(29-06-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक

 

Date:29-06-22

Why the G7 Matters, And Needs to Work
ET Editorials

The G7 Summit in Bavaria, Germany, ended with the leaders of the world’s wealthiest economies maintaining, with some caveats, the general direction of travel towards an economy less dependent on fossil fuels, more secure, and able to better deal with shocks such as the pandemic. The outcome is far from perfect, but is in the right direction.

As a group of the richest countries, all of them democracies, the G7 is, still, important. These are key players in global institutions like the UN and the World Bank. The 2022 summit took place in the context of multiple crises — the climate crisis that underpins all others, the Covid pandemic that has weakened economies pushing some countries further into debt and others to the brink of collapse, the Russian invasion of Ukraine, and the resulting energy and food crisis. The G7 response to this perfect storm will frame and shape future geopolitics. The last time the G7 (then G8 with now expelled Russia) faced a major crisis, the G20 was formed. While that brought the biggest economies to the high table, it still failed in many ways to find the most effective ways to address the needs of the world, especially the most vulnerable nations. At the 2022 summit, the struggle between the leadership the wealthiest economies need to show and the temptation to tweak the rules to make ‘things easy’ was on full display. In the end, a compromise that provided some space to address immediate crises such as ensuring energy security was agreed upon.

As a democracy and growing economy facing its own challenges, India is G7’s natural partner. This partnership needs to be nurtured, as does G7’s engagement with other middle-income developing countries, if it is to remain relevant and be effective.

 

Date:29-06-22

बंदूक रखना मौलिक अधिकार नहीं हो सकता
संपादकीय

तीन दशकों की जद्दोजहद के बाद आखिरकार अमेरिकी संसद ने हथियार नियंत्रण कानून पास कर दिया। यह कानून 21 वर्ष से कम उम्र के युवाओं और संदिग्ध लोगों को गन खरीदने के पहले काफी हद तक प्रारंभिक जांच से गुजारेगा। अमेरिका में हाल के कुछ वर्षों में और खासकर इस वर्ष हथियार लेकर स्कूलों, बाजारों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर गोली बरसाकर निर्दोषों को मारने की घटनाएँं बढ़ी हैं। परंतु हथियार निर्माता लॉबी इतनी मजबूत है कि किसी भी सरकार की हिम्मत नहीं होती थी कि खुलेआम हथियार बिक्री की नीति पर अंकुश लगाए। ट्रम्प तो जनसभाओं में हथियार के पक्ष में बोलते नजर आते थे। कानून पास होने के एक दिन पहले ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हथियार लेकर खुले में घूमने को मौलिक अधिकार करार देते हुए न्यूयॉर्क के एक हालिया कानून को खारिज कर दिया था। लेकिन इसके कुछ ही घंटे बाद सीनेट और फिर वहां के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव ने नया सख्त कानून पास करते हुए राष्ट्रपति के पास अंतिम हस्ताक्षर के लिए भेज दिया। खास बात यह थी कि ट्रम्प की नीति के खिलाफ कांग्रेस के दोनों सदनों में उनकी पार्टी के रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स के साथ मिलकर वोट दिया। यहां सवाल सुप्रीम कोर्ट की समझ का है जिसके तहत वह हथियार को नागरिक का मौलिक अधिकार मानता है। यह नीति तब तो सही थी जब 250 साल पहले अमेरिकी संविधान बना और सामाजिक संघर्ष खतरनाक स्थिति में था। लेकिन आज मजबूत पुलिस व्यवस्था है और हर नागरिक की समझ बढ़ी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, औसत आर्थिक सुरक्षा आदि तो मौलिक अधिकार हो सकते हैं, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए पूरे समाज को खतरे में डालना मौलिक अधिकार कतई नहीं हो सकता।

Date:29-06-22

बेरोजगार होने से बेहतर है अग्निवीर होना
चेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )

अग्निवीर पर चर्चा करने के साथ वही समस्या है, जो किसी भी ऐसी नीति पर चर्चा करने के साथ होती है जिसका राजनीतिकरण हो चुका हो- जैसे कि सीएए या किसान बिल। जैसे ही लोग राजनीतिक आधार पर बंट जाते हैं, उसके बाद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी योजना की अच्छाइयां क्या हैं और बुराइयां क्या हैं। अगर मैं अग्निवीर की सराहना करूंगा तो मुझे भाजपा-समर्थक और सरकार का चापलूस होने का तमगा दे दिया जाएगा। अगर मैं इसकी कमियों की ओर इशारा करूंगा तो मुझे भाजपा-विरोधी, सरकार का आलोचक कह दिया जाएगा। पर ऐसी लेबलिंग से विमर्श को कोई लाभ नहीं हो पाता है।

जो योजना आपको रोजगार देती है- फिर भले ही वह चार वर्षों के लिए हो- उसे पूरी तरह से बुरा बता देना तो मूर्खतापूर्ण है। चार साल तो दूर, उस योजना में भी कुछ अच्छी बातें हो सकती हैं, जो चार महीने या चार सप्ताह के लिए भी काम देती हो। चार साल नौकरी करने से बदतर है पूरे समय बेरोजगार रहना। आप किसी भारतीय युवा के लिए क्या पसंद करेंगे? यह कि वह फिजिकली फिट हो और आर्मी की ट्रेनिंग पाए या यह कि वह बिस्तर पर बैठा इंस्टाग्राम रील्स देखता रहे? आप क्या चाहेंगे, एक भारतीय युवा चार सालों के लिए किसी अनुशासित और परिश्रमी संस्था का हिस्सा बने या फिर वह उसी समय का इस्तेमाल वीडियो गेम्स खेलने या पोर्न देखने के लिए करे? क्योंकि आज भारतीय युवा यही सब कर रहा है। देश का औसत युवा अपने फोन से एडिक्टेड हो चुका है, वह कमजोर होता जा रहा है और कुछ करने की उसकी प्रेरणा खत्म हो रही है। न तो उसमें अग्नि है और न ही वह वीर रह गया है।

आज बड़ी टेक-कम्पनियों ने अपनी तेज-तर्रार एआई एल्गोरिदम की मदद से जान लिया है कि एक युवा को दिन में आठ घंटे फोन से चिपकाए रखने के लिए उसे क्या दिखाना है। आज देश का नौजवान सस्ता डाटा और प्रोसेस्ड आटा खा रहा है, जबकि जीवन में करने को इतना कुछ है। इस संदर्भ में देखें तो सेना आपको एक मौका दे रही है, जिसमें आप चार साल काम करेंगे और इस दौरान कुछ बेहतरीन चीजें सीखेंगे। आपको तनख्वाह मिलेगी और अंत में एकमुश्त रकम भी दी जाएगी। भला कोई इस योजना को पूरी तरह से खराब कैसे बता सकता है?

वहीं, ऐसा भी नहीं है कि यह स्कीम पूरी तरह से परफेक्ट है, क्योंकि दुनिया में कोई भी स्कीम परफेक्ट नहीं होती। लेकिन हमें पता होना चाहिए कि भारतीय सेना कोई रोजगार-एक्सचेंज नहीं है। वह एक संस्थान है, जिसके पास सीमित संसाधन हैं और जिसमें काम करना आसान नहीं है। सेना के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी जरूरत के हिसाब से लोगों को नौकरी दे, उन्हें नौकरी में बनाए रखे या उन्हें नौकरी छोड़कर जाने दे। अगर इस प्रक्रिया के तहत लम्बा कॅरिअर, पेंशन, प्रतिष्ठा आदि मिलते हैं तो यह सोने पर सुहागा होगा। लेकिन सेना की प्राथमिकता यह है कि किफायती तरीके से एक संस्थान को कैसे चलाया जाए। भारत की सेना महान है और हम उसे प्यार करते हैं। लेकिन वह सांताक्लॉज नहीं है, जो हमें मनचाहे तोहफे देगी।

शायद अपेक्षाओं के बेमेल होने से ही अग्निवीर योजना के विरोध में आंदोलन हुए हैं। मानो युवा फौज से कह रहे हों कि हम तुम्हें इतना प्यार करते हैं और तुमने हमारे लिए बस इतना ही किया? हमें लम्बी नौकरी और अनंत पेंशन चाहिए, लेकिन तुमने हमें केवल चार साल दिए? हम चाहते हैं कि तुम ज्यादा से ज्यादा भर्तियां करो और तुम कम भर्तियां कर रही हो? इस तकलीफ को समझा जा सकता है, लेकिन तोड़फोड़, अराजकता, आगजनी के लिए कोई जगह नहीं। न ही ऐसी उम्मीदें बांधने की कोई तुक है कि फौज हमें आजीवन नौकरियां और पेंशन देती रहेगी। क्या तकनीक ने हर क्षेत्र को प्रभावित नहीं किया है? आर्मी के सिगनल्स डिवीजन का उदाहरण लीजिए। तीन दशक पहले सिगनल्स टीम कम्युनिकेशन के लिए लैंडलाइंस बिछाने का काम करती थी। आज एनक्रिप्टेड वायरलेस विकल्प मौजूद हैं। तब सेना उस टीम का क्या करे, जो लैंडलाइंस बिछाती थी? शायद उन्हें दूसरी जिम्मेदारियां दी गई होंगी। दूसरे उद्योगों में तो बड़े पैमाने पर छंटनी कर दी जाती है, जो सेना में नहीं होता। लेकिन आज जब तकनीक ने रक्षा क्षेत्र को इतनी तेज गति से बदल दिया है, तब सेना पहले की तरह नौकरियां कैसे दे सकती है?

इसी संदर्भ में अग्निवीर योजना को लॉन्च किया गया था। इसका मकसद था रोजगार के बोझ को कम करना और साथ ही युवाओं को चार साल का काम देना, ताकि वे अपने जीवन की अच्छे-से योजना बना सकें। चार साल के बाद क्या होगा, ये जरूर एक वाजिब चिंता है। लेकिन देखें तो देश के अधिकतर ग्रैजुएट्स के सामने भी आज यही चिंता है कि डिग्री लेने के बाद क्या होगा? जीवन कठिन है, यहां किसी चीज की गारंटी नहीं है। ऐसे में सिक्योरिटी और पेंशन की उम्मीद लगाना बेमानी है। जरूरत इस बात की है कि हम मेहनत करें। सेना में चार साल पूरे करने के बाद जो युवा बाहर आएंगे, वे यकीनन जीवन में कुछ कर सकेंगे। उन्हें स्किल्स की जरूरत थी और सेना अग्निवीर कार्यक्रम में ऐसे मॉड्यूल जरूर जोड़ सकती है, जो मददगार होंगे।

आर्मी में बेहतरीन अंग्रेजी बोली जाती है। छह महीने की अंग्रेजी अग्निवीरों को एक दूसरे ही मुकाम पर ले जाएगी। अगर अग्निवीर अंग्रेजीवीर भी है तो नौकरियां पाने के उसके अवसर बेहतर हो जाएंगे। इसमें छह महीने की कम्प्यूटर ट्रेनिंग भी जोड़ लीजिए और आपके पास अग्निवीरों की एक ऐसी बैच होगी, जो दुनिया जीतने के लिए तैयार है। वास्तव में, उलटे ऐसा भी हो सकता है कि जो 25 प्रतिशत अग्निवीर सेना में बने रहेंगे, उन्हें खुद सेना अपने पास रोकने की कोशिशें करने लगे!

Date:29-06-22

नेताओं के सामूहिक दल-बदल का फाइव स्टार खेल
विराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )

महाराष्ट्र के सत्ता विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रमन्ना के तीन साल पुराने फैसले को नए सिरे से पढ़ने की जरूरत है। उसमें शामिल समाजशास्त्र के प्रोफेसर आंद्रे बेते की टिप्पणी के अनुसार संसदीय लोकतंत्र की सफलता के लिए सरकार-विपक्ष दोनों को संवैधानिक नैतिकता का पालन करना चाहिए। महाराष्ट्र में दिलचस्प बात यह है कि न तो बागी मंत्रियों को सरकार से बर्खास्त किया जा रहा है और न ही वे खुद भी त्यागपत्र दे रहे हैं।

दलबदल कर रहे माननीय जनप्रतिनिधियों की वजह से संविधान के चार संस्थानों- राज्यपाल, स्पीकर/डिप्टी स्पीकर, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की साख दांव पर लगी है। 1994 में बोम्मई मामले में नौ जजों के फैसले के बाद राज्यपाल की भूमिका को संविधान के खूंटे में कमोबेश बांध दिया गया है। स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के बारे में संविधान में विस्तार से प्रावधान होने के साथ सुप्रीम कोर्ट के भी कई अहम फैसले हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार विधायकों की अयोग्यता के मामलों में निष्पक्ष फैसले के लिए पूर्व जजों की अध्यक्षता में विशेष ट्रिब्यूनल का कानून बनना चाहिए। महाराष्ट्र मामले में कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद नई सरकार में मंत्रिपदों के बंटवारे पर फाइनल बातचीत की खबरें हैं। दलबदलू नेताओं की याचिकाओं पर आनन-फानन में अंतरिम आदेश के बाद उनका काम हो जाता है और मुख्य मुद्दों पर फाइनल बहस टलती रहती है। इसलिए राजनीतिक दल और विधायी दल में फर्क, विघटन और विलय जैसे मुद्दों पर सर्वोच्च अदालत को इस बार जल्द और ठोस फैसला देना चाहिए।

शिंदे गुट को मान्यता के बाद दूसरे दल में विलय के सवालों के बहाने भारत में पार्टियों की हालत पर गौर करना जरूरी है। गैरमान्यता प्राप्त रजिस्टर्ड दलों की संख्या सन् 2001 में 694 से 20 सालों में 300 फीसदी बढ़कर 2796 हो गई है। कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ रही रजिस्टर्ड पार्टियां, हवाला, मनी लॉन्ड्रिंग, चुनावी हेरफेर और अन्य आपराधिक कार्यों में लिप्त होकर लोकतंत्र को खोखला कर रही हैं। चुनाव आयोग ने पिछले कुछ महीनों में लगभग 200 बेनामी पार्टियों की मान्यता खारिज कर दी। तीन पार्टियों के खिलाफ गंभीर वित्तीय घोटालों के प्रमाण मिलने के बाद उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए चुनाव आयोग ने वित्त मंत्रालय को पत्र लिखा है।

अघाड़ी के नेताओं पर अंडरवर्ल्ड के साथ मिलीभगत तो बागी गुट के विधायक की 50 करोड़ में नीलामी के आरोप मीडिया में छाए हुए हैं। छोटी बातों पर भावनाएं आहत होने पर एफआईआर और जेल हो जाती है। लेकिन पार्टियों से जुड़े संगठित अपराधियों के खिलाफ कोई एफआईआर और क्रिमिनल ट्रायल नहीं होना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। संविधान और कानून के अनुसार चुनाव आयोग के पास राजनीतिक दलों के पंजीकरण और चिह्न आवंटित करने की शक्ति है। लेकिन जब दलों पर कार्रवाई की बात आती है तो आयोग सरकार से नए कानून बनाने की मांग करता है। आयोग के पास यदि दलों के पंजीकरण का अधिकार है तो फिर कार्रवाई के नाम पर बेबसी और विरोधाभास कैसे ठीक हो सकता है?

सत्ता पर नियंत्रण के लिए पार्टी संगठन और विधायक दल में बहुमत के लिए दोनों पक्ष के नेता मजबूत दावे कर रहे हैं। पर सवाल है कि सरकार के संगठित अपराधों की विरासत का वारिस कौन होगा? पुराने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हॉर्स ट्रेडिंग व भ्रष्टाचार को रोकने के लिए दलबदल विरोधी कानून के सख्त पालन को जरूरी बताया था। लेकिन सामूहिक दलबदल के फाइव स्टार खेल से साफ है कि विचारधारा के नाम पर चल रहे हॉर्स ट्रेडिंग के आपराधिक गेम को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को कठोर आदेश पारित करने होंगे। सत्ता और अपराध के गठजोड़ को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई से ही लोकतंत्र से हमारा रिश्ता मजबूत होगा।

Date:29-06-22

अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतियों से भरा हुआ है नेट-जीरो का लक्ष्य
वैभव मालू , ( प्रबंध निदेशक, एन्सो ग्रुप )

भारत लंबे समय से क्लाइमेट चेंज से जुड़ी चर्चाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। हम वर्तमान में दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं पर दूसरा पहलू यह है कि तीव्र गति से विकास के चलते हम ग्लोबल वार्मिंग के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार देशों में से एक हैं।

हालांकि भारत 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन प्राप्त करने की दिशा में बड़े कदम उठा रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश में विद्युत उत्पादन, माल परिवहन व सेवा और कचरा प्रबंधन आदि के तरीकों में बड़े पैमाने पर परिवर्तन की आवश्यकता होगी। पर अर्थव्यवस्था के लिए इसका क्या मतलब है? 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य इतना महत्वाकांक्षी है कि यह लगभग अकल्पनीय है। हालांकि इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अधिकांश आवश्यक बुनियादी ढांचे मौजूद हैं और कई राज्य सरकारों ने पहले ही अपने उत्सर्जन कम करने के लिए महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताएं की हैं। पर यह चिंता जताई गई है कि अगर उत्सर्जन में भारी कटौती करनी पड़ी तो भारत वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा।

दिलचस्प है कि भारत उन देशों में से एक है जो ऐसे ‘न्यायसंगत’ समझौते पर जोर दे रहा है। जिसमें जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशों की जिम्मेदारी के साथ-साथ विकासशील देशों को उनकी अर्थव्यवस्था को विकसित करने की जरूरत का ध्यान रखा गया है। दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन में विकसित देशों ने 2020 तक कम समृद्ध देशों को प्रति वर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर देने वादा किया ताकि वे जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से अनुकूल हो सकें और तापमान को और अधिक बढ़ने से रोकने में सहायता कर सकें। मदद का यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। हालांकि चर्चा जरूर हुई कि यह राशि किस रूप में दी जाएगी। दिसंबर 2017 में विकसित-विकासशील देशों के प्रतिनिधियों के बीच क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर समझौता हुआ, जिसमें सार्वजनिक और निजी वित्त दोनों शामिल हैं। समझौते में कहा गया कि विकसित देश सार्वजनिक वित्त देना जारी रखेंगे, विकासशील देश ‘घरेलू संसाधनों का उपयोग बढ़ाएंगे’।

यह भारत को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण रूप से सहायक कदम हो सकता है। इसके अलावा नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक भारत इटली को पीछे छोड़ते हुए सौर ऊर्जा परिनियोजन में दुनिया में 5वें स्थान पर पहुंच गया है। हमारी सौर ऊर्जा क्षमता पिछले पांच वर्षों में 11 गुना से अधिक बढ़ गई है। इस समय भारत में सोलर टैरिफ प्रतिस्पर्धी है और इसने ग्रिड समानता हासिल की है। साथ ही भारत में प्लग-एंड-प्ले मॉडल के उपयोग के चलते सोलर टैरिफ भी 75% कम है, जिसके तहत निवेशकों को सभी नियामक मंजूरी उपलब्ध कराई जाती है।

सवाल है कि भारत को अपने नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल करने के लिए क्या करने की आवश्यकता है? ऐसे कई तरीके हैं जिनसे भारत अपने बिजली क्षेत्र में सुधार कर सकता है ताकि इसे सौर और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश के लिए अधिक अनुकूल बनाया जा सके। हमें लगातार उन नियमों में सुधार लाते रहना होगा, जिनसे कंपनियों को पूरी तरह से अक्षय ऊर्जा का उपयोग और उत्पादन करने में आसानी हो। भारत को सौर प्रौद्योगिकी को बेहतर बनाने के लिए अनुसंधान और विकास में भी निवेश करना चाहिए।

Date:29-06-22

नया कानून, पुरानी समस्याएं
संपादकीय

बीती आधी सदी में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) के निरंतर खराब प्रदर्शन के बावजूद सरकार ने इन क्षेत्रों का दायरा लगभग दोगुना करने का निर्णय किया है। इससे संबंधित कानून संसद के आगामी मॉनसून सत्र में पेश किया जाना है। डेवलपमेंट एंटरप्राइज ऐंड सर्विसेज हब (देश) विधेयक एक महत्त्वाकांक्षी कानून है जिसका लक्ष्य विशालकाय विनिर्माण एवं निवेश केंद्र निर्मित करने का है जो निर्यातोन्मुखी तथा घरेलू दोनों तरह के निवेश को सुविधा प्रदान करेगा और घरेलू टैरिफ एरिया तथा एसईजेड की दोहरी भूमिका निबाहेगा। ये विकास केंद्र राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के क्षेत्रीय बोर्डों के अधीन तैयार होंगे और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इन्हें केंद्र या राज्य अथवा दोनों मिलकर या फिर कोई वस्तु या सेवा विनिर्माता स्थापित कर सकता है।

यह विकेंद्रीकृत एकल खिड़की व्यवस्था इसलिए तैयार की गई है ताकि विभिन्न स्वीकृतियां हासिल करने की उस व्यावहारिक समस्या से निजात पायी जा सके जिसका सामना उद्यमियों को देश में कोई प्रतिष्ठान स्थापित करते समय करना पड़ता है। इसमें निर्गम विकल्प और एसईजेड को विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अधिक अनुकूल बनाना शामिल है। यह दरअसल भारत फोर्ज के चेयरमैन बाबा कल्याणी की अध्यक्षता वाली एक विशेषज्ञ समिति के प्रस्तावों का निचोड़ है। यह आगामी कानून देश में एसईजेड की पूरी संभावनाओं का दोहन करने की राह में रोड़ा बनने वाली कुछ अहम बाधाओं को दूर करने की दिशा में एक सार्थक कदम हो सकता है। लेकिन इसकी सफलता की असली परीक्षा इस बात में निहित होगी कि यह उन अहम मसलों का कैसे समाधान करेगा जो अतीत में किसी भी बड़ी औद्योगिक परियोजना की असल समस्या रहे हैं। भूमि अधिग्रहण के कड़े कानून परियोजना लागत में काफी इजाफा करते हैं और लालफीताशाही के कारण भी 2005 के कानून के तहत बने एसईजेड का आकार बहुत छोटा रहा। छोटे आकार के कारण वे उतनी आर्थिक गति नहीं पैदा कर पाए जिसने चीन जैसे देश को चौथाई सदी में एक वैश्विक शक्ति बना दिया।

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में एक अध्यादेश के जरिये इस भूमि कानून को शिथिल बनाने का प्रयास किया था लेकिन गंभीर राजनीतिक और जन विरोध के चलते यह प्रयास सफल नहीं हुआ। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि देश विधेयक इस विवादित मसले को कैसे हल करेगा। इसके अलावा नीतिगत अनिश्चितता भी एक और कमजोरी बनी हुई है जो नये कानून के दायरे के बाहर है। कर रियायतों को समाप्त करना भी एक मसला है जो उद्योग जगत के ऐसे क्षेत्रों से पीछे हटने का कारण बनता है। ‘पिछड़ा क्षेत्र’ जोन के मामले में हमने ऐसा ही देखा जहां राज्य सरकारों ने समयबद्ध प्रोत्साहन की पेशकश की थी। कराधान के अलावा केंद्र और राज्य सरकार की ओर से अनुमान योग्य और स्थिर नीतिगत और नियामकीय माहौल की भी इन क्षेत्रों में निवेश सुनिश्चित करने में अहम भूमिका होगी।

अगर सरकार चाहती है कि उद्यमी आगे आएं और अपनी पूंजी लगाएं तथा जोखिम उठाएं तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि ताकतवर घरेलू लॉबी दिक्कतें न खड़ी करें, शुल्कों में इजाफा न किया जाए और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के निर्णयों की अनदेखी न की जाए। इस मामले में आर्थिक नीति में बार-बार बदलाव भी अनुकूल साबित नहीं होगा। सबसे बढ़कर ऐसे मामलों में सुरक्षित बुनियादी ढांचे से लेकर लॉजिस्टिक लिंक और अबाध बिजली आपूर्ति आदि भी ऐसी बातें हैं जिन पर अभी भी सवालिया निशान हैं। इन सभी मसलों के राष्ट्रीय स्तर के हल तलाशने की आवश्यकता है। ऐसा होने पर ही समग्र कारोबारी माहौल में सुधार आएगा।

इन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करके ही हम निवेश के लिए अधिक रचनात्मक और अनुकूल माहौल तैयार कर पाएंगे। यदि ऐसा हुआ तो भारत में एसईजेड की अवधारणा शायद कारगर साबित हो क्योंकि अतीत में तो यह कारगर नहीं साबित हुई है।