News Clipping on 10-09-2018


Supreme Defender

Supreme Court’s administrative fix to curb lynchings must be implemented urgently and sincerely

TOI Editorials

Supreme Court’s warning to 19 states that defaulted on complying with its July 17 directives to curb lynchings sends down a strong message. The ultimatum to these states to implement the guidelines or risk having their home secretaries summoned to court for contempt should be adequate to prompt the laggards to act. SC’s directives included preventive, remedial and punitive measures to overhaul the law and order machinery on the administrative side. Supreme Court has correctly deduced that the spate of lynchings and emboldening of mobs is a law and order issue needing administrative redress.

Bringing in a new law to tackle lynchings may not help much given the large body of laws in India which are feebly enforced. Far worse is the solution reportedly proposed by a panel of senior bureaucrats in their report to a Group of Ministers, that passes the buck to social media and threatens to jail local heads of platforms where rumours are disseminated. That’s a bit like jailing telephone company heads if subversive plans are hatched on phone. In contrast, SC’s directives include a designated officer at district level to prevent mob violence, asking police officers to be firm in using statutory powers to disperse mobs, constant patrolling of sensitive areas, and lodging FIRs for inciting violence. SC also prescribed awareness campaigns, fast tracking of cases, and imposing maximum punishment for lynchings. If these steps are implemented properly and sincerely, there is little likelihood of anyone taking the law into their hands.

Among the 10 states that have claimed to implement the SC directives are UP, Rajasthan and Jharkhand, which have been the worst hit by lynchings. This is a positive signal but SC must ensure that its directives are also applied to past cases. Charges are yet to be framed in the 2015 Dadri lynching case. Alwar in Rajasthan had the dubious distinction of being the first lynching after the July 17 SC order, a case revealing grave malfeasance of local police. Given these realities, SC must call for regular status reports on progress of earlier cases. SC has stolen a march over legislatures and executive when it comes to defence of fundamental rights. Its administrative prescriptions for curbing lynching should ideally have come from governments, and show up bureaucratic lethargy as well as lack of political will and commitment to good governance on the part of the latter. But there is still time to act.


Top Priority for Public Transport

Plan to prevent e-mobility becoming a fad

ET Editorials

Electric power is the way to go for the transport sector, given the need to curb greenhouse gas emissions and air pollution. India, too, is taking measures to lay the foundation of such a transition. The government is finalising a policy that would help transition the sector away from the internal combustion engine and fossil fuels to electric vehicles and alternative fuels. In devising a policy for clean mobility, the government must prioritise mass transit over cars and private vehicles. A shift away from fossil fuels to alternatives like methanol, ethanol, hydrogen or battery-stored power is essential to address the environmental, economic and health fallout of increased congestion.

However, any solution that does not put mass public transport at its core will fail. This means greater investment in the sector but also working to change public attitudes, from seeing public transport as the option for those who cannot afford a personal vehicle or be part of the shared mobility experience such as taxis, autos, e-rickshaws and ridesharing, to accepting it as the first and smart choice for mobility for even those who own a private vehicle.Three things are essential for this transformation. First, public transport options must be accessible, affordable, predictable, reliable and safe.

Second, the different modes of public transport such as bus, train, metro, tram, must be integrated. Third, lastmile connectivity must be easy, whether through local shuttle buses or shared mobility options, affordable, reliable and available. Price gouging is not uncommon among the pliers of auto-, cycle- and e- rickshaws. Such practices drive up the cost of public transport while reducing its convenience, resulting in more trips using private vehicles or shared mobility options such as taxis, autos and ride sharing. India is urbanising rapidly. New towns must be planned to minimise commutes and prioritise public transport. High density and mixed land use must be accompanied by public transport. Shared cycles will be possible at least in some places. Planning is the key.


अहम समझौता, बरकरार अनिश्चितता


भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच बातचीत पिछले सप्ताह संपन्न हुई। यह वार्ता पिछले काफी समय से टल रही थी और कुछ लोगों को तो यह आशंका भी हो गयी थी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशसन भारत-अमेरिका संबंधों को कम प्राथमिकता दे रहा है। इन चर्चाओं के दौरान दोनों देशों को एक साथ लाने वाली सामरिक दृष्टि के साथ-साथ तमाम नए और पुराने मुद्दों पर भी बातचीत हुई। इन वार्ताओं का सबसे बड़ा विषय रहा सुरक्षा सहयोग को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर करने को लेकर बनी सहमति। यह समझौता उन आधारभूत समझौतों का ही एक प्रकार है जो अमेरिका ने अपने निकटस्थ सामरिक साझेदारों के साथ किया है।

इस समझौते को कयुनिकेशंस कंपैटिबिलिटी ऐंड सेक्युरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) का नाम दिया गया है। यह समझौता एनक्रिप्टेड सुरक्षा मंचों तक साझा पहुंच बनाने की इजाजत देता है। उदाहरण के लिए इसके तहत भारतीय नौसेना क्षेत्रीय जानकारियां जुटाने के लिए पी-81 निगरानी एवं टोही विमान की पूरी क्षमताओं का इस्तेमाल कर सकेगी। ये विमान भारत ने अमेरिका से खरीदे हैं और अभी ये विमान केवल वाणिज्यिक उपलब्धता वाले उपकरणों के साथ ही काम करता है। इसके नियंत्रित संचार उपकरणों का कोई विकल्प नहीं था जो अब उपलब्ध होगा। दोनों नौसेनाओं के युद्धपोत अब अधिक सुरक्षित और प्रभावी ढंग से एक दूसरे के साथ संचार स्थापित कर सकेंगे। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने के लिए इस समझौते पर हस्ताक्षर लंबे समय से लंबित था। इस बात का स्वागत किया जाना चाहिए कि सरकार ने उस पुराने सोच को त्याग दिया है जिसके तहत वह देश के सामरिक साझेदारों के साथ ज्ञी एनक्रिप्टेड संचार को खोलने में भयभीत रहती थी।

बहरहाल, इस संवाद के दौरान कुछ असहज करने वाले मुद्दे भी सामने आए। यह सच है कि हाल के दिनों में हमारे सामरिक और सैन्य रिश्ते आर्थिक रिश्तों की तुलना में गर्माहट भरे और कम उतार चढ़ाव वाले रहे हैं परंतु कुछ समस्याओं ने अप्रत्याशित रूप से सर उठाया। इनमें से दो का संबंध अमेरिकी नेतृत्त्व में रूस और ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों से है। ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध भारत के लिए भी समस्या हैं क्योंकि भारत तेल आयात पर निर्भर है। उसे यह रास नहीं आया कि आयात होने वाले तेल में ईरान की हिस्सेदारी न हो। कुछ माह पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दोहराया था कि भारत केवल संयुक्त राष्ट्र द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को ही मान्यता देता है। ईरान पर प्रतिबंध लगाना इसमें शामिल नहीं है। ये प्रतिबंध अमेरिका के ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के साथ 2015 के नाभिकीय समझौते को एकपक्षीय ढंग से खत्म करने के बाद प्रभावी हुए हैं। संभव है कि अमेरिका भारत के ईरान से होने वाले आयात में बड़ी कटौती से संतुष्ट हो जाए।

रूस से रक्षा खरीद के सवाल अधिक कठिन हैं। इसका संबंध हमारी सामरिक स्वायत्तता और रूस के साथ पुरानी रक्षा साझेदारी से है। सेना 600 करोड़ डॉलर में पांच रूसी एस-400 मिसाइल खरीदना चाहती है जो सतह से हवा में मार करती है। अगर मौजूदा अमेरिकी कानून को लागू किया जाए तो ऐसा करने पर प्रतिबंध लग सकता है। चूंकि अमेरिका में रूसी सेना और इंटेलीजेंस पर प्रतिबंध को दोनों दलों का समर्थन हासिल है इसलिए आगे की राह अनिश्चित है। फिर भी यह स्पष्ट है कि भारत के लिए अपवाद स्वरूप राह निकाल ली जाएगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत और अमेरिका के सामरिक रिश्तों पर गहरा असर होगा। भारत को अपनी कूटनीतिक क्षमताओं का इस्तेमाल करते हुए इस समस्या से किसी तरह निपटना होगा।


पारिस्थितिकी को रौंदने से पहाड़ में बरपा कहर

अनिल जोशी

हिमालय के बिगड़ते हालात का प्रमाण इस बरसात ने दिखा ही दिया। मॉनसून बहुत भारी पड़ा है। इसे भी कहीं बदलते पर्यावरण से जोड़कर देखा जाना चाहिए। ऐसा इस बार होने के लक्षण पहले से विदित थे क्योंकि अबकी गर्मी ने भी अजीब-सा व्यवहार किया था। पहली बार देश ने बढ़ती गर्मी के कारण बवंडर झेला था। तब भी देश के कई कोनों ने बड़े नुकसान को झेला था। इस बार वर्षा का व्यवहार भी अजीब-सा रहा। समझ लेना होगा कि क्या पहाड़ और क्या समुद्रतटीय राज्य, मानसून की बारिश ने दोनों में तबाही मचाई। पहाड़ों में ज्यादा पीड़ा हिमालयी क्षेत्र के हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों को झेलनी पड़ी।हिमाचल प्रदेश में भारी तबाही का मंजर रहा। बारिश ने टुकड़ों-टुकड़ों में जो तीव्रता दिखाई उससे राज्य के कई हिस्सों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ।

पैंतीस से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी। मवेशियों के नुकसानों की तो गिनती ही नहीं। छोटी-बड़ी तमाम सड़कें ध्वस्त हो गई। एक हजार सड़कों पर आवाजाही ठप पड़ गई। खेत-खलिहानों का भी यही हाल रहा। फसल चौपट हो गई। राज्य में इस बार के मॉनसून में 990.54 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया गया है। कमोबेश ऐसा ही कुछ उत्तराखंड में भी हुआ। कुछ ही दिनों में 1200 मिमी. पानी पड़ा। अब तक राज्य में सैकड़ों करोड़ों रुपये का नुकसान माना जा रहा है। एक हजार से सड़कें बंद हो गई। चारधाम यात्रा पर संकट आए। हजारों तीर्थ यात्री जगह-जगह फंसे रहे। सैंतीस लोगों की जान गई। गांवों ने भारी नुकसान झेला। सवाल है कि क्या यह मात्र भारी पड़ती बारिश के ही कारण है, या कहीं गलतियां और भी जुड़ी हैं? इस विवेचना का भी समय है, इसके दो बड़े पहलू हैं। वर्षा का बदलता रुख और हमारी विकास की महत्त्वाकांक्षाएं। वैसे भी दुनिया भर में ताबड़तोड़ अनियोजित विकास ने बड़े बदलाव किए हैं।

उसका खमियाजा पर्यावरण को ही झेलना पड़ा है। बदलते मौसम के रुख के पीछे बड़ा कारण पृवी का बढ़ता तापक्रम है, और इसका कारण अनियंत्रित ऊर्जा का दुरुपयोग जो हम अपनी विलासिता जुटाने के लिए करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू इस बदलते परिवेश का यह है कि इसका सबसे क्रूर प्रभाव उन क्षेत्रों में ही पड़ता है, जो संवेदनशील हैं, और हिमालय देश का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। दो दशकों से हिमालय को दोतरफा मार पड़ रही है। बदलते तापक्रम से जहां हिमखंडों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ कर उनकी पिघलने की गति बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ शीतकालीन वर्षा का समय पर न होना हिमखंडों के विस्तार के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। प्रसिद्ध हिमखंड जैसे गंगोत्री, यमुनोत्री, डोकरानी, पिंडारी, मिलम और सतोपंथ आदि पिछले दशकों में काफी पीछे हटे हैं। इनकी प्रति वर्ष घटने की दर 10-12 मीटर मानी जा रही है। हिमखंड पानी के सबसे बड़े स्रेत हैं। इनके स्वास्य पर प्रतिकूल असर का मतलब पानी के संकट को बुलावा।दूसरा बड़ा पहलू हिमालय के प्रति सटीक विकासीय नियोजन का अभाव। हिमालय अति संवेदनशील क्षेत्र में आता है।

इसलिए यहां हर तरह के विकास में संवेदनशीलता बरते जाने की आवश्यकता है। अगर एक दृष्टि हम हिमालयी क्षेत्रों की पिछले 20 वर्ष की विकासीय रूपरेखा को देखें तो उनमें कहीं भी हिमालयी झलक नहीं दिखाई देती। ढांचागत विकास के सारे मानक वही हैं, जो मैदानी क्षेत्रों के होते हैं। इसके अलावा, पहाड़ और इसकी नदियों का लाभ उठाने के लिए बांधों की श्रृंखला ने यहां के भूगोल को नष्ट कर दिया। हालात ये हैं कि पहाड़, जो भूगर्भीय हलचलों और भूकंपों के लिए संवेदनशील हैं, पर बहुमंजिली इमारतों की बाढ़ आ गई है। हिमाचल प्रदेश हो या उत्तराखंड, सभी जगह ताबड़तोड़ तरीके से ढांचागत विकास की होड़ भी बनी है। सड़कों का जाल कुछ इस तरह से पनपा है कि हर गांव और कस्ब को जोड़ना जैसे सबसे बड़ा कर्त्तव्य हो। ऐसे उद्योगों को भी अनुमति दी गई जो पहाड़ों को खोदकर पनपते हैं यानी सीमेंट, चूना पत्थर या अन्य खनन उत्पाद। पिछले 20 वर्षो ये सब एक बाढ़ के ही रूप में आए हैं, और आज इन्हें ही बाढ़ लील भी रही है। इस अनियोजित शैली के विकास से कई और तरह के संकट भी सामने आ रहे हैं। कहने का मतलब यह कि आने वाले समय में पानी हवा का अभाव तो पड़ेगा ही पर वनों का हृास भी तेजी से होगा।

वन क्षेत्र तो सुरक्षित होंगे पर प्रजातियां बदल जाएंगी जिनका बेहतर पर्यावरण से कुछ भी लेना-देना नहीं होगा। परिस्थितियां ऐसी ही बनी रहीं तो केदारनाथ जैसी बड़ी घटनाएं हिमालय के हर क्षेत्र में होंगी और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। आज हिमालय ने पहाड़ हिमखंडों और नदियों से ही अपनी पहचान नहीं बना रखी है, बल्कि सभी धर्मो के प्रमुख देवी-देवताओं के देवस्थान की भी जगह है। जम्मू-कश्मीर का शाहदर शरीफ हो या वैष्णों देवी या बद्री केदारनाथ और फिर अरुणाचल प्रदेश के बौद्ध मठ, सबने अपना निवास हिमालय को ही बनाया है। ऐसे में हिमालय के साथ छेड़छाड़ का मतलब होगा कि इन्हें भी रुष्ट करना होगा। तब समझ लीजिए कि हमारे इस रवैये से रुष्ट प्रभु हमारे लिए कौन-सा दण्ड तय करेंगे। शायद वो जिसे हम झेल नहीं पाएंगे।


चीन-नेपाल धुरी के गंभीर सबक

डॉ. दिलीप चौबे

नेपाल और चीन के बीच व्यापार, पारगमन और परिवहन के क्षेत्र में संबंधों की जो नई शुरुआत हुई है, वह दोनों देशों के लिए मील का एक पत्थर है। यह बात इसलिए भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि चारों ओर से जमीन से घिरा नेपाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार और पारगमन के क्षेत्र में पूरी तरह से भारत पर निर्भर रहा है। लेकिन काठमांडू और बीजिंग के बीच ट्रांजिट प्रोटोकॉल पर जो समझौता हुआ है, उसके तहत नेपाल चीन के चार बंदरगाहों और दो लैंड पोटरे का इस्तेमाल कर पाएगा। नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद से ही नई दिल्ली और काठमांडू के बीच रिश्तों की धुरी बदलने का अनुमान लगाया जा रहा था। वास्तव में चीन और नेपाल के बीच इस समझौते की पटकथा मार्च 2016 में ही लिखी थी, जब प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन की यात्रा पर गए थे।

उन दिनों नेपाल के नये संविधान के प्रावधानों से नाराज मधेशियों का सरकार विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था। मधेशियों ने आर्थिक नाकेबंदी कर दी थी, जिसके कारण नेपाल में आवश्यक वस्तुओं विशेषकर डीजल-पेट्रोल और दवाओं की किल्लत शुरू हो गई थी। प्रधानमंत्री ओली ने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि इस आर्थिक नाकेबंदी का भारत ने समर्थन किया था, लेकिन यह तय है कि भारत सरकार कूटनीतिक स्तर पर इस संवेदनशील मुद्दे को ठीक से संभाल नहीं पाई। इस घटना ने दोनों देशों के रिश्तों को नया मोड़ दे दिया। नेपाल चीन की तरफ झुकता चला गया। नेपाल अब चीन के तियान जिन, शेनझेन, लियांम्यांग, झांजियांग, ल्हासा और शिगात्से बंदरगाहों और लैंड पोटरे का इस्तेमाल कर सकेगा। इस तरह नेपाल को अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार करने के लिए नया वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो जाएगा, जिससे भारत पर उसकी निर्भरता कम हो जाएगी।

कम्युनिस्ट सरकार भारत पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती थी ताकि भविष्य में होने वाली किसी भी संभावित आर्थिक नाकेबंदी पर भारत पर निर्भर करना न पड़े। अभी मुख्यत; कोलकाता और विशाखापट्टनम बंदरगाहों से नेपाल का अंतरराष्ट्रीय कारोबार होता है। चीन के साथ व्यापार और पारगमन समझौता करके नेपाल ने इस क्षेत्र में एक नया सहयोगी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। नेपाल के अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिहाज से यह अच्छा है, लेकिन भारत के लिए एक सबक है। नई दिल्ली को अपने छोटे-छोटे पड़ोसी देशों के साथ समानता और बराबरी के साथ पेश आने की कला सीखने की जरूरत है। हिमालयी राज्य नेपाल की सीमा से चीनी बंदरगाहों की दूरी बहुत अधिक है। झांजियांग नेपाल से सबसे नजदीकी बंदरगाह है और यह नेपाली सीमा से 2,755 किमी. दूर है। इतना ही नहीं, नेपाल में परिवहन और ढांचागत आधार बहुत कमजोर है। सीमावर्ती इलाकों में अच्छी सड़कें नहीं हैं। इसलिए यह देखने वाली बात होगी कि नेपाल चीनी बंदरगाहों का किस सीमा तक फायदा उठा पाता है। हालांकि चीन नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए संपर्क परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। फिर भी चीन और नेपाल की भौगोलिक दूरी एक अहम मुद्दा है और नेपाल का कम्युनिस्ट नेतृत्व इसकी जटिलताओं को देखते हुए भारत के साथ अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रखेंगे।


संवैधानिक नैतिकता सर्वोपरि

फैजान मुस्तफा

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को धारा 377 को लेकर जो फैसला दिया, वह न केवल ऐतिहासिक है बल्कि यह एक कलंक को धोने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो ऐतिहासिक फैसले अब तक दिए हैं, वे फैसले भी काफी युगांतरकारी और महत्त्वपूर्ण रहे हैं। पर यह फैसला शायद इन सब में अग्रिम पंक्ति का फैसला साबित हो। कोर्ट ने इस फैसले से व्यक्तिगत स्वायत्तता के दायरे को बड़ा कर दिया है और समलैंगिकता को अपराध का दर्जा समाप्त कर मानवाधिकार को नई ऊंचाई दी है। इस फैसले से संवैधानिक नैतिकता सबसे ऊपर माना गया है। इस फैसले में अगर किसी जज के शब्द पश्चाताप से लबालब हैं तो वह है पहली बार किसी संविधान पीठ का हिस्सा बनीं न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा का यह वक्तव्य : ‘‘इस समुदाय के सदस्यों और इनके परिवार के लोगों ने सदियों से जिस तरह का अपमान और बहिष्कार झेला है, उसके लिए इतिहास को इनसे माफी मांगनी चाहिए।’ व्यक्ति को उसके शरीर का मालिक घोषित किया गया है। वह किसके साथ अंतरंगता रखता है, यह उसकी इच्छा पर छोड़ दिया गया है और साफ कहा है कि राज्य या समाज को इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए।

कोर्ट ने सुरेश कौशल के मामले में अपने ही फैसले को बदल दिया है। सभी पांच जजों का यह फैसला 493 पृष्ठों में है और सभी जजों ने यह फैसला सर्वसम्मति से सुनाया है। इस फैसले में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने अपने और न्यायमूर्ति एएम खानविलकर के लिए फैसला लिखा है।अपने फैसले में न्यायमूर्ति मिश्रा ने व्यक्तिगत पहचान को दैवी ऊंचाई बख्शी है। किसी व्यक्ति की पहचान को नष्ट करना उसकी गरिमा को कुचलने जैसा है। उसकी गरिमा में उसकी निजता, उसकी पसंद, उसकी बोलने की स्वतंत्रता और अन्य अभिव्यक्तियां शामिल हैं। किसी व्यक्ति की विशेष पहचान को स्वीकार करने के लिए धारणा और सोच में बदलाव की जरूरत है। कोई भी व्यक्ति जो है, उसे स्वीकार किया जाना चाहिए न कि उसे वह बनने के लिए बाध्य किया जाए जो वह नहीं है। प्राकृतिक और अप्राकृतिक यौन संबंधों में अंतर के बारे में मुख्य न्यायाधीश ने कहा ‘‘प्रकृति देता है वह स्वाभाविक है’ और ‘‘किसी व्यक्ति के अस्वाभाविक पहचान को उसके होने के लिए निरा आवश्यक माना जाना चाहिए। समान सेक्स के प्रति आकर्षण तंत्रिका संबंधी गुणों और जीव शास्त्रीय कारकों की वजह से होता है। अपने फैसले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि संविधान को सप्राण दस्तावेज बनाने में न्यायपालिका की भूमिका है। संविधान को चाहिए कि वह समाज का ऐसा रूपांतरण करे कि वह बेहतर बने। इस रूपांतरकारी संविधान के हृदयप्रांत में बसता है भारतीय समाज को बदलने का शपथ और प्यास ताकि वह न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अपना सके।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘‘संवैधानिक नैतिकता’ सिर्फ संविधान के उदार शब्दों तक सीमित नहीं है बल्कि उसे एक बहुलवादी और समावेशी समाज के निर्माण के लिए उद्यत होना चाहिए’। उन्होंने कहा, यह संविधान के सभी तीनों अंगों की जिम्मेदारी है कि वह लोकप्रिय भावना या बहुसंख्यावाद के प्रति रु झान को रोके। समरस, समरूप, विरोध-रहित मानकीकृत दर्शन को आगे बढ़ाने का कोई भी प्रयास संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन करेगा। आपराधिक अभियोजन के डर से पसंद की स्वतन्त्रता का गला नहीं दबाया जा सकता।’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा,‘‘संविधान सिर्फ बहुसंख्यकों के लिए नहीं है। मौलिक अधिकार ‘‘किसी भी व्यक्ति को’ और ‘‘किसी भी नागरिक’ को प्राप्त है और यह अधिकार बहुसंख्यकों की अनुमति पर निर्भर नहीं है।’ ‘‘समलैंगिकता न तो मानिसक रोग है और न ही नैतिक दुराचार। यह भी नहीं है कि कोई समलैंगिक होने का चुनाव करता है यौनिकता का विज्ञान कहता है कि कोई व्यक्ति किसके प्रति आकर्षित होता/होती है; इस पर उस व्यक्ति का कोई नियंतण्रनहीं होता। इस बारे में हुए शोध यह बताते हैं कि यौनिक अनुस्थापन जीवन में काफी शुरू में ही निर्धारित हो जाता है। समलैंगिकता को सहमतिपूर्ण माना जाना चाहिए।

किसी की पसंद का महत्त्व ज्यादा है।’ धारा 377 समलैंगिकों के बीच सहवास को आपराधिक करार देता है और यह कानूनी आधार पर नहीं टिक सकता क्योंकि आईपीसी की धारा 375 में स्पष्ट कहा गया है कि एक पुरुष और एक महिला के बीच सहमति से शारीरिक सहवास बलात्कार नहीं है और यह दंडनीय नहीं है। चूंकि धारा 377 दो योग्य वयस्कों के बीच सहमति और असहमति से स्थापित होने वाले यौन संबंधों में भेद नहीं कर पाता है, इसलिए यह समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है और किसी की मनमानी के खिलाफ अधिकार भी इसके तहत आता है। ‘‘समानता एक ऐसा आधार है जिस पर गैर-भेदभाव वाली न्याय व्यवस्था का विशाल महल खड़ा है। व्यक्तिगत पसंद के प्रति आदर क़ानून के तहत स्वतन्त्रता का आवश्यक तत्त्व है।’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा। कोर्ट के आदेश ने धारा 377 को आंशिक रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया कि निजी स्पेस में दो वयस्कों के बीच सहमतिपूर्ण यौन संबंध समाज के लिए न तो नुकसानदेह है और न ही संक्रामक। पशुओं के साथ अप्राकृतिक मैथुन के संदर्भ में यह धारा कायम रहेगा। किसी संवैधानिक पीठ की सदस्य के रूप में पहली बार अपनी राय में न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने कहा कि किसी व्यक्ति का यौनिक अनुस्थापन उसकी पहचान का जन्मजात पक्ष है और उसे बदला नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि ‘‘सेक्स’ शब्द अनुच्छेद 15 में निषिद्ध है और यह न केवल किसी व्यक्ति की जीवशास्त्रीय गुण हैं बल्कि इसमें उसकी ‘‘यौनिक पहचान और विशेषता’ भी शामिल है। अपने एक शक्तिशाली बयान में उन्होंने कहा, ‘‘इस समुदाय के सदस्यों और इनके परिवार के लोगों ने सदियों से जिस तरह का अपमान और बहिष्कार झेला है उसके लिए इतिहास को इनसे माफी मांगनी चाहिए।’ न्यायमूर्ति नरीमन निजता पर आए फैसले को धारा 377 के लिए मौत का पैगाम बताया। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि इलाज से किसी के यौनिक अनुस्थापन को बदला जा सकता है। उन्होंने कहा कि नए संवैधानिक सिद्धान्तों का अन्य मामलों पर भारी असर पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने सर्वाधिक लंबा फैसला लिखा है। उन्होंने कहा है कि धारा 377 न केवल एक अधिनियम को आपराधिक घोषित करता है बल्कि वह एक विशेष प्रकार की पहचान को ही आपराधिक करार देता है। इसका संबंध एक ऐसे अधिकार से है जो हर मानव को मिला हुआ है और यह है गरिमा के साथ जीवन।


वार्ता के निहितार्थ


भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू वार्ता की तिथि बदलने से जो भी संशय के बादल कायम हुए थे, वह वार्ता के साथ ही छंट गए हैं। वैसे तो इसके कई सकारात्मक परिणाम भारत के अनुकूल आए हैं। मसलन, पाकिस्तान को आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए दबाव बढ़ाने का अमेरिका का मत और दाऊद इब्राहिम को भारत लाने में सहयोग का वचन। किंतु भारत और अमेरिका के बीच संपन्न ‘‘संचार अनुकूलता एवं सुरक्षा समझौता’ (कमकोसा) और दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों और विदेश मंत्रियों के बीच हॉटलाइन शुरू करने का निर्णय काफी महत्त्वपूर्ण है। दोनों देशों की तीनों सेनाओं के बीच पहली बार अगले वर्ष भारत में संयुक्त सैन्य अभ्यास के आयोजन का भी फैसला किया गया। यह अभ्यास देश के पूर्वी तट पर किया जाएगा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल पोम्पियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के बीच हुई पहली टू प्लस टू वार्ता के ये परिणाम निश्चय ही आम भारतीय को संतोष देने के लिए पर्याप्त हैं। कॉमकोसा सैन्य साजो-सामान के आदान-प्रदान से संबंधित समझौता करने के दो साल बाद संपन्न हुआ है।

इसका महत्त्व इसी से समझा जा सकता है कि अमेरिका ने गैर नाटो देशों में भारत के साथ ही पहली बार यह समझौता किया है। इससे भारत को अमेरिका की संवदेनशील रक्षा प्रौद्योगिक तक पहुंच हो गई है। इसके परिणामों को देखना होगा किंतु इस समय तो भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों की नींद हराम हो गई होगी। हॉट लाइन आरंभ होने का अर्थ है कि दोनों देशों के रक्षा और विदेशमंत्री किसी भी परिस्थिति में सीधे बात कर सकते हैं। यह रक्षा और विदेश मामलों में दोनों के प्रगाढ़ होते संबंधों का ही द्योतक है। इसी तरह अमेरिका ने नाभिकीय आपूत्तिकर्ता समूह या एनएसजी में भारत की सदस्यता जल्द-से-जल्द सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करने की भी मंजूरी दी है। भारत काफी समय से एनएसजी में शामिल होने का प्रयास कर रहा है लेकिन चीन के विरोध के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है। दूसरे कुछ देश चीन के कारण ही भारत के पक्ष में नहीं आ पाते। शायद अमेरिकी प्रभाव का असर हो एवं भारत को इसमें सफलता मिले। जहां तक पाकिस्तान पर दबाव का प्रश्न है तो आतंकवाद के संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन कड़ा रुख अपनाए हुए है एवं पाकिस्तान को मिलने वाली सहायता तक रोकी है। हां, जिस आंतकवाद से भारत पीड़ित है, उसके संदर्भ में भी वह उतना ही कठोर रहता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।


हमारे हित और अमेरिका की भूमिका

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

भारत और अमेरिका के बीच हुई ‘टू प्लस टू वार्ता’ कई आशंकाओं को जन्म देने के बाद भी उम्मीद बंधाती है। अच्छी बात यह है कि अमेरिका ने इस वार्ता के माध्यम से हमें अपने सहयोगी का दर्जा दिया है। ‘क्वाड’ (चतुष्कोणीय गठबंधन का संक्षिप्त रूप) के सदस्यों के साथ अमेरिका ने टू प्लस टू वार्ता की अनोखी पहल शुरू की है, जिसके दो अन्य सदस्य देश ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ यह होता भी रहा है। मगर ये दोनों उसके सहयोगी देश हैं। इसीलिए यदि अब हमें यह दर्जा हासिल हुआ है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। भारत और अमेरिका में इस तरह की बातचीत जरूरी थी, ताकि दोनों देश एक-दूसरे के विचार और दृष्टिकोण जान सकें। कई बार यह देखा गया है कि भारत के हितों पर अमेरिका उस कदर मुखर नहीं हुआ, जितनी अपेक्षा थी। मसलन, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को लेकर ही वह इस्लामाबाद पर दबाव नहीं बना पा रहा है। अगर वह उस पर थोड़ा-बहुत दबाव बनाता भी है, तो वह अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं को लेकर होता है, उसमें भारत का पक्ष कमोबेश अनसुना ही रहता है। टू प्लस टू वार्ता में शामिल होने के लिए ही अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो पाकिस्तान होकर आए थे, जहां उन्होंने दबाव डालने की बजाय अपनी अपेक्षाएं बताईं।

प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी देश का उसका दर्जा भी अब तक कायम है। इसका साफ अर्थ है कि पाकिस्तान अब भी अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण देश है, और खासतौर से अफगाानिस्तान मसले पर उसका एक प्रमुख सहयोगी बना हुआ है। इसी तरह, कई ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने विभाग की सलाह के इतर फैसले लिए और अपनी नीति की घोषणा ट्विटर पर की। लिहाजा यह जरूरी था कि अमेरिका में बन रहे इस नए सिस्टम को भारत समझे। टू प्लस टू वार्ता में कई ऐसे फैसले हुए हैं, जो भारत के नजरिये से बेहतर माने जाएंगे। रणनीतिक रूप से अहम संचार, संगतता, सुरक्षा समझौता (कॉमकोसा, यानी कम्युनिकेशन, कॉम्पैटिबिलिटी ऐंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) इसमें सबसे महत्वपूर्ण है। अच्छी बात यह है कि इसमें भारत की चिंताओं को शामिल करके इसे ‘इंडिया स्पेसिफिक’ बनाया गया है। इसके तहत भारत को अपनी सेना के लिए अमेरिका से कुछ आधुनिक संचार प्रणाली मिलेगी। इसके अलावा, अमेरिका से जो भी रक्षा उपकरण भारत आएंगे, सिर्फ वही अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर इस्तेमाल किए जाएंगे।

भारत में मौजूद अन्य रक्षा उपकरणों पर ऐसी कोई बंदिश नहीं होगी। असल में, अमेरिका इस समझौते के तहत सभी रक्षा उपकरणों को अपने प्लेटफॉर्म पर लाने का आग्रही रहा है। अगर ऐसा होता, तो हमें अपना पूरा रक्षा तंत्र अमेरिका के साथ साझा करना पड़ता। चूंकि हमने कई अन्य देशों से भी रक्षा समझौते किए हैं और उनसे सैन्य उपकरण खरीदें हैं, इसीलिए अमेरिकी बंदिश को मानने का अर्थ उन तमाम देशों की सुरक्षा तकनीकों की गोपनीयता को भंग करना होता। यह हमारे हित में कतई नहीं था। दूसरी अच्छी बात यह हुई है कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गुटों का नाम लिया गया है और मिलकर उनके खिलाफ कार्रवाई करने पर सहमति बनी है। आतंकवाद से लड़ने के लिए अमेरिका के साथ एक ग्रुप हमने पहले से बना रखा है। उम्मीद है कि अब यह और बेहतर तरीके से काम कर सकेगा। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि हाफिज सईद, मसूद अजहर या दाऊद इब्राहिम जैसे आतंकियों के खिलाफ तुरंत बड़ी कार्रवाई होगी। ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिका के अपने हित पाकिस्तान के साथ जुड़े हुए हैं। लिहाजा भारत को भी कुछ खास सावधानी बरतनी होगी। विशेषकर कश्मीर में जिस तरह के आतंकियों के हौसले बढ़े हैं, उसके खिलाफ अपने तईं उसे कड़ी कार्रवाई करनी ही होगी।

इंडो-पैसिफिक के मसले पर भी भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़ते हुए दिख रहे हैं। हालांकि यहां भी समझने की बात है कि अमेरिका का चीन के साथ एक जटिल रिश्ता है। लिहाजा भारत को पूरी तरह संभलकर आगे बढ़ना होगा। खासतौर से, कारोबार के मामले में दूसरे तमाम देशों से अच्छे रिश्ते बनाकर चलने में ही हमारी भलाई है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अमेरिका तमाम तरह के प्रतिबंध आयद करने की बात कहता रहता है। लिहाजा क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसीईपी) पर संजीदगी से आगे बढ़ना हमारे हित में होगा। यह मुक्त व्यापार को लेकर एक ऐसा प्रस्तावित समझौता है, जो आसियान के सभी दस देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों को भी एक साथ जोड़ता है। इसमें हम चीन के साथ बेशक सोच-समझकर आगे बढ़ें, पर दूसरे तमाम देशों के साथ हमें तेजी से कदम बढ़ना होगा।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि अमेरिका के साथ आगे बढ़ना हमारे हित में है। मगर हम उसके अधीनस्थ सहयोगी की भूमिका नहीं निभा सकते। अमेरिका जब अपने हितों के मद्देनजर पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए हुए है, तो हमें भी उसकी चिंता करते हुए ईरान और रूस के साथ अपने संबंधों की बलि नहीं देनी चाहिए। हालांकि जरूरी यह भी है कि हम तुर्की की तरह अमेरिका की सीधे-सीधे नाराजगी मोल न लें। गंभीर चिंतन के बाद उन मसलों पर आगे बढ़ें, जिसे लेकर ह्वाइट हाउस का रवैया सख्त है। अमेरिका में अब भी कई ऐसे लोग हैं, जो भारत के नजरिये का समर्थन करते हैं। ऐसे में, उम्मीद यही है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव के बाद यदि वहां की कांग्रेस (संसद) की तस्वीर बदलती है, तो अमेरिका की नीतियां कहीं अधिक स्पष्ट रूप में हमारे सामने आ सकती हैं। हमारा लक्ष्य दुनिया की तीन सबसे बड़ी ताकतों में शुमार होने का है। हमें इसी लक्ष्य के मद्देनजर अपनी नीतियां बनानी चाहिए। और इसमें जरूरी है कि हम एक व्यापक और समग्र सोच रखें। हमें चीन के साथ भी संबंध बेहतर बनाने होंगे और रूस के साथ बने रिश्ते की गरमाहट भी बरकरार रखनी है। अमेरिका का साझीदार बनने के लिए हम दूसरे देशों के साथ अपने रिश्ते खराब नहीं कर सकते।


मदद और निहितार्थ


भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में रिश्तों की जो नई शुरुआत हुई है, वह दोनों देशों के लिए मील का एक पत्थर है। यह बात इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि रक्षा क्षेत्र में भारत दशकों तक पूरी तरह से रूस पर निर्भर रहा है। लेकिन अब बदलते वैश्विक परिदृश्य और समीकरणों में रिश्तों की यह धुरी बदली है और अमेरिका को नया रक्षा सहयोगी बनाने की दिशा में भारत ने कदम बढ़ाए हैं। एक लिहाज से यह अच्छा इसलिए भी माना जाना चाहिए कि हम अब किसी एक देश या ताकत पर आश्रित नहीं रहेंगे, बल्कि जरूरत के मुताबिक अपने सैन्य बलों को अत्याधुनिक बनाने का फैसला कर सकेंगे। इसके अलावा वैश्विक महाशक्तियों के साथ रिश्तों में एक संतुलन बनेगा और भारत पर किसी का मोहरा बनने का ठप्पा भी नहीं लगेगा। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसमें न सिर्फ भारत के बल्कि अमेरिका के भी दूरगामी हित शामिल हैं। दस साल पहले तक अमेरिका के साथ रक्षा व्यापार मामूली था, लेकिन आज भारत उससे दस अरब डॉलर से ज्यादा के उपकरण खरीद रहा है और आने वाले दिनों में इसमें तेजी से इजाफा होगा।

भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों की वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच जो कॉमकासा (कम्युनिकेशंस, कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) संधि हुई है, उसके तहत भारत को रक्षा क्षेत्र में काफी कुछ नया हासिल होने जा रहा है। इसके तहत अमेरिका भारत को सभी गोपनीय सुरक्षा तकनीक देगा, सेना को अत्याधुनिक संचार प्रणाली से लैस करने लिए तकनीक मिलेगी और सी-17 व सी-130 हरक्यूलिस जैसे विमान भारत में बनने का रास्ता खुलेगा। इससे भी बड़ी बात यह कि अमेरिका सारे संवेदनशील डाटा भारत को मुहैया कराएगा, जो सुरक्षा के लिहाज से भारत के लिए जरूरी होंगे। अमेरिका ने वादा किया है कि चीन और पाकिस्तान की सैन्य तैयारियों को लेकर भी वह भारत को सूचनाएं देता रहेगा। इन दोनों देशों की गतिविधियों की निगरानी के लिए अमेरिका ड्रोन तकनीक भी देगा। इस करार से कुल मिला कर ऐसा संदेश जाता है कि जैसे भारत की झोली भरने को अमेरिका तैयार बैठा था।

लेकिन सवाल है कि अमेरिका भारत के प्रति इतनी दरियादिली दिखा क्यों रहा है। ऐसी क्या बात है कि भारत पर ट्रंप प्रशासन इतना मेहरबान हुआ है? जाहिर है, इसमें उसके हित और स्वार्थ कहीं ज्यादा बड़े हैं। भारत को चीन और पाकिस्तान का खौफ दिखा कर भारत के रक्षा क्षेत्र में पैर पसारने की यह अमेरिकी कवायद दूरगामी मतलब लिए हुए है। हमारी जरूरत यह है कि हमें चीन और पाकिस्तान को यह अहसास कराते रहना है कि सैन्य ताकत के मुकाबले में हम उनसे कहीं पीछे नहीं रहेंगे और हर स्थिति का सामना करने को तैयार हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में एक सैन्य ताकत के रूप में दबदबा बनेगा। लेकिन अमेरिका इस बहाने चीन से निपटने की दूरगामी रणनीति पर चल रहा है। वह भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया की मदद से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अपना दबदबा कायम करना चाह रहा है। इस बारे में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया केबीच साल भर के दौरान दो बार बैठकें हो चुकी हैं और इसे नए गठजोड़ के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा क्षेत्र में भारत को भारी मदद की आड़ में ईरान से दूर करने की रीति पर भी अमेरिका काम कर रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो अमेरिका दशकों से पाकिस्तान को पालता-पोसता रहा है, जिस पर उसका वरदहस्त रहा है और जो आज भी बना हुआ है, वह भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में कैसे और कितना बड़ा सहयोगी साबित होगा?


अनुच्छेद 35-ए : भ्रम और निदान

भीम सिंह

यह दुर्भाग्यपूर्ण एवं दुखद ऐतिहासिक घटना है, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर आज भी भारतीय संविधान के साथ जुड़ नहीं पाया है। भारतीय संविधान का निर्माण भारत की संविधान सभा ने 1949 में संपन्न किया था और 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान को लागू कर दिया था। संविधान में सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय था, अध्याय-3 जिसमें अनुच्छेद 12 से 35 तक मानवाधिकारों का उल्लेख है। ये मानवाधिकार सभी भारतीय नागरिकों के अलावा कुछ गैर-नागरिकों को भी दिए गए थे, जैसे अनुच्छेद 21, जो मानवाधिकार अध्याय-3 में दर्ज है। इसके अनुसार जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भारत वर्ष में रह रहे सभी लोगों को प्राप्त है, चाहे वे नागरिक हों या भारत में रह रहे हों। त्रासदी यह रही कि अध्याय-3 को जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया गया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के प्रश्न को संविधान के अनुच्छेद 370 को अस्थायी रूप से डाल कर एक भयंकर गलती की गई।

इसके लिए कौन जिम्मेदार है, कौन कसूवार है, इस वक्त इस बारे में विचार-विमर्श करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इतिहास के पन्नों को पलटने और उन पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। दूसरी गलती भारत सरकार ने 1954 में की, जब जम्मू-कश्मीर के लिए वहां के नागरिकों के मानवाधिकारों, जो भारतीय संविधान में सुनिश्चित थे, पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। 14 मई, 1954 को शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की हिरासत का औचित्य सिद्ध करने के लिए भारतीय संविधान के अध्याय-3 में अनुच्छेद 35 के साथ ‘ए’ जोड़ दिया गया। अध्याय-3 के अनुच्छेद 12 से 35 तक को समझने की जरूरत है, जिसमें भारतीय संविधान में दिए गए सभी मानवाधिकार शामिल हैं। ये मानवाधिकार भारत के सभी नागरिकों को प्राप्त थे, इनमें जम्मू-कश्मीर में रहने वाले सभी नागरिक भी शामिल थे। इस मानवाधिकार के अध्याय को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35-ए ने किस तरह रौंद डाला, इसका उल्लेख मैं सभी नागरिकों, भारतवासियों और जम्मू-कश्मीर में रहने वाले नागरिकों से करना चाहूंगा कि जो भारतीय संविधान के अनुसार भारतीय नागरिक हैं और उनमें मैं भी शामिल हूं।

इतिहास में एक बहुत बड़ी घटना यह हुई थी कि जब 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ तो भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य को शामिल नहीं किया गया, बल्कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह के पद को भी नहीं छेड़ा गया, क्योंकि महाराजा हरिसिंह 1949 में स्वेच्छा से जम्मू-कश्मीर छोड़ कर बंबई चले गए थे। 26 जनवरी, 1950 जिस दिन भारत का संविधान लागू किया गया, उस दिन भी जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ही अस्थायी शासक थे। उनकी अनुपस्थिति के बहाने उनके बेटे युवराज कर्णसिंह को जम्मू-कश्मीर का राजप्रमुख (सदर-ए-रियासत) नियुक्त किया गया। सबसे दुखदायी घटना यह थी कि महाराजा हरिसिंह के ऐतिहासिक विलयपत्र के अनुसार महाराजा को तीन विषयों रक्षा, विदेश और संचार इत्यादि के अधिकार विलयपत्र को स्वीकार करते हुए भी संसद को नहीं सौंपे गए, यानी भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 जोड़कर इन विषयों पर भी भारतीय संसद को कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया गया।

ये विषय महाराजा हरिसिंह ने भारतीय संसद को सौंप दिए थे, जैसे बाकी पांच सौ पचहत्तर रियासतों ने भारत के सौंपे थे। उन रियासतों के शासकों ने बाद में भारत संघ में विलय कर दिया था, परंतु जम्मू-कश्मीर के बारे में कोई भी निर्णय भारतीय संसद आज तक नहीं कर सकी। यहां इस बात का उल्लेख करना भी आवश्यक है कि दो रियासतों- हैदराबाद और जूनागढ़, जिन्हें भारत संघ में 26 जनवरी, 1950 में शामिल किया गया था, के शासकों ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। एक बहुत बड़ा प्रश्न यह है कि भारतीय संसद ने जम्मू-कश्मीर में राजशाही को क्यों नहीं हटाया था, जबकि वहां के महाराजा और लोकप्रिय नेतृत्व ने जम्मू-कश्मीर की विलय प्रक्रिया को पूरा समर्थन किया था। इस प्रश्न का उत्तर भी एक दिन भारत के इतिहासकारों को देना होगा। 26 जनवरी, 1957 को जम्मू-कश्मीर में जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू हुआ, जिसमें भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लेख तक नहीं है। आज भी जम्मू-कश्मीर के संविधान में भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का कोई उल्लेख नहीं है।

उच्चतम न्यायालय का योगदान है कि भारतीय संविधान में दिए गए कई मानवाधिकार जम्मू-कश्मीर में रहने वाले भारतीय नागरिकों को भी उपलब्ध हैं। यह आश्चर्य की बात है कि जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान के अनुसार पूरे भारत का अटूट अंग है, परंतु वहां रहने वाले भारतीय नागरिक आज भी मानवाधिकारों से वंचित हैं, जो पूरे भारत के नागरिकों को हासिल हैं। इसकी बहुत बड़ी वजह यह है कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार के अध्याय को लागू नहीं किया गया और इसका कारण था कि सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सरकार जब चाहे, जनसुरक्षा कानून के तहत जानवरों की तरह जेलों में बंद कर सकती है। इसका उल्लेख भी आवश्यक है कि 1954 में शेख अब्दुल्ला के ब्रिटेन से आए हुए वकील डिंगल फुट ने जम्मू की एक अदालत में यह प्रश्न उठाया था कि शेख अब्दुल्ला को तीन महीने से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि यह गारंटी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 इत्यादि में दी गई है।

तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद को असीमित शक्ति और अधिकार देने के लिए अनुच्छेद 35-ए को जन्म दिया गया, जिसके कारण भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर सरकार को असीमित अधिकार दे दिया, जिसके अनुसार जम्मू-कश्मीर सरकार को अपना जनसुरक्षा कानून बनाने का अधिकार मिल गया। आज भी जम्मू-कश्मीर में जनसुरक्षा कानून 1978 लागू है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति / राजनीतिक कार्यकर्ता को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा जा सकता है, इनमें आज भी सैकड़ों लोग जम्मू-कश्मीर से राज्य की जेलों में ही नहीं, बल्कि पूरे देश की जेलों में बंद हैं। आज का इतिहास इस बात पर जोर दे रहा है कि जम्मू-कश्मीर के ही नहीं पूरे भारतवर्ष के लोग विशेषकर यहां के सांसदों को इस बात को समझने की कोशिश करनी चाहिए कि इस अन्याय से भरे हुए अनुच्छेद 35-ए में दर्ज कानून को जम्मू-कश्मीर के भूतपूर्व शासक क्यों समर्थन दे रहे हैं। इसका उत्तर मेरे पास है कि ऐसे ही जनविरोधी कानून का इस्तेमाल करके जम्मू-कश्मीर के हजारों नौजवानों, राजनीतिक कार्यकर्ता इत्यादि को जेलों में रखा गया।

आश्चर्य की बात यह है कि आज जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35-ए के विरुद्ध युद्ध कौन कर रहा है नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और बाकी वे लोग, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों पर रोक लगा रखी थी और आज भी यही सोच रहे हैं कि कल ऐसा न हो कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को विशेषकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मानवाधिकार प्राप्त हो जाएं, जिसका आश्वासन भारतीय संविधान के अध्याय-3 में दर्ज अनुच्छेद 12 से 35 में है। भारतीय संविधान के अध्याय-3 को अनुच्छेद 370 के किसी भी दायरे में नहीं रखा गया है। अनुच्छेद 370 का विषय क्या है और अनुच्छेद 370 संसद से लेकर राष्ट्रपति तक हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देता। अनुच्छेद 35-ए को राष्ट्रपति छह महीने तक संविधान के अनुसार लागू कर सकते थे और यह संशोधन सिर्फ छह महीने तक ही लागू रह सकता था, यानी 1955 से अनुच्छेद 35-ए भारतीय संविधान में असंवैधानिक चल रहा है। जम्मू-कश्मीर में भी वहां के लोगों को भारतीय संविधान में दिए गए सभी मानवाधिकार उसी तरह प्राप्त हैं, जिस तरह देश के बाकी नागरिकों को। जहां तक जम्मू-कश्मीर ‘स्टेट सब्जेक्ट’ के विषय का संबंध है, यह कानून महाराजा हरिसिंह ने 1927 में लागू किया था, जिसे भारतीय संविधान ने स्वीकार किया है।


2+2 = ?

India must watch its side of the ledger while deepening defence ties with the U.S.


The India-U.S. defence relationship has been given a significant boost with the three agreements signed on Thursday after the inaugural 2+2 Dialogue in Delhi: the Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA), “hotlines” between the Defence and Foreign Ministers of both countries, and the first tri-services military exercises between the two countries. COMCASA is the third of four “foundational”, or enabling, agreements signed by India after more than a decade of negotiations, and is perceived as an inevitable consequence of the large amount of U.S. defence hardware it has been purchasing. This will increase, going forward, given the U.S. decision to include India in the top tier of countries entitled to Strategic Trade Authorisation (STA-1).

Apart from the defence agreements, both sides said in a joint statement that they had discussed trade issues, cooperation on fighting terrorism, advancing “a free, open, and inclusive Indo-Pacific region” and promoting sustainable “debt-financing” in the region. The last two points are clearly aimed at Beijing’s role in the South China Sea and the Belt and Road Initiative projects, respectively. The 2+2 discussions, held after two previous cancellations this year, brought much-needed focus on the India-U.S. relationship after months of drift and occasional discord. However, while trade was addressed, India did not receive a clear-cut assurance of its GSP (Generalised System of Preferences) status being restored, or of waivers on steel and aluminium tariffs imposed by Washington.

Instead, U.S. officials said clearly that they expect India to increase imports of American oil and gas as well as aircraft in order to wipe out the trade surplus India enjoys. It is unclear whether the Centre has acquiesced to this blatantly anti-free market demand, but its silence on the matter is disturbing.  The U.S.’s other demand, to “zero out” oil imports from Iran by November, is simply unreasonable. It would hurt India dearly not only because of costs at a time when the dollar is strengthening and fuel prices are going up, but also in terms of its substantial engagement with Iran. No public statement was made on what the U.S. will do on India’s investment in the Chabahar port once its full sanctions kick in on November 4. American officials also gave no firm commitment in their statements that India will receive a waiver to purchase Russian hardware, beginning with the S-400 missile system. While signing agreements the U.S. has pursued for years, India appears to have taken a leap of faith on its own concerns, expecting that the Trump administration will come through on waiving sanctions and being more flexible on trade issues. Delhi must work with Washington in the next few months to ensure that the benefits from the 2+2 dialogue don’t add up only on the other side.