News clipping on 29-07-2018


Why top-down Hindu reform is not a good idea

Swapan Dasgupta, (The writer is Well-known journalist and political commentator)

For Bengali Hindus, no visit to the sea resort of Puri is complete without a darshan of Lord Jagannath at the 12th century temple. The shrine is, along with the Vishwanath temple in Varanasi and the Kamakhya temple in Guwahati, among the favoured pilgrimage spots in eastern India. The last occasion I visited the Jagannath temple, jostling my way through the crowds, assisted by a pushy panda (also called a temple servitor), I noticed six white men and women, sitting silently on the street, discreetly separated from the rows of beggars that are a part of Puri’s landscape. I was told they professed to be bhakts who were barred from entering the temple owing to the entry ban on non-Hindus. It was a sad sight and an unfamiliar one since most Hindu temples are open to all.

Among the more prominent ones that are still for the exclusive darshan of Hindus are the Vishwanath temple, the Lingaraja temple, Guruvayur, Padmanabhaswamy temple, Kamakshi Amman temple and Kapaleeshwarar temple. Additionally, the Sabarimala shrine prohibits the entry of women from the ages of 12 to 50. Considering the lakhs of temples in India, these are the exceptions to the open-entry rule. Earlier this month, the Supreme Court suggested to the custodians of the Puri shrine that they open the Jagannath temple to all worshippers, regardless of their nominal religious status.

The court held that “Hinduism as a religion incorporates all forms of belief without mandating the selection or elimination of any one single belief. It is a religion that has no single founder; no single scripture and no single set of teachings. It has been described as Sanatana Dharma… as it is the collective wisdom and inspiration of the centuries that Hinduism seeks to preach and propagate.” The reaction of the temple community has so far been extremely hostile to the court’s suggestion.

Last week, the apex court also held hearings on a petition seeking the unrestricted right of women to worship Lord Ayyappa in Sabarimala. Although the hearings are still on, devotees are concerned that the court may use Article 25(2) of the Constitution, sanctioning temple entry to all sections of Hindus, to overturn an entrenched local tradition. Radical supporters of the petitioners have also argued that the court should not rely on a dissection of religious custom and beliefs but on secular Constitutional morality — gender justice. The attempts to change Hindu practices and customs aren’t unique. From the time of Gautam Buddha to the 1950s, when Hindu personal laws were radically modified by Parliament, the Sanatana Dharma has been witnessing unending reformation.

With urbanisation, global exposure and democratic politics, modern-day Hinduism has undergone profound changes without the community of believers perceiving an existential threat to their self-identity as Hindus. Indeed, it can be argued that a Hindu identity that incorporates faith, social customs and even politics is more all-encompassing today than ever before. To that extent, any court decision won’t affect the integrity of Hinduism, although it may generate momentary regional tensions.

The larger question is: how is change being introduced? Earlier, the Hindu reformation was preceded by energetic social reform movements that were either centred on a re-examination of the shastras or an invocation of human dignity. Although legislation seemed important to some individuals, the reformers that had the greatest impact — Dayanand Saraswati, Swami Vivekananda, Narayana Guru, to name only a few — were more concerned with changing attitudes.

Mahatma Gandhi twinned his battle for political freedom with an unceasing crusade to lift the so-called untouchables from social degradation. The reformist features of the Constitution were preceded by his bid to cleanse Hindu society of indignity. Today unfortunately, reform has become top down. There are many earnest activists in India committed to forcing social change. But their political clout and influence in society is negligible. More to the point, they don’t identify with the institutions and beliefs of Hindu society. Many would even be embarrassed calling themselves Hindu.

For them, what matters is not the cleansing of a religion that has defined India, but Constitutional morality based on Western progressive values. It is this curious alliance between rootless rationalism and the upholders of judicial absolutism — the shortcut alternative to patient, democratic politics — that is driving many of the changes in Indian society. However, the change is often lacking in social depth, and could even trigger a backlash that is viciously inimical to change altogether. The judiciary can disregard customs and even faith, but it can’t persuade society to regard the new norms as just and necessary.


आरक्षण पर भारी विकास का मॉडल

हरिमोहन मिश्र

आरक्षण को लेकर कुछ समय से देश में नये तरह की बेचैनी दिख रही है। एक तरफ उन समुदायों की ओर से आरक्षण की मांग हो रही है, जो पहले इसकी जरूरत महसूस नहीं करते थे। मसलन, महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट, आंध्र प्रदेश के कापू, गुजरात में पाटीदार वगैरह। दूसरे, अनुसूचित जाति-जनजाति के आरक्षण को लेकर पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक नई हलचल पैदा हुई है। दरअसल, आरक्षण को लेकर इन दोनों बहसों का रिश्ता गहराते कृषि और आर्थिक संकट से ज्यादा लगता है। पहले दूसरी बहस पर गौर करते हैं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आर. भानुमति और जस्टिस ए.एम. खानिवलकर की पीठ ने कहा कि एक बार आरक्षित वर्ग में आवेदन कर उसमें छूट और अन्य रियायतें लेने के बाद उम्मीदवार आरक्षित वर्ग में ही नौकरी का हकदार होगा। उसे सामान्य वर्ग में नहीं डाला जा सकता। एक महिला याचिकाकर्ता ने कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उसे सामान्य वर्ग में नौकरी दी जाए क्योंकि उसने लिखित परीक्षा में सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से ज्यादा अंक हासिल किए हैं।

इसके बाद से यह बहस भी चल पड़ी है कि अनुसूचित जातियों में क्रीमी लेयर की अवधारणा लाई जाए, जिससे खासकर दलित समुदायों में यह डर पैदा हो गया है कि कहीं यह आरक्षण खत्म करने की साजिश तो नहीं है। इसी से जुड़ा मामला प्रमोशन में आरक्षण का भी है। अगर हम आरक्षण की मूल अवधारणा को देखें तो एक नया पहलू उभरता है। आरक्षण सकारात्मक भेदभाव की उस अवधारणा से निकला है, जिसके तहत सामुदायिक स्तर पर वंचित समूहों को बराबरी के मौके मुहैया कराए जा सकें। ऐसे में अगर कोई बराबरी की विलक्षणता साबित कर देता है, तो उसे स्वत: सामान्य कोटे में जगह मिल जानी चाहिए। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि सिकुड़ते अवसरों से सामान्य वगरे में यह भय है कि इससे उनके अवसर सीमित होंगे यानी आरक्षण की अवधारणा जिस सामुदायिक भेदभाव को तोड़ने के लिए लागू की गई थी, वही खोता जा रहा है। याद करें कि आजादी के बाद जब यह व्यवस्था लागू हुई थी तो सामान्य वगरे से विरोध न के बराबर हुआ था। इसे दलित, ओबीसी समूहों की ओर से निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग को जोड़कर देखें तो यह साफ दिखेगा की इसका एक सूत्र यकीनन देश के कृषि और आर्थिक संकट से जुड़ता है।

अब मराठा जैसी ताकतवर जातियों के आरक्षण की मांग पर लौटें तो यह तस्वीर बहुत कुछ साफ नजर आने लगेगी। महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट, गुजरात में पाटीदार, आंध्र प्रदेश में कापू, ये सभी खेतिहर समुदाय रहे हैं, और अपने-अपने इलाकों में अच्छा दबदबा भी रखते रहे हैं। इन समुदायों का सियासी असर भी काफी रहा है, और इनके नेता आला पदों पर पहुंचते रहे हैं। इससे एक नतीजा निकालना तो आसान है कि सियासत में इन समुदायों के कुछ पिछड़ने से ये चिंगारियां फूट रही हैं। लेकिन यह बेहद सरलीकरण होगा और इससे सामाजिक सच्चाइयों का खुलासा नहीं होता। दूसरे, कुछ लोग यह दलील भी दे सकते हैं कि मोटे तौर पर ये आंदोलन आरक्षण की व्यवस्था पर ही सवाल उठा रहे हैं, और निचली जातियों के कुछ ऊपर पहुंचने से इनमें रोष दिख रहा है। लेकिन आंकड़े इसकी गवाही नहीं देते। अभी भी अफसरशाही और उच्च संस्थानों में एक मोटे अनुमान से अनुसूचित जाति-जनजाति या पिछड़ी जातियों के लोग बमुश्किल 3-4 प्रतिशत ही पहुंच पाए हैं। देश में खरबपतियों की फेहरिस्त दुनिया के अमीर देशों से होड़ लेने लगी है, लेकिन ऊपरी हलकों में इन जातियों की पहुंच नहीं हो पाई है।

सरकारी ही नहीं, गैर-सरकारी संस्थानों में अभी भी बेहद थोड़े लोग ही निचली जातियों से पहुंच पाते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में भी इनकी पहुंच गिनती की है। यह अवस्था कई दशकों के आरक्षण व्यवस्था के बाद है। इसलिए अटकलों को छोड़ दें तो इस दलील में दम नहीं दिखता।इसलिए मजबूत खेतिहर समाजों की ओर से आरक्षण की मांग की असलियत कुछ दूसरे तनाव और दबाव हो सकते हैं, जो अब बड़े पैमाने पर महसूस किए जाने लगे हैं। अब तो इसमें शक की गुंजाइश नहीं रह गई है कि ग्रामीण आमदनी में भारी कमी आई है। आज सरकार किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए तरह-तरह की घोषणाएं कर रही है, लेकिन उसमें उसे कितनी सफलता हासिल हुई है, यह संदिग्ध है। केंद्र में एनडीए की नरेन्द्र मोदी सरकार 2014 में यह वादा करके ही आई थी कि वह किसानों की आय दोगुनी कर देगी। इसके बदले पिछले चार साल में किसानों की आमदनी और घट गई। हाल में खरीफ की फसल पर लागत से डेढ़ गुना अधिक समर्थन मूल्य का ऐलान किया गया, लेकिन किसान संगठन उसे पर्याप्त नहीं मानते क्योंकि यह पुराने ए2एफएल फॉमूले पर तय किया गया है, न कि नये सी2 फॉर्मूले पर।

इससे ज्यादा इजाफा नहीं हो पाया है यानी संकट बड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। किसानों की आत्महत्या भी इस संकट का भयावह इजहार करते हैं। यह भी अब किसी शोध का विषय नहीं रह गया है कि इस दौर में छोटे उद्योग-धंधों की हालत खास्ता हुई है। इससे अब इनकार करना मुश्किल है कि किसानी अब घाटे का सौदा हो गई है, या कहिए बना दी गई है। उसके मुकाबले औद्योगिक उत्पादों की कीमत कई गुना बढ़ा दी गई है। दाम में कोई संतुलन नहीं है। सरकार कृषि जिंसों के दाम पर नियंतण्ररखती है, लेकिन कारखानों के उत्पादों पर उसका कोई नियंतण्रनहीं होता। दाम में नियंतण्रकायम रखने के लिए समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने खेती की उपज और कारखाने के उत्पादों के दाम में एक संतुलन की मांग की थी, और दाम बांधो आंदोलन चलाया था। लेकिन उदारीकरण के बाद तो औद्योगिक उत्पादों के दाम बेपनाह बढ़ते गए। यही नहीं हुआ, बड़े उद्योगों को तरजीह देने से छोटे उद्योग मरते गए हैं।

छोटी पूंजी का कोई अर्थ नहीं रह गया है। प्रधानमंत्री मोदी जरूर कहते हैं कि पकोड़े बनाने वाला भी कमा रहा है। सरकार यह दलील भी दे रही है कि छोटे उद्योगों को मुद्रा कर्ज योजना से काफी अवसर पैदा किए गए हैं। लेकिन मुद्रा कर्ज से औसत रकम 70,000 रु पए ही है। इतनी-सी रकम में भला आज कौन-सा काम शुरू किया जा सकता है। यह सब गिनाने का मतलब सिर्फ यह है कि संकट लगातार बड़ा होता जा रहा है, और समाज में उसके असर विभिन्न रूपों में दिख रहे हैं। यह तंगहाली समाज आपसी रंजिशें भी पैदा कर रही है, और उन विचारों पर भी चोट कर रही है जो हमारे राष्ट्र और संविधान-निर्माताओं ने देश में बराबरी का माहौल पैदा करने के लिए सोचा था। इसी तरह बड़े उद्योगों को तरजीह देने से छोटे उद्योग मरते जा रहे हैं। छोटी पूंजी का कोई अर्थ नहीं रह गया है।

अब एक बार फिर अनुसूचित जातियों के आरक्षण के मामले में लौटते हैं। कृषि क्षेत्र और छोटे उद्योग-धंधों के चौपट होने से बेशक, दलित और पिछड़े समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। लेकिन इसका दंश सामान्य वर्ग के लोग भी झेलने को मजबूर हैं। इसलिए आपसी होड़ और स्पर्धा का माहौल तीखा होता जा रहा है। इसे समझे बिना और अवसरों को बढ़ाए बिना सामाजिक फांक बढ़ने की ही आशंका है। इसलिए हमें अपनी आर्थिक दिशा पर नये सिरे से विचार करना होगा, जो लोगों को अवसरों से वंचित कर रही है। दरअसल, गहराता आर्थिक संकट और विकास का मौजूदा मॉडल ही आरक्षण के मामले को तीखा कर रहा है। इसलिए विकास का मॉडल ऐसा बनाइए, जिससे देश में सकारात्मक माहौल पैदा हो सके। महज विकास की रट लगाने से बात नहीं बनेगी, यह तय करना होगा कि हम विकास के किस रास्ते पर चल कर देश और समाज को समतामूलक आयाम दे सकते हैं। तभी स्थितियां बदलेंगी।


बुनियादी सुधार की पहल

डॉ विशेष गुप्ता

बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून में बदलाव से जुड़ा बिल लोक सभा से पारित हो गया। उम्मीद है कि यह बिल जल्दी ही राज्य सभा से भी पारित हो जायेगा। इस विधेयक में पांचवीं और आठवीं कक्षा में छात्र को एक बार फिर से फेल करने का प्रावधान किया गया है। इस बिल के पारित होने के बाद स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की संभावनाएं बढ़ गयी हैं। दरअसल, एक अप्रैल 2010 को जब शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया था, उस समय आठवीं कक्षा तक के बच्चों को फेल व पास के झंझट से मुक्ति दे दी गयी थी। इससे जुड़ा जो बिल लोक सभा से पारित हुआ है, उसकी खास बात यह है कि उसमें छात्र को फेल करने का प्रावधान तो रखा ही है। साथ में छात्र के फेल होने पर भी उसे परीक्षा देने का एक मौका और देने का प्रावधान भी इसमें जोड़ा गया है। इस पारित बिल के तहत छात्र का परीक्षाफल जारी होने के दो से तीन महीने के अंदर ही उसकी दोबारा परीक्षा ली जायेगी। इस परीक्षा में भी यदि वह छात्र दोबारा फेल हो जाता है तो उसके बाद ही वह छात्र उस कक्षा में दोबारा पढ़ाई कर सकेगा।केन्द्र सरकार ने यह बिल ऐसे समय पारित किया है, जब देश की प्राथमिक शिक्षा अनेक प्रकार की विसंगतियों से जूझ रही है।

खास बात यह है कि मौजूदा नीति के चलते ही बुनियादी शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है। इसी कारण देश में शिक्षा अधिकार कानून में निहित छात्रों को कक्षा आठ तक फेल न करने की नीति को समाप्त करने की मांग भी लगातार उठ रही थी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि राइट टू एजुकेशन-2009 के सेक्शन-16 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि बच्चे को स्कूल में तब तक फेल नहीं किया जायेगा, जब तक वह बुनियादी शिक्षा प्राप्त नहीं कर लेता।बुनियादी शिक्षा पर पिछले दिनों ‘‘असर’ व अन्य संस्थाओं की जो सव्रे रिपोर्ट सामने आयीं हैं, उनसे साफ हुआ कि कक्षा आठ का छात्र पांचवीं कक्षा और कक्षा पांच का छात्र कक्षा दो-तीन का सामान्य गणित भी हल नहीं कर पा रहा है। बुनियादी शिक्षा की इस चिंताजनक तस्वीर को लेकर देश में कई बार बहस उठी। परन्तु उसके परिणाम निष्फल ही रहे। एनडीए सरकार में विषय पर फिर गंभीर चिंतन शुरू हुआ। परिणामस्वरूप मानव संसाधन विकास मंत्रालय के केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (केब) की बैठक 25 अक्टूबर-2016 को सम्पन्न बैठक में केन्द्र सरकार के इस शिक्षा के अधिकार कानून-2009 में आवश्यक संशोधन करने का निर्णय लिया गया।

एक उपसमिति की अनुशंसा के बाद यह निश्चय किया गया था कि बुनियादी शिक्षा के अधिकार कानून-2009 के अंतर्गत आने वाली ‘‘नो डिटेंशन’की नीति में भी बदलाव किया जायेगा। सचाई यह है कि छात्र को कक्षा आठ तक फेल न करने का अर्थ छात्र को बिना मेहनत किये उसे कक्षा आठ तक स्वत: ही अगली कक्षा में प्रमोट करना रहा है। बच्चों की इस मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून के तहत यह प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि छात्रों के दिलोदिमाग पर परीक्षा का भय न रहे और वह साल भर चलने वाले टेस्ट और परीक्षा के दबाव और डर से कहीं वह स्कूल न छोड़ दे। इसी वजह से छात्रों को सत्र के अंत में अंकों के उतार-चढ़ाव की जगह ग्रेड देने की व्यवस्था की गयी थी। छात्रों को यह ग्रेड देने के पीछे भी उनके चहुमुखी व्यक्तित्व के विकास का संपूर्ण मूल्यांकन करना था। इस ग्रेडिंग व्यवस्था के अंतर्गत छात्र को पढ़ाई-लिखाई के कार्य के अनुभव, कुछ रचनात्मक पहल, टीमवर्क, सार्वजनिक स्थान पर उसके बोलने की क्षमता और उसके साल भर के व्यवहार की अभिव्यक्ति इत्यादि के मूल्यांकन में खरा उतरना होता था।

कुल मिलाकर देखा जाय तो इस शिक्षा के कानून में यह प्रावधान उसके बस्ते के बोझ और परीक्षा के दिमागी तनाव को घटाने के लिए भी किया गया था।हालांकि भारत में कक्षा आठ तक मुफ्त और किसी को फेल न करने की यह व्यवस्था पश्चिम के ‘‘खेल-खेल में सीखना’ के मॉडल से ली गई थी। परन्तु ध्यान रहें पश्चिम में शिक्षा की यह व्यवस्था आज भी शिक्षक, छात्र और अभिभावकों के त्रिपक्षीय प्रतिबंध और गठबंधन से ही सफल होती है। परन्तु भारत में शिक्षा की इस नि:शुल्क व्यवस्था की अनिवार्य नीति ने ड्राप आउट की दर कम करते हुए छात्रों की संख्या को तो बढ़ाया। परन्तु छात्र के सीखने, जानने व उसे व्यवहार में लाने का उपक्रम कमजोर होता चला गया। अवलोकन बताते हैं कि छात्र के मस्तिष्क में यह बात घर कर गई है कि कक्षा में उसके कम परिश्रम करने के बावजूद भी उसे अगली कक्षा में प्रवेश मिल ही जायेगा। इससे ऐसे छात्रों के बीच बड़ा लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ने की होड़ लगातार कमजोर पड़ रही है।

कक्षा में छात्रों के फेल न करने की नीति का एक नुकसान यह भी हो रहा है कि यह व्यवस्था अच्छे-बुरे अथवा परिश्रमी और गैर परिश्रमी छात्र के बीच अन्तर नहीं कर पा रही है। शिक्षकों का भी कहना है कि उनके ऊपर छात्रों को फेल न करने का दबाव है। इस प्रक्रिया से कक्षा में छात्रों की उपस्थिति भी घट रही है। यदि छात्र कक्षा में आता भी है तो पढ़ाई के प्रति गंभीर नहीं हो पाता। शिक्षा का अधिकार कानून-2009 के नीति-निर्धारकों ने शायद इस सच को आंखों से ओझल कर दिया कि कक्षा में प्रत्येक छात्र की प्रतिभा समान नहीं होती। कुछ छात्र तीव्र तो कुछ छात्र धीमी गति से सीखने वाले होते हैं। ऐसे कमजोर छात्रों को शिक्षक द्वारा अतिरिक्त काउंसिलिंग की जरूरत होती है। सभी को उत्तीर्ण करने की बाध्यता ने सभी छात्रों को समान रूप से अगली कक्षा में प्रवेश तो दे दिया। परन्तु कक्षा आठ के पश्चात कक्षा नौ से पुन: फेल करने की नीति ने छात्रों के मध्य एक नये प्रकार के तनाव को जन्म दे दिया।

अध्ययन बताते हैं कि छात्रों को कक्षा आठ तक फेल न करने की कवायद से हाईस्कूल की पायदान तक आते-आते छात्र पूरी तरह कोचिंग की व्यवस्था पर निर्भर होने लगे हैं। केन्द्र सरकार ने 31 दिसम्बर 2015 को राजस्थान सरकार के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी की अध्यक्षता में एक पैनल गठित किया था। इस पैनल ने 25 राज्यों की स्वीकृति के आधार पर नो डिटेंशन नीति को समाप्त करने की सिफारिश की थी। इसी प्रकार, शिक्षा सुधार पर टीएसआर सुब्रमण्यम कमेटी के साथ ही अनेक समितियों की सिफारिशों के चलते ही केन्द्र सरकार इस शिक्षा सुधार कानून में बदलाव करने को बाध्य हुई है। वर्तमान में एक बार फिर से बालक को उसके सीखने की गति और प्रदर्शन के आधार पर उसको सफल व असफल करने की नीति के इसी सत्र से अमल में आने की संभावना है। ध्यान रहे कि छात्र का परीक्षा में असफल होना उसका अपने जीवन में असफल होना नहीं है। छात्रों में परिश्रम की गति, सीखने की क्षमता और उसका कुल परीक्षा परिणाम इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसको घर में कितना सुखद वातावरण मिल रहा है और स्कूल में शिक्षकों के सीखने का तौर-तरीका कितना छात्र-उन्मुख है।


अमेरिकी धौंस और ब्रिक्स की भूमिका

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

दुनिया की अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों की भूमिका क्या बदलने वाली है? यह सवाल शुक्रवार को खत्म हुए ब्रिक्स के 10वें शिखर सम्मेलन के बाद कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। इस संगठन के सभी सदस्य देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) की गिनती उभरती आर्थिक ताकतों में होती है और इन्हें आर्थिक उदारीकरण का खासा लाभ भी मिला है। मगर अब अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों की ‘संरक्षणवादी नीतियों’ का शिकार यही देश सबसे ज्यादा हो रहे हैं। संभवत: इसीलिए ब्रिक्स सम्मेलन में सभी सदस्य देश उदारीकरण से इतर नीतियां तलाशने और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी नई जगह बनाने पर राजी हुए हैं।

इस समय दुनिया के कारोबार को संरक्षणवाद और ‘ट्रेड वार’ खासा प्रभावित कर रहे हैं। खासतौर से संरक्षणवाद कई देशों में जडे़ जमाता जा रहा हैं। शरणार्थी समस्या के बाद यूरोप इन नीतियों की ओर बढ़ा था और अपने दरवाजे दूसरे देशों के लिए बंद करने की वकालत की थी। बाद में, अमेरिका ने इसे भरपूर हवा दी, जबकि वह वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण का अगुवा देश रहा है। यह सच है कि अमेरिका में बेरोजगारी बढ़ी है, लेकिन यह भी समझना होगा कि किन्हीं उदार आर्थिक नीतियों ने नहीं, बल्कि घरेलू नीतियों ने अमेरिका में रोजगार संकट को बढ़ाया है।

‘ट्रेड वार’ भी इसी दरम्यान पनपा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने मुल्क को आर्थिक मुश्किलों से निकालने के लिए चीन के खिलाफ टैरिफ (अतिरिक्त शुल्क) लगाए हैं। चीन भी अपने तईं जवाब दे रहा है और इस मसले को विश्व व्यापार संगठन में ले गया है। फिलहाल तो यह जंग अमेरिका और चीन के बीच सिमटी हुई है, लेकिन इससे हमारा व्यापार भी प्रभावित हो रहा है। चीन के मुकाबले विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफैक्र्चंरग) में हमारी भागीदारी कम होने के बाद भी इसकी आंच हम तक पहुंची है। नतीजतन, हमने भी जवाबी शुल्क लगाए हैं और विश्व व्यापार संगठन में अर्जी दी है।

ऐसे में ब्रिक्स देशों की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बढ़ जाती है। अभी तक ये देश वैश्वीकरण से मिलने वाले फायदों का ही गुणा-भाग कर रहे थे। मगर अब जब ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर निकल चुका है, यूरोप की आर्थिक प्रगति ठहर चुकी है, इटली-यूनान जैसे देश मुश्किल हालात में हैं और पश्चिमी देश तमाम तरह की कारोबारी बंदिशें लगा रहे हैं, तब यह जरूरी हो जाता है कि ब्रिक्स आगे बढ़कर इन चुनौतियों को स्वीकारे और अपने लिए नई राह तलाशे। जोहानिसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में शुक्रवार को खत्म हुई बैठक में इसी पर सहमति बनी है कि किन-किन देशों पर भरोसा करके ब्रिक्स देश आगे बढ़ें। इसमें सफलता की उम्मीद ज्यादा है, क्योंकि तमाम देशों की सहमति पूर्व में विश्व व्यापार संगठन को लेकर रही है। जलवायु परिवर्तन के मसले पर ही जिस तरह फ्रांस, यूरोप और ब्रिक्स देश आगे बढ़े थे, उससे लगता है कि इस बार भी बात बन जाएगी। हां, यूरोप को साथ लाने की कोशिश हमें छोड़नी नहीं चाहिए, चाहे वह अभी संरक्षणवाद की कितनी भी वकालत क्यों न कर रहा हो?

जरूरत जल्द से जल्द क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) को मूर्त रूप देने की है। यह 16 देशों (10 आसियान राष्ट्र और छह एशिया-पैसिफिक देश) के बीच एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता है। इस पर सहमति मिलने के बाद न सिर्फ हमारे व्यापार को नई दिशा मिलेगी, बल्कि कुशल श्रमिक व पेशेवरों को भी रोजगार के नए अवसर हासिल होंगे। हमारी कोशिश मुक्त व्यापार की संकल्पना को एशिया में साकार करने की भी होनी चाहिए। इससे ‘ट्रेड वार’ के गति पकड़ने पर हम ज्यादा प्रभावित नहीं होंगे। हालांकि हमें यह काम चीन के साथ कोई गुट बनाए बिना करना होगा, वरना लंबी अवधि में यह हमारे लिए नुकसानदेह हो सकता है।

चौथी औद्योगिक क्रांति की चर्चा भी ब्रिक्स सम्मेलन की उपलब्धि मानी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी चर्चा अपने भाषण में की। अगर ब्रिक्स देश इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो हम आने वाले वर्षों में कई सारे बदलाव के गवाह बनेंगे। चौथी औद्योगिक क्रांति में कौशल व डिजिटल विकास का दिमागी शक्ति से मिलन होगा। इसका हमें काफी फायदा मिल सकता है, क्योंकि भारत सॉफ्टवेयर सर्विस में तेजी से आगे बढ़ा है। हमारी कई सेवाएं अमेरिकी और पश्चिमी देशों को मिलती रही हैं। मगर जिस तरह से हमारे पेशेवरों के सामने वीजा संबंधी दुश्वारियां खड़ी की गई हैं, उसमें बेहतर विकल्प यही है कि ब्रिक्स के दूसरे सदस्य देशों या विकासशील मुल्कों के साथ साझेदारी करके हम आगे बढ़ें। ब्रिक्स में इसकी चर्चा होने से भारतीय कंपनियां इस दिशा में सक्रिय हो सकेंगी।

ब्रिक्स सम्मेलन में आतंकवाद भी एक बड़ा मसला था। वहां आतंकवाद के खिलाफ हरसंभव लड़ाई लड़ने पर भी सहमति बनी है। अभी तक चीन जैसे सदस्य देश पाकिस्तान को मदद देकर परोक्ष रूप से इस लड़ाई में अपनी पूरी भागीदारी नहीं निभा पा रहे थे। मगर जिस तरह से अब बीजिंग पर आतंकी जमातों के हिमायती होने का आरोप लगने लगा है, मौजूदा तस्वीर बदलने की उम्मीद बढ़ गई है। पाकिस्तान में भी सत्ता-परिवर्तन हुआ है। इमरान खान वहां के नए वजीर-ए-आजम बनने वाले हैं। उन्होंने अपने हालिया भाषणों में पाकिस्तान को एक स्वच्छ मुल्क बनाने की बात कही है, जिससे लगता है कि वह आतंकी जमातों के खिलाफ कुछ ठोस काम करेंगे। हालांकि उन्होंने सीधे-सीधे किसी का नाम नहीं लिया है, पर चीन व अन्य देशों से संबंध आगे बढ़ाने के लिए वह दहशतगर्दों पर नकेल लगा सकते हैं।

‘बेस्ट प्रैक्टिस फॉलो’ पर सहमति बनना भी गौर करने लायक है। इसके तहत एक-दूसरे देशों की अच्छी आदतों या कार्यक्रमों को अपने यहां उतारने की बात कही गई है। जैसे, भारत से निकला योग दुनिया के तमाम देशों में फैल गया है। अच्छी बात है कि ‘नॉलेज शेयरिंग’ (ज्ञान साझा करना) की तरफ ब्रिक्स देशों ने गंभीरता दिखाई है। इसकी वकालत भारत हमेशा से करता रहा है।