News Clipping on 11-09-2018

Date:11-09-18

Man-made Devastation?

Kerala’s major dams filled up halfway through the monsoon, raising questions on dam management

TOI Editorials

A study for the water resources ministry, by a team from Central Water Commission, pointed out that many of Kerala’s major dams were filled to the brim even ahead of the torrential rain in August. This finding highlights again the state of dam management in India and its role in exacerbating the damage from floods. Kerala suffered devastation following extraordinary rainfall in the first three weeks of August. Floods were perhaps an inevitable outcome of this scale of precipitation. But what may not have been inevitable is the scale of devastation.

According to ecologist Madhav Gadgil, sensible dam management necessitated a gradual filling up of reservoirs as the monsoon progressed. In Kerala, halfway through the monsoon, the dams were filled to capacity. It rendered them ineffective in mitigating the impact of the August deluge. It speaks poorly of governance in India that questions about dam management arise every year when 164 of the 5,264 large dams are over a century old. Government has classified about 14% of India’s land area as flood prone. On average 7.169 million hectares are affected annually due to floods. This may be a recurring cycle. But repeating the same mistakes over and over again makes them doubly unacceptable.

Some of these mistakes have showed up in Kerala. Stone quarrying, some of it illegal, has led to siltation. Encroachment of floodplains and reclamation of wetlands have compounded the problem. During a performance audit of Tamil Nadu government’s role in mitigating the 2015 Chennai floods, CAG identified some of the standard mistakes. For example, allowing encroachments which shrunk storage capacity in Chennai is a governance failure – with devastating consequences – common to many states. With extreme weather events becoming more frequent, states need to ramp up governance standards. Else the scale of devastation can only get worse.


Date:11-09-18

केरल की बाढ़ में छिपे चेतावनी भरे संदेश

सुनीता नारायण

‘गॉड्स ओन कंट्री’ के नाम से मशहूर केरल पहाड़ों, नदियों, धान के खेतों और समुद्री तटों से भरा इलाका है। यहां पर प्राकृतिक सुंदरता की भरमार है। लेकिन यह खूबसूरत जगह उसी दुनिया में स्थित है जो हानिकारक रूप से गैर-संवहनीय है। इसकी वजह यह है कि यहां के लोगों ने पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया है और हमारी दुनिया की जलवायु को भी जोखिम में डाला जा चुका है। ऐसी स्थिति में वही होता है जो ‘भगवान के अपने देश’ में अगस्त के महीने में देखने को मिला। यह डूब गया था। उफनती नदियों और भूस्खलन ने इस राज्य में तबाही मचा दी। कहा जा रहा है कि इस बाढ़ ने केरल में इस कदर नुकसान पहुंचाया है कि एक तरह से समूचे राज्य का नए सिरे से निर्माण करना होगा।

गौर से विचार करें तो यही लगेगा कि केरल लंबे समय से इस तरह की आपदा का इंतजार कर रहा था। राज्य में छोटी-बड़ी 44 नदियां हैं जो पश्चिमी घाट से निकलती हैं और अमूमन 100 किलोमीटर से भी कम दूरी तय कर समुद्र में मिल जाती हैं। यह उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्र भी है जहां खूब बारिश होती है। इसका मतलब है कि राज्य में जलनिकासी का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। पश्चिमी घाट वाले उष्ण-कटिबंधीय वनाच्छादित पहाड़ी इलाके में मौजूद 61 बांध इस जलनिकासी पारिस्थितिकी का एक अंग हैं। मुख्यत: बिजली उत्पादन के लिए बनाए गए इन बांधों में मॉनसून के समय पानी जमा होता है और बारिश खत्म होने के बाद पानी को छोड़ा जाता है। लेकिन इस बार केरल में मूसलाधार बारिश हुई और 15-20 दिनों में ही 7.71 सेंटीमीटर बारिश हो गई। इसमें भी 75 फीसदी बारिश महज आठ दिनों में हुई। भारी बारिश के चलते ये बांध ही आपदा का सबब बन गए।

मूसलाधार बारिश होने से पहाड़ी इलाकों में चट्टानों के दरकने का सिलसिला शुरू हो गया जिसकी चपेट में आने से कई लोगों की मौत हो गई। चंद दिनों में ही भारी बारिश से जलाशयों में इतना पानी इकट्ठा हो गया कि उनके गेट खोलने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसा न करने पर बांधों की दीवारें टूटने का खतरा था। सबसे बड़े बांधों में से एक इडुक्की के गेट 26 साल बाद पहली बार और अब तक केवल तीसरी बार खोले गए। दरअसल मॉनसूनी बारिश के चलते जुलाई में ही बांधों के जलाशय काफी हद तक भर चुके थे। बारिश के वितरण में असंतुलन होने से बांध संचालकों ने जलाशयों में जमा पानी को छोडऩा भी मुनासिब नहीं समझा। उन्हें यह सूचना नहीं थी कि अगस्त में इतनी भारी बारिश होने वाली है। इसके अलावा उन्हें यह भी यकीन था कि बिजली पैदा करने के लिए जरूरी बारिश होगी और उनके जलाशय लबालब भर जाएंगे। इन वजहों से अगस्त की बारिश ने इस आपदा को कई गुना बढ़ा दिया। सच तो यह है कि मौसम प्रणाली में हो रहे बदलाव का सामना करने के लिए हमारे पास कोई योजना ही नहीं है। हम मॉनसून के प्रतिकूल एवं बदलावकारी चरित्र से निपटने के लिए तनिक भी तैयार नहीं हैं। लिहाजा हमें यह बात पूरी तरह साफ होनी चाहिए कि केरल की बाढ़ पूरी तरह मानव-निर्मित है।

यह त्रासदी वैश्विक उत्सर्जन पर काबू पाने में हमारी साझा नाकामी का नतीजा है। वैश्विक उत्सर्जन की वजह से अजीब मौसमी घटनाएं घट रही हैं। यह संसाधनों के हमारे कुप्रबंधन का नतीजा है। राज्य ने जंगली क्षेत्र से होकर धान के खेतों और वहां से तालाबों एवं नदियों तक जाने वाली जलप्रणाली को ध्वस्त कर दिया है। तालाबों एवं नदियों में अतिरिक्त पानी को इकट्ठा किया जा सकता था। यह हमारी तकनीकी एजेंसियों की अक्षमता भी है कि बाढ़ नियंत्रण और बांध प्रबंधन की सटीक योजना नहीं बनाई जा सकी। इस तरह यह त्रासदी मानव-निर्मित है। सबसे अहम बात यह है कि इसके मानव-निर्मित होने की वजह यह है कि हम इसे नया सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं। हम यह मानना चाहते हैं कि यह महज एक अनूठी और सौ साल में एक बार होने वाली घटना है जिससे निपटने के लिए कोई तैयारी नहीं की जा सकती है।

हमें सच को स्वीकार करना होगा, केवल शब्दों में ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी। केरल का एक तरह से पुनर्निर्माण होने जा रहा है। वह दोबारा वही गलती नहीं दोहरा सकता है। उसे मौसमी बारिश के इस नव-सामान्य पहलू (असमान वितरण एवं अत्यधिक बारिश) को ध्यान में रखते हुए नवनिर्माण करना होगा। लिहाजा केरल को हरेक नदी, नाले, तालाब, खेत और शहर से जल निकासी की समुचित योजना बनानी होगी और हरेक कीमत पर उनका संरक्षण करना होगा। प्रत्येक घर, संस्थान, गांव और शहर को वर्षाजल संचयन के लिए इंतजाम करना होगा ताकि बारिश के पानी को रास्ता दिखाया जा सके और उससे जलस्तर को भी बढ़ाया जा सके। वन पारिस्थितिकी का निर्माण इस तरह होना चाहिए कि लोगों को फायदा हो। जंगली इलाके में पौधरोपण इस तरह किया जाए कि मृदा संरक्षित रहे। लेकिन जलवायु परिवर्तन के जोखिम वाले दौर में इतना काफी नहीं होगा।

इस नव-सामान्य परिघटना में सरकारों को परिवर्तनशीलता के लिए भी योजना बनानी होगी। इसका मतलब है कि मौसम के सटीक पूर्वानुमान और उस सूचना से अवगत कराने के लिए सरकार को तकनीकी क्षमताएं बढ़ानी होंगी। केरल की बाढ़ के संदर्भ में देखें तो इसे भयंकर रूप लेने से तभी रोका जा सकता था जब जुलाई के पहले ही मॉनसून की भारी बारिश के बारे में जानकारी उपलब्ध होती। ऐसा होने पर बांधों में जमा पानी को छोड़ दिया जाता और जलाशयों की भंडारण क्षमता को भारी बारिश के लिए तैयार रखा जाता। सवाल है कि ऐसा किस तरह किया जा सकता है? अगली बाढ़ को इतना भयंकर रूप लेने से रोकने के लिए क्या करना होगा? जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मौसम वैज्ञानिकों से लेकर जल संसाधन एवं बाढ़ प्रबंधन से जुड़े तकनीकी संस्थानों के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यही है और हमें इसका जवाब तलाशना होगा। यह अब सामान्य स्थिति नहीं रह गई है। वह वक्त बीत चुका है और हमें इस बात को साफ-साफ समझ लेना होगा।


Date:10-09-18

फिर सिर उठाती जातिवादी राजनीति

इन दिनों आरक्षण की आड़ में तो जातिवादी राजनीति हो ही रही है, एससी-एसटी एक्ट के बहाने भी इसे हवा दी जा रही है।

संजय गुप्त

चार राज्यों के विधानसभा और उसके ठीक बाद लोकसभा चुनाव से पहले देश के विभिन्न् हिस्सों में जिस तरह जातिवादी राजनीति की आग सुलग उठी है, वह चिंताजनक भी है और भारतीय राजनीति के स्याह पक्ष को रेखांकित करने वाली भी। इस जातिवादी राजनीति से उत्तर भारत के कई राज्य झुलस रहे हैं। इन दिनों आरक्षण की आड़ में तो जातिवादी राजनीति हो ही रही है, एससी-एसटी एक्ट के बहाने भी इसे हवा दी जा रही है। अपने देश में जब भी चुनाव आते हैं तो जाति-पंथ से जुड़े मुद्दे किसी न किसी बहाने सतह पर आ ही जाते हैं। इन मुद्दों के जरिए ध्रुवीकरण की राजनीति की जाने लगती है। जब ऐसा होता है तो विकास के सवाल अपने आप पीछे छूट जाते हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अभी हाल में एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सड़कों पर उतरे सवर्ण समाज के विभिन्न् संगठनों ने आरक्षण को लेकर भी विरोध जताया। एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सड़कों पर उतरे लोग भले ही अलग-अलग संगठनों से जुड़े हों, लेकिन यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि उन्हें परदे के पीछे से राजनीतिक शह इसलिए दी जा रही थी, ताकि भाजपा के समक्ष मुश्किलें खड़ी की जा सकें। अभी तक अनुसूचित जाति, जनजाति या पिछड़े वर्ग के लोग ही जातीय हित के सवाल को लेकर धरना-प्रदर्शन किया करते थे, लेकिन अब इसी रास्ते पर सवर्ण वर्ग भी चलता दिख रहा है। इस वर्ग के लोग विभिन्न् राज्यों में जिस तरह सड़कों पर उतर आए, उससे तमाम राजनीतिक दल अपनी रणनीति बदलने के लिए विवश हो सकते हैं।

एक समय भाजपा पर यह आरोप लगता था कि वह अगड़ी जातियों की पार्टी है, लेकिन आज वह दलित समाज की चिंता करने को लेकर कठघरे में खड़ी की जा रही है। इसका कारण यह है कि केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय की ओर से एससी-एसटी एक्ट में किए गए आंशिक बदलाव को सही न मानते हुए उसके पुराने स्वरूप को बहाल करने का काम किया। एक तरह से मोदी सरकार को ऐसा करने के लिए विवश किया गया, क्योंकि विपक्ष ने यह शोर मचा दिया था कि उच्चतम न्यायालय ने एससी-एसटी एक्ट को बहुत कमजोर कर दिया है और इससे दलितों का उत्पीड़न करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही नहीं हो सकेगी। यह माहौल संकीर्ण राजनीतिक इरादे से बनाया गया। इससे बचा जाना चाहिए था, क्योंकि उच्चतम न्यायलय ने केवल यह आदेश दिया था कि एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपितों की गिरफ्तारी सक्षम पुलिस अधिकारी की जांच के बाद ही होगी। हालांकि यह फैसला न्यायालय का था, लेकिन विरोधी दलों ने ऐसी तस्वीर पेश की, जैसे यह सब मोदी सरकार ने किया हो। चूंकि इस मामले में गलत तस्वीर पेश की गई, इसलिए दलित समाज उद्वेलित हो उठा। इसका लाभ उठाकर भाजपा विरोधी अभियान छेड़ दिया गया। इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आयोजित भारत बंद के दौरान जमकर हिंसा हुई, जिसमें कई लोगों की जान गई।

हालांकि उस दौरान यह साफ था कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं और वह उसके खिलाफ अपील दायर करेगी, लेकिन बावजूद इसके विरोधी दल एससी-एसटी एक्ट को लेकर राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे। अपने वादे के अनुसार केंद्र सरकार ने संशोधन विधेयक लाकर एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में बहाल कर दिया। इसके विरोध में ही सवर्ण समाज के कुछ संगठनों ने बंद का आयोजन किया। उनका विरोध इसी बात को लेकर था कि इस एक्ट को पुराने स्वरूप में क्यों बहाल किया गया? यही सवाल अब एक याचिका की शक्ल में सुप्रीम कोर्ट के सामने है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एससी-एसटी एक्ट ही नहीं, आरक्षण से जुड़े कई मसले भी हैं। इन सब पर उसका फैसला कुछ भी हो, यह ध्यान रहे कि देश की आजादी के बाद वंचित-शोषित तबके को मुख्यधारा में लाने के लिए जब आरक्षण की पहल हुई, तब डॉ. भीमराव आंबेडकर के लिए इसका मतलब बैसाखी नहीं, सहारा था। वह इस मत के थे कि इसकी सतत समीक्षा होती रहे कि जिन्हें आरक्षण दिया जा रहा है, उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है या नहीं? वह आरक्षण व्यवस्था केवल दस वर्ष के लिए चाहते थे, लेकिन उसकी समयावधि लगातार बढ़ती गई। आज स्थिति है कि किसी भी राजनीतिक दल में यह साहस नहीं कि वह आरक्षण को चरणबद्ध ढंग से समाप्त करने की बात करना तो दूर रहा, उसकी समीक्षा करने अथवा उसे और अधिक न्यायसंगत बनाने की बात कर सके। यह एक यथार्थ है कि सवर्ण समाज की तुलना में अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग प्रगति की दौड़ में कहीं पीछे हैं। इन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए अभी काफी कुछ किया जाना शेष है, लेकिन इसके साथ ही इसकी भी आवश्यकता है कि जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलता चला आ रहा है और जिनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आ चुका है, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए। ऐसी कई जातियां अन्य पिछड़ा वर्गों में भी हैं और अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों में भी।

केंद्र सरकार सरकार ने ओबीसी आरक्षण के उप-वर्गीकरण की संभावना का पता लगाने के लिए जिस आयोग का गठन किया है, उसकी रपट जल्द ही आने वाली है। माना जा रहा है कि इस आयोग की रपट के बाद सरकार ओबीसी आरक्षण को तीन हिस्सों में वर्गीकृत करेगी और हर हिस्से में समान सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाली जातियां रखी जाएंगी। इससे उन जातियों को विशेष लाभ होगा, जो आरक्षण के दायरे में होते हुए भी उसका अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रही हैं। फिलहाल ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत है। एससी-एसटी आरक्षण मिलाकर कुल आरक्षण सीमा 49.5 प्रतिशत हो जाती है, लेकिन तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों में आरक्षण सीमा 69 प्रतिशत तक पहुंचा दी गई है। अन्य राज्य सरकारें भी आरक्षण सीमा बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। कई बार तो वे मनमाने ढंग से आरक्षण की मांग करने वाली जातियों को आरक्षण देने की घोषणा कर देती हैं। आमतौर पर आरक्षण के ऐसे फैसले न्यायपालिका की ओर से रद्द कर दिए जाते हैं, फिर भी इस या उस जाति को आरक्षण देने का सिलसिला कायम है।

आज जब विभिन्न् समर्थ जातियों की ओर से आरक्षण मांगा जा रहा है, तब इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि आर्थिक आधार पर भी आरक्षण की मांग तेज हो रही है। इसका कारण यह है कि देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो सवर्ण जाति का होने के बावजूद विपन्न् है। वह आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से खिन्न् है और उसमें कुंठा घर कर रही है। ऐसे में बेहतर होगा कि आर्थिक आधार पर भी आरक्षण देने की कोई व्यवस्था बनाई जाए। ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण इसलिए होना चाहिए, ताकि देश की राजनीति जातिवाद के दलदल से बाहर निकल सके। आज तो आरक्षण वोट बैैंक बनाने का हथियार बन गया है। राजनीतिक दलों को यह एहसास होना चाहिए कि मूल समस्या आर्थिक पिछड़ापन है। जब समाज का हर तबका आर्थिक रूप से सक्षम होगा, तभी उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य समस्याओं का निपटारा हो सकेगा।


Date:10-09-18

तेल की धार

संपादकीय

पेट्रोल, डीजल और गैसों के दाम लगातार बढ़ने से स्वाभाविक ही विरोध के स्वर उभरने शुरू हो गए हैं। इस वक्त डीजल की कीमतें बहत्तर रुपए के ऊपर पहुंच गई हैं, जो अब तक के सबसे ऊपरी स्तर पर है। पेट्रोल का दाम अस्सी से सतासी रुपए के बीच हो गया है। पहले ही विपक्ष ने महंगाई के विरोध में भारत बंद का आह्वान किया था, रविवार को तेल की कीमतें बढ़ने से उसे सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है। अब राजग की सहयोगी शिव सेना भी विरोध में उतर आई है। हालांकि वित्तमंत्री ने महंगाई बढ़ने और अर्थव्यवस्था के डावांडोल होने से इंकार किया है। मगर यह तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा। हकीकत यह है कि राजग सरकार के साढ़े चार सालों में तेल की कीमतें लगातार बढ़ी हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के मुताबिक पेट्रोल-डीजल के दामों को नियंत्रित करने का प्रावधान है, पर जिन दिनों कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने सबसे निचले स्तर पर थीं, उन दिनों भी भारत में तेल की कीमतें नीचे नहीं आर्इं। इसलिए इसे लेकर लोगों की नाराजगी समझी जा सकती है ।

तेल की कीमतें बढ़ने के पीछे बड़ा कारण डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत है। अब डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत करीब बहत्तर रुपए तक पहुंच गई है। इस तरह सरकार को कच्चे तेल की अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। हालांकि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो सरकारें उत्पाद शुल्क घटा कर उपभोक्ता का बोझ कम करने की कोशिश करती हैं। कुछ महीने पहले जब इसी तरह तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर विपक्ष का हमला तेज हुआ था, तो कुछ राज्य सरकारों ने उत्पाद शुल्क में कटौती करके उपभोक्ता को राहत देने का प्रयास किया था। उन दिनों चार विधानसभाओं में चुनाव होने वाले थे। पर फिर तेल की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं किया गया। यहां तक कि केंद्र सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में लगातार उत्पाद शुल्क बढ़ाया ही है। इस दौरान उत्पाद शुल्क बढ़ कर करीब दो गुना हो गया है। इसी तरह रसोई गैस और सीएनजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। सामान्य उपभोक्ता को रसोई गैस की कीमत पहले की तुलना में डेढ़ गुना से अधिक चुकानी पड़ रही है।

स्पष्ट तथ्य है कि जब डीजल-पेट्रोल और र्इंधन गैसों की कीमत बढ़ती है, तो उसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। यों संतुलित दर से महंगाई बढ़ना अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, पर जब वस्तुओं की कीमतें ढुलाई की वजह से बढ़ें तो यह संतुलित महंगाई नहीं कहलाती, क्योंकि उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने में जो दाम बढ़ जाता है, उसका लाभ उत्पादक को नहीं मिलता। इस तरह वस्तुओं की मांग और उत्पादन की दर घटती है। जाहिर है, इसका असर विकास दर पर पड़ता है। राजग सरकार के शुरुआती दिनों में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपने सबसे निचले स्तर पर थीं, तब सरकार ने इस तर्क पर तेल की कीमतें नहीं घटाई और उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया कि जब तेल की कीमतों को संभालना मुश्किल होगा, तब इस पैसे का उपयोग किया जाएगा। मगर अब सरकार शायद उस वादे को भूल गई है। अगर समय रहते इस दिशा में व्यावहारिक कदम नहीं उठाए गए तो अर्थव्यवस्था को लक्षित दर तक पहुंचाना मुश्किल होगा।


Date:10-09-18

बिजली के वाहन

संपादकीय

भारत के शहरों और महानगरों में जिस तेजी से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है उसमें सबसे ज्यादा योगदान वाहनों से होने वाले प्रदूषण का है। यह ऐसा विषय है जिस पर सालों से गंभीर चिंता तो जताई जा रही है, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी ठोस काम होता नजर नहीं आया है। ऐसी कोई ठोस नीति नहीं बनी है जो वाहन प्रदूषण की समस्या से निपटने का समाधान बताती हो। इसका नतीजा यह है कि देश में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और रोजाना नए लाखों वाहन पंजीकृत हो रहे हैं। लेकिन इन पर लगाम कैसे लगे, इसका कोई समाधान सरकार के पास नहीं है। आज देश भर में करोड़ों वाहन हैं जो पेट्रोल और डीजल से चल रहे हैं और इनसे निकलने वाला धुआं कार्बन उर्त्सजन का बड़ा कारण है। इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए नीति आयोग ने दो दिन तक बिजली से चलने वाले वाहनों की जरूरत, उनके निर्माण और इससे संबंधित जरूरी नीतियां बनाने के मकसद से वैश्विक सम्मेलन किया। इसमें दुनिया की कई जानीमानी वाहन निर्माता कंपनियों ने शिरकत की। ‘ग्लोबल मोबिलिटी समिट-मूव’ से यह उम्मीद तो बंधी है कि आने वाले वक्त में भारत बिजली से चलने वाले वाहनों के निर्माण को लेकर पहल करेगा।

प्रधानमंत्री ने बिजली चालित वाहनों के लिए बैटरी से लेकर उनके कलपुर्जे तक भारत में बनाने पर जोर दिया। यह भारत की तात्कालिक जरूरत भी है, क्योंकि जितनी जल्दी पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों से मुक्ति पाई जा सके, उतना ही अच्छा है। लेकिन हकीकत यह है कि हम इस दिशा में एक कदम भी नहीं बढ़ पाए हैं। जबकि दुनिया के दूसरे देश बिजली चालित वाहनों के इस्तेमाल में काफी आगे निकल चुके हैं। भारत में अभी किसी भी वाहन निर्माता कंपनी ने व्यावसायिक स्तर पर इसकी शुरुआत नहीं की है। इसके लिए जिम्मेदार खुद सरकार ही है। भारत में बिजली और वैकल्पिक र्इंधन से चलने वाले वाहनों के लिए अभी तक कोई नीति नहीं है। हालांकि सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने जल्द ही ऐसी नीति बनाने का भरोसा तो दिया है। लेकिन सवाल है कि कब नीति बनेगी, कैसे उस पर अमल होगा, इसके लिए अभी इंतजार ही करना होगा। तब तक समस्या और गंभीर हो चुकी होगी।

बिजली चालित वाहनों का सपना इसलिए भी साकार नहीं हो पाया है क्योंकि हमारे यहां उसके लिए बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि अगर सरकार बैटरी निर्माण और चार्जिंग स्टेशनों की समस्या का समाधान कर दे तो बिजली चालित वाहन बाजार में उतारे जा सकते हैं। जाहिर है, कंपनियां तो तैयार हैं, लेकिन पहल सरकार को करनी है। बुनियादी सुविधाओं का बंदोबस्त सरकार को करना है और इसके लिए ठोस दीर्घावधि नीति की जरूरत है। बिजली चालित वाहनों के लिए जो नीति बने उसमें सार्वजनिक परिवहन को केंद्र में रखना होगा। जब तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी और पूरी तरह बिजली वाहनों पर आधारित नहीं होगी, तब तक इस दिशा में किए जाने वाले अपेक्षित नहीं देंगे। आज जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए तो लगता है भारत में बिजली चालित वाहनों की मंजिल अभी दूर है। सरकारों ने अगर इस समले को पहले से ही गंभीरता लिया होता और इस दिशा में पहल की होती तो भारत भी उन देशों की कतार में शामिल हो सकता है जो अब बिजली वाहनों का इस्तेमाल कर प्रदूषण से मुक्ति पाने की दिशा में बढ़ चुके हैं।


Date:10-09-18

दुनिया को जलवायु परिवर्तन से बचाने का अगला पड़ाव

मदन जैड़ा ब्यूरो चीफ, हिन्दुस्तान

अभी-अभी भारत ने केरल की बाढ़ और देश के अन्य हिस्सों में मानसून की तबाही के रूप में जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना किया है, तो अमेरिका और जापान में भयावह तूफान और बैंकॉक में समुद्र के जलस्तर की बढ़ोतरी के रूप में इसकी झलक को देखा गया। इन खतरों और चुनौतियों से निपटने की जिम्मेदारी संभालने वाली एजेंसियों के प्रमुख 12 सितंबर से अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में एकजुट हो रहे हैं। लेकिन अन्य जलवायु सम्मेलनों की तरह वहां भावी खतरों पर चर्चा नहीं होनी है। न ही आगे की रणनीति बनेगी। बल्कि यह चर्चा होगी कि तीन साल पूर्व हुए पेरिस समझौते के अनुरूप अब तक क्या-क्या हुआ है? इस पर भी मंथन होगा कि पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ये कार्य कितने पर्याप्त हैं?

बैठक को इसी साल दिसंबर में पोलैंड में होने वाली कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप) की 24वीं बैठक की तैयारी भी माना जा रहा है। कॉप-24 में पेरिस समझौते की समीक्षा होनी है। संयुक्त राष्ट्र ने पोलैंड की बैठक को पेरिस 2.0 की संज्ञा दी है। यानी सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन पोलैंड की बैठक का भी आधार बनेगा। हो सकता है कि इस बैठक के बाद राष्ट्रों को अपने उर्त्सजन के लक्ष्यों को नए सिरे से निर्धारित करने के लिए कहा जाए। जो राष्ट्र अभी तक लक्ष्यों को घोषित करने या क्रियान्वयन में देरी कर रहे हैं, उन्हें आगाह किया जा सकता है। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें चर्चा करने वाले राष्ट्राध्यक्ष या नीति-निर्माता नहीं हैं, बल्कि क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियों के प्रमुख हैं। इसमें स्थानीय प्रशाासनिक इकाइयों के प्रमुख, मेयर, स्वतंत्र सरकारी और गैर सरकारी एजेंसियों के मुखिया, उद्योग जगत के लीडर, प्रबुद्ध नागरिकों और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच चर्चा होनी है। एजेंसियों को यह बताना है कि जमीनी स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या हो रहा है? मसलन, सौर ऊर्जा बनाने वाली एजेंसियां अपनी बात रख सकती हैं, तो शहर प्रशासन जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के उपाय बता सकते हैं। मसलन, न्यूयॉर्क के शहर प्रशासन ने समुद्र का जलस्तर बढ़ने के खतरे से निपटने के लिए समुद्री किनारों पर पानी को रोकने और बढ़ने की स्थिति में उसकी निकासी के प्रयास शुरू किए हैं। बैंकॉक भी ऐसे कदम बढ़ा रहा है। लेकिन क्या मुंबई और चेन्नई ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं? जलवायु परिवर्तन से जुड़े जिन पांच बड़े मुद्दों पर इस सम्मेलन में और आगे भी चर्चा होनी है, उनमें स्वच्छ ऊर्जा, समग्र आर्थिक विकास, सतत विकास, भूमि एवं समुद्र से जुड़े मुद्दे तथा जलवायु अर्थव्यवस्था का विस्तार शामिल है। लेकिन कई मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर अभी पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है।

कई अहम मुद्दों पर राष्ट्रों की नीतियां भी स्पष्ट नहीं हैं, जिससे उद्योग जगत अपने कदम तय नहीं कर पा रहा है। जैसे देश में आज स्वच्छ तकनीक में निवेश की बात करें, तो यह हरित ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। यहां सरकार की नीति स्पष्ट है। लेकिन हरित परिवहन क्षेत्र में उतनी तेजी नहीं दिखी। इसी प्रकार, जलवायु परिवर्तन से सबसे बड़ी चुनौती कृषि क्षेत्र के सामने है। इससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है। लेकिन इस पर पूरी दुनिया में अपेक्षाकृत कम काम हो रहा है।

पेरिस समझौते को तीन साल हो चुके हैं। इसलिए यह भी तय होना है कि ये उपाय तापमान बढ़ोतरी को डेढ़ डिग्री तक रोकने में कारगर हैं या फिर नए उपायों या लक्ष्य निर्धारित करने की जरूरत है। कई रिपोर्ट कहती हैं कि जिस रफ्तार से काम हो रहा है, उससे तापमान बढ़ोतरी डेढ़ डिग्री तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि तीन डिग्री तक पहुंच जाएगी। एक चिंता यह है कि पेरिस समझौते से अमेरिका के बाहर होने के बाद धनी राष्ट्र वैश्विक हरित कोष के लिए धन देने में कोताही कर सकते हैं। पेरिस समझौते के अनुसार, 2020 तक इस कोष में प्रतिवर्ष सौ अरब डॉलर होना चाहिए। पेरिस समझौते पर निकरागुआ व सीरिया को छोड़ सभी 197 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। मोटा आकलन है कि कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार 55 फीसदी देशों ने पेरिस समझौते के अनुरूप कार्य शुरू किया है, बाकी ने नहीं।


Date:10-09-18

जाति जनगणना का अमृत और विष

बद्री नारायण निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

अन्य पिछड़े वर्ग की आबादी के आंकड़े जमा करने की घोषणा हो गई है। 2021 की जनगणना में इन आंकड़ों को संकलित किया जाएगा। इसके पहले यह काम 87 साल पहले 1931 की जनगणना में हुआ था। साल 1980 में मंडल कमीशन रिपोर्ट ने भारतीय समाज में ओबीसी के रूप में 1,257 जातियों और 52 प्रतिशत जनसंख्या को चिह्नित किया था। 2021 की जनगणना में अगर ये आंकडे़ संकलित होते हैं, तो इन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने में तीन वर्ष का समय लग जाएगा। यानी ये आंकडे़ 2024 में ही उपलब्ध हो पाएंगे।

जनगणना भारत में औपनिवेशिक शासन द्वारा शुरू की गई मेगा औपनिवेशिक डॉक्यूमेंटेशन परियोजना का हिस्सा थी। लेकिन इसने भारतीय समाज में शासन, नीति, नियम और योजनाओं के निर्माण को गहरे रूप से प्रभावित किया है। राज्यसत्ता इन्हीं जनगणना के माध्यम से विकास की नीतियां तय करती है। इसी के हिसाब से समाज का वर्गीकरण होता है, जो राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक पूंजी का भी रूप लेता है। राजसत्ता के ये दस्तावेज हमारी अस्मिता को निश्चित और जड़ कर देते हैं। राजसत्ता इन्हीं के माध्यम से अपने अनुरूप अनेक नई अस्मिताओं को जन्म देती है।

जनगणना में 1931 के बाद जातियों के आंकड़े संकलित करना बंद कर दिए गए थे। फिर अनेक राजनीतिक दलों के दबाव में 2011 में जातीय आंकड़ों के संकलन की प्रक्रिया शुरू हुई, पर 2011 में निर्णित ढांचे में संकलित आंकडे़ कई कारणों से सामने नहीं आ सके। अब सरकार ने फिर से पिछड़ा वर्ग की समूह आधारित गणना की नीति पर काम करने का संकेत दिया है। यह केवल अनेक राजनीतिक दलों के दबाव या प्रशासन की जरूरतों के कारण किया जा रहा है या इसकी कोई राजनीति भी है? इन आंकड़ों का सरकार क्या करेगी?

इन आंकड़ों के कई उपयोग हो सकते हैं। एक तो इनसे सरकार अपनी पिछड़ी जाति संबंधी नीतियों की समीक्षा कर सकती है। दूसरे, इनकी बढ़ती संख्या का आकलन हो सकता है। तीसरे, चुनाव प्रक्रिया में इन वर्गों की जनसंख्या के कारण सरकारी योजनाओं, परियोजनाओं और आरक्षण संबंधी दावों में और ज्यादा आक्रामकता आ सकती है। नीति निर्माता और शोधार्थी तो इन आंकड़ों का उपयोग कर ही सकते हैं। राजनीतिक दल और चुनाव विशेषज्ञ इन आंकड़ों से अपने आकलन को धार देंगे। अभी तक के ज्यादातर चुनावी आकलनों में 1931 के आंकड़े ही उपयोग में लाए जाते रहे हैं।

इन आंकड़ों से सबसे बड़ा फेरबदल चुनावी राजनीति में ही दिखेगा। इनके आधार पर विभिन्न जातियों को लामबंद करने की राजनीति चलेगी। वहीं दूसरी ओर, भाजपा जैसी राजनीतिक पार्टी, जो क्षेत्रीय स्तर पर पिछड़ों के जनाधार वाली पार्टियों की चुनौती झेल रही है, इन जातियों में उपेक्षितों और अत्यंत पिछड़े समूहों का एक नया वर्ग बनाकर उन्हें लामबंद करने की कोशिश कर सकती है। उन्हें यह समझाया जा सकता है कि पिछड़ों के लिए मिली सरकारी सुविधाएं उनमें से कुछ जातियों तक ही सीमित रह गई हैं। ऐसे में, जरूरी है कि पिछड़ों में प्रभावी क्रीमी लेयर के अतिरिक्त शेष पिछड़े समाज को, जो कि बहुत बड़ा है, चिह्नित कर उसके मुद्दे उठाए जाएं। भले ये छोटी-छोटी संख्या में हों, पर ये गैर-प्रभावी अति पिछड़ी जातियां संयुक्त रूप से एक बड़ी संख्या में बदल जाती हैं, जो भारतीय चुनाव को गहरे प्रभावित कर सकती है। इनके लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की बात करके इन्हें एक राजनीतिक समूह में बदला जा सकता है। भाजपा यह दावा करती रही है कि वह ऐसी जातियों और समूहों के विकास और उनकी राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास में लगी है। उसका मानना है कि ऐसी जातियों और समूहों के नेताओं को वह अपने दल और चुनावी प्रक्रिया में उचित शेयर देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

भाजपा सरकार ने 2017 में ‘नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड कास्ट’ को एक सांविधानिक शक्ति से लैस कमीशन के रूप में आकार दिया है। साथ ही 2017 में ही दिल्ली हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस जी रोहिणी के नेतृत्व में बने आयोग की रिपोर्ट के आधार पर पिछडे़ वर्ग के और वर्गीकरण की जरूरत पर बल दिया है। ऐसी कोशिशों को सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ जोड़ा जा सकता है। यह तय है कि अगर भाजपा अन्य पिछड़े वर्ग में उपकोटि की राजनीति को अपने पक्ष में लामबंद कर लेती है, तो चुनावी राजनीति में वह अपने को और ज्यादा शक्तिवान बना सकती है। लेकिन इस राजनीति में जोखिम भी हैं। पिछड़े वर्गों की राजनीति करने वाले इसे पिछड़ों में फूट डालने की कोशिश के रूप में पेश करेंगे।

इसमें कोई शक नहीं कि जाति और सामाजिक समूह आधारित जनगणना से तरह-तरह की अस्मिता की राजनीति को और ज्यादा खाद-पानी मिलेगा। यह भी तय है कि इस प्रक्रिया में सरकार अपने तर्कों पर आधारित नई अस्मिताओं का सृजन कर सकती है। इसका एक नतीजा यह भी हो सकता है कि अन्य पिछड़े वर्ग में प्रभावी सामाजिक समूहों और गैर-प्रभावी सामाजिक समूहों में राजनीतिक व विकासपरक अवसरों पर कब्जे के लिए टकराव बढ़े। इससे आरक्षण कोटे को लेकर भी दावे, प्रतिदावे और टकराव बढ़ सकते हैं। किंतु आजादी के लगभग 70 वर्षों के बाद जातियों के सही आंकडे़ प्रशासन, नीति-निर्माण और शोध के लिए सकारात्मक परिणाम भी दे सकते हैं। वही आंकडे़ राजनीति के हाथों में आते ही टकराव पैदा करने वाले नकारात्मक परिणाम में बदल सकते हैं। यह सच है कि भारतीय लोकतंत्र और समाज में हर चीज राजनीतिक हो जाती है। कई बार इसी प्रक्रिया से विकास का रास्ता भी खुलता है। यह प्रयास एक ही साथ अमृत और विष, दोनों पैदा करने वाला हो सकता है। देखना यह है कि इसका कौन सा रूप हमारे भविष्य को गढ़ता है।


Date:10-09-18

A Shrinking Table

For a society in the throes of turbulent change, however, even the most sacred of relationships has come under pressure.

Shruti Lakhtakia , [The writer, 26, is a graduate student at the Harvard Kennedy School of Government ]

During my childhood, we had a rather strict rule about having dinner together as a family. My grandparents were close to my father, and he to them. The cacophony of cross-conversations between grandparents, parents, cousins bore testimony to filial responsibility that had been deeply internalised by every generation.

For a society in the throes of turbulent change, however, even the most sacred of relationships has come under pressure. The share of the elderly in India living alone or only with a spouse increased from 9 per cent in 1992 to 19 per cent in 2006. The modernising forces of demographic change, growth-induced geographic mobility and a sense of individualism, have transformed society within a span of one generation. First, growing life expectancy and lower fertility rates mean an increasing share of elderly in the population, putting additional pressure on a smaller number of children. Since 1991, the number of households has grown faster than the population. Nuclear families now constitute 70 per cent of all households.

Second, better economic opportunities mean that children are leaving home earlier than they used to, migrating not to the neighbouring town, but across states and countries. According to the 2017 Economic Survey, 90 lakh people, on average, migrated between Indian states for either work or education each year between 2011 and 2016. Urban living is predominantly nuclear, and only 8.3 per cent of the urban elderly live in joint families. Third, and perhaps most important, direct or indirect exposure to the Western way of life has given this generation an alternative idea of family responsibility and how to organise care. The share of adult children who said that caring for their elderly parents was their duty fell from 91 per cent in 1984 to 51 per cent in 2001.

The Government of India in 2007 enacted the Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, which made it a legal obligation for children to provide maintenance to parents in the form of a monthly allowance. In 2018, the revised Act seeks to increase the jail term for negligent children, broaden responsibility beyond biological children and grandchildren and expand the definition of maintenance to include safety and security. This law will ultimately safeguard the rights of those elderly who have seen abuse and help them pursue legal action. But when financial needs are met, and social ones remain, the bite of law is limited. Isolation and loneliness among the elderly is rising. Nearly half the elderly felt sad and neglected, 36 per cent felt they were a burden to the family. One in every five people will be above the age of 60 by 2050. As the trends of smaller families and reductions in the cost of mobility continue, it is our values that will determine what the future looks like.

For both my grandparents and me, dinner together grew to be a meaningful exchange of lives lived in very different times — my displays of what technology could do, their stories about what the Partition meant. But in the face of change, our generation will face a unique problem in how it approaches the filial contract. On one hand, sociologists have predicted the rise of modified extended families to replace joint families. This hybrid structure of nuclear families enmeshed in large kinship networks is characterised by close familial bonds despite geographic distance — manifested in frequent visits to parents, and participation in events such as births, marriages and festivals.

An alternative future is one where social support comes from other elderly. Facing greater competitive and economic pressures, young Indians may create a tipping point where old-age homes become the norm, and there is no longer any stigma or guilt associated with them. In Kerala, there has been a 69 per cent increase in the residents of old age homes in 2011-15. For a society caught between greater economic opportunities and individual freedoms on one hand and traditional values and moral responsibilities on the other, finding a balance is not straightforward. With the passage of time, the values that were once internalised at the dining table might become too distant a memory to check the opportunities and freedoms of the day.


Date:10-09-18

Jobs, lost and found

There is a basket of livelihoods and knowledge, guided by culture, which fulfils all that government means when it says “jobs”.

Jaya Jaitly And Rahul Goswami , [ Jaitly is a writer and founder-president, Dastkari Haat Samiti, and Goswami is a Unesco Asia facilitator on intangible cultural heritage ]

Ever since he became prime minister in 2014, Narendra Modi has talked about job creation as a sorely needed factor for India’s economic stability and growth. Yet, the subject remains the proverbial elephant in the room.

On August 15, 2014, the media reported: “Modi hoists the national flag… Skill development will be towards job creation and empowering the youth.” A year later, “Modi said there would now be an attempt at linking job creation with new investments. Proposed schemes would now impose the obligation of creating fresh jobs for every clearance given to investments”. In 2017, the reports quoted the PM as saying, “We are nurturing our youngsters to be job creators and not job seekers.” During the July no-confidence motion in the Lok Sabha, Modi replied to the criticism his government was facing over the unemployment issue by saying that over one crore jobs had been created over the past year. Finally, on August 15, he hinted at the need for a rethink of what “job creation” means.

We agree. There is a basket of livelihoods and knowledge, guided by culture, which fulfils all that government means when it says “jobs”. It is found as the self-employed traditional artisan sector. The “job creation” that has featured in speeches over the last few years is embodied in the millions of women and men whose wealth of skills gives us products both utilitarian and sustainable, and contributes to inclusiveness, respect, remuneration, rural wealth creation and eco-friendly solutions.

These are brought to us by households of many parts, engaged in cultivation or animal rearing, some retail activity, one or two members of which may draw salaries, and in which there is a household industry too, often a handicraft. If they are in plain view, why are they still neglected? Some of the neglect can be explained by the uncertainty about how many households of this description there are in India. We make guesstimates based on how a few agencies of the central government report their findings, and from the experience of those who have worked in the sector. Even so, the government is not blind to its size and strength. In its “Guide for Enumerators and Supervisors”, the Sixth Economic Census 2012-13 explained that it “included handicrafts with a view to reflect the huge contribution the artisan communities make to India’s economy”.

But the Economic Census did not scrutinise artisan communities as keenly as it did workers of other sectors. The experience of state handicrafts’ agencies and especially the cooperative crafts groups shows that these are probably included in the 13.1 million “establishments” enumerated by the 2012-13 Economic Census, which pursue activities relating to agriculture other than crop production and plantation. According to reports, NABARD’s All India Rural Financial Inclusion Survey 2016-17 has indicated likewise.

Some guidance (limited and hampered by unhelpful definitions) can be taken from the Census 2011, which has listed 6.2 million rural “occupied census houses” used as residences but which are put to other uses too (out of the total of 166.2 million), these being (in census jargon) “arts, entertainment and recreation” and “undifferentiated goods and services” both of which may include all kinds of activities not related to handicrafts, hand-weaves and village household industries.

Useful as it may be, poring through the minutiae of Census entries does not help tally what the Central agencies list. The programmes of the Khadi and Village Industries Commission (KVIC) are implemented through 4,601 registered institutions and involve more than 7,23,000 entrepreneurial units under the Prime Minister’s Employment Generation Programme and the erstwhile Rural Employment Generation Programme (now subsumed into the PMEGP), and also the Pradhan Mantri Rojgar Yojana. The KVIC alone claims through its programmes to have placed in employment (for 2016-17) 13.64 million people, a number that corresponds better with the most recent Economic Census than with Census 2011 data on workers.

However, that still leaves us with the sadly indeterminate impacts of programmes under ministries and agencies (textiles, agriculture, rural development) which deal with handicrafts and household industries.

What else is missing in the handicraft sector? Advances in appropriate technology to remove drudgery are few and far between, raw materials at moderate rates are seldom secured, lack of upgraded design for greater acceptability and utility, and — most important of all — access to marketing opportunities. The e-marketing platforms are mystifying oceans to a craftsperson with low or no IT skills. Most of these platforms serve youthful, educated middle-class entrepreneurs adept at both English and presentation skills. Even so, Dilli Haat alone is proof that once markets pitched at different levels are available, many shortcomings are tackled by craftspersons themselves.

For years, those invited to the Red Fort on August 15 have sweltered in the humidity and heat, fanning themselves with their invitation cards. Surely there was an opportunity here to connect “jobs” with tasteful utility at hand, and this writer proposed and assisted the government in the procurement of 1,000 bamboo fans from tribal Bengal which were provided this year to the VIP section. The next opportunity was Raksha Bandhan, for in 2017 during a ‘Mann ki Baat’ broadcast the PM spoke about wearing khadi rakhis instead of China-made ones (media went looking but found none). This lack of follow-up by concerned bodies to positive, simple suggestions, leads people to accuse the PM of running a “jumla sarkar”.

Innovation, a government watchword, abounds where there is natural material to work and knowledge to apply. Such ideas need committed support from the government, as much for fulfilling “job creation” and sustainable livelihoods as for mainstreaming the environmental service done by the handicraft sector.