द्वारा प्रत्येक वर्ष दुनिया के प्रमुख देशों की प्रतिस्पर्धा क्षमता के आधार पर रैंकिंग बनाई जाती है। इस रैंकिंग में 2015 में हमारी रैंक 71 थी जो 2017 में सुधरकर 39 हो गई, लेकिन इस वर्ष इसमें फिसलन आ गई और हम 40वें स्थान पर आ टिके हैं। पूर्व में जो सुधार हो रहा था वह अब स्थिर हो गया है। डब्लूईएफ ने इसका पहला कारण भारतीय व्यापार की तकनीकी तैयारी बताया है। आज के युग में इंटरनेट आदि के माध्यम से व्यापार करना बढ़ रहा है। डब्लूईएफ ने पाया कि नई तकनीक हासिल करने में भारत के व्यापारी और उद्यमी कुछ सुस्त हैं। यह इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि सॉफ्टवेयर बनाने में भारत विश्व में अग्रणी है। हमारी तकनीकी क्षमता सॉफ्टवेयर बनाने के प्रमुख केंद्रों जैसे बेंगलुरु या पुणे तक ही सीमित रह गई है। यह पूरे देश में नहीं फैल पा रही है। हमारे उद्यमी मूल रूप से पुरानी तकनीक के ही आधार पर व्यापार कर रहे हैं। इसलिए भी भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता कम है। डब्लूईएफ ने इसीलिए तकनीकी तैयारी में भारत को 137 देशों की सूची में 107 वें स्थान पर रखा है।

डब्लूईएफ ने इसका दूसरा कारण शिक्षा का बताया है। प्राथमिक शिक्षा में भारत की रैंक 137 देशों में 91 और उच्च शिक्षा में भारत की रैंक 75 बताई है। कारण यह है कि हमारी शिक्षा पद्धति अभी भी पुरानी परिपाटी पर ही चल रही है। उसमें नए विषय एवं इंटरनेट जैसी तकनीकों का पर्याप्त समावेश नहीं है। सरकार को शिक्षा में आमूलचूल सुधार पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। भारत की नीची रैंक का तीसरा कारण डब्लूईएफ ने श्रम बाजार की जटिलता बताया है। श्रम कानूनों के तहत कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध है। काम न करने पर भी उद्यमी के लिए उन्हें दंडित करना कठिन होता है। जानकार बताते हैं कि भारत के कर्मियों की तुलना में चीन के कर्मी लगभग दोगुने माल का उत्पादन करते हैं। इससे चीन का माल सस्ता और भारत का महंगा हो जाता है। हमें श्रम कानूनों में जल्द सुधार करना पड़ेगा।

यदि हमें अपने रुपये की साख को बचाना है तो हमें माल सस्ता बनाना पड़ेगा। इस संदर्भ में हम अन्य कारणों का विवेचन कर सकते हैं। पहला कारण यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का दाम चढ़ रहा है। कच्चा तेल खरीदने के लिए अब हमें अधिक डॉलर की जरूरत पड़ रही है। इससे डॉलर की मांग बढ़ रही है। परिणामस्वरूप रुपया भी गिर रहा है। हम इस दलदल में इसलिए फंसे हैं, क्योंकि हमने ऊर्जा की खपत को अनायास ही बढ़ाया है। प्रत्येक देश को अपने प्राकृतिक संसाधनों के अनुकूल आर्थिक विकास की रणनीति बनानी होती है। चूंकि रूस में तेल उपलब्ध है इसलिए वहां इस्पात और एल्युमीनियम का उत्पादन सस्ता पड़ रहा है। इसी प्रकार भारत में ऊर्जा की कमी है इसलिए हमें ऐसे उद्यमों पर ध्यान देना होगा जहां ऊर्जा की जरूरत कम हो।

सेवा क्षेत्र में होटल, पर्यटन, सॉफ्टवेयर, सिनेमा, अनुवाद और शोध इत्यादि क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों की तुलना में ऊर्जा की खपत खासी कम होती है। सेवा क्षेत्र में यदि सौ रुपये का माल बनाने में दो रुपये की ऊर्जा खर्च होती है तो विनिर्माण में 20 रुपये। हमने विनिर्माण को प्रोत्साहन देकर ऊर्जा की खपत को बढ़ाया है। इसी कारण हमें तेल ज्यादा आयात करना पड़ रहा है। रुपये के गिरने का दूसरा कारण भारत का बढ़ता व्यापार घाटा भी है। हमारे निर्यात दबाव में हैं जबकि आयात बढ़ रहे हैं। ऐसे विषम हालात पैदा करने में हमारी आर्थिक नीतियों का योगदान है। आज अमेरिका ने भारत और चीन के इस्पात पर आयात कर बढ़ा दिए। हम अभी भी मुक्त व्यापार का झंडा फहरा रहे हैं। जब दूसरे देशों की सरहदें हमारे निर्यात के लिये बंद होती जा रही हैं तब हम हमने अपनी सरहदों को आयात के लिए खोल रखा है। यही कारण है कि भारत का व्यापार घाटा और बढ़ता जा रहा है।

रुपये के गिरने का तीसरा कारण रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप का अभाव बताया जा रहा है। जब हमारी मुद्रा में यकायक तेजी या गिरावट आती है तब रिजर्व बैंक हस्तक्षेप करता है। जब रुपया एकाएक बढ़ता है तो रिजर्व बैंक डॉलर की खरीद करता है जिससे डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपये का दाम फिर घटने लगता है। इसके विपरीत जब रुपये के मूल्य में गिरावट आती है तो रिजर्व बैंक डॉलर बेचकर डॉलर की उपलब्धता को बढ़ाता है जिससे रुपये का दाम फिर स्थिर हो जाता है, लेकिन रिजर्व बैंक के पास डॉलर का एक सीमित भंडार है जिसे बेचने की एक सीमा है। ऐसे में रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से रुपये के मूल्य में तात्कालिक गिरावट को रोका जा सकता है, लेकिन यह दीर्घकालीन हल नहीं है। रुपये के गिरने का मूल कारण हमारी प्रतिस्पर्धा शक्ति का हृास है। हमने नई तकनीकों का समावेश एवं शिक्षा में तकनीकी विषयों को जोड़ने का पर्याप्त कार्य नहीं किया है। हमने विनिर्माण को बढ़ावा देकर तेल की खपत को बढ़ाया है और मुक्त व्यापार के मंत्र को अपनाकर अपना व्यापार घाटा बढ़ाया है। ऐसे में रुपये के मूल्य को गिरने से रोकने के लिये सरकार को अपनी इन नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा रुपये में गिरावट का यह सिलसिला और लंबा खिंच सकता है।


Date:11-09-18

केरल की बाढ़ में छिपे चेतावनी भरे संदेश

सुनीता नारायण

गॉड्स ओन कंट्री’ के नाम से मशहूर केरल पहाड़ों, नदियों, धान के खेतों और समुद्री तटों से भरा इलाका है। यहां पर प्राकृतिक सुंदरता की भरमार है। लेकिन यह खूबसूरत जगह उसी दुनिया में स्थित है जो हानिकारक रूप से गैर-संवहनीय है। इसकी वजह यह है कि यहां के लोगों ने पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया है और हमारी दुनिया की जलवायु को भी जोखिम में डाला जा चुका है। ऐसी स्थिति में वही होता है जो ‘भगवान के अपने देश’ में अगस्त के महीने में देखने को मिला। यह डूब गया था। उफनती नदियों और भूस्खलन ने इस राज्य में तबाही मचा दी। कहा जा रहा है कि इस बाढ़ ने केरल में इस कदर नुकसान पहुंचाया है कि एक तरह से समूचे राज्य का नए सिरे से निर्माण करना होगा।गौर से विचार करें तो यही लगेगा कि केरल लंबे समय से इस तरह की आपदा का इंतजार कर रहा था। राज्य में छोटी-बड़ी 44 नदियां हैं जो पश्चिमी घाट से निकलती हैं और अमूमन 100 किलोमीटर से भी कम दूरी तय कर समुद्र में मिल जाती हैं। यह उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र भी है जहां खूब बारिश होती है। इसका मतलब है कि राज्य में जलनिकासी का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए।

पश्चिमी घाट वाले उष्ण-कटिबंधीय वनाच्छादित पहाड़ी इलाके में मौजूद 61 बांध इस जलनिकासी पारिस्थितिकी का एक अंग हैं। मुख्यत: बिजली उत्पादन के लिए बनाए गए इन बांधों में मॉनसून के समय पानी जमा होता है और बारिश खत्म होने के बाद पानी को छोड़ा जाता है। लेकिन इस बार केरल में मूसलाधार बारिश हुई और 15-20 दिनों में ही 7.71 सेंटीमीटर बारिश हो गई। इसमें भी 75 फीसदी बारिश महज आठ दिनों में हुई। भारी बारिश के चलते ये बांध ही आपदा का सबब बन गए। मूसलाधार बारिश होने से पहाड़ी इलाकों में चट्टानों के दरकने का सिलसिला शुरू हो गया जिसकी चपेट में आने से कई लोगों की मौत हो गई। चंद दिनों में ही भारी बारिश से जलाशयों में इतना पानी इकट्ठा हो गया कि उनके गेट खोलने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा न करने पर बांधों की दीवारें टूटने का खतरा था। सबसे बड़े बांधों में से एक इडुक्की के गेट 26 साल बाद पहली बार और अब तक केवल तीसरी बार खोले गए। दरअसल मॉनसूनी बारिश के चलते जुलाई में ही बांधों के जलाशय काफी हद तक भर चुके थे। बारिश के वितरण में असंतुलन होने से बांध संचालकों ने जलाशयों में जमा पानी को छोडऩा भी मुनासिब नहीं समझा। उन्हें यह सूचना नहीं थी कि अगस्त में इतनी भारी बारिश होने वाली है।

इसके अलावा उन्हें यह भी यकीन था कि बिजली पैदा करने के लिए जरूरी बारिश होगी और उनके जलाशय लबालब भर जाएंगे। इन वजहों से अगस्त की बारिश ने इस आपदा को कई गुना बढ़ा दिया। सच तो यह है कि मौसम प्रणाली में हो रहे बदलाव का सामना करने के लिए हमारे पास कोई योजना ही नहीं है। हम मॉनसून के प्रतिकूल एवं बदलावकारी चरित्र से निपटने के लिए तनिक भी तैयार नहीं हैं। लिहाजा हमें यह बात पूरी तरह साफ होनी चाहिए कि केरल की बाढ़ पूरी तरह मानव-निर्मित है। यह त्रासदी वैश्विक उत्सर्जन पर काबू पाने में हमारी साझा नाकामी का नतीजा है। वैश्विक उत्सर्जन की वजह से अजीब मौसमी घटनाएं घट रही हैं। यह संसाधनों के हमारे कुप्रबंधन का नतीजा है। राज्य ने जंगली क्षेत्र से होकर धान के खेतों और वहां से तालाबों एवं नदियों तक जाने वाली जलप्रणाली को ध्वस्त कर दिया है। तालाबों एवं नदियों में अतिरिक्त पानी को इकट्ठा किया जा सकता था। यह हमारी तकनीकी एजेंसियों की अक्षमता भी है कि बाढ़ नियंत्रण और बांध प्रबंधन की सटीक योजना नहीं बनाई जा सकी। इस तरह यह त्रासदी मानव-निर्मित है। सबसे अहम बात यह है कि इसके मानव-निर्मित होने की वजह यह है कि हम इसे नया सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं।

हम यह मानना चाहते हैं कि यह महज एक अनूठी और सौ साल में एक बार होने वाली घटना है जिससे निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं की जा सकती है। हमें सच को स्वीकार करना होगा, केवल शब्दों में ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी। केरल का एक तरह से पुनर्निर्माण होने जा रहा है। वह दोबारा वही गलती नहीं दोहरा सकता है। उसे मौसमी बारिश के इस नव-सामान्य पहलू (असमान वितरण एवं अत्यधिक बारिश) को ध्यान में रखते हुए नवनिर्माण करना होगा। लिहाजा केरल को हरेक नदी, नाले, तालाब, खेत और शहर से जल निकासी की समुचित योजना बनानी होगी और हरेक कीमत पर उनका संरक्षण करना होगा। प्रत्येक घर, संस्थान, गांव और शहर को वर्षाजल संचयन के लिए इंतजाम करना होगा ताकि बारिश के पानी को रास्ता दिखाया जा सके और उससे जलस्तर को भी बढ़ाया जा सके। वन पारिस्थितिकी का निर्माण इस तरह होना चाहिए कि लोगों को फायदा हो। जंगली इलाके में पौधरोपण इस तरह किया जाए कि मृदा संरक्षित रहे। लेकिन जलवायु परिवर्तन के जोखिम वाले दौर में इतना काफी नहीं होगा।

इस नव-सामान्य परिघटना में सरकारों को परिवर्तनशीलता के लिए भी योजना बनानी होगी। इसका मतलब है कि मौसम के सटीक पूर्वानुमान और उस सूचना से अवगत कराने के लिए सरकार को तकनीकी क्षमताएं बढ़ानी होंगी। केरल की बाढ़ के संदर्भ में देखें तो इसे भयंकर रूप लेने से तभी रोका जा सकता था जब जुलाई के पहले ही मॉनसून की भारी बारिश के बारे में जानकारी उपलब्ध होती। ऐसा होने पर बांधों में जमा पानी को छोड़ दिया जाता और जलाशयों की भंडारण क्षमता को भारी बारिश के लिए तैयार रखा जाता। सवाल है कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है? अगली बाढ़ को इतना भयंकर रूप लेने से रोकने के लिए क्या करना होगा? जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम वैज्ञानिकों से लेकर जल संसाधन एवं बाढ़ प्रबंधन से जुड़े तकनीकी संस्थानों के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही है और हमें इसका जवाब तलाशना होगा। यह अब सामान्य स्थिति नहीं रह गई है। वह वक्त बीत चुका है और हमें इस बात को साफ-साफ समझ लेना होगा।


Date:11-09-18

Reconnecting with Europe

C. Raja Mohan, (The writer is director, Institute of South Asian Studies, National University of Singapore and a contributing editor on international affairs for ‘The Indian Express’)

President Ram Nath Kovind’s visit to three European states — Cyprus, Bulgaria and the Czech Republic— last week may not have drawn big headlines in the Indian media. But his trip is part of a notable effort by the Narendra Modi government to put Europe back at the centre of India’s global consciousness. India’s diplomatic mind space is occupied mostly by Pakistan, China, and the United States. Thanks to the institutionalised high-level interaction with Asia, India’s relations with the ASEAN have become a part of the foreign policy discourse. Thanks again to annual summits, Japan has become an important element of India’s international relations.

But Europe as a collective has drawn little attention. The problem is not just with the government, but also the so-called strategic community. Analysts presenting periodic reviews of India’s foreign policy rarely mention Europe. When all is said and done about Modi’s diplomatic record, his outreach to Europe is likely to emerge as a major contribution to India’s foreign policy. This outreach has had a number of strands. One was to show the flag. India’s accumulated neglect of Europe meant there were many countries that few Indian leaders or senior officials had not visited for decades. The smaller countries of Europe, in particular, got the short shrift. The Modi government has made amends by launching an expansive engagement with European countries at the political level.

Kovind had earlier travelled to Greece and outlined a comprehensive new Indian approach to Europe. His predecessor, Pranab Mukherjee and Vice President Hamid Ansari had undertaken important trips to the region after the NDA government came to office. Ministers and senior officials too have stepped up travel to and engagement with Europe. The last four years have also seen a major diplomatic push to clear the underbrush that was preventing a rapid advance in the engagement with Europe. Unresolved issues with key countries in Europe had injected much negativity to India’s relations with key European countries. The case of the detained Italian marines — that festered under the UPA government — was sorted out by the NDA government with long overdue purposefulness. This led to Rome’s support for India’s membership of the export control groups and its lifting the political hold on the India-EU annual summit in 2016.

In what could turn out to be a potential game-changer, Modi has laid the foundation for a strong strategic partnership with France. If the UPA government was unable to translate its selection of the Rafale fighter aircraft into formal acquisition, the NDA government has moved forward, notwithstanding the political problems associated these days with any major arms purchase. Even more important, the ambit of the relationship with France now includes maritime and naval collaboration.Beyond the bilateral, the NDA government sought to intensify engagement with the European Union. Although the two sides had unveiled a strategic partnership way back in 2004, the movement was too slow. If India seemed unwilling to think strategically about Europe, Brussels too took a bureaucratic view of India. That is changing now.

The EU is currently mapping out an “India Strategy” that is expected to lay out an ambitious new agenda for the relationship. India, on its part, is attaching a new strategic salience to the relationship with Europe. As Kovind put it in a speech in Athens earlier this year, “Europe is irreplaceable in India’s determination to achieve the goals it has set itself.” As the world’s second-largest economic entity and a major source of capital, Europe is a natural partner in India’s economic transformation. But India has a lot of catching up to do with Europe — from trade liberalisation to educational exchanges and climate change to security cooperation. The Modi government’s boldest move, however, lies in a conscious effort to break out of the anti-colonial and Cold War attitudes that crimped India’s engagement with Europe.

The PM’s enthusiastic outreach to Britain and participation in the Commonwealth summit, much against the grain of conventional thinking in the foreign policy community, opened up new opportunities with London. So is the unfolding Indian Ocean partnership with France. Independent India began well by looking at Europe in quite a differentiated way. Prime Minister Jawaharlal Nehru chose to retain the Commonwealth connection against the dominant trend in the nationalist movement. The attractions of aid saw Nehru limit India’s post-War engagement with a divided Germany to the West. As its foreign policy became more doctrinaire in the later years of the Cold War, Delhi became less and less sophisticated.

As it deepens engagement with Europe today, India is learning to appreciate the multiple forces — religious, ethnic, economic and political — that are reshaping the continent. As it reaches out to Central Europe, India has begun to acknowledge the region’s complex relations with its large neighbours — Germany and Russia. In deepening ties with the Nordic and Baltic states, Delhi recognises their deep-seated fears about an assertive Moscow. India’s long-standing friendship with Russia gives Delhi a solid understanding of Moscow’s concerns on Western expansion into its “near abroad”. This is not a picture that fits in with India’s Cold War perceptions of Europe.

On top of all this is a new factor — the Trump Administration’s pressure on Europe to take more responsibility for its own security and the maintenance of the regional order. As Europe steps out from America’s protective shell, it will need partners in promoting stability in Eurasia and the Indo-Pacific. That opens up one of the most productive and exciting lines of strategic advance for India in the coming years.

News Clipping on 11-09-2018

Date:11-09-18

Man-made Devastation?

Kerala’s major dams filled up halfway through the monsoon, raising questions on dam management

TOI Editorials

A study for the water resources ministry, by a team from Central Water Commission, pointed out that many of Kerala’s major dams were filled to the brim even ahead of the torrential rain in August. This finding highlights again the state of dam management in India and its role in exacerbating the damage from floods. Kerala suffered devastation following extraordinary rainfall in the first three weeks of August. Floods were perhaps an inevitable outcome of this scale of precipitation. But what may not have been inevitable is the scale of devastation.

According to ecologist Madhav Gadgil, sensible dam management necessitated a gradual filling up of reservoirs as the monsoon progressed. In Kerala, halfway through the monsoon, the dams were filled to capacity. It rendered them ineffective in mitigating the impact of the August deluge. It speaks poorly of governance in India that questions about dam management arise every year when 164 of the 5,264 large dams are over a century old. Government has classified about 14% of India’s land area as flood prone. On average 7.169 million hectares are affected annually due to floods. This may be a recurring cycle. But repeating the same mistakes over and over again makes them doubly unacceptable.

Some of these mistakes have showed up in Kerala. Stone quarrying, some of it illegal, has led to siltation. Encroachment of floodplains and reclamation of wetlands have compounded the problem. During a performance audit of Tamil Nadu government’s role in mitigating the 2015 Chennai floods, CAG identified some of the standard mistakes. For example, allowing encroachments which shrunk storage capacity in Chennai is a governance failure – with devastating consequences – common to many states. With extreme weather events becoming more frequent, states need to ramp up governance standards. Else the scale of devastation can only get worse.


Date:11-09-18

केरल की बाढ़ में छिपे चेतावनी भरे संदेश

सुनीता नारायण

‘गॉड्स ओन कंट्री’ के नाम से मशहूर केरल पहाड़ों, नदियों, धान के खेतों और समुद्री तटों से भरा इलाका है। यहां पर प्राकृतिक सुंदरता की भरमार है। लेकिन यह खूबसूरत जगह उसी दुनिया में स्थित है जो हानिकारक रूप से गैर-संवहनीय है। इसकी वजह यह है कि यहां के लोगों ने पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया है और हमारी दुनिया की जलवायु को भी जोखिम में डाला जा चुका है। ऐसी स्थिति में वही होता है जो ‘भगवान के अपने देश’ में अगस्त के महीने में देखने को मिला। यह डूब गया था। उफनती नदियों और भूस्खलन ने इस राज्य में तबाही मचा दी। कहा जा रहा है कि इस बाढ़ ने केरल में इस कदर नुकसान पहुंचाया है कि एक तरह से समूचे राज्य का नए सिरे से निर्माण करना होगा।

गौर से विचार करें तो यही लगेगा कि केरल लंबे समय से इस तरह की आपदा का इंतजार कर रहा था। राज्य में छोटी-बड़ी 44 नदियां हैं जो पश्चिमी घाट से निकलती हैं और अमूमन 100 किलोमीटर से भी कम दूरी तय कर समुद्र में मिल जाती हैं। यह उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र भी है जहां खूब बारिश होती है। इसका मतलब है कि राज्य में जलनिकासी का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। पश्चिमी घाट वाले उष्ण-कटिबंधीय वनाच्छादित पहाड़ी इलाके में मौजूद 61 बांध इस जलनिकासी पारिस्थितिकी का एक अंग हैं। मुख्यत: बिजली उत्पादन के लिए बनाए गए इन बांधों में मॉनसून के समय पानी जमा होता है और बारिश खत्म होने के बाद पानी को छोड़ा जाता है। लेकिन इस बार केरल में मूसलाधार बारिश हुई और 15-20 दिनों में ही 7.71 सेंटीमीटर बारिश हो गई। इसमें भी 75 फीसदी बारिश महज आठ दिनों में हुई। भारी बारिश के चलते ये बांध ही आपदा का सबब बन गए।

मूसलाधार बारिश होने से पहाड़ी इलाकों में चट्टानों के दरकने का सिलसिला शुरू हो गया जिसकी चपेट में आने से कई लोगों की मौत हो गई। चंद दिनों में ही भारी बारिश से जलाशयों में इतना पानी इकट्ठा हो गया कि उनके गेट खोलने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा न करने पर बांधों की दीवारें टूटने का खतरा था। सबसे बड़े बांधों में से एक इडुक्की के गेट 26 साल बाद पहली बार और अब तक केवल तीसरी बार खोले गए। दरअसल मॉनसूनी बारिश के चलते जुलाई में ही बांधों के जलाशय काफी हद तक भर चुके थे। बारिश के वितरण में असंतुलन होने से बांध संचालकों ने जलाशयों में जमा पानी को छोडऩा भी मुनासिब नहीं समझा। उन्हें यह सूचना नहीं थी कि अगस्त में इतनी भारी बारिश होने वाली है। इसके अलावा उन्हें यह भी यकीन था कि बिजली पैदा करने के लिए जरूरी बारिश होगी और उनके जलाशय लबालब भर जाएंगे। इन वजहों से अगस्त की बारिश ने इस आपदा को कई गुना बढ़ा दिया। सच तो यह है कि मौसम प्रणाली में हो रहे बदलाव का सामना करने के लिए हमारे पास कोई योजना ही नहीं है। हम मॉनसून के प्रतिकूल एवं बदलावकारी चरित्र से निपटने के लिए तनिक भी तैयार नहीं हैं। लिहाजा हमें यह बात पूरी तरह साफ होनी चाहिए कि केरल की बाढ़ पूरी तरह मानव-निर्मित है।

यह त्रासदी वैश्विक उत्सर्जन पर काबू पाने में हमारी साझा नाकामी का नतीजा है। वैश्विक उत्सर्जन की वजह से अजीब मौसमी घटनाएं घट रही हैं। यह संसाधनों के हमारे कुप्रबंधन का नतीजा है। राज्य ने जंगली क्षेत्र से होकर धान के खेतों और वहां से तालाबों एवं नदियों तक जाने वाली जलप्रणाली को ध्वस्त कर दिया है। तालाबों एवं नदियों में अतिरिक्त पानी को इकट्ठा किया जा सकता था। यह हमारी तकनीकी एजेंसियों की अक्षमता भी है कि बाढ़ नियंत्रण और बांध प्रबंधन की सटीक योजना नहीं बनाई जा सकी। इस तरह यह त्रासदी मानव-निर्मित है। सबसे अहम बात यह है कि इसके मानव-निर्मित होने की वजह यह है कि हम इसे नया सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं। हम यह मानना चाहते हैं कि यह महज एक अनूठी और सौ साल में एक बार होने वाली घटना है जिससे निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं की जा सकती है।

हमें सच को स्वीकार करना होगा, केवल शब्दों में ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी। केरल का एक तरह से पुनर्निर्माण होने जा रहा है। वह दोबारा वही गलती नहीं दोहरा सकता है। उसे मौसमी बारिश के इस नव-सामान्य पहलू (असमान वितरण एवं अत्यधिक बारिश) को ध्यान में रखते हुए नवनिर्माण करना होगा। लिहाजा केरल को हरेक नदी, नाले, तालाब, खेत और शहर से जल निकासी की समुचित योजना बनानी होगी और हरेक कीमत पर उनका संरक्षण करना होगा। प्रत्येक घर, संस्थान, गांव और शहर को वर्षाजल संचयन के लिए इंतजाम करना होगा ताकि बारिश के पानी को रास्ता दिखाया जा सके और उससे जलस्तर को भी बढ़ाया जा सके। वन पारिस्थितिकी का निर्माण इस तरह होना चाहिए कि लोगों को फायदा हो। जंगली इलाके में पौधरोपण इस तरह किया जाए कि मृदा संरक्षित रहे। लेकिन जलवायु परिवर्तन के जोखिम वाले दौर में इतना काफी नहीं होगा।

इस नव-सामान्य परिघटना में सरकारों को परिवर्तनशीलता के लिए भी योजना बनानी होगी। इसका मतलब है कि मौसम के सटीक पूर्वानुमान और उस सूचना से अवगत कराने के लिए सरकार को तकनीकी क्षमताएं बढ़ानी होंगी। केरल की बाढ़ के संदर्भ में देखें तो इसे भयंकर रूप लेने से तभी रोका जा सकता था जब जुलाई के पहले ही मॉनसून की भारी बारिश के बारे में जानकारी उपलब्ध होती। ऐसा होने पर बांधों में जमा पानी को छोड़ दिया जाता और जलाशयों की भंडारण क्षमता को भारी बारिश के लिए तैयार रखा जाता। सवाल है कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है? अगली बाढ़ को इतना भयंकर रूप लेने से रोकने के लिए क्या करना होगा? जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम वैज्ञानिकों से लेकर जल संसाधन एवं बाढ़ प्रबंधन से जुड़े तकनीकी संस्थानों के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही है और हमें इसका जवाब तलाशना होगा। यह अब सामान्य स्थिति नहीं रह गई है। वह वक्त बीत चुका है और हमें इस बात को साफ-साफ समझ लेना होगा।


Date:10-09-18

फिर सिर उठाती जातिवादी राजनीति

इन दिनों आरक्षण की आड़ में तो जातिवादी राजनीति हो ही रही है, एससी-एसटी एक्ट के बहाने भी इसे हवा दी जा रही है।

संजय गुप्त

चार राज्यों के विधानसभा और उसके ठीक बाद लोकसभा चुनाव से पहले देश के विभिन्न् हिस्सों में जिस तरह जातिवादी राजनीति की आग सुलग उठी है, वह चिंताजनक भी है और भारतीय राजनीति के स्याह पक्ष को रेखांकित करने वाली भी। इस जातिवादी राजनीति से उत्तर भारत के कई राज्य झुलस रहे हैं। इन दिनों आरक्षण की आड़ में तो जातिवादी राजनीति हो ही रही है, एससी-एसटी एक्ट के बहाने भी इसे हवा दी जा रही है। अपने देश में जब भी चुनाव आते हैं तो जाति-पंथ से जुड़े मुद्दे किसी न किसी बहाने सतह पर आ ही जाते हैं। इन मुद्दों के जरिए ध्रुवीकरण की राजनीति की जाने लगती है। जब ऐसा होता है तो विकास के सवाल अपने आप पीछे छूट जाते हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अभी हाल में एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सड़कों पर उतरे सवर्ण समाज के विभिन्न् संगठनों ने आरक्षण को लेकर भी विरोध जताया। एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सड़कों पर उतरे लोग भले ही अलग-अलग संगठनों से जुड़े हों, लेकिन यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि उन्हें परदे के पीछे से राजनीतिक शह इसलिए दी जा रही थी, ताकि भाजपा के समक्ष मुश्किलें खड़ी की जा सकें। अभी तक अनुसूचित जाति, जनजाति या पिछड़े वर्ग के लोग ही जातीय हित के सवाल को लेकर धरना-प्रदर्शन किया करते थे, लेकिन अब इसी रास्ते पर सवर्ण वर्ग भी चलता दिख रहा है। इस वर्ग के लोग विभिन्न् राज्यों में जिस तरह सड़कों पर उतर आए, उससे तमाम राजनीतिक दल अपनी रणनीति बदलने के लिए विवश हो सकते हैं।

एक समय भाजपा पर यह आरोप लगता था कि वह अगड़ी जातियों की पार्टी है, लेकिन आज वह दलित समाज की चिंता करने को लेकर कठघरे में खड़ी की जा रही है। इसका कारण यह है कि केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय की ओर से एससी-एसटी एक्ट में किए गए आंशिक बदलाव को सही न मानते हुए उसके पुराने स्वरूप को बहाल करने का काम किया। एक तरह से मोदी सरकार को ऐसा करने के लिए विवश किया गया, क्योंकि विपक्ष ने यह शोर मचा दिया था कि उच्चतम न्यायालय ने एससी-एसटी एक्ट को बहुत कमजोर कर दिया है और इससे दलितों का उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही नहीं हो सकेगी। यह माहौल संकीर्ण राजनीतिक इरादे से बनाया गया। इससे बचा जाना चाहिए था, क्योंकि उच्चतम न्यायलय ने केवल यह आदेश दिया था कि एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपितों की गिरफ्तारी सक्षम पुलिस अधिकारी की जांच के बाद ही होगी। हालांकि यह फैसला न्यायालय का था, लेकिन विरोधी दलों ने ऐसी तस्वीर पेश की, जैसे यह सब मोदी सरकार ने किया हो। चूंकि इस मामले में गलत तस्वीर पेश की गई, इसलिए दलित समाज उद्वेलित हो उठा। इसका लाभ उठाकर भाजपा विरोधी अभियान छेड़ दिया गया। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आयोजित भारत बंद के दौरान जमकर हिंसा हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई।

हालांकि उस दौरान यह साफ था कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं और वह उसके खिलाफ अपील दायर करेगी, लेकिन बावजूद इसके विरोधी दल एससी-एसटी एक्ट को लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे। अपने वादे के अनुसार केंद्र सरकार ने संशोधन विधेयक लाकर एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में बहाल कर दिया। इसके विरोध में ही सवर्ण समाज के कुछ संगठनों ने बंद का आयोजन किया। उनका विरोध इसी बात को लेकर था कि इस एक्ट को पुराने स्वरूप में क्यों बहाल किया गया? यही सवाल अब एक याचिका की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट के सामने है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एससी-एसटी एक्ट ही नहीं, आरक्षण से जुड़े कई मसले भी हैं। इन सब पर उसका फैसला कुछ भी हो, यह ध्यान रहे कि देश की आजादी के बाद वंचित-शोषित तबके को मुख्यधारा में लाने के लिए जब आरक्षण की पहल हुई, तब डॉ. भीमराव आंबेडकर के लिए इसका मतलब बैसाखी नहीं, सहारा था। वह इस मत के थे कि इसकी सतत समीक्षा होती रहे कि जिन्हें आरक्षण दिया जा रहा है, उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है या नहीं? वह आरक्षण व्यवस्था केवल दस वर्ष के लिए चाहते थे, लेकिन उसकी समयावधि लगातार बढ़ती गई। आज स्थिति है कि किसी भी राजनीतिक दल में यह साहस नहीं कि वह आरक्षण को चरणबद्ध ढंग से समाप्त करने की बात करना तो दूर रहा, उसकी समीक्षा करने अथवा उसे और अधिक न्यायसंगत बनाने की बात कर सके। यह एक यथार्थ है कि सवर्ण समाज की तुलना में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग प्रगति की दौड़ में कहीं पीछे हैं। इन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए अभी काफी कुछ किया जाना शेष है, लेकिन इसके साथ ही इसकी भी आवश्यकता है कि जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलता चला आ रहा है और जिनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आ चुका है, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए। ऐसी कई जातियां अन्य पिछड़ा वर्गों में भी हैं और अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों में भी।

केंद्र सरकार सरकार ने ओबीसी आरक्षण के उप-वर्गीकरण की संभावना का पता लगाने के लिए जिस आयोग का गठन किया है, उसकी रपट जल्द ही आने वाली है। माना जा रहा है कि इस आयोग की रपट के बाद सरकार ओबीसी आरक्षण को तीन हिस्सों में वर्गीकृत करेगी और हर हिस्से में समान सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाली जातियां रखी जाएंगी। इससे उन जातियों को विशेष लाभ होगा, जो आरक्षण के दायरे में होते हुए भी उसका अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रही हैं। फिलहाल ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत है। एससी-एसटी आरक्षण मिलाकर कुल आरक्षण सीमा 49.5 प्रतिशत हो जाती है, लेकिन तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों में आरक्षण सीमा 69 प्रतिशत तक पहुंचा दी गई है। अन्य राज्य सरकारें भी आरक्षण सीमा बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। कई बार तो वे मनमाने ढंग से आरक्षण की मांग करने वाली जातियों को आरक्षण देने की घोषणा कर देती हैं। आमतौर पर आरक्षण के ऐसे फैसले न्यायपालिका की ओर से रद्द कर दिए जाते हैं, फिर भी इस या उस जाति को आरक्षण देने का सिलसिला कायम है।

आज जब विभिन्न् समर्थ जातियों की ओर से आरक्षण मांगा जा रहा है, तब इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि आर्थिक आधार पर भी आरक्षण की मांग तेज हो रही है। इसका कारण यह है कि देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो सवर्ण जाति का होने के बावजूद विपन्न् है। वह आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से खिन्न् है और उसमें कुंठा घर कर रही है। ऐसे में बेहतर होगा कि आर्थिक आधार पर भी आरक्षण देने की कोई व्यवस्था बनाई जाए। ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण इसलिए होना चाहिए, ताकि देश की राजनीति जातिवाद के दलदल से बाहर निकल सके। आज तो आरक्षण वोट बैैंक बनाने का हथियार बन गया है। राजनीतिक दलों को यह एहसास होना चाहिए कि मूल समस्या आर्थिक पिछड़ापन है। जब समाज का हर तबका आर्थिक रूप से सक्षम होगा, तभी उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य समस्याओं का निपटारा हो सकेगा।


Date:10-09-18

तेल की धार

संपादकीय

पेट्रोल, डीजल और गैसों के दाम लगातार बढ़ने से स्वाभाविक ही विरोध के स्वर उभरने शुरू हो गए हैं। इस वक्त डीजल की कीमतें बहत्तर रुपए के ऊपर पहुंच गई हैं, जो अब तक के सबसे ऊपरी स्तर पर है। पेट्रोल का दाम अस्सी से सतासी रुपए के बीच हो गया है। पहले ही विपक्ष ने महंगाई के विरोध में भारत बंद का आह्वान किया था, रविवार को तेल की कीमतें बढ़ने से उसे सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है। अब राजग की सहयोगी शिव सेना भी विरोध में उतर आई है। हालांकि वित्तमंत्री ने महंगाई बढ़ने और अर्थव्यवस्था के डावांडोल होने से इंकार किया है। मगर यह तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा। हकीकत यह है कि राजग सरकार के साढ़े चार सालों में तेल की कीमतें लगातार बढ़ी हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के मुताबिक पेट्रोल-डीजल के दामों को नियंत्रित करने का प्रावधान है, पर जिन दिनों कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने सबसे निचले स्तर पर थीं, उन दिनों भी भारत में तेल की कीमतें नीचे नहीं आर्इं। इसलिए इसे लेकर लोगों की नाराजगी समझी जा सकती है ।

तेल की कीमतें बढ़ने के पीछे बड़ा कारण डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत है। अब डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत करीब बहत्तर रुपए तक पहुंच गई है। इस तरह सरकार को कच्चे तेल की अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। हालांकि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो सरकारें उत्पाद शुल्क घटा कर उपभोक्ता का बोझ कम करने की कोशिश करती हैं। कुछ महीने पहले जब इसी तरह तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर विपक्ष का हमला तेज हुआ था, तो कुछ राज्य सरकारों ने उत्पाद शुल्क में कटौती करके उपभोक्ता को राहत देने का प्रयास किया था। उन दिनों चार विधानसभाओं में चुनाव होने वाले थे। पर फिर तेल की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं किया गया। यहां तक कि केंद्र सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में लगातार उत्पाद शुल्क बढ़ाया ही है। इस दौरान उत्पाद शुल्क बढ़ कर करीब दो गुना हो गया है। इसी तरह रसोई गैस और सीएनजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। सामान्य उपभोक्ता को रसोई गैस की कीमत पहले की तुलना में डेढ़ गुना से अधिक चुकानी पड़ रही है।

स्पष्ट तथ्य है कि जब डीजल-पेट्रोल और र्इंधन गैसों की कीमत बढ़ती है, तो उसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। यों संतुलित दर से महंगाई बढ़ना अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, पर जब वस्तुओं की कीमतें ढुलाई की वजह से बढ़ें तो यह संतुलित महंगाई नहीं कहलाती, क्योंकि उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने में जो दाम बढ़ जाता है, उसका लाभ उत्पादक को नहीं मिलता। इस तरह वस्तुओं की मांग और उत्पादन की दर घटती है। जाहिर है, इसका असर विकास दर पर पड़ता है। राजग सरकार के शुरुआती दिनों में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपने सबसे निचले स्तर पर थीं, तब सरकार ने इस तर्क पर तेल की कीमतें नहीं घटाई और उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया कि जब तेल की कीमतों को संभालना मुश्किल होगा, तब इस पैसे का उपयोग किया जाएगा। मगर अब सरकार शायद उस वादे को भूल गई है। अगर समय रहते इस दिशा में व्यावहारिक कदम नहीं उठाए गए तो अर्थव्यवस्था को लक्षित दर तक पहुंचाना मुश्किल होगा।


Date:10-09-18

बिजली के वाहन

संपादकीय

भारत के शहरों और महानगरों में जिस तेजी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का है। यह ऐसा विषय है जिस पर सालों से गंभीर चिंता तो जताई जा रही है, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी ठोस काम होता नजर नहीं आया है। ऐसी कोई ठोस नीति नहीं बनी है जो वाहन प्रदूषण की समस्या से निपटने का समाधान बताती हो। इसका नतीजा यह है कि देश में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और रोजाना नए लाखों वाहन पंजीकृत हो रहे हैं। लेकिन इन पर लगाम कैसे लगे, इसका कोई समाधान सरकार के पास नहीं है। आज देश भर में करोड़ों वाहन हैं जो पेट्रोल और डीजल से चल रहे हैं और इनसे निकलने वाला धुआं कार्बन उर्त्सजन का बड़ा कारण है। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए नीति आयोग ने दो दिन तक बिजली से चलने वाले वाहनों की जरूरत, उनके निर्माण और इससे संबंधित जरूरी नीतियां बनाने के मकसद से वैश्विक सम्मेलन किया। इसमें दुनिया की कई जानीमानी वाहन निर्माता कंपनियों ने शिरकत की। ‘ग्लोबल मोबिलिटी समिट-मूव’ से यह उम्मीद तो बंधी है कि आने वाले वक्त में भारत बिजली से चलने वाले वाहनों के निर्माण को लेकर पहल करेगा।

प्रधानमंत्री ने बिजली चालित वाहनों के लिए बैटरी से लेकर उनके कलपुर्जे तक भारत में बनाने पर जोर दिया। यह भारत की तात्कालिक जरूरत भी है, क्योंकि जितनी जल्दी पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से मुक्ति पाई जा सके, उतना ही अच्छा है। लेकिन हकीकत यह है कि हम इस दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ पाए हैं। जबकि दुनिया के दूसरे देश बिजली चालित वाहनों के इस्तेमाल में काफी आगे निकल चुके हैं। भारत में अभी किसी भी वाहन निर्माता कंपनी ने व्यावसायिक स्तर पर इसकी शुरुआत नहीं की है। इसके लिए जिम्मेदार खुद सरकार ही है। भारत में बिजली और वैकल्पिक र्इंधन से चलने वाले वाहनों के लिए अभी तक कोई नीति नहीं है। हालांकि सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने जल्द ही ऐसी नीति बनाने का भरोसा तो दिया है। लेकिन सवाल है कि कब नीति बनेगी, कैसे उस पर अमल होगा, इसके लिए अभी इंतजार ही करना होगा। तब तक समस्या और गंभीर हो चुकी होगी।

बिजली चालित वाहनों का सपना इसलिए भी साकार नहीं हो पाया है क्योंकि हमारे यहां उसके लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार बैटरी निर्माण और चार्जिंग स्टेशनों की समस्या का समाधान कर दे तो बिजली चालित वाहन बाजार में उतारे जा सकते हैं। जाहिर है, कंपनियां तो तैयार हैं, लेकिन पहल सरकार को करनी है। बुनियादी सुविधाओं का बंदोबस्त सरकार को करना है और इसके लिए ठोस दीर्घावधि नीति की जरूरत है। बिजली चालित वाहनों के लिए जो नीति बने उसमें सार्वजनिक परिवहन को केंद्र में रखना होगा। जब तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी और पूरी तरह बिजली वाहनों पर आधारित नहीं होगी, तब तक इस दिशा में किए जाने वाले अपेक्षित नहीं देंगे। आज जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए तो लगता है भारत में बिजली चालित वाहनों की मंजिल अभी दूर है। सरकारों ने अगर इस समले को पहले से ही गंभीरता लिया होता और इस दिशा में पहल की होती तो भारत भी उन देशों की कतार में शामिल हो सकता है जो अब बिजली वाहनों का इस्तेमाल कर प्रदूषण से मुक्ति पाने की दिशा में बढ़ चुके हैं।


Date:10-09-18

दुनिया को जलवायु परिवर्तन से बचाने का अगला पड़ाव

मदन जैड़ा ब्यूरो चीफ, हिन्दुस्तान

अभी-अभी भारत ने केरल की बाढ़ और देश के अन्य हिस्सों में मानसून की तबाही के रूप में जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना किया है, तो अमेरिका और जापान में भयावह तूफान और बैंकॉक में समुद्र के जलस्तर की बढ़ोतरी के रूप में इसकी झलक को देखा गया। इन खतरों और चुनौतियों से निपटने की जिम्मेदारी संभालने वाली एजेंसियों के प्रमुख 12 सितंबर से अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में एकजुट हो रहे हैं। लेकिन अन्य जलवायु सम्मेलनों की तरह वहां भावी खतरों पर चर्चा नहीं होनी है। न ही आगे की रणनीति बनेगी। बल्कि यह चर्चा होगी कि तीन साल पूर्व हुए पेरिस समझौते के अनुरूप अब तक क्या-क्या हुआ है? इस पर भी मंथन होगा कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ये कार्य कितने पर्याप्त हैं?

बैठक को इसी साल दिसंबर में पोलैंड में होने वाली कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप) की 24वीं बैठक की तैयारी भी माना जा रहा है। कॉप-24 में पेरिस समझौते की समीक्षा होनी है। संयुक्त राष्ट्र ने पोलैंड की बैठक को पेरिस 2.0 की संज्ञा दी है। यानी सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन पोलैंड की बैठक का भी आधार बनेगा। हो सकता है कि इस बैठक के बाद राष्ट्रों को अपने उर्त्सजन के लक्ष्यों को नए सिरे से निर्धारित करने के लिए कहा जाए। जो राष्ट्र अभी तक लक्ष्यों को घोषित करने या क्रियान्वयन में देरी कर रहे हैं, उन्हें आगाह किया जा सकता है। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें चर्चा करने वाले राष्ट्राध्यक्ष या नीति-निर्माता नहीं हैं, बल्कि क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियों के प्रमुख हैं। इसमें स्थानीय प्रशाासनिक इकाइयों के प्रमुख, मेयर, स्वतंत्र सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों के मुखिया, उद्योग जगत के लीडर, प्रबुद्ध नागरिकों और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच चर्चा होनी है। एजेंसियों को यह बताना है कि जमीनी स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या हो रहा है? मसलन, सौर ऊर्जा बनाने वाली एजेंसियां अपनी बात रख सकती हैं, तो शहर प्रशासन जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के उपाय बता सकते हैं। मसलन, न्यूयॉर्क के शहर प्रशासन ने समुद्र का जलस्तर बढ़ने के खतरे से निपटने के लिए समुद्री किनारों पर पानी को रोकने और बढ़ने की स्थिति में उसकी निकासी के प्रयास शुरू किए हैं। बैंकॉक भी ऐसे कदम बढ़ा रहा है। लेकिन क्या मुंबई और चेन्नई ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं? जलवायु परिवर्तन से जुड़े जिन पांच बड़े मुद्दों पर इस सम्मेलन में और आगे भी चर्चा होनी है, उनमें स्वच्छ ऊर्जा, समग्र आर्थिक विकास, सतत विकास, भूमि एवं समुद्र से जुड़े मुद्दे तथा जलवायु अर्थव्यवस्था का विस्तार शामिल है। लेकिन कई मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर अभी पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है।

कई अहम मुद्दों पर राष्ट्रों की नीतियां भी स्पष्ट नहीं हैं, जिससे उद्योग जगत अपने कदम तय नहीं कर पा रहा है। जैसे देश में आज स्वच्छ तकनीक में निवेश की बात करें, तो यह हरित ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। यहां सरकार की नीति स्पष्ट है। लेकिन हरित परिवहन क्षेत्र में उतनी तेजी नहीं दिखी। इसी प्रकार, जलवायु परिवर्तन से सबसे बड़ी चुनौती कृषि क्षेत्र के सामने है। इससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है। लेकिन इस पर पूरी दुनिया में अपेक्षाकृत कम काम हो रहा है।

पेरिस समझौते को तीन साल हो चुके हैं। इसलिए यह भी तय होना है कि ये उपाय तापमान बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री तक रोकने में कारगर हैं या फिर नए उपायों या लक्ष्य निर्धारित करने की जरूरत है। कई रिपोर्ट कहती हैं कि जिस रफ्तार से काम हो रहा है, उससे तापमान बढ़ोतरी डेढ़ डिग्री तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि तीन डिग्री तक पहुंच जाएगी। एक चिंता यह है कि पेरिस समझौते से अमेरिका के बाहर होने के बाद धनी राष्ट्र वैश्विक हरित कोष के लिए धन देने में कोताही कर सकते हैं। पेरिस समझौते के अनुसार, 2020 तक इस कोष में प्रतिवर्ष सौ अरब डॉलर होना चाहिए। पेरिस समझौते पर निकरागुआ व सीरिया को छोड़ सभी 197 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। मोटा आकलन है कि कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार 55 फीसदी देशों ने पेरिस समझौते के अनुरूप कार्य शुरू किया है, बाकी ने नहीं।


Date:10-09-18

जाति जनगणना का अमृत और विष

बद्री नारायण निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

अन्य पिछड़े वर्ग की आबादी के आंकड़े जमा करने की घोषणा हो गई है। 2021 की जनगणना में इन आंकड़ों को संकलित किया जाएगा। इसके पहले यह काम 87 साल पहले 1931 की जनगणना में हुआ था। साल 1980 में मंडल कमीशन रिपोर्ट ने भारतीय समाज में ओबीसी के रूप में 1,257 जातियों और 52 प्रतिशत जनसंख्या को चिह्नित किया था। 2021 की जनगणना में अगर ये आंकडे़ संकलित होते हैं, तो इन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने में तीन वर्ष का समय लग जाएगा। यानी ये आंकडे़ 2024 में ही उपलब्ध हो पाएंगे।

जनगणना भारत में औपनिवेशिक शासन द्वारा शुरू की गई मेगा औपनिवेशिक डॉक्यूमेंटेशन परियोजना का हिस्सा थी। लेकिन इसने भारतीय समाज में शासन, नीति, नियम और योजनाओं के निर्माण को गहरे रूप से प्रभावित किया है। राज्यसत्ता इन्हीं जनगणना के माध्यम से विकास की नीतियां तय करती है। इसी के हिसाब से समाज का वर्गीकरण होता है, जो राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक पूंजी का भी रूप लेता है। राजसत्ता के ये दस्तावेज हमारी अस्मिता को निश्चित और जड़ कर देते हैं। राजसत्ता इन्हीं के माध्यम से अपने अनुरूप अनेक नई अस्मिताओं को जन्म देती है।

जनगणना में 1931 के बाद जातियों के आंकड़े संकलित करना बंद कर दिए गए थे। फिर अनेक राजनीतिक दलों के दबाव में 2011 में जातीय आंकड़ों के संकलन की प्रक्रिया शुरू हुई, पर 2011 में निर्णित ढांचे में संकलित आंकडे़ कई कारणों से सामने नहीं आ सके। अब सरकार ने फिर से पिछड़ा वर्ग की समूह आधारित गणना की नीति पर काम करने का संकेत दिया है। यह केवल अनेक राजनीतिक दलों के दबाव या प्रशासन की जरूरतों के कारण किया जा रहा है या इसकी कोई राजनीति भी है? इन आंकड़ों का सरकार क्या करेगी?

इन आंकड़ों के कई उपयोग हो सकते हैं। एक तो इनसे सरकार अपनी पिछड़ी जाति संबंधी नीतियों की समीक्षा कर सकती है। दूसरे, इनकी बढ़ती संख्या का आकलन हो सकता है। तीसरे, चुनाव प्रक्रिया में इन वर्गों की जनसंख्या के कारण सरकारी योजनाओं, परियोजनाओं और आरक्षण संबंधी दावों में और ज्यादा आक्रामकता आ सकती है। नीति निर्माता और शोधार्थी तो इन आंकड़ों का उपयोग कर ही सकते हैं। राजनीतिक दल और चुनाव विशेषज्ञ इन आंकड़ों से अपने आकलन को धार देंगे। अभी तक के ज्यादातर चुनावी आकलनों में 1931 के आंकड़े ही उपयोग में लाए जाते रहे हैं।

इन आंकड़ों से सबसे बड़ा फेरबदल चुनावी राजनीति में ही दिखेगा। इनके आधार पर विभिन्न जातियों को लामबंद करने की राजनीति चलेगी। वहीं दूसरी ओर, भाजपा जैसी राजनीतिक पार्टी, जो क्षेत्रीय स्तर पर पिछड़ों के जनाधार वाली पार्टियों की चुनौती झेल रही है, इन जातियों में उपेक्षितों और अत्यंत पिछड़े समूहों का एक नया वर्ग बनाकर उन्हें लामबंद करने की कोशिश कर सकती है। उन्हें यह समझाया जा सकता है कि पिछड़ों के लिए मिली सरकारी सुविधाएं उनमें से कुछ जातियों तक ही सीमित रह गई हैं। ऐसे में, जरूरी है कि पिछड़ों में प्रभावी क्रीमी लेयर के अतिरिक्त शेष पिछड़े समाज को, जो कि बहुत बड़ा है, चिह्नित कर उसके मुद्दे उठाए जाएं। भले ये छोटी-छोटी संख्या में हों, पर ये गैर-प्रभावी अति पिछड़ी जातियां संयुक्त रूप से एक बड़ी संख्या में बदल जाती हैं, जो भारतीय चुनाव को गहरे प्रभावित कर सकती है। इनके लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की बात करके इन्हें एक राजनीतिक समूह में बदला जा सकता है। भाजपा यह दावा करती रही है कि वह ऐसी जातियों और समूहों के विकास और उनकी राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास में लगी है। उसका मानना है कि ऐसी जातियों और समूहों के नेताओं को वह अपने दल और चुनावी प्रक्रिया में उचित शेयर देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

भाजपा सरकार ने 2017 में ‘नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड कास्ट’ को एक सांविधानिक शक्ति से लैस कमीशन के रूप में आकार दिया है। साथ ही 2017 में ही दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस जी रोहिणी के नेतृत्व में बने आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पिछडे़ वर्ग के और वर्गीकरण की जरूरत पर बल दिया है। ऐसी कोशिशों को सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ जोड़ा जा सकता है। यह तय है कि अगर भाजपा अन्य पिछड़े वर्ग में उपकोटि की राजनीति को अपने पक्ष में लामबंद कर लेती है, तो चुनावी राजनीति में वह अपने को और ज्यादा शक्तिवान बना सकती है। लेकिन इस राजनीति में जोखिम भी हैं। पिछड़े वर्गों की राजनीति करने वाले इसे पिछड़ों में फूट डालने की कोशिश के रूप में पेश करेंगे।

इसमें कोई शक नहीं कि जाति और सामाजिक समूह आधारित जनगणना से तरह-तरह की अस्मिता की राजनीति को और ज्यादा खाद-पानी मिलेगा। यह भी तय है कि इस प्रक्रिया में सरकार अपने तर्कों पर आधारित नई अस्मिताओं का सृजन कर सकती है। इसका एक नतीजा यह भी हो सकता है कि अन्य पिछड़े वर्ग में प्रभावी सामाजिक समूहों और गैर-प्रभावी सामाजिक समूहों में राजनीतिक व विकासपरक अवसरों पर कब्जे के लिए टकराव बढ़े। इससे आरक्षण कोटे को लेकर भी दावे, प्रतिदावे और टकराव बढ़ सकते हैं। किंतु आजादी के लगभग 70 वर्षों के बाद जातियों के सही आंकडे़ प्रशासन, नीति-निर्माण और शोध के लिए सकारात्मक परिणाम भी दे सकते हैं। वही आंकडे़ राजनीति के हाथों में आते ही टकराव पैदा करने वाले नकारात्मक परिणाम में बदल सकते हैं। यह सच है कि भारतीय लोकतंत्र और समाज में हर चीज राजनीतिक हो जाती है। कई बार इसी प्रक्रिया से विकास का रास्ता भी खुलता है। यह प्रयास एक ही साथ अमृत और विष, दोनों पैदा करने वाला हो सकता है। देखना यह है कि इसका कौन सा रूप हमारे भविष्य को गढ़ता है।


Date:10-09-18

A Shrinking Table

For a society in the throes of turbulent change, however, even the most sacred of relationships has come under pressure.

Shruti Lakhtakia , [The writer, 26, is a graduate student at the Harvard Kennedy School of Government ]

During my childhood, we had a rather strict rule about having dinner together as a family. My grandparents were close to my father, and he to them. The cacophony of cross-conversations between grandparents, parents, cousins bore testimony to filial responsibility that had been deeply internalised by every generation.

For a society in the throes of turbulent change, however, even the most sacred of relationships has come under pressure. The share of the elderly in India living alone or only with a spouse increased from 9 per cent in 1992 to 19 per cent in 2006. The modernising forces of demographic change, growth-induced geographic mobility and a sense of individualism, have transformed society within a span of one generation. First, growing life expectancy and lower fertility rates mean an increasing share of elderly in the population, putting additional pressure on a smaller number of children. Since 1991, the number of households has grown faster than the population. Nuclear families now constitute 70 per cent of all households.

Second, better economic opportunities mean that children are leaving home earlier than they used to, migrating not to the neighbouring town, but across states and countries. According to the 2017 Economic Survey, 90 lakh people, on average, migrated between Indian states for either work or education each year between 2011 and 2016. Urban living is predominantly nuclear, and only 8.3 per cent of the urban elderly live in joint families. Third, and perhaps most important, direct or indirect exposure to the Western way of life has given this generation an alternative idea of family responsibility and how to organise care. The share of adult children who said that caring for their elderly parents was their duty fell from 91 per cent in 1984 to 51 per cent in 2001.

The Government of India in 2007 enacted the Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, which made it a legal obligation for children to provide maintenance to parents in the form of a monthly allowance. In 2018, the revised Act seeks to increase the jail term for negligent children, broaden responsibility beyond biological children and grandchildren and expand the definition of maintenance to include safety and security. This law will ultimately safeguard the rights of those elderly who have seen abuse and help them pursue legal action. But when financial needs are met, and social ones remain, the bite of law is limited. Isolation and loneliness among the elderly is rising. Nearly half the elderly felt sad and neglected, 36 per cent felt they were a burden to the family. One in every five people will be above the age of 60 by 2050. As the trends of smaller families and reductions in the cost of mobility continue, it is our values that will determine what the future looks like.

For both my grandparents and me, dinner together grew to be a meaningful exchange of lives lived in very different times — my displays of what technology could do, their stories about what the Partition meant. But in the face of change, our generation will face a unique problem in how it approaches the filial contract. On one hand, sociologists have predicted the rise of modified extended families to replace joint families. This hybrid structure of nuclear families enmeshed in large kinship networks is characterised by close familial bonds despite geographic distance — manifested in frequent visits to parents, and participation in events such as births, marriages and festivals.

An alternative future is one where social support comes from other elderly. Facing greater competitive and economic pressures, young Indians may create a tipping point where old-age homes become the norm, and there is no longer any stigma or guilt associated with them. In Kerala, there has been a 69 per cent increase in the residents of old age homes in 2011-15. For a society caught between greater economic opportunities and individual freedoms on one hand and traditional values and moral responsibilities on the other, finding a balance is not straightforward. With the passage of time, the values that were once internalised at the dining table might become too distant a memory to check the opportunities and freedoms of the day.


Date:10-09-18

Jobs, lost and found

There is a basket of livelihoods and knowledge, guided by culture, which fulfils all that government means when it says “jobs”.

Jaya Jaitly And Rahul Goswami , [ Jaitly is a writer and founder-president, Dastkari Haat Samiti, and Goswami is a Unesco Asia facilitator on intangible cultural heritage ]

Ever since he became prime minister in 2014, Narendra Modi has talked about job creation as a sorely needed factor for India’s economic stability and growth. Yet, the subject remains the proverbial elephant in the room.

On August 15, 2014, the media reported: “Modi hoists the national flag… Skill development will be towards job creation and empowering the youth.” A year later, “Modi said there would now be an attempt at linking job creation with new investments. Proposed schemes would now impose the obligation of creating fresh jobs for every clearance given to investments”. In 2017, the reports quoted the PM as saying, “We are nurturing our youngsters to be job creators and not job seekers.” During the July no-confidence motion in the Lok Sabha, Modi replied to the criticism his government was facing over the unemployment issue by saying that over one crore jobs had been created over the past year. Finally, on August 15, he hinted at the need for a rethink of what “job creation” means.

We agree. There is a basket of livelihoods and knowledge, guided by culture, which fulfils all that government means when it says “jobs”. It is found as the self-employed traditional artisan sector. The “job creation” that has featured in speeches over the last few years is embodied in the millions of women and men whose wealth of skills gives us products both utilitarian and sustainable, and contributes to inclusiveness, respect, remuneration, rural wealth creation and eco-friendly solutions.

These are brought to us by households of many parts, engaged in cultivation or animal rearing, some retail activity, one or two members of which may draw salaries, and in which there is a household industry too, often a handicraft. If they are in plain view, why are they still neglected? Some of the neglect can be explained by the uncertainty about how many households of this description there are in India. We make guesstimates based on how a few agencies of the central government report their findings, and from the experience of those who have worked in the sector. Even so, the government is not blind to its size and strength. In its “Guide for Enumerators and Supervisors”, the Sixth Economic Census 2012-13 explained that it “included handicrafts with a view to reflect the huge contribution the artisan communities make to India’s economy”.

But the Economic Census did not scrutinise artisan communities as keenly as it did workers of other sectors. The experience of state handicrafts’ agencies and especially the cooperative crafts groups shows that these are probably included in the 13.1 million “establishments” enumerated by the 2012-13 Economic Census, which pursue activities relating to agriculture other than crop production and plantation. According to reports, NABARD’s All India Rural Financial Inclusion Survey 2016-17 has indicated likewise.

Some guidance (limited and hampered by unhelpful definitions) can be taken from the Census 2011, which has listed 6.2 million rural “occupied census houses” used as residences but which are put to other uses too (out of the total of 166.2 million), these being (in census jargon) “arts, entertainment and recreation” and “undifferentiated goods and services” both of which may include all kinds of activities not related to handicrafts, hand-weaves and village household industries.

Useful as it may be, poring through the minutiae of Census entries does not help tally what the Central agencies list. The programmes of the Khadi and Village Industries Commission (KVIC) are implemented through 4,601 registered institutions and involve more than 7,23,000 entrepreneurial units under the Prime Minister’s Employment Generation Programme and the erstwhile Rural Employment Generation Programme (now subsumed into the PMEGP), and also the Pradhan Mantri Rojgar Yojana. The KVIC alone claims through its programmes to have placed in employment (for 2016-17) 13.64 million people, a number that corresponds better with the most recent Economic Census than with Census 2011 data on workers.

However, that still leaves us with the sadly indeterminate impacts of programmes under ministries and agencies (textiles, agriculture, rural development) which deal with handicrafts and household industries.

What else is missing in the handicraft sector? Advances in appropriate technology to remove drudgery are few and far between, raw materials at moderate rates are seldom secured, lack of upgraded design for greater acceptability and utility, and — most important of all — access to marketing opportunities. The e-marketing platforms are mystifying oceans to a craftsperson with low or no IT skills. Most of these platforms serve youthful, educated middle-class entrepreneurs adept at both English and presentation skills. Even so, Dilli Haat alone is proof that once markets pitched at different levels are available, many shortcomings are tackled by craftspersons themselves.

For years, those invited to the Red Fort on August 15 have sweltered in the humidity and heat, fanning themselves with their invitation cards. Surely there was an opportunity here to connect “jobs” with tasteful utility at hand, and this writer proposed and assisted the government in the procurement of 1,000 bamboo fans from tribal Bengal which were provided this year to the VIP section. The next opportunity was Raksha Bandhan, for in 2017 during a ‘Mann ki Baat’ broadcast the PM spoke about wearing khadi rakhis instead of China-made ones (media went looking but found none). This lack of follow-up by concerned bodies to positive, simple suggestions, leads people to accuse the PM of running a “jumla sarkar”.

Innovation, a government watchword, abounds where there is natural material to work and knowledge to apply. Such ideas need committed support from the government, as much for fulfilling “job creation” and sustainable livelihoods as for mainstreaming the environmental service done by the handicraft sector.

News Clipping on 10-09-2018

Date:10-09-18

Supreme Defender

Supreme Court’s administrative fix to curb lynchings must be implemented urgently and sincerely

TOI Editorials

Supreme Court’s warning to 19 states that defaulted on complying with its July 17 directives to curb lynchings sends down a strong message. The ultimatum to these states to implement the guidelines or risk having their home secretaries summoned to court for contempt should be adequate to prompt the laggards to act. SC’s directives included preventive, remedial and punitive measures to overhaul the law and order machinery on the administrative side. Supreme Court has correctly deduced that the spate of lynchings and emboldening of mobs is a law and order issue needing administrative redress.

Bringing in a new law to tackle lynchings may not help much given the large body of laws in India which are feebly enforced. Far worse is the solution reportedly proposed by a panel of senior bureaucrats in their report to a Group of Ministers, that passes the buck to social media and threatens to jail local heads of platforms where rumours are disseminated. That’s a bit like jailing telephone company heads if subversive plans are hatched on phone. In contrast, SC’s directives include a designated officer at district level to prevent mob violence, asking police officers to be firm in using statutory powers to disperse mobs, constant patrolling of sensitive areas, and lodging FIRs for inciting violence. SC also prescribed awareness campaigns, fast tracking of cases, and imposing maximum punishment for lynchings. If these steps are implemented properly and sincerely, there is little likelihood of anyone taking the law into their hands.

Among the 10 states that have claimed to implement the SC directives are UP, Rajasthan and Jharkhand, which have been the worst hit by lynchings. This is a positive signal but SC must ensure that its directives are also applied to past cases. Charges are yet to be framed in the 2015 Dadri lynching case. Alwar in Rajasthan had the dubious distinction of being the first lynching after the July 17 SC order, a case revealing grave malfeasance of local police. Given these realities, SC must call for regular status reports on progress of earlier cases. SC has stolen a march over legislatures and executive when it comes to defence of fundamental rights. Its administrative prescriptions for curbing lynching should ideally have come from governments, and show up bureaucratic lethargy as well as lack of political will and commitment to good governance on the part of the latter. But there is still time to act.


Date:10-09-18

Top Priority for Public Transport

Plan to prevent e-mobility becoming a fad

ET Editorials

Electric power is the way to go for the transport sector, given the need to curb greenhouse gas emissions and air pollution. India, too, is taking measures to lay the foundation of such a transition. The government is finalising a policy that would help transition the sector away from the internal combustion engine and fossil fuels to electric vehicles and alternative fuels. In devising a policy for clean mobility, the government must prioritise mass transit over cars and private vehicles. A shift away from fossil fuels to alternatives like methanol, ethanol, hydrogen or battery-stored power is essential to address the environmental, economic and health fallout of increased congestion.

However, any solution that does not put mass public transport at its core will fail. This means greater investment in the sector but also working to change public attitudes, from seeing public transport as the option for those who cannot afford a personal vehicle or be part of the shared mobility experience such as taxis, autos, e-rickshaws and ridesharing, to accepting it as the first and smart choice for mobility for even those who own a private vehicle.Three things are essential for this transformation. First, public transport options must be accessible, affordable, predictable, reliable and safe.

Second, the different modes of public transport such as bus, train, metro, tram, must be integrated. Third, lastmile connectivity must be easy, whether through local shuttle buses or shared mobility options, affordable, reliable and available. Price gouging is not uncommon among the pliers of auto-, cycle- and e- rickshaws. Such practices drive up the cost of public transport while reducing its convenience, resulting in more trips using private vehicles or shared mobility options such as taxis, autos and ride sharing. India is urbanising rapidly. New towns must be planned to minimise commutes and prioritise public transport. High density and mixed land use must be accompanied by public transport. Shared cycles will be possible at least in some places. Planning is the key.


Date:10-09-18

अहम समझौता, बरकरार अनिश्चितता

संपादकीय

भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत पिछले सप्ताह संपन्न हुई। यह वार्ता पिछले काफी समय से टल रही थी और कुछ लोगों को तो यह आशंका भी हो गयी थी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशसन भारत-अमेरिका संबंधों को कम प्राथमिकता दे रहा है। इन चर्चाओं के दौरान दोनों देशों को एक साथ लाने वाली सामरिक दृष्टि के साथ-साथ तमाम नए और पुराने मुद्दों पर भी बातचीत हुई। इन वार्ताओं का सबसे बड़ा विषय रहा सुरक्षा सहयोग को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर बनी सहमति। यह समझौता उन आधारभूत समझौतों का ही एक प्रकार है जो अमेरिका ने अपने निकटस्थ सामरिक साझेदारों के साथ किया है।

इस समझौते को कयुनिकेशंस कंपैटिबिलिटी ऐंड सेक्युरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) का नाम दिया गया है। यह समझौता एनक्रिप्टेड सुरक्षा मंचों तक साझा पहुंच बनाने की इजाजत देता है। उदाहरण के लिए इसके तहत भारतीय नौसेना क्षेत्रीय जानकारियां जुटाने के लिए पी-81 निगरानी एवं टोही विमान की पूरी क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकेगी। ये विमान भारत ने अमेरिका से खरीदे हैं और अभी ये विमान केवल वाणिज्यिक उपलब्धता वाले उपकरणों के साथ ही काम करता है। इसके नियंत्रित संचार उपकरणों का कोई विकल्प नहीं था जो अब उपलब्ध होगा। दोनों नौसेनाओं के युद्धपोत अब अधिक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से एक दूसरे के साथ संचार स्थापित कर सकेंगे। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए इस समझौते पर हस्ताक्षर लंबे समय से लंबित था। इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए कि सरकार ने उस पुराने सोच को त्याग दिया है जिसके तहत वह देश के सामरिक साझेदारों के साथ ज्ञी एनक्रिप्टेड संचार को खोलने में भयभीत रहती थी।

बहरहाल, इस संवाद के दौरान कुछ असहज करने वाले मुद्दे भी सामने आए। यह सच है कि हाल के दिनों में हमारे सामरिक और सैन्य रिश्ते आर्थिक रिश्तों की तुलना में गर्माहट भरे और कम उतार चढ़ाव वाले रहे हैं परंतु कुछ समस्याओं ने अप्रत्याशित रूप से सर उठाया। इनमें से दो का संबंध अमेरिकी नेतृत्त्व में रूस और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से है। ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध भारत के लिए भी समस्या हैं क्योंकि भारत तेल आयात पर निर्भर है। उसे यह रास नहीं आया कि आयात होने वाले तेल में ईरान की हिस्सेदारी न हो। कुछ माह पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दोहराया था कि भारत केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को ही मान्यता देता है। ईरान पर प्रतिबंध लगाना इसमें शामिल नहीं है। ये प्रतिबंध अमेरिका के ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के साथ 2015 के नाभिकीय समझौते को एकपक्षीय ढंग से खत्म करने के बाद प्रभावी हुए हैं। संभव है कि अमेरिका भारत के ईरान से होने वाले आयात में बड़ी कटौती से संतुष्ट हो जाए।

रूस से रक्षा खरीद के सवाल अधिक कठिन हैं। इसका संबंध हमारी सामरिक स्वायत्तता और रूस के साथ पुरानी रक्षा साझेदारी से है। सेना 600 करोड़ डॉलर में पांच रूसी एस-400 मिसाइल खरीदना चाहती है जो सतह से हवा में मार करती है। अगर मौजूदा अमेरिकी कानून को लागू किया जाए तो ऐसा करने पर प्रतिबंध लग सकता है। चूंकि अमेरिका में रूसी सेना और इंटेलीजेंस पर प्रतिबंध को दोनों दलों का समर्थन हासिल है इसलिए आगे की राह अनिश्चित है। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत के लिए अपवाद स्वरूप राह निकाल ली जाएगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत और अमेरिका के सामरिक रिश्तों पर गहरा असर होगा। भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए इस समस्या से किसी तरह निपटना होगा।


Date:09-09-18

पारिस्थितिकी को रौंदने से पहाड़ में बरपा कहर

अनिल जोशी

हिमालय के बिगड़ते हालात का प्रमाण इस बरसात ने दिखा ही दिया। मॉनसून बहुत भारी पड़ा है। इसे भी कहीं बदलते पर्यावरण से जोड़कर देखा जाना चाहिए। ऐसा इस बार होने के लक्षण पहले से विदित थे क्योंकि अबकी गर्मी ने भी अजीब-सा व्यवहार किया था। पहली बार देश ने बढ़ती गर्मी के कारण बवंडर झेला था। तब भी देश के कई कोनों ने बड़े नुकसान को झेला था। इस बार वर्षा का व्यवहार भी अजीब-सा रहा। समझ लेना होगा कि क्या पहाड़ और क्या समुद्रतटीय राज्य, मानसून की बारिश ने दोनों में तबाही मचाई। पहाड़ों में ज्यादा पीड़ा हिमालयी क्षेत्र के हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों को झेलनी पड़ी।हिमाचल प्रदेश में भारी तबाही का मंजर रहा। बारिश ने टुकड़ों-टुकड़ों में जो तीव्रता दिखाई उससे राज्य के कई हिस्सों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ।

पैंतीस से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी। मवेशियों के नुकसानों की तो गिनती ही नहीं। छोटी-बड़ी तमाम सड़कें ध्वस्त हो गई। एक हजार सड़कों पर आवाजाही ठप पड़ गई। खेत-खलिहानों का भी यही हाल रहा। फसल चौपट हो गई। राज्य में इस बार के मॉनसून में 990.54 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया है। कमोबेश ऐसा ही कुछ उत्तराखंड में भी हुआ। कुछ ही दिनों में 1200 मिमी. पानी पड़ा। अब तक राज्य में सैकड़ों करोड़ों रुपये का नुकसान माना जा रहा है। एक हजार से सड़कें बंद हो गई। चारधाम यात्रा पर संकट आए। हजारों तीर्थ यात्री जगह-जगह फंसे रहे। सैंतीस लोगों की जान गई। गांवों ने भारी नुकसान झेला। सवाल है कि क्या यह मात्र भारी पड़ती बारिश के ही कारण है, या कहीं गलतियां और भी जुड़ी हैं? इस विवेचना का भी समय है, इसके दो बड़े पहलू हैं। वर्षा का बदलता रुख और हमारी विकास की महत्त्वाकांक्षाएं। वैसे भी दुनिया भर में ताबड़तोड़ अनियोजित विकास ने बड़े बदलाव किए हैं।

उसका खमियाजा पर्यावरण को ही झेलना पड़ा है। बदलते मौसम के रुख के पीछे बड़ा कारण पृवी का बढ़ता तापक्रम है, और इसका कारण अनियंत्रित ऊर्जा का दुरुपयोग जो हम अपनी विलासिता जुटाने के लिए करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू इस बदलते परिवेश का यह है कि इसका सबसे क्रूर प्रभाव उन क्षेत्रों में ही पड़ता है, जो संवेदनशील हैं, और हिमालय देश का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। दो दशकों से हिमालय को दोतरफा मार पड़ रही है। बदलते तापक्रम से जहां हिमखंडों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ कर उनकी पिघलने की गति बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ शीतकालीन वर्षा का समय पर न होना हिमखंडों के विस्तार के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। प्रसिद्ध हिमखंड जैसे गंगोत्री, यमुनोत्री, डोकरानी, पिंडारी, मिलम और सतोपंथ आदि पिछले दशकों में काफी पीछे हटे हैं। इनकी प्रति वर्ष घटने की दर 10-12 मीटर मानी जा रही है। हिमखंड पानी के सबसे बड़े स्रेत हैं। इनके स्वास्य पर प्रतिकूल असर का मतलब पानी के संकट को बुलावा।दूसरा बड़ा पहलू हिमालय के प्रति सटीक विकासीय नियोजन का अभाव। हिमालय अति संवेदनशील क्षेत्र में आता है।

इसलिए यहां हर तरह के विकास में संवेदनशीलता बरते जाने की आवश्यकता है। अगर एक दृष्टि हम हिमालयी क्षेत्रों की पिछले 20 वर्ष की विकासीय रूपरेखा को देखें तो उनमें कहीं भी हिमालयी झलक नहीं दिखाई देती। ढांचागत विकास के सारे मानक वही हैं, जो मैदानी क्षेत्रों के होते हैं। इसके अलावा, पहाड़ और इसकी नदियों का लाभ उठाने के लिए बांधों की श्रृंखला ने यहां के भूगोल को नष्ट कर दिया। हालात ये हैं कि पहाड़, जो भूगर्भीय हलचलों और भूकंपों के लिए संवेदनशील हैं, पर बहुमंजिली इमारतों की बाढ़ आ गई है। हिमाचल प्रदेश हो या उत्तराखंड, सभी जगह ताबड़तोड़ तरीके से ढांचागत विकास की होड़ भी बनी है। सड़कों का जाल कुछ इस तरह से पनपा है कि हर गांव और कस्ब को जोड़ना जैसे सबसे बड़ा कर्त्तव्य हो। ऐसे उद्योगों को भी अनुमति दी गई जो पहाड़ों को खोदकर पनपते हैं यानी सीमेंट, चूना पत्थर या अन्य खनन उत्पाद। पिछले 20 वर्षो ये सब एक बाढ़ के ही रूप में आए हैं, और आज इन्हें ही बाढ़ लील भी रही है। इस अनियोजित शैली के विकास से कई और तरह के संकट भी सामने आ रहे हैं। कहने का मतलब यह कि आने वाले समय में पानी हवा का अभाव तो पड़ेगा ही पर वनों का हृास भी तेजी से होगा।

वन क्षेत्र तो सुरक्षित होंगे पर प्रजातियां बदल जाएंगी जिनका बेहतर पर्यावरण से कुछ भी लेना-देना नहीं होगा। परिस्थितियां ऐसी ही बनी रहीं तो केदारनाथ जैसी बड़ी घटनाएं हिमालय के हर क्षेत्र में होंगी और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। आज हिमालय ने पहाड़ हिमखंडों और नदियों से ही अपनी पहचान नहीं बना रखी है, बल्कि सभी धर्मो के प्रमुख देवी-देवताओं के देवस्थान की भी जगह है। जम्मू-कश्मीर का शाहदर शरीफ हो या वैष्णों देवी या बद्री केदारनाथ और फिर अरुणाचल प्रदेश के बौद्ध मठ, सबने अपना निवास हिमालय को ही बनाया है। ऐसे में हिमालय के साथ छेड़छाड़ का मतलब होगा कि इन्हें भी रुष्ट करना होगा। तब समझ लीजिए कि हमारे इस रवैये से रुष्ट प्रभु हमारे लिए कौन-सा दण्ड तय करेंगे। शायद वो जिसे हम झेल नहीं पाएंगे।


Date:09-09-18

चीन-नेपाल धुरी के गंभीर सबक

डॉ. दिलीप चौबे

नेपाल और चीन के बीच व्यापार, पारगमन और परिवहन के क्षेत्र में संबंधों की जो नई शुरुआत हुई है, वह दोनों देशों के लिए मील का एक पत्थर है। यह बात इसलिए भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि चारों ओर से जमीन से घिरा नेपाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार और पारगमन के क्षेत्र में पूरी तरह से भारत पर निर्भर रहा है। लेकिन काठमांडू और बीजिंग के बीच ट्रांजिट प्रोटोकॉल पर जो समझौता हुआ है, उसके तहत नेपाल चीन के चार बंदरगाहों और दो लैंड पोटरे का इस्तेमाल कर पाएगा। नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद से ही नई दिल्ली और काठमांडू के बीच रिश्तों की धुरी बदलने का अनुमान लगाया जा रहा था। वास्तव में चीन और नेपाल के बीच इस समझौते की पटकथा मार्च 2016 में ही लिखी थी, जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन की यात्रा पर गए थे।

उन दिनों नेपाल के नये संविधान के प्रावधानों से नाराज मधेशियों का सरकार विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था। मधेशियों ने आर्थिक नाकेबंदी कर दी थी, जिसके कारण नेपाल में आवश्यक वस्तुओं विशेषकर डीजल-पेट्रोल और दवाओं की किल्लत शुरू हो गई थी। प्रधानमंत्री ओली ने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि इस आर्थिक नाकेबंदी का भारत ने समर्थन किया था, लेकिन यह तय है कि भारत सरकार कूटनीतिक स्तर पर इस संवेदनशील मुद्दे को ठीक से संभाल नहीं पाई। इस घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को नया मोड़ दे दिया। नेपाल चीन की तरफ झुकता चला गया। नेपाल अब चीन के तियान जिन, शेनझेन, लियांम्यांग, झांजियांग, ल्हासा और शिगात्से बंदरगाहों और लैंड पोटरे का इस्तेमाल कर सकेगा। इस तरह नेपाल को अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार करने के लिए नया वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो जाएगा, जिससे भारत पर उसकी निर्भरता कम हो जाएगी।

कम्युनिस्ट सरकार भारत पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती थी ताकि भविष्य में होने वाली किसी भी संभावित आर्थिक नाकेबंदी पर भारत पर निर्भर करना न पड़े। अभी मुख्यत; कोलकाता और विशाखापट्टनम बंदरगाहों से नेपाल का अंतरराष्ट्रीय कारोबार होता है। चीन के साथ व्यापार और पारगमन समझौता करके नेपाल ने इस क्षेत्र में एक नया सहयोगी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। नेपाल के अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिहाज से यह अच्छा है, लेकिन भारत के लिए एक सबक है। नई दिल्ली को अपने छोटे-छोटे पड़ोसी देशों के साथ समानता और बराबरी के साथ पेश आने की कला सीखने की जरूरत है। हिमालयी राज्य नेपाल की सीमा से चीनी बंदरगाहों की दूरी बहुत अधिक है। झांजियांग नेपाल से सबसे नजदीकी बंदरगाह है और यह नेपाली सीमा से 2,755 किमी. दूर है। इतना ही नहीं, नेपाल में परिवहन और ढांचागत आधार बहुत कमजोर है। सीमावर्ती इलाकों में अच्छी सड़कें नहीं हैं। इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि नेपाल चीनी बंदरगाहों का किस सीमा तक फायदा उठा पाता है। हालांकि चीन नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए संपर्क परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। फिर भी चीन और नेपाल की भौगोलिक दूरी एक अहम मुद्दा है और नेपाल का कम्युनिस्ट नेतृत्व इसकी जटिलताओं को देखते हुए भारत के साथ अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रखेंगे।


Date:08-09-18

संवैधानिक नैतिकता सर्वोपरि

फैजान मुस्तफा

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को धारा 377 को लेकर जो फैसला दिया, वह न केवल ऐतिहासिक है बल्कि यह एक कलंक को धोने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो ऐतिहासिक फैसले अब तक दिए हैं, वे फैसले भी काफी युगांतरकारी और महत्त्वपूर्ण रहे हैं। पर यह फैसला शायद इन सब में अग्रिम पंक्ति का फैसला साबित हो। कोर्ट ने इस फैसले से व्यक्तिगत स्वायत्तता के दायरे को बड़ा कर दिया है और समलैंगिकता को अपराध का दर्जा समाप्त कर मानवाधिकार को नई ऊंचाई दी है। इस फैसले से संवैधानिक नैतिकता सबसे ऊपर माना गया है। इस फैसले में अगर किसी जज के शब्द पश्चाताप से लबालब हैं तो वह है पहली बार किसी संविधान पीठ का हिस्सा बनीं न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का यह वक्तव्य : ‘‘इस समुदाय के सदस्यों और इनके परिवार के लोगों ने सदियों से जिस तरह का अपमान और बहिष्कार झेला है, उसके लिए इतिहास को इनसे माफी मांगनी चाहिए।’ व्यक्ति को उसके शरीर का मालिक घोषित किया गया है। वह किसके साथ अंतरंगता रखता है, यह उसकी इच्छा पर छोड़ दिया गया है और साफ कहा है कि राज्य या समाज को इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए।

कोर्ट ने सुरेश कौशल के मामले में अपने ही फैसले को बदल दिया है। सभी पांच जजों का यह फैसला 493 पृष्ठों में है और सभी जजों ने यह फैसला सर्वसम्मति से सुनाया है। इस फैसले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने अपने और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर के लिए फैसला लिखा है।अपने फैसले में न्यायमूर्ति मिश्रा ने व्यक्तिगत पहचान को दैवी ऊंचाई बख्शी है। किसी व्यक्ति की पहचान को नष्ट करना उसकी गरिमा को कुचलने जैसा है। उसकी गरिमा में उसकी निजता, उसकी पसंद, उसकी बोलने की स्वतंत्रता और अन्य अभिव्यक्तियां शामिल हैं। किसी व्यक्ति की विशेष पहचान को स्वीकार करने के लिए धारणा और सोच में बदलाव की जरूरत है। कोई भी व्यक्ति जो है, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए न कि उसे वह बनने के लिए बाध्य किया जाए जो वह नहीं है। प्राकृतिक और अप्राकृतिक यौन संबंधों में अंतर के बारे में मुख्य न्यायाधीश ने कहा ‘‘प्रकृति देता है वह स्वाभाविक है’ और ‘‘किसी व्यक्ति के अस्वाभाविक पहचान को उसके होने के लिए निरा आवश्यक माना जाना चाहिए। समान सेक्स के प्रति आकर्षण तंत्रिका संबंधी गुणों और जीव शास्त्रीय कारकों की वजह से होता है। अपने फैसले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान को सप्राण दस्तावेज बनाने में न्यायपालिका की भूमिका है। संविधान को चाहिए कि वह समाज का ऐसा रूपांतरण करे कि वह बेहतर बने। इस रूपांतरकारी संविधान के हृदयप्रांत में बसता है भारतीय समाज को बदलने का शपथ और प्यास ताकि वह न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अपना सके।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘‘संवैधानिक नैतिकता’ सिर्फ संविधान के उदार शब्दों तक सीमित नहीं है बल्कि उसे एक बहुलवादी और समावेशी समाज के निर्माण के लिए उद्यत होना चाहिए’। उन्होंने कहा, यह संविधान के सभी तीनों अंगों की जिम्मेदारी है कि वह लोकप्रिय भावना या बहुसंख्यावाद के प्रति रु झान को रोके। समरस, समरूप, विरोध-रहित मानकीकृत दर्शन को आगे बढ़ाने का कोई भी प्रयास संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन करेगा। आपराधिक अभियोजन के डर से पसंद की स्वतन्त्रता का गला नहीं दबाया जा सकता।’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा,‘‘संविधान सिर्फ बहुसंख्यकों के लिए नहीं है। मौलिक अधिकार ‘‘किसी भी व्यक्ति को’ और ‘‘किसी भी नागरिक’ को प्राप्त है और यह अधिकार बहुसंख्यकों की अनुमति पर निर्भर नहीं है।’ ‘‘समलैंगिकता न तो मानिसक रोग है और न ही नैतिक दुराचार। यह भी नहीं है कि कोई समलैंगिक होने का चुनाव करता है यौनिकता का विज्ञान कहता है कि कोई व्यक्ति किसके प्रति आकर्षित होता/होती है; इस पर उस व्यक्ति का कोई नियंतण्रनहीं होता। इस बारे में हुए शोध यह बताते हैं कि यौनिक अनुस्थापन जीवन में काफी शुरू में ही निर्धारित हो जाता है। समलैंगिकता को सहमतिपूर्ण माना जाना चाहिए।

किसी की पसंद का महत्त्व ज्यादा है।’ धारा 377 समलैंगिकों के बीच सहवास को आपराधिक करार देता है और यह कानूनी आधार पर नहीं टिक सकता क्योंकि आईपीसी की धारा 375 में स्पष्ट कहा गया है कि एक पुरुष और एक महिला के बीच सहमति से शारीरिक सहवास बलात्कार नहीं है और यह दंडनीय नहीं है। चूंकि धारा 377 दो योग्य वयस्कों के बीच सहमति और असहमति से स्थापित होने वाले यौन संबंधों में भेद नहीं कर पाता है, इसलिए यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है और किसी की मनमानी के खिलाफ अधिकार भी इसके तहत आता है। ‘‘समानता एक ऐसा आधार है जिस पर गैर-भेदभाव वाली न्याय व्यवस्था का विशाल महल खड़ा है। व्यक्तिगत पसंद के प्रति आदर क़ानून के तहत स्वतन्त्रता का आवश्यक तत्त्व है।’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा। कोर्ट के आदेश ने धारा 377 को आंशिक रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया कि निजी स्पेस में दो वयस्कों के बीच सहमतिपूर्ण यौन संबंध समाज के लिए न तो नुकसानदेह है और न ही संक्रामक। पशुओं के साथ अप्राकृतिक मैथुन के संदर्भ में यह धारा कायम रहेगा। किसी संवैधानिक पीठ की सदस्य के रूप में पहली बार अपनी राय में न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने कहा कि किसी व्यक्ति का यौनिक अनुस्थापन उसकी पहचान का जन्मजात पक्ष है और उसे बदला नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि ‘‘सेक्स’ शब्द अनुच्छेद 15 में निषिद्ध है और यह न केवल किसी व्यक्ति की जीवशास्त्रीय गुण हैं बल्कि इसमें उसकी ‘‘यौनिक पहचान और विशेषता’ भी शामिल है। अपने एक शक्तिशाली बयान में उन्होंने कहा, ‘‘इस समुदाय के सदस्यों और इनके परिवार के लोगों ने सदियों से जिस तरह का अपमान और बहिष्कार झेला है उसके लिए इतिहास को इनसे माफी मांगनी चाहिए।’ न्यायमूर्ति नरीमन निजता पर आए फैसले को धारा 377 के लिए मौत का पैगाम बताया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि इलाज से किसी के यौनिक अनुस्थापन को बदला जा सकता है। उन्होंने कहा कि नए संवैधानिक सिद्धान्तों का अन्य मामलों पर भारी असर पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने सर्वाधिक लंबा फैसला लिखा है। उन्होंने कहा है कि धारा 377 न केवल एक अधिनियम को आपराधिक घोषित करता है बल्कि वह एक विशेष प्रकार की पहचान को ही आपराधिक करार देता है। इसका संबंध एक ऐसे अधिकार से है जो हर मानव को मिला हुआ है और यह है गरिमा के साथ जीवन।


Date:08-09-18

वार्ता के निहितार्थ

संपादकीय

भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू वार्ता की तिथि बदलने से जो भी संशय के बादल कायम हुए थे, वह वार्ता के साथ ही छंट गए हैं। वैसे तो इसके कई सकारात्मक परिणाम भारत के अनुकूल आए हैं। मसलन, पाकिस्तान को आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए दबाव बढ़ाने का अमेरिका का मत और दाऊद इब्राहिम को भारत लाने में सहयोग का वचन। किंतु भारत और अमेरिका के बीच संपन्न ‘‘संचार अनुकूलता एवं सुरक्षा समझौता’ (कमकोसा) और दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों और विदेश मंत्रियों के बीच हॉटलाइन शुरू करने का निर्णय काफी महत्त्वपूर्ण है। दोनों देशों की तीनों सेनाओं के बीच पहली बार अगले वर्ष भारत में संयुक्त सैन्य अभ्यास के आयोजन का भी फैसला किया गया। यह अभ्यास देश के पूर्वी तट पर किया जाएगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल पोम्पियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के बीच हुई पहली टू प्लस टू वार्ता के ये परिणाम निश्चय ही आम भारतीय को संतोष देने के लिए पर्याप्त हैं। कॉमकोसा सैन्य साजो-सामान के आदान-प्रदान से संबंधित समझौता करने के दो साल बाद संपन्न हुआ है।

इसका महत्त्व इसी से समझा जा सकता है कि अमेरिका ने गैर नाटो देशों में भारत के साथ ही पहली बार यह समझौता किया है। इससे भारत को अमेरिका की संवदेनशील रक्षा प्रौद्योगिक तक पहुंच हो गई है। इसके परिणामों को देखना होगा किंतु इस समय तो भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों की नींद हराम हो गई होगी। हॉट लाइन आरंभ होने का अर्थ है कि दोनों देशों के रक्षा और विदेशमंत्री किसी भी परिस्थिति में सीधे बात कर सकते हैं। यह रक्षा और विदेश मामलों में दोनों के प्रगाढ़ होते संबंधों का ही द्योतक है। इसी तरह अमेरिका ने नाभिकीय आपूत्तिकर्ता समूह या एनएसजी में भारत की सदस्यता जल्द-से-जल्द सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करने की भी मंजूरी दी है। भारत काफी समय से एनएसजी में शामिल होने का प्रयास कर रहा है लेकिन चीन के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है। दूसरे कुछ देश चीन के कारण ही भारत के पक्ष में नहीं आ पाते। शायद अमेरिकी प्रभाव का असर हो एवं भारत को इसमें सफलता मिले। जहां तक पाकिस्तान पर दबाव का प्रश्न है तो आतंकवाद के संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन कड़ा रुख अपनाए हुए है एवं पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता तक रोकी है। हां, जिस आंतकवाद से भारत पीड़ित है, उसके संदर्भ में भी वह उतना ही कठोर रहता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।


Date:08-09-18

हमारे हित और अमेरिका की भूमिका

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

भारत और अमेरिका के बीच हुई ‘टू प्लस टू वार्ता’ कई आशंकाओं को जन्म देने के बाद भी उम्मीद बंधाती है। अच्छी बात यह है कि अमेरिका ने इस वार्ता के माध्यम से हमें अपने सहयोगी का दर्जा दिया है। ‘क्वाड’ (चतुष्कोणीय गठबंधन का संक्षिप्त रूप) के सदस्यों के साथ अमेरिका ने टू प्लस टू वार्ता की अनोखी पहल शुरू की है, जिसके दो अन्य सदस्य देश ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ यह होता भी रहा है। मगर ये दोनों उसके सहयोगी देश हैं। इसीलिए यदि अब हमें यह दर्जा हासिल हुआ है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भारत और अमेरिका में इस तरह की बातचीत जरूरी थी, ताकि दोनों देश एक-दूसरे के विचार और दृष्टिकोण जान सकें। कई बार यह देखा गया है कि भारत के हितों पर अमेरिका उस कदर मुखर नहीं हुआ, जितनी अपेक्षा थी। मसलन, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर ही वह इस्लामाबाद पर दबाव नहीं बना पा रहा है। अगर वह उस पर थोड़ा-बहुत दबाव बनाता भी है, तो वह अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं को लेकर होता है, उसमें भारत का पक्ष कमोबेश अनसुना ही रहता है। टू प्लस टू वार्ता में शामिल होने के लिए ही अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो पाकिस्तान होकर आए थे, जहां उन्होंने दबाव डालने की बजाय अपनी अपेक्षाएं बताईं।

प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी देश का उसका दर्जा भी अब तक कायम है। इसका साफ अर्थ है कि पाकिस्तान अब भी अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण देश है, और खासतौर से अफगाानिस्तान मसले पर उसका एक प्रमुख सहयोगी बना हुआ है। इसी तरह, कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने विभाग की सलाह के इतर फैसले लिए और अपनी नीति की घोषणा ट्विटर पर की। लिहाजा यह जरूरी था कि अमेरिका में बन रहे इस नए सिस्टम को भारत समझे। टू प्लस टू वार्ता में कई ऐसे फैसले हुए हैं, जो भारत के नजरिये से बेहतर माने जाएंगे। रणनीतिक रूप से अहम संचार, संगतता, सुरक्षा समझौता (कॉमकोसा, यानी कम्युनिकेशन, कॉम्पैटिबिलिटी ऐंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। अच्छी बात यह है कि इसमें भारत की चिंताओं को शामिल करके इसे ‘इंडिया स्पेसिफिक’ बनाया गया है। इसके तहत भारत को अपनी सेना के लिए अमेरिका से कुछ आधुनिक संचार प्रणाली मिलेगी। इसके अलावा, अमेरिका से जो भी रक्षा उपकरण भारत आएंगे, सिर्फ वही अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल किए जाएंगे।

भारत में मौजूद अन्य रक्षा उपकरणों पर ऐसी कोई बंदिश नहीं होगी। असल में, अमेरिका इस समझौते के तहत सभी रक्षा उपकरणों को अपने प्लेटफॉर्म पर लाने का आग्रही रहा है। अगर ऐसा होता, तो हमें अपना पूरा रक्षा तंत्र अमेरिका के साथ साझा करना पड़ता। चूंकि हमने कई अन्य देशों से भी रक्षा समझौते किए हैं और उनसे सैन्य उपकरण खरीदें हैं, इसीलिए अमेरिकी बंदिश को मानने का अर्थ उन तमाम देशों की सुरक्षा तकनीकों की गोपनीयता को भंग करना होता। यह हमारे हित में कतई नहीं था। दूसरी अच्छी बात यह हुई है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गुटों का नाम लिया गया है और मिलकर उनके खिलाफ कार्रवाई करने पर सहमति बनी है। आतंकवाद से लड़ने के लिए अमेरिका के साथ एक ग्रुप हमने पहले से बना रखा है। उम्मीद है कि अब यह और बेहतर तरीके से काम कर सकेगा। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हाफिज सईद, मसूद अजहर या दाऊद इब्राहिम जैसे आतंकियों के खिलाफ तुरंत बड़ी कार्रवाई होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिका के अपने हित पाकिस्तान के साथ जुड़े हुए हैं। लिहाजा भारत को भी कुछ खास सावधानी बरतनी होगी। विशेषकर कश्मीर में जिस तरह के आतंकियों के हौसले बढ़े हैं, उसके खिलाफ अपने तईं उसे कड़ी कार्रवाई करनी ही होगी।

इंडो-पैसिफिक के मसले पर भी भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़ते हुए दिख रहे हैं। हालांकि यहां भी समझने की बात है कि अमेरिका का चीन के साथ एक जटिल रिश्ता है। लिहाजा भारत को पूरी तरह संभलकर आगे बढ़ना होगा। खासतौर से, कारोबार के मामले में दूसरे तमाम देशों से अच्छे रिश्ते बनाकर चलने में ही हमारी भलाई है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अमेरिका तमाम तरह के प्रतिबंध आयद करने की बात कहता रहता है। लिहाजा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर संजीदगी से आगे बढ़ना हमारे हित में होगा। यह मुक्त व्यापार को लेकर एक ऐसा प्रस्तावित समझौता है, जो आसियान के सभी दस देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों को भी एक साथ जोड़ता है। इसमें हम चीन के साथ बेशक सोच-समझकर आगे बढ़ें, पर दूसरे तमाम देशों के साथ हमें तेजी से कदम बढ़ना होगा।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि अमेरिका के साथ आगे बढ़ना हमारे हित में है। मगर हम उसके अधीनस्थ सहयोगी की भूमिका नहीं निभा सकते। अमेरिका जब अपने हितों के मद्देनजर पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए हुए है, तो हमें भी उसकी चिंता करते हुए ईरान और रूस के साथ अपने संबंधों की बलि नहीं देनी चाहिए। हालांकि जरूरी यह भी है कि हम तुर्की की तरह अमेरिका की सीधे-सीधे नाराजगी मोल न लें। गंभीर चिंतन के बाद उन मसलों पर आगे बढ़ें, जिसे लेकर ह्वाइट हाउस का रवैया सख्त है। अमेरिका में अब भी कई ऐसे लोग हैं, जो भारत के नजरिये का समर्थन करते हैं। ऐसे में, उम्मीद यही है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव के बाद यदि वहां की कांग्रेस (संसद) की तस्वीर बदलती है, तो अमेरिका की नीतियां कहीं अधिक स्पष्ट रूप में हमारे सामने आ सकती हैं। हमारा लक्ष्य दुनिया की तीन सबसे बड़ी ताकतों में शुमार होने का है। हमें इसी लक्ष्य के मद्देनजर अपनी नीतियां बनानी चाहिए। और इसमें जरूरी है कि हम एक व्यापक और समग्र सोच रखें। हमें चीन के साथ भी संबंध बेहतर बनाने होंगे और रूस के साथ बने रिश्ते की गरमाहट भी बरकरार रखनी है। अमेरिका का साझीदार बनने के लिए हम दूसरे देशों के साथ अपने रिश्ते खराब नहीं कर सकते।


Date:08-09-18

मदद और निहितार्थ

संपादकीय

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में रिश्तों की जो नई शुरुआत हुई है, वह दोनों देशों के लिए मील का एक पत्थर है। यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि रक्षा क्षेत्र में भारत दशकों तक पूरी तरह से रूस पर निर्भर रहा है। लेकिन अब बदलते वैश्विक परिदृश्य और समीकरणों में रिश्तों की यह धुरी बदली है और अमेरिका को नया रक्षा सहयोगी बनाने की दिशा में भारत ने कदम बढ़ाए हैं। एक लिहाज से यह अच्छा इसलिए भी माना जाना चाहिए कि हम अब किसी एक देश या ताकत पर आश्रित नहीं रहेंगे, बल्कि जरूरत के मुताबिक अपने सैन्य बलों को अत्याधुनिक बनाने का फैसला कर सकेंगे। इसके अलावा वैश्विक महाशक्तियों के साथ रिश्तों में एक संतुलन बनेगा और भारत पर किसी का मोहरा बनने का ठप्पा भी नहीं लगेगा। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसमें न सिर्फ भारत के बल्कि अमेरिका के भी दूरगामी हित शामिल हैं। दस साल पहले तक अमेरिका के साथ रक्षा व्यापार मामूली था, लेकिन आज भारत उससे दस अरब डॉलर से ज्यादा के उपकरण खरीद रहा है और आने वाले दिनों में इसमें तेजी से इजाफा होगा।

भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों की वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच जो कॉमकासा (कम्युनिकेशंस, कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) संधि हुई है, उसके तहत भारत को रक्षा क्षेत्र में काफी कुछ नया हासिल होने जा रहा है। इसके तहत अमेरिका भारत को सभी गोपनीय सुरक्षा तकनीक देगा, सेना को अत्याधुनिक संचार प्रणाली से लैस करने लिए तकनीक मिलेगी और सी-17 व सी-130 हरक्यूलिस जैसे विमान भारत में बनने का रास्ता खुलेगा। इससे भी बड़ी बात यह कि अमेरिका सारे संवेदनशील डाटा भारत को मुहैया कराएगा, जो सुरक्षा के लिहाज से भारत के लिए जरूरी होंगे। अमेरिका ने वादा किया है कि चीन और पाकिस्तान की सैन्य तैयारियों को लेकर भी वह भारत को सूचनाएं देता रहेगा। इन दोनों देशों की गतिविधियों की निगरानी के लिए अमेरिका ड्रोन तकनीक भी देगा। इस करार से कुल मिला कर ऐसा संदेश जाता है कि जैसे भारत की झोली भरने को अमेरिका तैयार बैठा था।

लेकिन सवाल है कि अमेरिका भारत के प्रति इतनी दरियादिली दिखा क्यों रहा है। ऐसी क्या बात है कि भारत पर ट्रंप प्रशासन इतना मेहरबान हुआ है? जाहिर है, इसमें उसके हित और स्वार्थ कहीं ज्यादा बड़े हैं। भारत को चीन और पाकिस्तान का खौफ दिखा कर भारत के रक्षा क्षेत्र में पैर पसारने की यह अमेरिकी कवायद दूरगामी मतलब लिए हुए है। हमारी जरूरत यह है कि हमें चीन और पाकिस्तान को यह अहसास कराते रहना है कि सैन्य ताकत के मुकाबले में हम उनसे कहीं पीछे नहीं रहेंगे और हर स्थिति का सामना करने को तैयार हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में एक सैन्य ताकत के रूप में दबदबा बनेगा। लेकिन अमेरिका इस बहाने चीन से निपटने की दूरगामी रणनीति पर चल रहा है। वह भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की मदद से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अपना दबदबा कायम करना चाह रहा है। इस बारे में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया केबीच साल भर के दौरान दो बार बैठकें हो चुकी हैं और इसे नए गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में भारत को भारी मदद की आड़ में ईरान से दूर करने की रीति पर भी अमेरिका काम कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो अमेरिका दशकों से पाकिस्तान को पालता-पोसता रहा है, जिस पर उसका वरदहस्त रहा है और जो आज भी बना हुआ है, वह भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में कैसे और कितना बड़ा सहयोगी साबित होगा?


Date:08-09-18

अनुच्छेद 35-ए : भ्रम और निदान

भीम सिंह

यह दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद ऐतिहासिक घटना है, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर आज भी भारतीय संविधान के साथ जुड़ नहीं पाया है। भारतीय संविधान का निर्माण भारत की संविधान सभा ने 1949 में संपन्न किया था और 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान को लागू कर दिया था। संविधान में सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय था, अध्याय-3 जिसमें अनुच्छेद 12 से 35 तक मानवाधिकारों का उल्लेख है। ये मानवाधिकार सभी भारतीय नागरिकों के अलावा कुछ गैर-नागरिकों को भी दिए गए थे, जैसे अनुच्छेद 21, जो मानवाधिकार अध्याय-3 में दर्ज है। इसके अनुसार जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भारत वर्ष में रह रहे सभी लोगों को प्राप्त है, चाहे वे नागरिक हों या भारत में रह रहे हों। त्रासदी यह रही कि अध्याय-3 को जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया गया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के प्रश्न को संविधान के अनुच्छेद 370 को अस्थायी रूप से डाल कर एक भयंकर गलती की गई।

इसके लिए कौन जिम्मेदार है, कौन कसूवार है, इस वक्त इस बारे में विचार-विमर्श करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इतिहास के पन्नों को पलटने और उन पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। दूसरी गलती भारत सरकार ने 1954 में की, जब जम्मू-कश्मीर के लिए वहां के नागरिकों के मानवाधिकारों, जो भारतीय संविधान में सुनिश्चित थे, पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। 14 मई, 1954 को शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की हिरासत का औचित्य सिद्ध करने के लिए भारतीय संविधान के अध्याय-3 में अनुच्छेद 35 के साथ ‘ए’ जोड़ दिया गया। अध्याय-3 के अनुच्छेद 12 से 35 तक को समझने की जरूरत है, जिसमें भारतीय संविधान में दिए गए सभी मानवाधिकार शामिल हैं। ये मानवाधिकार भारत के सभी नागरिकों को प्राप्त थे, इनमें जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी नागरिक भी शामिल थे। इस मानवाधिकार के अध्याय को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35-ए ने किस तरह रौंद डाला, इसका उल्लेख मैं सभी नागरिकों, भारतवासियों और जम्मू-कश्मीर में रहने वाले नागरिकों से करना चाहूंगा कि जो भारतीय संविधान के अनुसार भारतीय नागरिक हैं और उनमें मैं भी शामिल हूं।

इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना यह हुई थी कि जब 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ तो भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य को शामिल नहीं किया गया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के पद को भी नहीं छेड़ा गया, क्योंकि महाराजा हरिसिंह 1949 में स्वेच्छा से जम्मू-कश्मीर छोड़ कर बंबई चले गए थे। 26 जनवरी, 1950 जिस दिन भारत का संविधान लागू किया गया, उस दिन भी जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ही अस्थायी शासक थे। उनकी अनुपस्थिति के बहाने उनके बेटे युवराज कर्णसिंह को जम्मू-कश्मीर का राजप्रमुख (सदर-ए-रियासत) नियुक्त किया गया। सबसे दुखदायी घटना यह थी कि महाराजा हरिसिंह के ऐतिहासिक विलयपत्र के अनुसार महाराजा को तीन विषयों रक्षा, विदेश और संचार इत्यादि के अधिकार विलयपत्र को स्वीकार करते हुए भी संसद को नहीं सौंपे गए, यानी भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़कर इन विषयों पर भी भारतीय संसद को कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया गया।

ये विषय महाराजा हरिसिंह ने भारतीय संसद को सौंप दिए थे, जैसे बाकी पांच सौ पचहत्तर रियासतों ने भारत के सौंपे थे। उन रियासतों के शासकों ने बाद में भारत संघ में विलय कर दिया था, परंतु जम्मू-कश्मीर के बारे में कोई भी निर्णय भारतीय संसद आज तक नहीं कर सकी। यहां इस बात का उल्लेख करना भी आवश्यक है कि दो रियासतों- हैदराबाद और जूनागढ़, जिन्हें भारत संघ में 26 जनवरी, 1950 में शामिल किया गया था, के शासकों ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। एक बहुत बड़ा प्रश्न यह है कि भारतीय संसद ने जम्मू-कश्मीर में राजशाही को क्यों नहीं हटाया था, जबकि वहां के महाराजा और लोकप्रिय नेतृत्व ने जम्मू-कश्मीर की विलय प्रक्रिया को पूरा समर्थन किया था। इस प्रश्न का उत्तर भी एक दिन भारत के इतिहासकारों को देना होगा। 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर में जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हुआ, जिसमें भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लेख तक नहीं है। आज भी जम्मू-कश्मीर के संविधान में भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का कोई उल्लेख नहीं है।

उच्चतम न्यायालय का योगदान है कि भारतीय संविधान में दिए गए कई मानवाधिकार जम्मू-कश्मीर में रहने वाले भारतीय नागरिकों को भी उपलब्ध हैं। यह आश्चर्य की बात है कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान के अनुसार पूरे भारत का अटूट अंग है, परंतु वहां रहने वाले भारतीय नागरिक आज भी मानवाधिकारों से वंचित हैं, जो पूरे भारत के नागरिकों को हासिल हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार के अध्याय को लागू नहीं किया गया और इसका कारण था कि सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सरकार जब चाहे, जनसुरक्षा कानून के तहत जानवरों की तरह जेलों में बंद कर सकती है। इसका उल्लेख भी आवश्यक है कि 1954 में शेख अब्दुल्ला के ब्रिटेन से आए हुए वकील डिंगल फुट ने जम्मू की एक अदालत में यह प्रश्न उठाया था कि शेख अब्दुल्ला को तीन महीने से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह गारंटी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 इत्यादि में दी गई है।

तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद को असीमित शक्ति और अधिकार देने के लिए अनुच्छेद 35-ए को जन्म दिया गया, जिसके कारण भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार को असीमित अधिकार दे दिया, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर सरकार को अपना जनसुरक्षा कानून बनाने का अधिकार मिल गया। आज भी जम्मू-कश्मीर में जनसुरक्षा कानून 1978 लागू है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति / राजनीतिक कार्यकर्ता को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा जा सकता है, इनमें आज भी सैकड़ों लोग जम्मू-कश्मीर से राज्य की जेलों में ही नहीं, बल्कि पूरे देश की जेलों में बंद हैं। आज का इतिहास इस बात पर जोर दे रहा है कि जम्मू-कश्मीर के ही नहीं पूरे भारतवर्ष के लोग विशेषकर यहां के सांसदों को इस बात को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि इस अन्याय से भरे हुए अनुच्छेद 35-ए में दर्ज कानून को जम्मू-कश्मीर के भूतपूर्व शासक क्यों समर्थन दे रहे हैं। इसका उत्तर मेरे पास है कि ऐसे ही जनविरोधी कानून का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर के हजारों नौजवानों, राजनीतिक कार्यकर्ता इत्यादि को जेलों में रखा गया।

आश्चर्य की बात यह है कि आज जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35-ए के विरुद्ध युद्ध कौन कर रहा है नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और बाकी वे लोग, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों पर रोक लगा रखी थी और आज भी यही सोच रहे हैं कि कल ऐसा न हो कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को विशेषकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मानवाधिकार प्राप्त हो जाएं, जिसका आश्वासन भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दर्ज अनुच्छेद 12 से 35 में है। भारतीय संविधान के अध्याय-3 को अनुच्छेद 370 के किसी भी दायरे में नहीं रखा गया है। अनुच्छेद 370 का विषय क्या है और अनुच्छेद 370 संसद से लेकर राष्ट्रपति तक हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देता। अनुच्छेद 35-ए को राष्ट्रपति छह महीने तक संविधान के अनुसार लागू कर सकते थे और यह संशोधन सिर्फ छह महीने तक ही लागू रह सकता था, यानी 1955 से अनुच्छेद 35-ए भारतीय संविधान में असंवैधानिक चल रहा है। जम्मू-कश्मीर में भी वहां के लोगों को भारतीय संविधान में दिए गए सभी मानवाधिकार उसी तरह प्राप्त हैं, जिस तरह देश के बाकी नागरिकों को। जहां तक जम्मू-कश्मीर ‘स्टेट सब्जेक्ट’ के विषय का संबंध है, यह कानून महाराजा हरिसिंह ने 1927 में लागू किया था, जिसे भारतीय संविधान ने स्वीकार किया है।


Date:08-09-18

2+2 = ?

India must watch its side of the ledger while deepening defence ties with the U.S.

Editorial

The India-U.S. defence relationship has been given a significant boost with the three agreements signed on Thursday after the inaugural 2+2 Dialogue in Delhi: the Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA), “hotlines” between the Defence and Foreign Ministers of both countries, and the first tri-services military exercises between the two countries. COMCASA is the third of four “foundational”, or enabling, agreements signed by India after more than a decade of negotiations, and is perceived as an inevitable consequence of the large amount of U.S. defence hardware it has been purchasing. This will increase, going forward, given the U.S. decision to include India in the top tier of countries entitled to Strategic Trade Authorisation (STA-1).

Apart from the defence agreements, both sides said in a joint statement that they had discussed trade issues, cooperation on fighting terrorism, advancing “a free, open, and inclusive Indo-Pacific region” and promoting sustainable “debt-financing” in the region. The last two points are clearly aimed at Beijing’s role in the South China Sea and the Belt and Road Initiative projects, respectively. The 2+2 discussions, held after two previous cancellations this year, brought much-needed focus on the India-U.S. relationship after months of drift and occasional discord. However, while trade was addressed, India did not receive a clear-cut assurance of its GSP (Generalised System of Preferences) status being restored, or of waivers on steel and aluminium tariffs imposed by Washington.

Instead, U.S. officials said clearly that they expect India to increase imports of American oil and gas as well as aircraft in order to wipe out the trade surplus India enjoys. It is unclear whether the Centre has acquiesced to this blatantly anti-free market demand, but its silence on the matter is disturbing.  The U.S.’s other demand, to “zero out” oil imports from Iran by November, is simply unreasonable. It would hurt India dearly not only because of costs at a time when the dollar is strengthening and fuel prices are going up, but also in terms of its substantial engagement with Iran. No public statement was made on what the U.S. will do on India’s investment in the Chabahar port once its full sanctions kick in on November 4. American officials also gave no firm commitment in their statements that India will receive a waiver to purchase Russian hardware, beginning with the S-400 missile system. While signing agreements the U.S. has pursued for years, India appears to have taken a leap of faith on its own concerns, expecting that the Trump administration will come through on waiving sanctions and being more flexible on trade issues. Delhi must work with Washington in the next few months to ensure that the benefits from the 2+2 dialogue don’t add up only on the other side.

News Clipping on 09-09-2018

Date:08-09-18

भारत-अमेरिका रक्षा संबंधी संचार समझौते का मतलब

आज के युग में जमीन-जायदाद और हथियार से भी ज्यादा मूल्यवान चीज है डेटा

संपादकीय

भारत और अमेरिका ने गुरुवार को कामकासा (कम्युनिकेशन्स कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) पर दस्तखत करते हुए दोनों देशों के बीच सहयोग के नए द्वार खोल दिए हैं। आज के युग में जमीन-जायदाद और हथियार से भी ज्यादा मूल्यवान चीज है डेटा। यह समझौता तमाम तरह के डेटा की भागीदारी के लिए भारत को अमेरिकी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने की इजाजत देगा। इसके साथ ही भारत उन डेटा का भी इस्तेमाल कर सकेगा, जिन्हें दूसरे देशों की सेनाएं अमेरिका से साझा करती हैं।

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक आर. पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जेम्स एन. मैटिस के साथ भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने उस पर दस्तखत किए और न सिर्फ सरकारी स्तर पर डेटा की हिस्सेदारी के द्वार खोले बल्कि निजी स्तर पर भी रक्षा में काम करने वाली कंपनियों के लिए भी यह संभावना तैयार की। समझौते का उद्‌देश्य दुनिया भर में फैले अमेरिकी रक्षा नेटवर्क के साथ भारत का सहयोग और आतंकवादी गतिविधियों पर निगरानी रखना भी है। भारत ने रक्षा मामलों में निजी कंपनियों को निर्माण का मौका हाल में दिया है और इस समझौते से उस नीति को मजबूती मिलेगी।

अब भारत की निजी कंपनियां अमेरिका की सैन्य आपूर्ति शृंखला में शामिल हो सकेंगी। भारत इस बात से खुश है कि अमेरिका पाकिस्तान में पैदा हो रहे आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए सक्रिय है और इसीलिए उसने दक्षिण एशिया में ट्रम्प की नीति का समर्थन किया है। हालांकि, इस समर्थन से अलग भारत को ईरान पर लगी पाबंदी का पालन करने में अपना नुकसान दिखाई पड़ रहा है। यही कारण है कि भारत ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से अनुरोध किया है कि वे इस बात का ध्यान रखे कि ईरान पर पाबंदी से भारत को नुकसान न हो। जबकि अमेरिका ईरान पर पाबंदी लगाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है।

आर्थिक और सामरिक हितों के इस लेन-देन के बीच भारत को अमेरिकी निकटता से रक्षा और संचार संबंधी तकनीक का अगर लाभ मिलेगा तो तेल-गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों को महंगी कीमत पर खरीदने को बाध्य होना पड़ेगा। रक्षा का बड़ा दारोमदार संचार की नई तकनीक पर निर्भर है और अमेरिका वह भारत से साझा करने को तैयार है लेकिन, वह ईरान के साथ कोई नरमी बरतने को तैयार नहीं है। भारत इन दोनों के बीच संतुलन बिठाने का प्रयास करना होगा।


Date:08-09-18

जातिवाद के दलदल में फंसी हमारी राजनीति

विभिन्न दल एक-दूसरे की टांग खींचने की बजाय अजा-जजा अत्याचार निवारण कानून पर सर्वसम्मति बनाएं

वेदप्रताप वैदिक

अजा जजा अत्याचार निवारण कानून को लेकर कभी अनुसूचित जाति-जनजाति द्वारा और कभी सवर्णों द्वारा बार-बार भारत बंद का जो नारा दिया जा रहा है, वह आखिर किस बात का सूचक है? वह प्रमुख राजनीतिक दलों के दिवालिएपन का सूचक है। जो दल शुद्ध जातिवादी राजनीति करते हैं और जिनका वर्चस्व सिर्फ उनके प्रांतों में ही है, मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं। जिन दलों का केंद्र में राज रहा है और जो खुद को संपूर्ण भारत का प्रतिनिधि कहते हैं, इस मुद्‌दे पर उनकी नीति क्या है?

जब 20 मार्च 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने 1989 में बने अजा-जजा अत्याचार निवारण कानून की गड़बड़ियों को सुधारा तो भाजपा-कांग्रेस का रवैया क्या था? कांग्रेस ने देश में भाजपा-विरोधी अभियान छेड़ दिया। उसने ऐसे आरोप लगाए जैसे अदालत का फैसला भाजपा सरकार के इशारे पर ही आया है। अजा-जजा वर्गों को भड़काया गया और हिंसा में 15 लोगों की जान चली गई। जहां तक सरकार का सवाल है, उसने याचिका लगाकर अदालत से प्रार्थना की थी कि वह 1989 के कानून को जरा भी ढीला न पड़ने दे। चूंकि कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों के पास कोई मुद्‌दा नहीं था, उन्होंने इसे ही पकड़ लिया।

उन्होंने राजघाट पर अनशन की नौटंकी रच दी और भारत बंद का नारा दे दिया। भाजपा को लगा कि अनूसचित जातियों और जनजातियों का वोट बैंक कहीं खिसक न जाए, इसलिए उसने नेहले पर देहला मार दिया। उसने संसद में प्रस्ताव लाकर सर्वोच्च न्यायालय के संशोधनों को रद्‌द करवा दिया। किसी भी दल ने सर्वोच्च न्यायालय के संशोधनों का समर्थन नहीं किया। वे संशोधन क्या थे? सर्वोच्च न्यायालय ने 1989 के इस कानून में तीन मुख्य संशोधन सुझाए थे। अदालत ने यह तो माना कि अनुसूचितों पर अत्याचार आज भी जारी है। लेकिन उसने यह भी कहा कि अत्याचार को खत्म करने वाले कानून को खुद अत्याचारी नहीं बनना चाहिए। पिछले ढाई दशक का अनुभव है कि कानून की आड़ में लोगों ने झूठे मुकदमे चलाकर हजारों बेगुनाह लोगों को जेल के सींखचों के पीछे डलवा दिया।

अदालत ने इस पुराने कानून में पहला संशोधन यह किया कि किसी भी व्यक्ति को इसलिए तुरंत गिरफ्तार न किया जाए कि उसके विरुद्ध अजा वर्ग के किसी व्यक्ति या किसी आदिवासी ने थाने में कोई शिकायत लिखा दी है। मूल कानून में सुधार करते हुए अदालत ने फैसला दिया कि किसी भी नागरिक के खिलाफ कोई अनुसूचित व्यक्ति किसी भी प्रकार की शिकायत करे तो उस नागरिक को गिरफ्तार करने के पहले पुलिस उसकी जांच करके वरिष्ठ जिला अधीक्षक को दे। उसके संतुष्ट होने पर ही गिरफ्तारी की जाए। दूसरा संशोधन यह था कि यदि ऐसा ही मामला किसी सरकारी कर्मचारी का हो तो जब तक उसे नियुक्त करने वाले उच्चाधिकारी की अनुमति न मिले, उसे गिरफ्तार न किया जाए। पहले उसकी जांच हो, यह जरूरी है। तीसरा संशोधन यह था कि इस तरह के आरोपी यदि जमानत या अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करें तो उस पर विचार किया जाए।

ये संशोधन कड़ुए अनुभवों से ही पैदा हुए हैं। 2015-16 में अजा-जजा अत्याचार के 6 हजार मुकदमे फर्जी निकले और 2016-17 में इनकी संख्या 11 हजार तक पहुंच गई थी। अत्याचार का कोई मुकदमा फर्जी है या असली है, इसका फैसला होने में तो लंबा समय लगता है लेकिन, उतने समय तक निर्दोष लोगों को भी जेल काटनी पड़ती है, क्योंकि उन्हें जमानत भी प्रायः नहीं मिलती। यह कानून 1989 में बना था, जब देश में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। सभी दलों ने इस कानून का समर्थन किया था, क्योंकि सभी चाहते थे कि अजा-जजा वर्ग पर सदियों से हो रहे अत्याचारों पर प्रतिबंध लगे। तब संसद ने जो कड़े प्रावधान बनाए उनके पीछे यह भावना नहीं थी कि गैर-अजा-जजा वर्ग का दमन हो या उनको अनावश्यक तकलीफ पहुंचाई जाए।

लेकिन, अब जबकि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अन्यायकारी कानून में सुधार किया तो उसे सभी दलों का समर्थन क्यों नहीं मिला? इसीलिए कि देश के सभी नेता, सभी दल वोट और नोट के गुलाम हैं। उनके लिए देशहित नहीं, अपना दलीय हित सर्वोपरि है। हर प्रमुख दल यह बताने के लिए मरा जा रहा है कि देश के अनुसूचितों का सबसे बड़ा हितैषी वही है, क्योंकि उनकी आबादी 30-35 करोड़ है और वे प्रायः थोकबंद वोट डालते हैं। वास्तविकता यह है कि संसद ने 2018 में जो अजा-जजा अत्याचार निवारण कानून दोबारा पारित किया है, वह सवर्णों, पिछड़ों, मुसलमानों, ईसाइयों और अन्य गैर-अनुसूचित समुदायों के लिए तो तकलीफदेह है ही, उससे अजा-जजा वर्गों के करोड़ों लोगों को राहत मिलना तो दूर, उनका नुकसान ही ज्यादा होगा। देश के 75-80 प्रतिशत लोगों के मन में अगर यह बात घर कर गई कि यह कानून अन्यायकारी है तो आप ही सोचिए कि उसे अमल में लाना कितना कठिन होगा?

जिन नेताओं ने वोट के लालच में इसका समर्थन किया है, क्या वे भारत में सर्वत्र विराजमान होते हैं? पुलिस में, अदालत, प्रशासन, रेल, बस, स्कूल में, अस्पताल में- हर जगह गैर-अनुसूचितों की बहुसंख्या है। इनसे अनुसूचित लोग कैसे पार पाएंगे? इस दमनकारी कानून का एक सूक्ष्म असर यह भी होगा कि अजा-जजा विरोधी भावना भी फैलेगी। जो सांसद हाथ उठाकर इस कानून को पास करते हैं, वे भी मैदानी मौका पड़ने पर हाथ ऊंचे कर देंगे।  जरूरी यह है कि हमारे अजा-जजा नेता और संगठन इस कानून पर पुनर्विचार करें। वे पहल करें और सर्वोच्च न्यायालय के संशोधनों को अधिक व्यावहारिक और तर्कसम्मत बनाने के लिए रचनात्मक सुझाव दें।

देश के प्रमुख राजनीतिक दल एक-दूसरे की टांग खींचने की बजाय इस मुद्‌दे पर एक सर्वसम्मति बनाएं। गैर-अनुसूचित जातियों के संगठन उत्तेजित होकर आजकल जो आंदोलन चला रहे हैं, वह हिंसक कदापि नहीं होना चाहिए। यह तो उन्होंने अच्छा किया कि वे भाजपा-कांग्रेस, दोनों के नेताओं को आड़े हाथों ले रहे हैं लेकिन, वे कृपया यह कभी नहीं भूलें कि अजा-जजा लोगों पर सदियों से हम अत्याचार करते रहे हैं। वे भी हमारे भाई हैं और उन्हें भी बराबरी का हक मिलना चाहिए। यह तभी होगा, जबकि भारत से जातिवाद का खात्मा होगा और भारत में डाॅ. आंबेडकर और डाॅ. लोहिया के सपनों का जातिविहीन समाज बनेगा लेकिन, अभी तो हमारी राजनीति जातिवाद के दलदल में बुरी तरह फंस गई है।


Date:08-09-18

एससी-एसटी एक्ट पर रार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यही सुनिश्चित किया था, लेकिन उसे दलित विरोधी करार देने के साथ उसके विरोध में भारत बंद का आयोजन भी किया गया।

संपादकीय

अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों को उत्पीड़न से बचाने वाले कानून को पुराने स्वरूप में बहाल करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को लेकर मोदी सरकार असमंजस में पड़े तो हैरानी नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने एससीएसटी एक्ट में हालिया संशोधन पर सरकार से छह सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है। चूंकि यह संशोधन खुद सरकार की पहल पर हुआ है इसलिए उसके लिए उसका विरोध करना संभव नहीं होगा। इसी के साथ वह इसकी अनदेखी भी नहीं कर सकती कि तमाम सामाजिक संगठन यह दवाब बनाने में लगे हुए हैं कि इस अधिनियम के उसी स्वरूप को स्वीकार किया जाए जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तय किया था। यह दबाव बढ़ाने के लिए ही अभी हाल में कुछ राज्यों में बंद बुलाया गया। पता नहीं इस बंद को किन राजनीतिक दलों ने हवा दी, लेकिन दिखा यही कि यह एक राजनीति प्रेरित आयोजन था।

बसपा प्रमुख मायावती ने इस बंद के लिए जिस तरह भाजपा को जिम्मेदार ठहरा दिया उससे यही स्पष्ट होता है कि किस तरह एक संवेदनशील मसले पर संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ साधे जा रहे हैं। क्या यह वही मायावती नहीं जिन्होंने मुख्यमंत्री रहते समय एससी-एसटी एक्ट में करीब-करीब वैसे ही बदलाव किए थे जैसे अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने किए? बात केवल बसपा की ही नहीं, अन्य अनेक दलों की भी है। आगामी आम चुनाव और कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए विभिन्न दल एससी-एसटी एक्ट के बहाने अपना-अपना वोट बैंक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह चिंताजनक है कि वोट बैंक के आगे उन्हें सामाजिक सद्भाव की कहीं कोई चिंता नहीं।

यह ठीक नहीं कि एससी-एसटी एक्ट के मामले जब नीर-क्षीर ढंग से विचार करने की जरूरत है तब ऐसा करने से बचा जा रहा है। शायद इसी कारण सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए इस एक्ट के पुराने स्वरूप को बहाल करने का फैसला किया गया। सरकार को ऐसा इसलिए करना पड़ा, क्योंकि खुद को दलित हितैषी दिखाने के फेर में राजनीतिक दलों ने एक ऐसा माहौल बना दिया जैसे सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को खारिज ही कर दिया हो। न्याय का तकाजा तो यह कहता है कि किसी भी मामले में बिना जांच गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यही सुनिश्चित किया था, लेकिन उसे दलित विरोधी करार देने के साथ उसके विरोध में भारत बंद का आयोजन भी किया गया। इस दौरान अनावश्यक उग्रता भी दिखाई गई। क्या संवेदनशील मसले रार ठानने से सुलझते हैं? कहना कठिन है कि पुराने स्वरूप वाले एससी-एसटी एक्ट पर सुनवाई करने जा रहे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सरकार क्या दलील पेश करेगी, लेकिन अगर इस नाजुक मसले पर संयम का परिचय नहीं दिया गया तो सामाजिक समरसता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। ऐसा होना किसी के भी हित नहीं। बेहतर होगा कि सभी संगठन चाहे वे राजनीतिक हों या सामाजिक, यह देखें कि दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर लगाम कैसे लगे? इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट भी यह देखे कि एससी-एसटी एक्ट का ऐसा स्वरूप कैसे बने कि वह प्रभावी भी रहे और उसका दुरुपयोग भी न हो।


Date:07-09-18

आधार की अड़चन

संपादकीय

जब से सरकार ने ज्यादातर कामों के लिए आधार नंबर की अनिवार्यता पर जोर देना शुरू किया है, तब से ऐसी जगहों पर भी लोगों को मुश्किलें उठानी पड़ रही हैं, जहां अभी तक इसकी बाध्यता तय नहीं की गई है। हालत यह है कि अगर अभिभावक स्कूलों में अपने बच्चे का दाखिला कराने जाते हैं तो बिना आधार नंबर मुहैया कराए यह काम नहीं हो पाता है। दाखिले के लिए आधार नंबर की अनिवार्यता को स्कूलों ने अपनी ओर से लागू कर दिया। यूआइडीएआइ यानी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने बुधवार को स्कूलों के लिए जारी अपने ताजा निर्देश में कहा है कि आधार कार्ड न होने की वजह से किसी बच्चे को दाखिला देने से इनकार न करें। यह अवैध है और फिलहाल कानून के तहत ऐसा करने की इजाजत नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आधार कार्ड की वजह से किसी भी बच्चे को लाभ और उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जाए।

सवाल है कि स्कूलों ने किस वजह से एक ऐसे नियम को अनिवार्य बना दिया था, जिसके लिए सरकार या संबंधित महकमे की ओर से कोई बाध्यता तय नहीं की गई थी! सच यह है कि न केवल दाखिले के लिए, बल्कि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को किसी न किसी बहाने अनिवार्य रूप से अपना आधार नंबर मुहैया कराने की प्रक्रिया में डाल दिया गया है। यह किसी से छिपा नहीं है कि फिलहाल कानूनी तौर पर आधार का दायरा चाहे जो तय किया गया हो, लेकिन व्यवहार में बैंकों और स्कूलों से लेकर बहुत सारे ऐसे कामों में भी लोगों को आधार के बिना सुविधाएं मुहैया कराने से इनकार कर दिया जा रहा है, जहां अभी तक इसकी अनिवार्यता लागू नहीं हुई है। जबकि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना अभी बाकी है कि आधार की वैधता क्या है या इसकी अनिवार्यता और उपयोग की सीमा क्या होनी चाहिए !

अगर किन्हीं स्थितियों में सुप्रीम कोर्ट अपने अंतिम निर्णय में इसकी अनिवार्यता के पक्ष में फैसला दे भी देता है, तो चूंकि इसके दायरे में देश के सभी वैध नागरिक आएंगे, इसलिए आधार एक सतत चलने वाली प्रक्रिया होगी। फिर इस कार्ड का बनना एक प्रक्रिया से होकर गुजरता है और संभव है कि किसी व्यक्ति को कोई ऐसी जरूरत अचानक सामने आ जाए, जिसमें आधार की अनिवार्यता लागू हो। ऐसी स्थिति में प्राधिकरण या संबंधित संस्थान की ओर से क्या व्यवस्था की जाएगी? अभी जिन योजनाओं और सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ उठाने के लिए आधार को अनिवार्य घोषित कर दिया गया है, उसमें भी तकनीकी वजहों से बायोमेट्रिक पहचान से संबंधित मुश्किलें खड़ी हो रही हैं। ऐसी खबरें भी आती रहती हैं कि बायोमेट्रिक मिलान में दिक्कत होने की वजह से किसी व्यक्ति को योजना का लाभ नहीं मिल सका। इसके अलावा, आधार नंबर के सार्वजनिक होने और उसके जोखिम को लेकर अभी बहुत सारे सवालों का निराकरण नहीं हो पाया है और डाटा चोरी के खतरे के मामले या आधार नंबर के दुरुपयोग की आशंका बड़ी चिंता की वजहें बनी हुई हैं। जरूरत इस बात की है कि आधार के समूचे मामले पर जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आ जाता है, तब तक लोगों के सामने इसकी बाध्यता तय न की जाए।


Date:07-09-18

निजता का सम्मान

संपादकीय

सर्वोच्च न्यायालय ने आखिर समलैंगिकों की निजता का सम्मान करते हुए धारा तीन सौ सतहत्तर को समाप्त कर दिया है। पांच न्यायाधीशों के पीठ ने अपने फैसले में कहा कि यौन प्राथमिकता जैविक और प्राकृतिक है। अंतरंगता और निजता किसी का निजी चुनाव है, इसमें राज्य को दखल नहीं देना चाहिए। इस मामले में किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन है। धारा तीन सौ सतहत्तर इन अधिकारों का हनन करती थी। इस धारा को समाप्त करने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही थी। इसमें कई स्वयंसेवी संगठन और समलैंगिक लोग शामिल थे। तर्क दिया गया था कि ब्रिटिश शासन के दौरान बने इस कानून का अब कोई औचित्य नहीं है। दुनिया के बहुत सारे देश समलैंगिकता को मान्यता दे चुके हैं। पर हमारे यहां अब भी इस कानून के तहत दो समान लिंगी लोगों के परस्पर यौन संबंध बनाने, विवाह करने आदि पर चौदह साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान लागू था। इस कानून की वजह से समाज का नजरिया भी ऐसे लोगों के प्रति नहीं बदल पा रहा था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले पर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों को एतराज है। उनका तर्क है कि यह भारतीय समाज के अनुकूल नहीं है। इसलिए समाज के नजरिए में जल्दी बदलाव की बेशक संभावना क्षीण नजर आती हो, पर इससे समाज में समलैंगिकों की प्रताड़ना पर रोक अवश्य लग जाएगी।

कानून व्यक्ति, समाज और देश के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाए जाते हैं। इसलिए बदली परिस्थितियों के अनुसार उनमें संशोधन होते रहते हैं। हालांकि इन बदलावों को लेकर समाज और देश के सभी लोग सहमत और संतुष्ट हों, जरूरी नहीं। इसलिए अक्सर कानूनी बदलावों को लेकर विरोध के स्वर भी उभरते रहते हैं। पर जिस कानून से मानवीय अधिकारों का हनन होता हो, उसे सिर्फ समाज के कुछ लोगों के नजरिए के आधार पर बनाए रखना उचित नहीं होता। समलैंगिकता को उचित ठहराने से पहले ट्रांसजेंडर के मामले में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही फैसला दे चुका है। समाज में ट्रांसजेंडरों को लेकर भी अच्छा दृष्टिकोण नहीं था। उन्हें कानूनी रूप से बराबरी का हक भी नहीं प्राप्त था। वे उपहास के पात्र थे। उसी श्रेणी में गिने जाने वाले समलैंगिकों को भी समाज में हिकारत की नजर से देखा जाता है। उन्हें कानूनी स्वीकार्यता मिलने से एलजीबीटी कहे जाने वाले लोगों को अब सामान्य नागरिकों को प्राप्त सभी अधिकार मिल सकेंगे।

अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि समलैंगिकता मानसिक विकृति नहीं है। यह अपनी इच्छा से जीवन जीने का तरीका चुनना है। यों सामाजिक व्यवस्था में एक ही लिंग के दो लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते, यौन संबंध नहीं बना सकते। पर इस आधार पर लोगों को इस व्यवस्था को स्वीकार करने को मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर दो लोग स्वेच्छा से साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हें सिर्फ इस सामाजिक मान्यता के आधार पर नहीं रोका जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को स्वीकृति देकर एक तरह से समाज के संकीर्ण नजरिए को बदलने की दिशा में भी सराहनीय कदम बढ़ाया है। जब समलैंगिक लोग सहजता से समाज में रह सकेंगे, तो समाज का दृष्टिकोण भी उनके प्रति बदलेगा। अभी तक उन्हें जैसी यातना और हिकारत झेलनी पड़ती थी, हर समय कानून का भय सताता था, वह दूर होगा, तो सामाजिक समरसता में उनका योगदान भी बढ़ेगा।


Date:07-09-18

The Long Road to Equality

SC’s Section 377 verdict brings a belated but soaring moment. It’s a victory for individual and minority rights, underlines primacy of Constitution as a transformative document

Editorial

Section 377 IPC is irrational, indefensible and arbitrary,” the Supreme Court ruled on Thursday while striking down a law that had oppressed India’s LGBT community for more than 150 years. What consenting adults do in their bedrooms is no longer the business of the state. “The sexual orientation of each individual in the society must be protected on an even platform, for the right to privacy and the protection of sexual orientation lie at the core of the fundamental rights guaranteed by Articles 14, 15 and 21 of the Constitution,” the five-judge bench ruled. That, in itself, makes the verdict historic. But the judgment must also be celebrated for tying the issue of sexual freedom with questions of minority rights, the protection of which is essential in any system that calls itself a constitutional democracy. “Constitutional rights cannot be held hostage to majoritarian consensus and popular morality,” said the apex court.

While striking down Section 377, the five-judge bench delineated the law’s discriminatory character. “Section 377 IPC assumes the characteristic of unreasonableness, for it becomes a weapon in the hands of the majority to seclude, exploit and harass the LGBT community. It shrouds the lives of the LGBT community in criminality and constant fear mars their joy of life. They constantly face social prejudice, disdain and are subjected to the shame of being their very natural selves.”

The judgment then tries to locate homosexuality “as a matter of identity”. “Attitudes and mentality have to change to accept the distinct identity of individuals and respect them for who they are rather than compelling them to become who they are not,” the five-judge bench notes. It quotes scientific research to show that the behaviour is “as much ingrained, inherent and innate as heterosexuality”. In doing so, the bench makes a strong case for the rights of the individual. “The LGBT community possess the same human, fundamental and constitutional rights as other citizens do since these rights inhere in individuals as natural and human rights. Respect for individual choice is the very essence of liberty under law”.

Thursday’s verdict is in line with the apex court’s recent inclination to subject some of its past verdicts to scrutiny — this was most noticeable in last year’s ruling on the privacy issue. In fact, a major portion of that landmark verdict was devoted to Section 377. The court had weighed its 2013 ruling that resuscitated Section 377 against the Delhi High Court’s verdict of 2009 that decriminalised homosexuality and had come out in support of the latter. “Discrimination against an individual on the basis of sexual orientation is deeply offensive to the dignity and self-worth of the individual,” it said.

In a fundamental sense, the verdict that reads down the colonial-era law is an affirmation of the principles that underlay the privacy verdict. “The mere fact that the percentage of population whose fundamental right to privacy is being abridged by the existence of Section 377 in its present form is low does not impose a limitation upon this Court from protecting the fundamental rights of those who are so affected by this Section,” the court has said.

Its words, “The constitutional framers could have never intended that the protection of fundamental rights was only for the majority population,” while intended as a critique of its 2013 judgment, have resonance beyond this case. In fact, the court notes that the “struggles of citizens belonging to sexual minorities is the struggle against various forms of social subordination. This includes various forms of transgression such as inter-caste and inter-community relationships, which are sought to be curbed by society. What links LGBT individuals to couples who love across caste and community lines is the fact that both are exercising their right to love at enormous personal risk and in the process disrupting existing lines of social authority”.

The battle against Section 377 has politicised generations of activists, influenced popular culture, sparked public discussion and debates — within the LGBT community as well — and raised awareness around sexuality and gender-related issues. Thursday’s verdict acknowledges this socio-political context: “The challenge to Section 377 has to be understood from the perspective of a rights discourse. While doing so, it becomes necessary to understand the constitutional source from which the claim emerges. When a right is claimed to be constitutionally protected, it is but necessary for the court to analyse the basis of that assertion”.

The richness of the verdict lies in the way the five judges link their understanding of the discriminatory nature of Section 377 with the role of the Constitution as “a transformative document”. “Our Constitution is a living and organic document capable of expansion with the changing needs and demands of the society”. The verdict calls upon courts to “act as sentinel on qui vive for guarding the rights of all individuals”. CJI Dipak Misra, introduced the verdict with a call to “vanish, prejudice and embrace inclusion and ensure equal rights”. The judiciary has, time and again, proved it is up to the task. In the case of Section 377, it has been supported enthusiastically by civil society, more reluctantly by the political class, to deliver a much belated but historic reform.


Date:07-09-18

The Right to Love

The Supreme Court ruling on Section 377 furthers the frontiers of personal freedom

EDITORIAL

The stirring message from the Supreme Court’s landmark judgment decriminalising gay sex is that social morality cannot trump constitutional morality. It is a reaffirmation of the right to love. In a 5-0 verdict, a Constitution Bench has corrected the flagrant judicial error committed by a two-member Bench in Suresh Kumar Koushal (2013), in overturning a reasoned judgment of the Delhi High Court reading down Section 377 of the IPC. The 2013 decision meant that the LGBTQ community’s belatedly recognised right to equal protection of the law was withdrawn on specious grounds: that there was nothing wrong in the law treating people having sex “against the order of nature” differently from those who abide by “nature”, and that it was up to Parliament to act if it wanted to change the law against unnatural sex. The court has overruled Koushal and upheld homosexuals’ right to have intimate relations with people of their choice, their inherent right to privacy and dignity and the freedom to live without fear. The outcome was not unexpected. When the courts considered Section 377 earlier, the litigation was initiated by voluntary organisations. When those affected by the 2013 verdict approached the Supreme Court, it was referred to a larger Bench to reconsider Koushal.

In the intervening years, two landmark judgments took forward the law on sexual orientation and privacy and formed the jurisprudential basis for the latest judgment. In National Legal Services Authority (2014), a case concerning the rights of transgender people, the court ruled that there could be no discrimination on the basis of sexual orientation and gender identity. In Justice K.S. Puttaswamy (2017), or the ‘privacy case’, a nine-judge Bench ruled that sexual orientation is a facet of privacy, and constitutionally protected. Chief Justice of India Dipak Misra’s opinion lays emphasis on transformative constitutionalism, that is, treating the Constitution as a dynamic document that progressively realises various rights. In particular, he invokes the doctrine of non-retrogression, which means that once a right is recognised, it cannot be reversed. Taken together, the four opinions have furthered the frontiers of personal freedom and liberated the idea of individual rights from the pressure of public opinion. Constitutional morality trumps any imposition of a particular view of social morality, says Justice R.H. Nariman, while Justice D.Y. Chandrachud underscores the “unbridgeable divide” between the moral values on which Section 377 is based and the values of the Constitution. Justice Indu Malhotra strikes a poignant note when she says history owes an apology to the LGBTQ community for the delay in providing the redress. The dilution of Section 377 marks a welcome departure from centuries of heteronormative thinking. This is a verdict that will, to borrow a phrase from Justice Chandrachud, help sexual minorities ‘confront the closet’ and realise their rights.

News Clipping on 07-09-2018

Date:07-09-18

Step Out Fearless

Homosexuality is no crime. From fearing state and society, gays now have law on their side

Editorial

Supreme Court has consigned over 150 years of discrimination against the LGBT community, wrought by enactment of the Indian Penal Code in 1860, to the annals of history. Section 377 IPC, that denied India’s homosexual citizens the right to pursue their sexual orientation, applies no more to consensual sexual behaviour. In restoring their rights to equality before law, personal liberty, privacy and life with dignity – all fundamental rights guaranteed to an Indian citizen which should have been theirs from birth – a grave constitutional wrong that questioned the Republic’s commitment to minority rights stands corrected. The next logical step would be to recognise gay marriage.

Supreme Court (SC) has also ejected from its precedents the problematic verdict of December 2013 that recriminalised homosexuality and its observations about “so-called rights of LGBTs” who constituted “a miniscule fraction of the country’s population.” This had stoked much unease over law giving precedence to social mores over constitutional morality. But subsequent judgments including the historic Right to Privacy verdict and the present one have conclusively rejected the state’s right to police bedrooms or deny constitutional rights to a minority.

From Justice Chandrachud beginning his judgment by noting “The lethargy of the law is manifest yet again” to Justice Nariman concluding that “it is clear that Articles 14, 15, 19 and 21 have all been transgressed without any legitimate state rationale to uphold such provision”, SC’s focus on individual rights promises to bridge the gap between constitutional aspirations and ground realities. After all, current Indian politics is predisposed towards religion and caste – or more broadly towards large collectives having strength of numbers. This is where a judiciary committed to democracy and constitutional values is the last resort for harried citizens.

Recall how in reuniting Hadiya with her husband or quashing bans against Padmaavat, SC faced down majoritarian impulses. For similar reasons, successive governments shrunk away from amending 377. Before SC recognised privacy as a fundamental right, government stood in opposition, regarding it as an abstract concept. After helping demolish 377 and more cases like Aadhaar and adultery awaiting their turn, the privacy judgment may just have begun impacting our lives in concrete ways. What Supreme Court does in the realm of safeguarding individual liberties must shine like a beacon for lower courts to replicate. The defence of a person’s rights – even when you disagree with that person – keeps democracy, dissent and diversity alive.


Date:07-09-18

Historic And Necessary

By decriminalising gays, SC ushers in new dawn for an inclusive society and country

Alok Prasanna Kumar and Arghya Sengupta, ( Arghya Sengupta is Research Director and Alok Prasanna Kumar is Senior Resident Fellow at Vidhi Centre for Legal Policy.)

The Constitution Bench of the Supreme Court of India has undone an enormous injustice to members of the lesbian, gay, bisexual and transgender (LGBT) community in its judgment delivered in Navtej Johar vs Union of India. It has undone not just Section 377 of the Indian Penal Code insofar as it decriminalised homosexual acts between consenting adults, but also its own judgment in Suresh Kumar Koushal vs Naz Foundation. It is an important judgment not just for the expansion for civil liberties and gay rights in India, but also for the court to recognise that, as an institution, it failed terribly in delivering the kind of judgment that it did in Suresh Koushal.

The court’s institutional faults were many – first and foremost in being unconcerned with issues of standing when it permitted total third parties to approach it challenging the Delhi high court’s judgment in Naz Foundation vs NCT of Delhi which had read down Section 377. It is one thing for the court to permit third parties to act in public interest without standing in rare case – it is another to not even attempt to address what was the important question of public interest that would permit the parties to use the courts to try and overturn progressive and historic judgments.

A second fault was in the fact that the court did not think the issues were worthy of serious constitutional debate. An issue of such far reaching impli-cations was dealt with by a bench of only two judges who failed to see the full implications and impact of the case, whether or not they agreed with the petitioner. Even at the first instance, the Supreme Court should have ensured that the matter was heard by a constitution bench of no fewer than five judges (as the Constitution demands) and its failure to do so is an indictment of the legitimacy of Koushal. The final fault was in the judgment itself. The words “minuscule fraction” and “so-called rights” stung.

It may have been aimed purely at members of the LGBT community, but it spoke of a court that was distinctly and deeply out of touch with the larger changes in society and greater tolerance for diversity. These were words that tomorrow could be turned on any minority for any reason if the circumstances permitted. They go to the heart of what the court is supposed to do – protect exactly such minorities from the whims of the majority. In saying what it did, the Supreme Court told us (and not just the LGBT community) that it didn’t care enough to do its job. Thankfully, the Supreme Court has done exactly what was expected of it in Navtej Johar. While ostensibly concerned only with the reading down of Section 377, it has gone further than expected in handling the matter with the utmost sensitivity and care that it deserved.

Whether in the atmosphere at the hearings or in the nuanced reading of gay rights that we get in the judgments, Navtej Johar is a universe away from the narrow minded and straitened judgment in Koushal. As historic and necessary as this judgment is, we must not lose sight of the fact that all it does is restore gay rights in India only to the situation it was in 2013 before Koushal was delivered. There is still a much greater task before the court, not just in the context of gay rights but in the larger context of building an inclusive and diverse nation that fulfils the vision of the framers of the Constitution.

For, in as much as the Johar judgment is about gay rights, it has the potential of fundamentally re-shaping the jurisprudence around equality in India. As important as it is to affirm autonomy and push back against arbitrary laws, the Supreme Court’s judgment could potentially give new meaning to the notion of equal protection of laws, protecting not just the LGBT community but potentially every minority in a “country of minorities.” The coming years could herald the dawn of a bold era for constitutional courts in India giving greater and richer meaning to equality under the Constitution. We only hope that the Supreme Court proves equal to the task.


Date:07-09-18

2+2 Dialogue Makes Own R&D Imperative

ET Editorials

The India-US 2+2 Ministerial Dialogue is an important development that upgrades bilateral ties. India is the third country, after Japan and Australia, to have such a ministerial engagement with the US. This upgrade in US ties, however, is not at the expense of India’s independent foreign policy and strategic engagement with the world. This is evident from the US’ acceptance of India’s defence ties with Russia and trade engagements with Iran. India-US bilateral ties have been on the ascendant for more than a decade now, beginning with the efforts made by the Vajpayee government and the Indo-US nuclear deal of 2008.

Nonetheless, the 2+2 Ministerial Dialogue marks an important milestone. It provides a platform for both countries to discuss issues of strategic importance and allows for synergy in their diplomatic and security efforts. Strengthening of defence ties is among the pillars of this strategic engagement — India’s designation as a Major Defence Partner creates the opportunity for better defence and security coordination and cooperation. It allows for an expansion in the two-way trade in defence items and defence manufacturing supply linkages.

The signing of a Communications Compatibility and Security Agreement (Comcasa) enhances the interoperability between the militaries and military systems of the two countries. Expansion of counterterrorism cooperation and the naming of Pakistan-based terror outfits are welcome.Such expanded cooperation with the US and interoperability with their weapons systems makes it mandatory for India to step up its R&D efforts in defence technologies.To be a passive recipient of oodles of one variety of defence tech is to lose the capacity to handle other kinds, making for dependence.


Date:07-09-18

Good Riddance To Colonial Rubbish

ET Editorials

We welcome the unanimous verdict of a five-member Constitution bench of the Supreme Court, articulated through four separate judgments, however, that homosexuality is not a crime but a natural state that society must respect as part of the right to liberty and to live with dignity guaranteed by the Constitution. This removes the legal hurdle to large numbers of Indians who belong to the Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender and Queer (LGBTQ) community to seeking a life of equality with other members of society.

However, social mores do not change, merely because the law has expunged an aberrant portion from its body. For that, the state must be prepared to fully enforce the judgment, as conservative elements oppose change to social norms relating to sexuality. “We would have appreciated a categorical statement of position by the government, setting out its views on the validity of Section 377,” says Justice Chandrachud in his judgment. That would have been ideal. But the government did the next best thing, leave it to the court to decide, without opposing decriminalisation of consensual sex between adults, whatever its nature. Its pragmatism is explained by the observation of the ruling party’s ideological parent, the RSS, following the verdict, that homosexuality is not natural.

Nor have political parties come forward to welcome the judgment, except for Congress and the Left. The reluctance of the political class to confront social conservatism in defence of liberty and equality points to the tough battle ahead for the LGBTQ community to translate their release from criminality into celebration of life on par with heterosexual men and women. In fact, there is reason to celebrate the judgment as one more step forward in the national project of shedding the Victorian shroud of prudery that colonialism had forced on a culture that had produced the Kamasutra and the commingling of stone and sensuality at Khajuraho. That makes it all the more ironic that Justice Indu Malhotra should quote the current British premier to justify reading down Section 377.


Date:07-09-18

सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक पहल और अनुदार समाज

संपादकीय

देश की सर्वोच्च अदालत ने आखिर समलैंगिकता के संदर्भ में एक ऐतिहासिक और उदार निर्णय दे ही दिया, जिसका एलजीबीटी ही नहीं उदारवादी लोकतांत्रिक समाज को लंबे समय से इंतजार था। इसके बावजूद सवाल यह है कि औपनिवेशिक गुलामी में बुरी तरह जकड़ा और उसी संदर्भ में अपने अतीत की व्याख्या करने पर आमादा समाज क्या उसे दिल से स्वीकार कर पाएगा? भारतीय दंड संहिता की धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की खंडपीठ ने इस फैसले में न सिर्फ अपने ही 2013 के फैसले को पलट दिया है बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के निर्णय को भी स्वीकार कर लिया है।

अदालत ने दो वयस्कों के बीच होने वाले यौन संबंध को अपराध बताने वाली आईपीसी की धारा से बाहर निकालते हुए जो सिद्धांत प्रतिपादित किए हैं उनकी व्याख्या गहरी और दूर तक जाने वाली है। जरूरत इस समाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं को उसे समझने की है। अदालत का कहना है कि व्यक्तिगत आज़ादी महत्वपूर्ण है और यौन अर्थ में भी अलग रुझान का सम्मान होना चाहिए। उससे भी बड़ी बात जो आज के समय के लिए ज्यादा मौजूं है वो यह कि बहुसंख्यकों की नैतिकता को संविधान पर थोपा नहीं जाना चाहिए। अदालत ने इस मामले में न सिर्फ संविधान में वर्णित निजता और समानता के अधिकार की नई व्याख्या की है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य कल्याण अधिनियम को भी इस संदर्भ से जोड़ा है। निर्णय में साफ कहा गया है कि समलैंगिकता कोई मनोरोग नहीं है।

दुर्भाग्य से समाज का बड़ा हिस्सा और उसका सांस्कृतिक विमर्श इसी दृष्टिकोण से बंधा हुआ है। विडंबना देखिए कि 1860 में लार्ड मैकाले द्वारा लाए गए आईपीसी के कानून की इस धारा को हटाने में भारतीय समाज को 158 साल लग गए। जबकि यह कानून विक्टोरियाई युग के मूल्यों के आधार पर लाया गया था जिसका मकसद भारतीय समाज को एक तरह की पुरुषवादी मानसिकता में जकड़ना था। हकीकत में भारतीय समाज इतनी विविधता वाला रहा है कि उसने कभी यौन रुझानों के आधार पर समाज में दंड का प्रावधान नहीं किया था। इसलिए अपनी हकीकत को भूल कर औपनिवेशिक मूल्यों में जीने वाले भारतीय समाज के लिए सुप्रीम कोर्ट के इस उदार और प्रगतिशील फैसले को स्वीकार करके उसके मुताबिक आज़ादी का अर्थ समझने की चुनौती है।


Date:07-09-18

शिक्षा की तस्वीर संवारने के जतन

प्रकाश जावडेकर, (लेखक मानव संसाधन विकास मंत्री हैं)

प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों को मिलने वाले ज्ञान यानी लर्निंग आउटकम की बात तो खूब होती थी, लेकिन उसकी व्याख्या कभी नहीं हो पाई। हमारी सरकार ने यह काम किया है। लर्निंग आउटकम की व्याख्या करने से यह सुनिश्चित हो गया कि अब हर कक्षा में हर विषय में क्या ज्ञान छात्रों को होना ही चाहिए। एनसीईआरटी ने लर्निंग आउटकम तैयार कर उसे लगभग 40 लाख शिक्षकों तक पहुंचाया और उन्हें प्रशिक्षित किया, ताकि वे अपनी-अपनी भाषा में लर्निंग आउटकम सुनिश्चित कर पाएं। इसके तहत छात्र, विद्यालय और अभिभावक की भी जिम्मेदारी सुनिश्चित होगी। जब 25 राज्यों ने पहली से आठवीं तक परीक्षा की मांग की और प्रथम प्रयास में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्र को दोबारा अवसर देने का नियम बनाया, तो नो डिटेंशन नीति में परिवर्तन किया गया। यह बिल लोकसभा में सर्वसम्मति से पारित हुआ और अभी राज्यसभा में अनुमोदन के लिए लंबित है।

हमारी सरकार का मानना है कि शिक्षक जितना सुयोग्य होता है, शिक्षा उतनी ही सार्थक होती है। हम जब सरकार में आए, तब देश में 15 लाख शिक्षक ऐसे थे, जो 5वीं कक्षा तक के छात्रों को पढ़ा रहे थे, परंतु वे केवल 12वीं पास थे और उन्होंने डिप्लोमा या प्रशिक्षण हासिल नहीं किया हुआ था। करीब 8-10 वर्षों से यह समस्या चल रही थी। इसे देखते हुए प्रधानमंत्री की पहल पर कैबिनेट में यह प्रस्ताव लाया गया कि ऐसे शिक्षकों को दो साल का एक्सटेंशन देंगे और इस अवधि में इन सभी शिक्षकों को प्रशिक्षित करेंगे। हमने शिक्षकों को ऑनलाइन और टीवी पर ऑफलाइन चैनल्स के माध्यम से विभिन्न् भाषाओं में डिप्लोमा इन एजुकेशन करने की अपील करते हुए कहा कि आपको सरकार ने दो साल का जो एक्सटेंशन दिया है, उसी में आपको प्रशिक्षण प्राप्त करना है। इसके बाद 14 लाख शिक्षकों ने इसके लिए रजिस्टर किया। आज वे सभी पढ़ा रहे हैं। हमारा मानना है कि ये शिक्षक जितने सुयोग्य होंगे, उतना ही सुधार हमारी शिक्षा व्यवस्था में होगा। हमारे जो शिक्षक कुछ अलग करते हुए समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, उनका सम्मान होना चाहिए।

इसके लिए हमने जैसे ‘पद्म पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में बदलाव किए, वैसे ही शिक्षक पुरस्कार चयन प्रक्रिया में भी बदलाव किया। इसके लिए आवेदन ऑनलाइन भेजे गए। जिन शिक्षकों ने नए-नए उत्कृष्ट प्रयास किए, उन्हें पुरस्कार के लिए चयनित किया गया। इस बार 45 ऐसे शिक्षकों का सम्मान हुआ। विद्यालयों में सर्व शिक्षा अभियान पहले से जारी था। यह 25 साल चला। अब समग्र शिक्षा कार्यक्रम शुरू हुआ है। प्री-स्कूल से 12वीं तक पूरी शिक्षा पर एक समग्रता से विचार हो सके, इसलिए इसका नाम समग्र शिक्षा रखा गया। इसमें तीन बड़ी पहल की गई हैं। पहली, सभी 15 लाख सरकारी स्कूलों में लाइब्रेरी होगी और प्रत्येक लाइब्रेरी को 5 से 20 हजार रुपए का अनुदान हर साल मिलेगा। दूसरी, ‘खेले इंडिया, खिले इंडिया के तहत हर स्कूल को हर साल 5 से 20 हजार तक का अनुदान खेलकूद सामग्री के लिए दिया जाएगा। दरअसल एक बार प्रधानमंत्री ने दिल्ली के एक कार्यक्रम में छात्रों से यह पूछा था कि यहां कितने छात्र हैं, जिन्हें दिन में तीन बार पसीना आता है, तो वहां एकत्र छात्रों में से एक ने भी हाथ ऊपर नहीं किया। तब उन्होंने कहा था कि खेलकूद भी अध्ययन का एक महत्वपूर्ण भाग होता है। खेलकूद को बढ़ावा देने का कार्यक्रम प्रधानमंत्री की इसी सोच का परिणाम है।

तीसरी पहल हर गरीब छात्र को अच्छी शिक्षा देने की है। देश में गरीबी के कारण किसी को भी शिक्षा से वंचित नहीं होना पड़े, इसके लिए खासकर उच्च शिक्षा में जहां फीस का भार होता है, वहां शिक्षा के लिए कर्ज के ब्याज का भुगतान सरकार करती है। संप्रग सरकार के जमाने में यह राशि 800 करोड़ रुपए सालाना होती थी। पिछले तीन वर्षों में इसे बढ़ाकर 1800 करोड़ रुपए सालाना कर दिया गया है। करीब आठ लाख विद्यार्थियों को इससे फायदा हो रहा है। आने वाले तीन साल में इस मद में हर साल 2200 करोड़ रुपए व्यय करने का लक्ष्य है। इसके लिए 6600 करोड़ रुपए अलग से व्यवस्था की गई। इसका फायदा 10 लाख ऐसे गरीब छात्रों को मिलेगा। इन्हें शिक्षा ऋण का ब्याज नहीं देना पड़ेगा। इस ब्याज का वहन सरकार करेगी। इस पहल का एक उद्देश्य समाज में समानता लाना भी है।

सरकार की एक बड़ी पहल स्वायत्तता को लेकर भी है। हमने संसद में एक बिल लाकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट को शैक्षिक स्वतंत्रता दी। इसके पीछे विचार यह है कि सरकार के प्रतिनिधियों द्वारा संस्थान के क्रियाकलापों में दखलंदाजी के बजाय उसी संस्थान के पूर्व छात्रों को इसका दायित्व दिया जाए। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की स्वायत्तता की कल्पना को सबने स्वीकार किया। इसी क्रम में हमने ग्रेडेड स्वायत्तता की अवधारणा को मूर्त रूप दिया है। इसके तहत अब लगभग 70 विश्वविद्यालय, जिन्होंने गुणवत्ता के साथ विकास किया है, उन्हें इस आधार पर विस्तार और व्यवस्था के लिए बार-बार अनुमति लेने के लिए सरकार के पास नहीं आना पड़ेगा।

दो और पहल भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। चूंकि टेक्नोलॉजी के उपयोग पर प्रधानमंत्री जी का हमेशा जोर रहता है, इसलिए बजट में ऑपरेशन डिजिटल बोर्ड की घोषणा की गई। इसके तहत नौवीं से पोस्ट ग्रेजुएट तक देशभर की 15 लाख कक्षाओं में अगले चार वर्षों में डिजिटल बोर्ड लगेंगे। इससे शिक्षा रुचिकर और सार्थक होगी। इससे कक्षाओं में चर्चाएं अधिक गहन-गंभीर भी होंगी। यह एक ऐसा प्रयास है, जिससे छात्रों को विषय समझने में ज्यादा आसानी होगी। डिजिटल बोर्ड लगाने का खाका तैयार कर हम जल्द ही उसका शुभारंभ करने जा रहे हैं। सरकार द्वारा ‘स्वयं प्लेटफार्म पर जो ऑनलाइन कोर्स शुरू किया गया था, उसका 23 लाख से अधिक छात्र लाभ ले रहे हैं। इस पर एक हजार से अधिक पाठ्यक्रम शुरू हो गए हैं। सभी जानते हैं कि देश आगे तभी बढ़ेगा, जब वह नित नए शोध और अनुसंधान करेगा।

चूंकि नवरचना के बिना कोई राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता, इसलिए हमारी सरकार ने छह आईआईटी संस्थानों में रिसर्च पार्क की स्थापना की। इसका उद्देश्य स्टार्टअप कल्चर को कैंम्पस में न केवल अनुमति, बल्कि प्रोत्साहन देना है। इसके लिए इनक्यूबेशन केंद्रों की शुरुआत की गई है। इसी तरह उच्चतर आविष्कार योजना के तहत शिक्षक और छात्र साथ-साथ काम कर रहे हैं। देश के जो मेधावी छात्र विदेश जाकर शोध करते हैं, वे यहीं देश में रुकें, इसके लिए प्राइम मिनिस्टर रिसर्च फेलोशिप शुरू की गई है। इस वर्ष इसके तहत 135 छात्रों का चयन किया गया है। इन सभी को प्रतिमाह एक लाख रुपए की सहायता मिलेगी। इसके अलावा स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन की अनूठी प्रक्रिया भी हमारी सरकार की एक उपलब्धि है। इसके तहत 40 हजार छात्रों ने पहले वर्ष में और दूसरे वर्ष में एक लाख छात्रों ने सहभागिता की। इन सभी छात्रों ने तीन महीने अध्ययन और मेहनत करके अनेक समस्याओं का उपाय सुझाया। प्रधानमंत्री ने भी इनका उत्साहवर्द्धन करते हुए फाइनल राउंड में उनके साथ संवाद किया। ये तमाम पहल देश में शिक्षा जगत की तस्वीर बदलने की व्यापक सोच का परिणाम हैं।


Date:07-09-18

बड़े असर वाला फैसला

संपादकीय

देश, काल और परिस्थितियां बदलने पर किस तरह मूल्य-मान्यताएं और नियम-कानून भी बदल जाते है, इसका ही उदाहरण है समलैंगिकता पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। इस फैसले का असर भारत ही नहीं, भारत के बाहर उन तमाम देशों पर भी पड़ेगा जो भारतीय लोकतंत्र से प्रेरित होते है और जहां समलैंगिकता को अपराध माना जाता है। स्पष्ट है कि यह बड़े असर वाला एक बड़ा फैसला है। ऐसा कोई फैसला समय की मांग थी, क्योंकि इस धारणा का कोई औचित्य-आधार नहीं कि समलैंगिकता किसी तरह की विकृति है अथवा भिन्न यौन व्यवहार वाले कमतर नागरिक है। यह फैसला समलैंगिकों के साथ-साथ भिन्न यौन अभिरुचि वाले अन्य लोगों के लिए भी एक बड़ी राहत लेकर आया है। यह फैसला इसलिए भी उल्लेखनीय है कि जिस सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस अंश को रद्द किया जो बालिगों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित करती थी उसी ने 2013 में ऐसा करने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया था कि यह काम तो संसद का है।

इतना ही नहीं, उसने इस फैसले पर पुनर्विचार याचिका को भी खारिज कर दिया था। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से 2009 में दिए गए उस फैसले को पलटने का काम किया था जिसमें धारा 377 को असंवैधानिक करार दिया गया था। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भूल सुधार करते हुए वही फैसला दिया जो दिल्ली उच्च न्यायालय ने नौ साल पहले ही दे दिया था। इस बीच संसद धारा 377 में संशोधन-परिवर्तन करने का काम कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि मोदी सरकार ने इस मसले पर अपनी राय न देकर एक तरह से यही इंगित किया था कि समलैंगिकता के अपराध न रहने से उसे हर्ज नहीं। क्या वे प्रगतिशील लोग इस पर गौर करेंगे कि ऐसे संकेत उस भाजपा की सरकार ने दिए जो उनकी निगाह में पुरातन विचारों वाली पार्टी है?

यह सहज ही समझा जा सकता है कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने भिन्न यौन अभिरुचि वालों को सम्मान से जीवन जीने के अधिकार के तहत समलैंगिकता को अपराध के दायरे से मुक्त करने के साथ धारा 377 को पूरी तौर पर खारिज नहीं किया तो इसके पर्याप्त कारण है। इस धारा के वे अंश प्रभावी बने रहने आवश्यक थे जो नाबालिगों से समलैगिक संबंध को अपराध की श्रेणी में रखते है। नाबालिगों को यौन शोषण से बचाने के लिए यह सतर्कता बरतनी जरूरी थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को मान्यता प्रदान कर भारतीय समाज को यही संदेश दिया कि भिन्न यौन अभिरुचि वाले भी आदर और सम्मान से जीने के अधिकारी है, लेकिन समाज के उस हिस्से की धारणा बदलने में कुछ समय लगेगा जो अलग यौन व्यवहार वालों को अपने से इतर और अस्वाभाविक मानता चला आ रहा है। ऐसी सोच रखने वालों को यह समझना होगा कि अलग यौन व्यवहार वाले भी मनुष्य है और उन्हें अपनी पंसद के हिसाब से अपना जीवन जीने का अधिकार है। ऐसी स्वस्थ समझ को बल मिलना ही चाहिए।


Date:07-09-18

समलैंगिकता और पूर्वग्रह

संपादकीय

सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों के संवैधानिक पीठ ने गुरुवार को समलैंगिक संबंधों को कानूनी दर्जा दे दिया। इसे लेकर अत्यधिक उत्साहित होने वालों को थोड़ा ठहरकर हकीकत का इंतजार करना चाहिए। भारतीय दंड संहिता के इस 157 वर्ष पुराने प्रावधान को खत्म करना समलैंगिक समुदाय के लिए व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और मजबूत कानूनी संरक्षण हासिल करने की दिशा में पहला लेकिन छोटा कदम है। हमने बार-बार देखा है कि हमारे देश में कानूनी पहल से सामाजिक सुधारों को सामाजिक मान्यता प्राय: नहीं मिलती है। ध्यान रहे कि अतीत में कई प्रमुख राजनेता खुलकर समलैंगिकता के विरुद्ध बोल चुके हैं। काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कानूनी और राजनीतिक प्रतिष्ठान तथा सुरक्षा तंत्र नए कानून को कितनी तेजी से लागू करते हैं।

समलैंगिक अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को सबसे पहले आगे की चुनौती को समझना होगा। यह बहस दशकों पुरानी है। इस कवायद में पुलिस को शिक्षित करना भी शामिल है जो समलैंगिक जोड़ों को दंडित करने के लिए कुख्यात रही है। दूसरी तात्कालिक जरूरत होगी विवाह कानूनों में संशोधन करके समलैंगिक विवाह को उनमें स्थान देना। यहां यह याद रखना होगा कि अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने महज तीन वर्ष पहले अपने ऐतिहासिक निर्णय के जरिये ऐसे विवाहों को कानूनी मान्यता प्रदान की। जबकि यह मामला अमेरिका में एक दशक से अधिक समय से सरगर्म था। भारतीय अदालतों ने मूलभूत मानवाधिकारों की रक्षा में कोई खास तेजी नहीं दिखाई है। ऐसा लगता नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी वे समलैंगिक अधिकारों के प्रवर्तन में कोई तेजी दिखाएंगी।

ध्यान रहे कि प्रधानमंत्री तो छोडि़ए किसी भी बड़े राजनेता ने सार्वजनिक रूप से इस विषय पर जुबान नहीं खोली है। उनको भय है कि ऐसा करने से समाज का रूढि़वादी तबका नाराज हो जाएगा। यह वही तबका है जिसने दो दशक पहले दीपा मेहता की फिल्म ‘फायर’ का विरोध किया था। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि सत्ताधारी दल के किसी राजनेता ने गुरुवार के निर्णय पर कोई टिप्पणी नहीं की है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस अंतिम याचिका पर आया है और इसने सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के निर्णय को पलट दिया है। 2013 के निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के निर्णय को पलटा गया था। गुरुवार के निर्णय का महत्त्व केवल समलैंगिकता को अपराध न मानने से कहीं परे है। पीठ ने जो कहा है उसे व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। पहली बात तो यह कि समलैंगिकता को एक प्राकृतिक जीवविज्ञान संबंधी अवधारणा के रूप में देखना होगा, न कि मानसिक विकृति के रूप में। समलैंगिक को अल्पसंख्यक के रूप में देखने की भी जरूरत नहीं है जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय में कहा गया था।

अदालत ने कहा कि इसके आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यानी उनके मूल अधिकार अक्षुण्ण हैं। उसने व्यक्तिगत चयन और निजता के अधिकार पर जोर दिया है। हमारी हालिया राजनीतिक बहस में इन दोनों का ह्रास हुआ है। यह निर्णय देश के कारोबारी जगत के लिए भी अवसर है कि वह कुछ प्रगतिशीलता दिखाए। वर्ष 2015 में करीब 379 अमेरिकी कंपनियां और पेशेवर संगठन (गूगल, ऐपल, गोल्डमैन सैक्स, मॉर्गन स्टैनली और वॉलमार्ट समेत) अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय में समलैंगिक विवाह की सुनवाई के वक्त ‘अदालती मित्र’ बने थे। उनका कहना था कि चूंकि वे समलैंगिक दंपतियों को लाभ नहीं पहुंचा सकते थे इसलिए तमाम प्रतिभाशाली लोग नौकरी से बाहर रह गए। भारतीय कंपनियों में असहिष्णुता का माहौल भी समलैंगिकों को सामने आने या रोजगार मांगने से रोकता है। भारतीय उद्यमी जगत सामाजिक सुधारों में शायद ही कभी रुचि दिखाता है। ऐसे में यह शुरुआत का अच्छा वक्त है।


Date:06-09-18

River And Stick

Draft bill that recommends punitive measures to clean Ganga is a climbdown from the Namami Gange project

Editorial

In May, Union Water Resources Minister Nitin Gadkari announced that the government will “try to ensure” a 70-80 per cent improvement in the Ganga’s water quality by March 2019. The water resources ministry, it seems, is now taking desperate, rather than sensible, measures to meet that deadline. If it has its way, a host of activities that impact the Ganga will be deemed illegal. These include construction activities that obstruct the river, withdrawal of groundwater for commercial or industrial purposes, commercial fishing and discharging of sewage into the the river. The ministry has drafted a bill which prescribes a slew of penal provisions — including fines and imprisonment — to curb these activities. The draft also envisages a Ganga Protection Corps “to arrest those who pollute the river”. Such reliance on punitive measures is a disturbing climbdown from the government’s Namami Gange project in more ways than one.

Namami Gange recognises that the key to reviving the river lies in a robust sewage infrastructure. The programme that took off two years ago ticked several boxes about the river’s ecology. It had projects to develop interceptor drains, plant trees and improve the river’s species composition. More importantly, the project accepted that its success hinged on the support of the people, whose activities impact the Ganga. In May, the Water Resources Minister talked of the government’s resolve to attain synergy between ecology and development. He also talked of plans to link the livelihood needs of local communities with efforts to clean the Ganga. This dovetailed with the Ministry’s project to create a cadre of village and town-level volunteers who would help panchayat, municipal and other local bodies to monitor the quality of the Ganga’s water.

There has been very little, however, by way of giving effect to these plans to ensure people’s participation. The Namami Gange website talks of awareness campaigns to curb pollution of the river. But it has nothing on the successes or failures of these projects. Namami Gange, in fact, has been dogged by the failing of other Ganga clean-up projects — the gap between intention and implementation. Till March, the water resources ministry had spent barely a fifth of the Rs 20,000 crore allocated for the project. In July, the National Green Tribunal pulled up the government for “tardy progress” on the Clean Ganga Mission. Even then, the government would do well to remember that it does have a lot of the basics in place. There is no reason for a law heavy on punitive measures to clean the Ganga.