सी उदयभास्कर। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भले ही बीती 15 जून को यह कहा हो कि राज्य में आतंकी गतिविधियां कम हुई हैं और हालात में ‘काफी’ सुधार हुआ है, लेकिन हकीकत इससे उलट दिखती है। कुछ हालिया घटनाएं संकेत करती हैं कि हिंसा फिर से सिर उठा रही है।

कई जवान हुए शहीद
17 जून को हिंसक वारदात में सेना के एक मेजर शहीद हो गए। इसके कुछ दिन पहले अनंतनाग में सीआरपीएफ के पांच जवान शहीद हुए और कई घायल हो गए थे। राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर केतन शर्मा और सीआरपीएफ के जवानों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करके सुरक्षाकर्मियों की उस सूची में जगह बना ली जिनका जीवन उस छद्म युद्ध की भेंट चढ़ गया जिसका भारत जनवरी 1990 से ही सामना कर रहा है। जम्मू- कश्मीर इस जंग का अखाड़ा बना हुआ है।

आतंक को खत्म करने का हमारा संकल्प दृढ़
इन आतंकी हमलों की भत्र्सना करते हुए राज्यपाल मलिक ने 20 जून को कहा, ‘जब भी सुरक्षा बलों द्वारा शांतिपूर्ण चुनाव कराने या आतंकियों का लगातार सफाया करने जैसे सफल अभियान चलाए जाते हैं तब सीमा पार बैठे आतंकियों के आका उन्हें फिदायीन हमले करने का हुक्म देते है और अनंतनाग जिले में हुआ हमला फिदायीन हमला ही था।’ उन्होंने यह भी कहा कि आतंकी और उनके आकाओं को यह पता होना चाहिए कि आतंक के इस उन्माद को खत्म करने का हमारा संकल्प दृढ़ है।

फिर से बड़े आतंकी हमले की आशंका
कश्मीर में आतंकी हमलों के बीच एक अजीबोगरीब घटना भी सामने आई। 16 जून को दावा किया गया कि पाकिस्तान ने भारत और अमेरिका के साथ एक सूचना साझा की जिसमें पुलवामा में आइईडी से लैस वाहन से धमाके की आशंका व्यक्त की गई थी। हालांकि भारतीय खुफिया एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि यह जानकारी पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग में अज्ञात व्यक्ति द्वारा कॉल के जरिये दी गई थी। यह किसी विश्वसनीय स्रोत द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी नहीं थी।

लगातार बढ़ रहा शहीदों का आंकड़ा
जम्मू-कश्मीर में यह छद्म युद्ध तमाम अनमोल जिंदगियों को लील रहा है। इस साल के आंकड़े तो और चिंताजनक हैं। जनवरी से अब तक 62 सुरक्षाकर्मी आतंकी हिंसा के चलते अपना जीवन गंवा चुके हैं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में इसमें नौ का इजाफा और हो चुका है जिससे यह आंकड़ा 71 तक पहुंच गया है। तमाम आम नागरिक भी इसकी तपिश झेल रहे हैं। इससे निपटने के लिए राज्यपाल मलिक ने जो हल सुझाया वह काफी महंगा साबित हो रहा है।

राज्य में चुनाव के कोई संकेत नहीं
याद दिला दें कि राज्य में 20 जून, 2018 को राज्यपाल शासन लगा जब पीडीपी-भाजपा का असहज गठबंधन टूट गया। छह महीनों के राज्यपाल शासन की अवधि के बाद यह राष्ट्रपति शासन में तब्दील हो गया। एक साल बीत गया, लेकिन राज्य में चुनाव के कोई संकेत नहीं दिख रहे। स्थानीय राजनीतिक प्रक्रिया जस की तस शिथिल पड़ी हुई है। ऐसे में मौजूदा व्यवस्था कायम रहने के ही आसार हैं।

कई परतों में उलझा है कश्मीर मुद्दा
अक्टूबर, 1947 से ही कश्मीर मुद्दा पहेली की तरह उलझा हुआ है। भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय रिश्तों में यह लगातार अहम बना हुआ है। 1950 के दशक में नेहरू-अयूब खान से लेकर मोदी इमरान खान के दौर में इस मोर्चे पर कुछ नहीं बदला। कश्मीर मुद्दा कई परतों में उलझा हुआ है। इसे भौगोलिक स्थिति, भू-राजनीतिक विशेषता और जनसांख्यिकी मिश्रण जैसे पहलुओं पर देखा जाता है।

अनुच्छेद 370
याद रहे कि यह इकलौता मुस्लिम बहुल राज्य था जो भारतीय संघ में शामिल हुआ जिसमें भारत और पाकिस्तानी दोनों पहचानें समाहित हैं। विलय की संधि के तहत जहां इसे विशेष दर्जा हासिल है वहीं भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 के अंतर्गत इसे विशिष्ट स्वायत्तता भी मिली हुई है।

पाक की नई रणनीति छद्म युद्ध
जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी अगर राज्य की राजनीति को दिशा देती है तो दिल्ली-श्रीनगर के समीकरण राजनीतिक दिशा के मुख्य निर्धारक बनते हैं। पाकिस्तान बाहुबल से राज्य को हड़पने की कोशिशें करता रहा है। दो सीधे युद्धों में नाकाम होने के बाद उसने रणनीति बदलते हुए 1990 से राज्य में घुसपैठ और आतंकवाद का रास्ता पकड़कर छद्म युद्ध शुरू कर दिया। 1999 का कारगिल भी इसमें शामिल है।

मोदी ने बनाई मजबूत भारत की छवि
फरवरी 2019 में हुआ पुलवामा हमला तनातनी की हालिया मिसाल है। इसके बाद भारत ने बालाकोट में हवाई हमला किया। यह एक नया पड़ाव है। मोदी की दूसरी बार जबरदस्त जीत ने ऐसे मजबूत भारत की छवि बनाई है जिसकी कमान एक बहुत सशक्त एवं दृढ़ नेता के हाथ में है।

मोदी ने आतंक के मुद्दे को रखा सबसे आगे
चुनाव प्रचार के दौरान अपने बयानों से मोदी ने यही धारणा बनाई कि किसी भी तरह के आतंकी हमले में भारत चुप होकर बैठने वाला नहीं। ऐसे में इस्लामाबाद में भारतीय मिशन को किया गया अज्ञात कॉल शायद पाकिस्तान की नई एहतियाती नीति का हिस्सा हो। कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तानी पहलू से निपटना जटिल होगा और इसमें काफी समय भी लगेगा, क्योंकि चीन, अमेरिका, रूस, ईरान, अफगानिस्तान और जिहादी धड़ों जैसी बाहरी ताकतें भी इसमें जुड़ी हैं।

अमरनाथ यात्रा एक बड़ी चुनौती
जम्मू-कश्मीर के घरेलू हालात में दिल्ली अहम कारक है और मोदी के पास भी 2014 की तुलना में ज्यादा राजनीतिक ताकत है। मोदी सरकार के लिए तात्कालिक चुनौती यही होगी कि वह एक जुलाई से शुरू होने जा रही अमरनाथ यात्रा को अभेद्य सुरक्षा उपलब्ध कराकर शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराए। अतीत में भी आतंकी इस वार्षिक धार्मिक आयोजन को निशाना बनाते रहे हैं। जुलाई 2017 में आतंकियों ने आठ श्रद्धालुओं की हत्या कर दी थी और उससे पहले 2000, 2001 और 2002 में और बड़े आतंकी हमले हुए थे।

धार्मिक सौहार्द का प्रतीक अमरनाथ यात्रा
अमरनाथ यात्रा कश्मीर के बहुलतावाद एवं धार्मिक सौहार्द का प्रतीक रही है। स्थानीय मुस्लिम हिंदुओं के इस बड़े आयोजन को सुरक्षित रूप से संपन्न कराते रहे हैं। यह अफसोसजनक है कि कश्मीर की युवा आबादी केवल बीते ढाई दशकों के बुरे अनुभवों और भेदभाव से ही वाकिफ है। पिछले साल तो स्थानीय सामाजिक-राजनीतिक परिवेश और भी शुष्क हो गया था।

कश्मीरी भावनाओं पर मरहम
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दम पर भाजपा को जबरदस्त जनादेश दिलाया है। उनकी राजनीतिक विरासत के लिहाज से यह एक अहम मोड़ है। क्या वह वाजपेयी की राह पर चल सकते हैं जिसमें पहले तो स्थानीय कश्मीरी भावनाओं पर मरहम लगाया जाए और फिर उनमें आशंका और अलगाव के भाव को खत्म किया जाए।

जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव
वह विधानसभा चुनावों का एलान करके शिथिल पड़ी घरेलू राजनीतिक प्रक्रिया को प्रोत्साहन देंगे या फिर सुरक्षा बलों के दम पर सख्त रवैया अपनाएंगे और केवल आतंकवाद के दमन पर ही पूरा ध्यान केंद्रित करेंगे? बाद वाले उपाय पर ध्यान देने से उन नरम और स्मार्ट कदमों की अनदेखी हो जाएगी जिनकी कश्मीर को सख्त जरूरत है।

भारतीय सैनिकों को चुकानी पड़ रही बड़ी कीमत
साल की पहली छमाही में 71 सैनिकों की शहादत इस कड़वी हकीकत का प्रमाण है कि भारतीय सैनिकों को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। राजनीतिक दूरदर्शिता यही सुनिश्चित करने में निहित है कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान तिरंगे में लिपटे सैनिकों के ताबूत सरकार की पहचान न बनने पाएं।

(लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ एवं सोसायटी फॉर पॉलिसी स्टडीज के निदेशक है।)