14-06-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक

Date:14-06-22

Taking Care of Our Senior Citizenry
ET Editorials

Taking care of ageing populations is usually considered a ‘first world problem’, especially in countries like Japan and in Europe. But while India’s focus — and, indeed, mantra — has been reaping its ‘demographic dividend’, India’s aged are also growing in size. With life expectancy at birth at 69. 7 years in the 2015-19 period — still below the global average of 72. 6 years, but an improvement from 69. 4 years in the 2014-18 period — improving the ease of living for our senior citizens should also become a policy focus. This will require taking a life cycle approach to improving life expectancy, a move that will parlay into improvements in life expectancy at birth and well beyond.

Better quality of life and longevity must be the goals of improving life expectancy. This means ensuring sustainable healthcare systems, improved accessibility of care and reducing the incidence of preventable burden of disease. Retirement homes should provide alternatives for those requiring assisted living. However much morality lessons are weaved to encourage adult children’s support as part of ‘traditional duty’, the reality of the post-joint family structure must be taken on board as standard practice. Improved, accessible healthcare systems, especially geriatrics, are essential as the share of India’s ageing population grows, a vast number in absolute terms even for a ‘young nation’.

Pension schemes and insurance penetration should also make systemic inroads in a country that still has vast holes in its welfare responsibilities. India’s young may well be its future. But it is its ageing population that deserves the support that is required. Even the young, after all, should look forward to a healthy, happy life that is owed to them as they live longer.

Date:14-06-22

एमएसपी खरीद की नीति में बदलाव से जुड़े प्रश्न
संपादकीय

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने केंद्र को सलाह दी है कि केवल लघु एवं सीमान्त किसानों का ही अनाज एमएसपी पर खरीदा जाए। यही संस्था एमएसपी की दरें तय करती है। आयोग का मानना है कि एमएसपी का लाभ केवल बड़े किसानों को ही मिलता है और छोटे किसान इससे वंचित रहते हैं। लेकिन आयोग तीन बड़े तथ्यों को संज्ञान में लेना भूल गया। सरकार का किसानों से गेहूं खरीदना मजबूरी बन चला है क्योंकि अनाज देने की अनेक योजनाएं चल रही हैं जिन्हें बंद करना न तो राजनीतिक रूप से संभव है ना ही महंगाई देखते हुए आर्थिक रूप से न्याय-सम्मत। इस साल सरकार की खरीद काफी कम रही है, जिससे योजनाओं में गेहूं के वितरण का संकट पैदा हो गया है और इसकी जगह चावल दिए जाने की नीति बनाई जा रही है। दूसरे, आयोग की सलाह मानी जाए तो केवल 68% एक हेक्टेयर और 20% दो हेक्टेयर यानी कुल 88% किसान ही सरकार को अनाज बेचने के लिए सुपात्र होंगे। यहां दो प्रश्न हैं। जहां देश में औसत खेती की जमीन 1.06 हेक्टेयर प्रति परिवार है वहीं पंजाब में 3.60 हेक्टेयर, जबकि बिहार में 0.40 और यूपी में 0.60 प्रतिशत है। ऐसे में क्या पूरे पंजाब और हरियाणा के किसान इससे वंचित रहेंगे? क्या यह सच नहीं कि छोटे किसानों के पास अपनी खपत से ज्यादा अनाज होता ही नहीं? फिर क्या बड़े किसान और खासकर आढ़तिया इनके नाम पर अपना अनाज बेचकर चोरबाजारी का नया प्रपंच नहीं शुरू करेंगे? आज सरकार इस स्कीम को खत्म नहीं कर सकती। हां पूरी तरह डायरेक्ट डिलीवरी की प्रशासनिक व्यवस्था करते हुए सीधे किसानों को जमीन की उत्पादकता के हिसाब से प्रति क्विंटल कैश मदद कर सकती है। बहरहाल इस गंभीर मुद्दे पर सरकार को कई सावधानियां रखनी होंगे।

Date:14-06-22

देश के अंदरूनी मसलों पर विदेशी प्रतिक्रियाएं क्यों?
डॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )

भाजपा के पूर्व प्रवक्ताओं की समुदाय विशेष से संबंधित टिप्पणियों ने भारत में जितना विवाद पैदा किया, उससे कहीं ज्यादा मुस्लिम जगत में कर दिया है। इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी), पाकिस्तान और कुछ प्रमुख इस्लामी राष्ट्रों ने टिप्पणियों की कड़ी भर्त्सना की है। उन्होंने इस तथ्य पर संतोष व्यक्त नहीं किया कि भारत सरकार ने अपने आप को उन टिप्पणियों से बिल्कुल अलग बताया और यह भी कहा कि वह सभी धर्मों का बराबर सम्मान करती है। यदि भारत सरकार और भाजपा उन प्रवक्ताओं के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई कर देती तो मुस्लिम राष्ट्रों का रवैया शायद इतना कड़ा नहीं होता। इस कार्रवाई में लगभग एक सप्ताह की देर के दौरान ट्विटर पर इतनी ले-दे हुई कि मामले ने अंतरराष्ट्रीय तूल पकड़ लिया।

उधर ओआईसी के 57 सदस्यों में से लगभग डेढ़ दर्जन सदस्यों ने ही भारत के विरुद्ध बयान दिए हैं। बांग्लादेश और मालदीव के विपक्षी नेता अपनी सरकारों से भारत-विरोधी बयान जारी करवाने पर आमादा हैं लेकिन ज्यादातर बयान देने वालों को यह पता ही नहीं है कि उन प्रवक्ताओं ने पैगंबर के बारे में कहा क्या है? पाकिस्तान की संसद ने भारत के विरुद्ध एक प्रस्ताव पारित किया है। इसी तरह का प्रस्ताव मालदीव के विपक्षी दल भी अपनी संसद में लाने की कोशिश कर रहे हैं। यों तो शाहबाज़ शरीफ की सरकार भारत के साथ अपने रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है लेकिन उसे अपने वोट बैंक की हिफाजत भी करनी है। लेकिन ओआईसी ने भारत सरकार पर कई तोहमतें लगा दीं और संयुक्त राष्ट्र संघ से भारत के विरुद्ध कार्रवाई की अपील भी कर दी।

इस अपील की संयुक्त राष्ट्र संघ ने पूरी तरह उपेक्षा कर दी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष मालदीव के अब्दुल्ला शाहिद हैं। उन्होंने इस मांग को इस लायक भी नहीं समझा कि इस पर वे कोई प्रतिक्रिया दें। बांग्लादेश के सूचना मंत्री डॉ. हसन महमूद ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि यह विवाद भारत का आंतरिक मामला है। भारत सरकार ने जो कार्रवाई की है उससे हम खुश हैं और भारत सरकार बधाई की पात्र है। इस मुद्दे पर बांग्लादेश के लोगों को भड़काना हमारा काम नहीं है। इसी तरह कुवैत की सरकार ने भी उन लोगों के खिलाफ कदम उठाया है जो मामले को वहां तूल दे रहे हैं। कुवैत में रहने वाले भारतीय, पाकिस्तानी व बांग्लादेशी मुसलमानों ने यदि कोई आंदोलन किया तो अब कुवैत सरकार उन्हें बाहर करेगी और पुन: अपने देश में कभी आने नहीं देगी। कुछ अतिवादी तत्व भारत-अरब सहयोग की दीवार को इसी बहाने ढहा देना चाहते हैं। इस समय भारत का खाड़ी के सिर्फ छह देशों के साथ 154 अरब डॉलर का व्यापार है। भारत में तेल-गैस की सर्वाधिक आपूर्ति इन्हीं देशों से होती है। इन्हें पता है कि यदि भारतीयों को वहां से बाहर निकाला तो वहां की अर्थव्यवस्थाएं ठप हो सकती हैं।

मोदी सरकार के पिछले आठ साल में इन सब देशों के साथ प्रगति की रफ्तार अपूर्व रही है। इसके अलावा इन मुस्लिम राष्ट्रों के साथ भाजपा सरकार ने जितने घनिष्ठ राजनीतिक, व्यापारिक, कूटनीतिक संबंध बनाए हैं, उतने कोई भी पिछली सरकार नहीं बना सकी है। इन मुस्लिम राष्ट्रों पर इस घटना का काफी गहरा असर पड़ा है कि किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने पहली बार फलस्तीन जाने की हिम्मत दिखाई है। मोदी ने अबू धाबी की शेख जायद मस्जिद और मस्क़त की सुल्तान क़ाबूस मस्जिद में जाकर भारत की सर्वधर्म सम्मान की छवि भी पैदा की है।

ऐसा नहीं लगता कि मौजूदा मामला ज्यादा तूल पकड़ेगा। यदि इस मामले ने तूल पकड़ा तो लोग इस्लामी राष्ट्रों से सवाल करेंगे कि वे चीन के उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर चुप क्यों हैं? फ्रांस, नीदरलैंड और कुछ अन्य यूरोपीय देशों द्वारा इस्लामी कर्मकांडों पर थोपे गए प्रतिबंधों के बारे में वे मौन क्यों धारण किए हुए हैं? कुछ मुस्लिम राष्ट्र भारत के अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की डोंडी पीटते रहते हैं। वे अपने अल्पसंख्यक गैर-मुसलमानों के नारकीय जीवन के बारे में क्या सफाई देंगे?

Date:14-06-22

जीवन संभाव्यता की पहेली
संपादकीय

एक औसत भारतीय की आयु अब बढ़कर 69.7 वर्ष हो गई है। यानी 10 वर्ष पहले की तुलना में उसकी जीवन संभाव्यता में दो वर्ष का सुधार हुआ है। यह खबर वैश्विक स्तर पर उभरती शक्ति की हमारी स्वनिर्मित छवि पर आघात के समान है। जाहिर है एक बड़े कालखंड के आधार पर देखा जाए तो भारत की जीवन संभाव्यता में हुए सुधार को उल्लेखनीय माना जा सकता है क्योंकि आजादी के समय एक औसत भारतीय महज 32 वर्ष तक जीवित रहता था। 75 वर्ष पहले आजाद हुए मुल्क के लिए 70 वर्ष की औसत आयु ठीकठाक है जबकि वैश्विक औसत आयु 72.6 वर्ष की है। 50 वर्ष पहले आजाद हुए नजदीकी पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से तुलना करें तो उसकी औसत आयु 72.1 वर्ष तथा नेपाल की 70 वर्ष है। जीवन संभाव्यता के मामले में हम चीन से भी काफी पीछे हैं। उसकी औसत आयु 76.91 वर्ष है। हालांकि दिल्ली, केरल, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र में जीवन संभाव्यता वैश्विक औसत से अधिक है लेकिन इनमें से कोई देश चीन से आगे नहीं निकल पाया है।

आर्थिक विकास के एक अहम जनांकीय संकेतक पर इस खराब प्रदर्शन के बीच एक तथ्य यह भी है कि भारतीय शिशुओं, खासकर कन्या शिशुओं में जन्म के समय और शैशवावस्था में बचने की संभावना कम है।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि 45 वर्ष की अवधि में जन्म के समय जीवन संभाव्यता और एक या पांच वर्ष की आयु के बीच जीवन संभाव्यता में केवल 20 वर्ष का अंतर आया है। यह धीमी प्रगति भी उत्तर और पूर्वी भारत के निराशाजनक प्रदर्शन को ढक लेती है। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीवन संभाव्यता के क्षेत्र में क्रमश: 65.6 वर्ष और 65.3 वर्ष के साथ सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले प्रदेश हैं। वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू की शिशु मृत्यु दर की ताजा रैंकिंग में भारत 195 देशों में 138वें स्थान पर है। यहां प्रत्येक 1000 जन्मे बच्चों में से 27.8 की मृत्यु हो जाती है। बांग्लादेश 135वें तथा नेपाल 132वें स्थान पर है। जबकि चीन 50वें स्थान पर है।

जीवन संभाव्यता और शिशु मृत्यु दर के मामले में भारत के कमजोर प्रदर्शन की वजह है औसत भारतीय, खासकर महिलाओं की चिकित्सा ढांचे तक सहज पहुंच नहीं हो पाना। शहरी और ग्रामीण जीवन संभाव्यता में भी अंतर भी इस बात को उजागर करता है। दोनों के बीच 5 से 8 वर्ष का अंतर देखा जा सकता है।

ये हालात समझ से परे हैं क्योंकि सन 1975 से ही भारत सरकार एक व्यापक कार्यक्रम चला रही है जो छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर केंद्रित है। इसके लिए आंगनवाड़ी केंद्रों का एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया गया और लगभग हर राज्य ने अपने स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना शुरू की। एकीकृत बाल विकास सेवाओं की शुरुआत की गई जिन्हें दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा कार्यक्रम कहा जाता है और इसके तहत भी बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण में सुधार आने की बात कही गई। परंतु वर्ष बीतने के साथ ही इनके तथा संबद्ध योजनाओं के लिए बजट आवंटन तथा क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाना कम कर दिया गया। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि आईसीडीएस तथा मध्याह्न भोजन के बजट में 2015-16 के बाद से लगातार कटौती की गई है। अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि इन योजनाओं का ज्यादातर लाभ गरीबों और वंचित वर्ग के बच्चों के बजाय मध्यम और निम्न मध्य वर्ग के बच्चों को मिला है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में सुधार लंबे समय से लंबित है।

Date:14-06-22

दुनिया को बचाने के लिए जरूरी सवाल
सुनीता नारायण

मैं यह आलेख गहरे क्षोभ के साथ लिख रही हूं। जून में दुनिया भर के देश स्टॉकहोम में एकत्रित हुए। ये देश वैश्विक स्तर पर पर्यावरण को लेकर जगी चेतना के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एकत्रित हुए थे। यह बैठक परस्पर निर्भरता का उत्सव मनाने तथा पृथ्वी के हित में वैश्विक एकजुटता के लिए आयोजित की गई थी। परंतु इन तमाम बातों से इतर ऐसे आयोजन बहरों के बीच आपसी संवाद बनकर रह गए हैं। ऐसा लगता है मानो यह विश्व दो अलग-अलग ग्रहों पर रहता है। दोनों के बीच एक गहरा विभाजन है, ध्रुवीकरण है और एक दूसरे की चिंताओं को लेकर नासमझी भी है।

मैं आपको बताती हूं कि मुझे किस बात से परेशानी है और किस बात से मुझे लगा कि हमें एक दूसरे को सुनने सीखने की कितनी अधिक आवश्यकता है। जैसा कि आप जानते हैं देश के कई हिस्से झुलसा देने वाली गर्मी और लू से त्रस्त हैं। दिल्ली में जहां मैं रहती हूं, तापमान 47 डिग्री सेल्सियस का स्तर पार कर गया। इस समय जब मैं ये पंक्तियां लिख रही हूं, मुझे पता है कि मेरे जैसे लोग जो अपेक्षाकृत आरामदेह माहौल में रहते हैं, उन्हें इस गर्मी से बहुत अधिक परेशानी नहीं होती। परंतु लाखों लोग ऐसे भी हैं जो धूप में काम करते हैं। इनमें किसानों से लेकर विनिर्माण श्रमिक तक ऐसे तमाम लोग शामिल हैं जो एक पंखा चलाने के लिए भी बिजली का भुगतान करने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे लोग सबसे अधिक प्रभावित हैं। इस भीषण तापमान को वही सबसे अधिक झेल रहे हैं, उनका काम प्रभावित हो रहा है, वे बीमार पड़ रहे हैं, लोगों की जान जा रही है। गेहूं की फसल इस गर्मी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार तापमान में वृद्धि बहुत जल्दी हुई। हर वर्ष मई के बदले इस बार मार्च में ही गर्मियां बढ़ गईं। इससे गर्मियों का असर भी पहले की तुलना में बहुत खतरनाक ढंग से बढ़ा है। वैज्ञानिक इसे प्रशांत महासागर की लहरों के असामान्य व्यवहार यानी ला नीना से जोड़ते हैं। उनका कहना है कि उनके असामान्य रूप से लंबा होने के कारण गर्म हवा के थपेड़े बढ़े। पश्चिमी विक्षोभ में बदलाव के भी प्रमाण हैं और यह बदलाव आर्कटिक जेट धारा में परिवर्तन के फलस्वरूप है। पश्चिमी विक्षोभ के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में इन गर्मियों में जल्दी बारिश होती और गर्मियों का प्रभाव भी कम होता। परंतु इस वर्ष पश्चिमी विक्षोभ कमजोर है। अभी यह पता नहीं है कि यह दीर्घकालिक रुझान है या अल्पकालिक लेकिन यह बात एकदम स्पष्ट है कि गर्म हवाओं और वैश्विक जलवायु परिवर्तन में सीधा संबंध है।

हालात बहुत-बहुत खराब हैं। यह भी निश्चित है कि भारत में हम लोगों को इससे अलग तरह से सबक लेने की आवश्यकता है क्योंकि हम जानते हैं कि तापमान खराब से और खराब होता जाएगा। विश्च मौसम विज्ञान संगठन द्वारा मई 2022 में जारी रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2021’ हमें बताती है कि जलवायु परिवर्तन के चार अहम संकेतक-ग्रीनहाउस गैसों का संघनन, समुद्री जलस्तर में वृद्धि, समुद्र की गर्मी और समुद्र का अमलीकरण 2021 में रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गया।

हमारे सामने क्या विकल्प हैं? पहला, सभी को सस्ती बिजली मुहैया कराना ताकि लोग इस तापमान का मुकाबला कर सकें, दूसरा बेहतर इंसुलेशन वाले और हवादार घर बनाना ताकि वे तापमान झेल सकें, तीसरा छायादार वृक्ष लगाना और चौथा पीने और सिंचाई करने के लिए जल संरक्षण करना। इन उपायों को अपनाने से हमारे शहरों का वातावरण शीतल होगा। लेकिन इस क्षेत्र में भी सीमाएं हैं। हमारा सामना जिस तापवृद्धि से है, उसमें रहना या उससे सामंजस्य बना पाना मुश्किल है। यह भी स्पष्ट है कि दुनिया का गरीब वर्ग इससे सबसे अधिक प्रभावित होगा।

मेरी पीड़ा केवल अपने आसपास के इन कठिन हालात की वजह से नहीं है। जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता और पर्यावरणविद के रूप में मुझे इस बात का अहसास है कि मैं चीजों को बेहतर बनाने में नाकाम रही हूं- हम सभी नाकाम रहे हैं। जले पर नमक वाली बात तब हो जाती है जब पश्चिमी मीडिया मेरा साक्षात्कार लेकर गर्मियों के बिगड़ते हालात के बारे में बात करना चाहता है। जीवन और मौत के बारे में चुनिंदा सवालों के बाद यही सवाल आते हैं कि भारत जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए क्या कर रहा है? यह सवाल भी किया जाता है कि भारत अभी भी कोयले से बनने वाली बिजली क्यों इस्तेमाल कर रहा है। आखिरी प्रश्न यह है कि गर्मियों में बिजली की मांग बढ़ती है जिसका अर्थ है और अधिक कोयले की खरीद। मुझसे इन सवालों के जवाब चाहे जाते हैं।

मैं उत्तर में क्या कह सकती हूं? मैं भला कैसे समझाऊंगी कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारत का योगदान नाम मात्र का है। मैं उन्हें यह कैसे समझाऊं कि वातावरण में उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों का भंडार भारत की देन नहीं है। मैं कैसे समझाऊं कि हमें भारत के गरीबों या अपेक्षाकृत अमीरों को दोष देने के बजाय वैश्विक ताकतों को यह समझना चाहिए कि तापमान में यह वृद्धि भारत जैसे देशों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है। हम सभी को अपने हित के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना चाहिए लेकिन इस बीच चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि अमीर देश जो इस समस्या की मूल वजह हैं वे अपना उत्सर्जन कैसे कम करेंगे और शेष विश्व को इस नुकसान की भरपाई करने के लिए क्या करेंगे। यह असहज करने वाला सच है जो सुना नहीं जाता। हम चीख सकते हैं लेकिन दुनिया का दूसरा हिस्सा सुन ही नहीं रहा है। अगर हम एक बेहतर दुनिया चाहते हैं तो इन हालात में बदलाव लाना होगा। तभी हमारी दुनिया बच सकेगी।