News Clipping on 10-08-2018


Watchdog Or Lapdog ?

Why authoritarian leaders like to brand the media as ‘enemy of the people

Gautam Adhikari, (The writer is former Executive Editor of The Times Of India, is a senior fellow at the Center for American Progress, Washington DC)

President Donald Trump keeps lashing out at the media as “the enemy of the people”. His surrogates refuse to say whether they agree with that description of the press, notably Sarah Sanders when she is accosted by CNN’s Jim Acosta in the White House. Journalists, including conservative anti-Trump pundits like Bret Stephens of The New York Times, are being threatened with dire consequences. Alarming? Yes, but there may be method in Trump’s rant.There are different ways in which an authoritarian, or would-be authoritarian, goes after the media in a democracy that constitutionally mandates a free press.

The old-fashioned way is to censor the media, ban criticisms of the leader and the administration, and throw leading journalists in jail. It’s still the preferred method of outright tyrants. A more effective way in a political system that is democratically structured is to avoid the appearance of suppression of a still independent media on the way to delegitimising it. It works like this: Keep a significant part of the media unquestioningly on your side as virtual state megaphones – witness Fox News and the overwhelming majority of US talk radio – while systematically attacking the credibility of the rest of the media. All the while, keep ranting against “the media” as corrupt and untrustworthy even as a substantial part of it is on your side. The part that is not, call it ‘the enemy of the people’ to stoke popular opinion against the press.

The term has long been used by leaders in power who would brand a subgroup, including an independent media, that might pose a check to unchallengeable authority. Robespierre used it during the French Revolution, so did Lenin and Stalin in the Soviet Union. All authoritarians hate an independent press. Trump, not a full-blown authoritarian thus far, realises how it makes tactical sense at this juncture of his drive to make America in his own image to keep berating the press as purveyors of “fake news” and to beat up the media as the enemy of the people. The tactic cleverly devalues truth and erodes the credibility of objective reportage.

The press in a liberal democracy is, of course, necessarily an ‘enemy of some people’ at a given point of time. It performs its defining role as watchdog, the more so when sections of it want to be lapdogs. In such a role it barks when it spies misconduct. But for any wannabe authoritarian who already controls the three estates of a constitutional democracy, ie the executive, the legislature and the highest rungs of the judiciary, a defiant fourth estate is his natural enemy.

Trump’s base of blind supporters is a substantial minority that, going by opinion polls, trusts him overwhelmingly over the coverage of the mainstream news outlets, unless it’s Fox or one of the numerous hard right websites or his amen corner of conservative talk radio. A tad more support from independents and wavering Republicans, of whom there are few, may be enough for him. The fabled checks and balances of the American system of governance are malfunctioning. Apart from the hope of a record high turnout for the midterm elections in November that might give Democrats a majority in one or both houses, the press remains the only bulwark left for slowing Trump’s assault on a liberal democratic United States.

Trump and his cohort know this well. That may be why he relentlessly attacks the media. Take his meeting last week with AG Sulzberger, publisher of The New York Times. Trump tweeted that he had discussed “the vast amounts of Fake News being put by the media and how that Fake News has morphed into phrase ‘Enemy of the People’, Sad!” Within two hours, Sulzberger clarified: “I told the president directly that I thought his language was not just divisive but increasingly dangerous.”

The publisher told him that he was far more concerned about his labelling of journalists ‘the enemy of the people’ and warned that “this inflammatory language is contributing to a rise in threats against journalists and will lead to violence.” Yes. But what if it’s an outcome which doesn’t perturb the president? In fact, he might be happy to have generated an atmosphere of intimidation of the press. Some of his hardline supporters at rallies have become menacing to reporters. And the real fake news that is purveyed by far right conspiratorial websites has already generated violence or the threat of violence. The media, or the part of it which isn’t yet servile to an authoritarian or near-authoritarian, simply must be as alert a watchdog as ever in these times. It’s the only fighter left in the ring, for now.


चुनाव में पाला बदलने का वक्त आ गया है

विज्ञान और तर्क को दरकिनार कर दिए गए सत्ता में बैठे जिम्मेदार व्यक्तियों के अतिशयोक्ति पूर्ण बयान

प्रीतीश नंदी

कुछ दिन पहले कर्नाटक के भाजपा विधायक बासनागौडा पाटिल येतनाल ने कारगिल विजय दिवस कार्यक्रम में कहा कि भारत को भीतर से ही इसके बुद्धिजीवियों और उदारवादियों से गंभीर खतरा है, जो राज्य-व्यवस्था पर बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे सब राष्ट्र-विरोधी हैं और यदि वे गृहमंत्री हो तो पुलिस को आदेश देंगे कि सबको कतार में खड़े करके गोली मार दो। सौभाग्य से वे मंत्री है नहीं लेकिन, पत्रकार गौरी लंकेश सहित चार बुद्धिजीवियों को कर्नाटक और पड़ोसी महाराष्ट्र में गोली मारी गई है। पुलिस ने नहीं बल्कि किराये के हत्यारों ने। मुझे लगता है कि इन्हें किराये पर यतनाल जैसे लोगों ने ही लिया होगा। ये सभी चारों सम्माननीय शख्सियतें थीं और पांच अन्य इस वक्त कर्नाटक में पुलिस सुरक्षा में जी रहे हैं, क्योंकि माना जा रहा है कि वे निशाने पर हो सकते हैं।

यतनाल ही वे शख्स हैं, जिन्होंने पहले एक वायरल वीडियो में कहा था कि उनकी पार्टी के पार्षद मुस्लिमों के लिए काम नहीं करेंगे। वे अकेले नहीं हैं। हमने ऐसे ही विचार उनकी पार्टी के कुछ अन्य लोगों से भी सुने हैं, जो सोचने-समझने वाले लोगों, उदारवादियों, धर्मनिरपेक्षवादियों, अल्पसंख्यकों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं को अपना शत्रु मानते हैं। वे इसे भिन्न तरीकों से कह सकते हैं पर यह साफ है कि ऐसे लोग उन्हें अखरते हैं, वे भी जो आधुनिक विज्ञान की भाषा बोलते हैं। उनके लिए ये ‘दूसरे’ हैं- और उन्हें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। वे पाठ्यपुस्तकें भी बदलना चाहते हैं। यदि उनकी चले तो इतिहास से मुगल अध्याय ही समाप्त हो जाए और उसी तरह ब्रिटिश शासन भी। राजस्थान में कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक में छात्रों को पढ़ाया जाता है कि महाराणा प्रताप हल्दीघाटी की लड़ाई जीत गए थे, जबकि अन्य जगहों पर बच्चे सीखते हैं कि वे अकबर की सेना से हार गए थे।

अकबर भी राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों से बाहर कर दिए गए हैं। टीपू सुल्तान भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, जो अंग्रेजों से लड़ते हुए मारा गया था। किसी स्पष्ट कारण के बिना उसे खलनायक बना दिया गया है। लेकिन, बात सिर्फ इतिहास की किताबों की नहीं है। वे डार्विन को भी नकारते हैं। हमारे बच्चे जिन स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते हैं उससे संबंधित मानव संसाधन मंत्रालय के जूनियर मंत्री ने डार्विन को फर्जी बताकर उसकी निंदा की। उन्होंने मानव उत्क्रांति के सिद्धांत को पाठ्यपुस्तकों से निकालने की कसम खाई है, क्योंकि उनका दावा है कि वे बरसों से देख रहे हैं पर किसी वानर को मानव होते नहीं देखा (मेरा ख्याल है अब आइंस्टीन निशाने पर होंगे, क्योंकि इसी तर्क से किसी ने e को mc2 होते नहीं देखा।

लेकिन पूर्व पुलिसकर्मी, जो प्राय: मंत्रालय के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति होने की शेखी बघारते हैं वे सत्यपाल अकेले नहीं हैं। पार्टी में कई और हैं, जो बहुत जल्दी में है। उन्हें हमारा संविधान बदलने की जल्दी है। वे सारे मुस्लिमों को पाकिस्तान– और अब बांग्लादेश भेजना चाहते हैं। उन्हें सारे अंतरजातीय, अंतर्धार्मिक विवाह रोकने की जल्दी में हैं। उन्हें दलितों को घोड़े पर बैठकर विवाह करने जाने से रोकने की जल्दी है। उन्हें महात्मा को हटाकर उनके स्थान पर उनके हत्यारों को लाने की जल्दी है। हमारे सामने तो त्रिपुरा के राज्यपाल भी हैं, जो 2002 में गुजरात में मुस्लिमों के मारे जाने को सकारात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री भी कम नहीं हैं। उन्होंने राज्य के युवाओं को सलाह दी है कि वे सरकारी नौकरियों के पीछे न भागे बल्कि घर पर रहे और गाय का दूध निकाले या पान की दुकान खोल लें। वे सिविल सेवा में सिर्फ सिविल इंजीनियर चाहते हैं, क्योंकि उनकी योग्यता काम के अनुरूप है।

जैसे-जैसे हम 2019 के चुनाव के नज़दीक जा रहे हैं, इस तरह का शोर अधिक तीखा, कर्कश और अधिक भड़काऊ होगा, क्योंकि उन्हें रोकने वाला कोई है नहीं। मजे की बात है कि जो बचे हुए सरकार के सहयोगी हैं चुपचाप उससे दूर हो रहे हैं। लेकिन, समस्या यह है कि खेल के नियम बदल गए हैं। हर कोई आगामी चुनाव के लिए पैसे की जुगाड़ में है और जैसा हम जानते हैं पैसा हमेशा सत्ता में होता है। इस तरह यदि विपक्ष राजनीतिक गठजोड़ों और संसाधनों दोनों स्तरों पर काम नहीं करता, तो उन्हें चुनाव बाद के खरीद-फरोख्त के माहौल में मात मिलेगी। मुझे आश्चर्य होता है कि क्यों सरकार नफरत को इतना फैलाना चाहती है। वे उदारवादियों को गोली मारना चाहते हैं, धर्मनिरपेक्षतावादियों को निर्वासित करना चाहते हैं। बुद्धिजीवी तो उनके लिए राष्ट्रविरोधी हैं, मुस्लिम आतंकी। किसान तो लगातार अर्थव्यवस्था को निचोड़ने वाले, इसलिए उनकी जमीन को विकास यानी –बुलेट ट्रेन और हाईवे- के लिए हथिया लेना चाहिए। आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ रहे सारे एक्टिविस्ट माओवादी हैं। पर्यावरणविद तो तरक्की के दुश्मन है, क्योंकि वे जंगलों की कटाई, मेनग्रोव को उखाड़ने, नदियों पर बांध बनाने का विरोध करते हैं। पत्रकार प्रेस्टीट्यूट हैं।

एनजीओ को भारत के खिलाफ शत्रुता रखने वाली वैश्विक ताकतें पैसा देती हैं। जब तक आप नहीं मानेंगे कि संजय ने टीवी देखकर दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध का वर्णन सुनाया था या गणेशजी ने प्लास्टिक सर्जन से सिर का प्रत्यारोपण कराया था, ऐसे किसी प्रागैतिहासिक भारत के सुनहरे युग में जब आसमान में सुपसॉनिक जेट उड़ते थे और हम ब्रह्मांडों के बीच उड़ान भरने वाले वाहनों में उड़ते थे, जो उस सबसे बहुत आगे की बात थे, जो एलन मस्क सोच रहे हैं, तब तक आप राष्ट्रवादी नहीं हैं। बेशक, धरती भी चपटी है और जब तक आप सारे नास्तिकों को कगार से नीचे नहीं धकेल देते तब तक हम यह पता नहीं लगा पाएंगे कि इतने दुष्कर्मों और लिचिंग और तर्कवादियों की हत्याओं के बाद भारत अतुल्य कैसे है। ऐसे राष्ट्र के लिए जिसने कला और विज्ञान के क्षेत्रों के हमारे समय के महानतम मस्तिष्कों को जन्म दिया यह सब अतिशयोक्तिपूर्ण है। लेकिन, फिर हमने ही इन्हें वोट देकर सत्ता सौंपी है। मुझे नहीं पता कि हमने तब क्या खाकर उन्हें वोट दिए थे। लेकिन, अब पाला बदलने का वक्त है फिर चाहे हमारी जीडीपी कुछ नीचे ही क्यों न गिर जाए और शेयर बाजार को धरती पर ही क्यों न ला दे। शायद एक थोड़ा कम महान, सुरक्षित, तर्कशील भारत इतनी बुरी बात भी नहीं है।


राष्ट्रहित पर भारी पड़ते दलगत हित

प्रदीप सिंह,(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार है)

अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक लोकसभा में आम राय से पास हो गया। उम्मीद है कि राज्यसभा से भी इसे मंजूरी मिल जाएगी। मौजूदा राजनीतिक माहौल में किसी विधेयक का आम सहमति से पास होना उपलब्धि से कम नहीं, परंतु यह एक विधेयक हमारी राजनीति, संसदीय व्यवस्था और कानून के राज के बारे में बहुत कुछ कहता है। जनतांत्रिक व्यवस्था में आम सहमति अच्छी बात है, लेकिन उसके साथ ही सवाल यह भी है कि आम सहमति किसलिए और उस आम सहमति से लिए गए फैसले का मकसद क्या है? राजनीति क्या और कैसे-कैसे फैसले करा सकती है, इसका उदाहरण उक्त विधेयक है। ऐसा लगता है पूरी संसद ने मिलकर तय किया कि वह कुछ मामलों में न्याय के सिद्धांत नहीं मानेगी- सर्वोच्च न्यायालय कहेगा तब भी नहीं। संसद के मानसून सत्र में दो बड़ी घटनाएं हुईं। पहली तो यह कि संसद की कार्यवाही चल रही है।

प्रत्यक्ष रूप से उसके दो कारण समझ में आते हैं। एक अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष सरकार के खिलाफ अपने मन की भड़ास निकाल चुका है। हार तो तय थी पर हार के अंतर ने उसका हौसला थोड़ा पस्त किया। दूसरा, उसे समझ में आ गया कि लगातार संसद की कार्यवाही बाधित करने से उसकी नकारात्मक छवि बन रही है। कई राज्यों के विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव के नजदीक होने से इसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है। संसद ने बीते दिनों पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक पर मुहर भी लगाई। कई दशकों से यह मांग थी। सभी सरकारें वादा तो करती रहीं, परंतु किसी ने किया नहीं। मोदी सरकार ने इसका बीड़ा उठाया और पूरा किया। यदि कांग्रेस ने राज्यसभा में अड़ंगा न लगाया होता तो इस विधेयक पर बजट सत्र में ही संसद की मुहर लग जाती।

समझना मुश्किल है कि कांग्रेस ने पिछले सत्र में अड़ंगा क्यों लगाया और इस सत्र में समर्थन क्यों किया? इस विधेयक के पास होने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि इतिहास में यह सत्र सामाजिक न्याय सत्र के रूप में याद किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने यह भी घोषणा की कि अब हर साल एक से नौ अगस्त तक सामाजिक न्याय सप्ताह मनाया जाएगा। उक्त विधेयक पर मुहर लगाने के बाद लोकसभा में अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार रोकथाम) कानून में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिए विधेयक को पारित किया गया। समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े इस वर्ग के लोगों को सुरक्षा देने के लिए कानून बने और सख्त कानून बने, इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, परंतु यह संशोधन विधेयक जिन परिस्थितियों में सरकार को लाने के लिए मजबूर होना पड़ा वह हमारी राजनीति का विद्रूप चेहरा दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा था कि इस कानून के तहत गिरफ्तारी से पहले पुलिस अधिकारी इसकी पड़ताल करेंगे कि प्रथमदृष्टया मामला बनता या नहीं? अदालत ने गिरफ्तारी के लिए कुछ शर्तें भी लगाई थीं।

जिस याचिका पर यह फैसला आया उसमें कहा गया था कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। हालांकि यह कोई बहुत वाजिब तर्क नहीं था, क्योंकि दुरुपयोग तो हर कानून का होता है। दहेज विरोधी कानून इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ समय पहले इसी आधार दहेज विरोधी कानून में भी सुप्रीम कोर्ट ने शिकायत के बाद तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। शायद इसी फैसले से प्रेरित होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट गए थे। यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह न तो नैतिक रूप से ठीक था और न ही राष्ट्रहित की दृष्टि से। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विपक्षी दलों और कुछ गैर राजनीतिक संगठनों ने अनुसूचित जाति और जनताति के लोगों को बरगलाया कि मोदी सरकार आरक्षण खत्म करना चाहती है। स्वाभाविक रूप से इसकी प्रतिक्रिया हुई। दो अप्रैल को आंदोलन की घोषणा हुई। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन और हिंसा हुई जिसमें कई लोग मारे गए। अनुसूचित जाति-जनजाति के जो लोग इस आंदोलन में शामिल हुए उनसे जब पूछा गया कि प्रदर्शन में क्यों आए हो तो तमाम का जवाब था कि उन्हें बताया गया है कि सरकार आरक्षण खत्म कर रही है।

लोगों को गुमराह करने का यह काम इसके बावजूद हुआ कि 2015 में मोदी सरकार ने ही अनुसूचित जाति-जनजाति के खिलाफ अत्याचार की श्रेणी में आने वाले मामलों की संख्या 22 से बढ़ाकर 47 की थी। इसके अलावा भी सरकार ने इस वर्ग की सुरक्षा और विकास को लेकर कई कदम उठाए, परंतु यहां सवाल इसका नहीं कि सरकार ने क्या किया? सवाल है कि सरकार ने जो नहीं किया उसका झूठा प्रचार करके एक वर्ग को सड़क पर उतरने, सामाजिक समरसता को बिगाड़ने का प्रयास क्यों किया गया? यह केवल वोट के लिए किया गया। यह विपक्ष का अधिकार है कि वह सरकार की कमजोरियों और नाकामियों पर लोगों को लामबंद करे, परंतु समाज और देश के प्रति भी उसकी जिम्मेदारी है।एक झूठे प्रचार के जरिये केंद्र सरकार और अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को आमने सामने खड़ा कर दिया गया। इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि कुछ संगठनों ने नौ अगस्त को इसी मुद्दे पर दोबारा भारत बंद का एलान कर दिया। प्रतियोगी राजनीति जनतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छी है, परंतु यही राजनीति जब राष्ट्रहित पर दलगत हित को तरजीह देने लगती है तो देश और जनतंत्र दोनों का नुकसान करती है।

विपक्षी दलों को लगता है कि यदि दलित समुदाय को भाजपा से अलग कर दिया जाए तो मोदी को रोका जा सकता है। यही कारण है कि उनकी राजनीति कभी दलित-मुस्लिम गठजोड़ की बात करती है तो कभी दलितों पर अत्याचार के मुद्दे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती है। यही राजनीति अपराध में कभी धर्म खोजती है तो कभी जाति। 2014 में कई राज्यों में दलित समाज का एक बड़ा तबका भाजपा के साथ गया। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी यह ट्रेंड बना रहा। इसी कारण दलित अस्मिता के नारे पर बनी बसपा लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिली और विधानसभा में वह 19 सीटों पर सिमट गई। भाजपा और संघ की कोशिश है कि समाज का यह तबका उससे स्थाई रूप से जुड़े। आजादी के कई दशक बाद तक कांग्रेस को ब्राह्मण, दलित और मुसलमानों का थोक में वोट मिलता था। भाजपा की कोशिश है कि उसका सवर्ण, अति पिछड़ा और दलित समीकरण बने जिससे चुनाव जाति पर जाएं तो भी उसे नुकसान न हो। विपक्ष इसी को रोकने के लिए नैतिक के साथ अनैतिक हथकंडे आजमा रहा है।


नियामकों की क्षमता बढ़ाने से ही बन पाएगी बात

सोमशेखर सुंदरेशन, (लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)

पिछले लेख में मैंने प्रतिभूति अपील अधिकरण (एसएटी) में रिक्तियों के चलते कामकाज प्रभावित होने का जिक्र किया था। अधिकरण अक्सर आलोचनाओं के घेरे में आ जाते हैं। सवाल उठाया जाता है कि ये अधिकरण स्टाफ से जुड़ी मुश्किलों के बावजूद किस तरह अदालतों की भूमिका निभा पाते हैं। अक्सर इन अधिकरणों की तरफ से बयान आता है कि उन्हें जरूरी स्टाफ नहीं मिल पा रहा है। हालांकि सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में इसका अभाव दिखता है कि अदालतों की तरह काम करने वाले इन अधिकरणों के स्टाफ की नियुक्ति कैसे होती है, उन्हें जरूरी स्टाफ क्यों नहीं मिल रहा है और ये अधिकरण क्या अपनी जिम्मेदारी पूरी करने लायक हैं? पहला, भारत में नियमन ढांचा इस तरह बना है कि हरेक काम के लिए एक नियामक बनाया गया है और उसके फैसलों के खिलाफ अपील की सुनवाई के लिए एक अधिकरण होता है। अधिकरण के फैसलों के खिलाफ अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में जाती है। जहां विमर्श मुख्यत: इस पर होता है कि अधिकरण उच्चतर न्यायपालिका का विकल्प बनते जा रहे हैं।

नियामक की व्यवस्था वाले हरेक कानून में नियामक संस्था को दीवानी अदालत की कुछ विशिष्ट एवं सीमित शक्तियां सौंपी जाती हैं। लेकिन असल सवाल यह है कि क्या ये नियामक न्यायाधीश की भूमिका निभाने और अदालत की तरह इंसाफ दिला पाने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं? अमूमन इन कानूनों में एक व्यापक मूलभूत राजाज्ञा निहित होती है कि ‘नियामक प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुसरण करेगा’। लेकिन इसके मायने और वास्तविक कार्य इसे एक बेलगाम घोड़ा बना देते हैं। किसी एक मापदंड से संचालित होने वाले दो नियामक प्रकृति में पूरी तरह जुदा हो सकते हैं। मसलन, रिकॉर्ड का मुआयना करने की इजाजत देने के मामले में दो नियामकों का रवैया पूरी तरह अलग हो सकता है। यहां तक कि एक नियामकीय संस्था के भीतर भी किसी आरोपी को मामले से जुड़े रिकॉर्ड देखने की इजाजत देने को लेकर दो अफसरों की राय अलग हो सकती है। रिकॉर्ड देखने से वंचित होने से खुद को गलत तरीके से आरोपित मानने वाला व्यक्ति अपील अधिकरण का रुख करता है और कई बार यह मामला वर्षों तक चलता रहता है।

दूसरा, नियामकों के गठन का प्रावधान करने वाले कानून आम तौर पर संबंधित मसले पर दीवानी अदालतों के अधिकार-क्षेत्र को दरकिनार कर देते हैं। इसके चलते अक्सर भारी दुविधा की स्थिति बनती है। एक नियामक दंड देने और नियम अनुपालन के साथ ही उपचारात्मक व्यवस्था भी कर सकता है। लेकिन एक नियामक निजी सुनवाई करने, साक्ष्यों को तौलने और मुआवजे के आकलन में सक्षम नहीं होगा। अगर आपको लगता है कि किसी नियामकीय कानून के तहत हासिल आपके अधिकारों का हनन हुआ है और उसके एवज में क्षतिपूर्ति चाहते हैं तो आप नियामक के समक्ष खुद याचिका नहीं दायर कर सकते हैं। अगर आप सीधे नियामक के पास जाते हैं तो वह आपकी याचिका की प्रासंगिकता और दायरे को देखते हुए उसे स्वीकार करने के प्रति अनिच्छुक हो सकता है। यह भी हो सकता है कि वह इसे अपना दायित्व ही न माने।

अगर आप नियामक को इसके लिए मजबूर करना चाहेंगे तो उसके लिए संवैधानिक अदालत में रिट याचिका दायर करनी होगी। अगर नियामक को इस शिकायत पर कार्यवाही शुरू करनी पड़ती है तो संभव है कि सवालों के घेरे में रहे नियामकीय अधिकारी की शिकायतकर्ता और आरोपी व्यक्ति के बीच विरोधात्मक कार्यवाही चलाने की मंशा और चाहत न हो।  दूसरी तरफ एक नियामक गलत काम करने वाले शख्स को दंडित करने के लिए सक्षम होगा। नियामक गलत व्यक्ति को उपचारात्मक निर्देश भी दे सकता है। लेकिन विशेष शक्तियों के बगैर नियामक क्षतिपूर्ति के दावे की कार्यवाही नहीं चला सकता है। नियामक को ऐसी शक्तियों से लैस करने के लिए कानून में संशोधन किए जा सकते हैं लेकिन इसमें सावधानी भी बरतनी होगी। असल में आदेश पलटने की शक्ति पहली बार सेबी अधिनियम 1992 में दी गई थी। लेकिन उससे केवल इतना हो सकता है कि गलत काम करने वाला शख्स दोषपूर्ण तरीके से अर्जित लाभ का उपयोग न कर सके।

अगर वह लाभ उसके पास नहीं है तो फिर यह प्रावधान भी उससे वसूली नहीं कर पाएगा। अगर नियामक के पास नुकसान के आकलन और हर्जाने के भुगतान का आदेश देने की शक्ति नहीं है तो सामान्य अदालत के न्याय-क्षेत्र को बेदखल नहीं किया जा सकेगा।  हमें अपने नियामकों को सशक्त करने के बारे में सोचने की जरूरत है। यह भी देखना होगा कि नियामक को अदालत की पूरी भूमिका निभानी चाहिए या नहीं। अगर उसे अदालत की भूमिका निभाने के लिए अधिकार सौंपे जाते हैं तो फिर उसी तरह का हंगामा मचेगा जैसा अधिकरणों पर होता है। आज नियामक काफी काम इसलिए कर पाते हैं कि वे भले ही देखने और काम करने में अदालत की तरह हैं लेकिन असल में अदालत नहीं हैं।

आखिर में, प्राकृतिक न्याय के समुचित अनुपालन के लिए गठित निकाय के न्यायिक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की गंभीर कोशिशें काफी जरूरी हैं। नैसर्गिक न्याय के अनुपालन संबंधी विवादों पर अधिक संसाधन लगाना न केवल समय बल्कि नियामक के वित्तीय संसाधनों का भी अपव्यय है। एक ही नियामकीय संस्था के भीतर उठाए जाने वाले कदमों के बारे में एकरूपता होनी चाहिए। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संघर्ष में जगह तलाशना काफी नहीं है। अगर कार्यपालिका को लगता है कि इसकी एजेंसियां न्यायाधीश की भूमिका निभा सकती हैं तो उसे नियामकों की क्षमता बढ़ाने में निवेश करना चाहिए ताकि निष्पक्ष, वस्तुनिष्ठ, सुदृढ़ और संयमित तरीके
से अदालत की तरह कार्यवाही चल सके।


हमारी विदेश नीति की पाकिस्तान दुविधा

जोरावर दौलत सिंह, फेलो, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, दिल्ली

बीते एक दशक के निर्बाध लोकतंत्र ने भारतीय मानस में उम्मीद जगाई कि पाकिस्तान बदल रहा है और वहां के नागरिक-सैन्य संबंधों को इतिहास के आईने में देखना शायद गलत हो। इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ के नेतृत्व में सत्ता का ताजा और शांतिपूर्ण हस्तांतरण भी कुछ लोगों को ऐसा ही लग रहा है, जैसे सेना के प्रभुत्व से निकलकर कोई राजनेता आम जनता के बीच से चुनाव जीतकर आगे आया है। वे इसे राजनीति को सेना की छाया से उबरने का एक और प्रमाण मान रहे हैं। और चूंकि राजनेताओं के पास भारत से टकराने का कोई स्पष्ट आधार नहीं है, इसलिए पाकिस्तान का यह लोकतंत्रीकरण उप महाद्वीप की भू-राजनीति को बदलने वाला साबित होगा। अब ऐसे मूल्यांकन के लिए क्या कोई आधार है?

हमें नागरिक-सैन्य मॉडल पर बात करते हुए थोड़ी सतर्कता या कहें कि कुछ जटिलता का परिचय देना चाहिए, जो कई बार भारतीय सोच को कमतर करती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मुहम्मद अली जिन्ना ही थे, जो 1947 में कश्मीर पर हमला करने वाले पहले नागरिक नेता थे। दूसरे, पाकिस्तान में लोकतंत्र की तलाश हमेशा से एक खासा जटिल मसला रहा है। जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर के पाकिस्तान को हम सैन्य संरचना पर एक असल नागरिक पड़ाव मान सकते हैं। लेकिन तब हालात कुछ और थे। 1971 के युद्ध में करारी शिकस्त के बाद पाकिस्तानी सेना अपनी साख पूरी तरह खो चुकी थी। फिर भी, ऐसे तमाम अनुकूल हालात के बावजूद पाकिस्तान के भीतर फिर से जमीन व्यवस्थित करने की भारतीय कोशिशों को सफलता नहीं मिली। भट्टो अपनी कमजोरी का इस्तेमाल कर सद्भावना और एक नए पाकिस्तान की उम्मीद कायम करने में तो सफल रहे ही, दिल्ली की युद्ध-उपरांत मुद्रा को नरम करने में भी सफल थे।

पाकिस्तानी सेना ने अतीत के सबक के साथ 1980 के दशक में बहुत सधे और सोचे-समझे तरीके से पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ संतुलन साधने के लिए राजनेताओं का एक नया नेटवर्क खड़ा कर दिया। जैसा कि क्रिस्टोफ जैफ्रेलॉट लिखता है,‘पंजाब में जियाउल हक की छत्रछाया में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत से 1990 के चुनाव अभियान तक नवाज शरीफ ने जो कुछ राजनीतिक सफलता हासिल की, उसके पार्श्व में सैन्य समर्थन ही था।’ लेकिन अगर वह सुरक्षा प्रतिष्ठान के सबसे प्रमुख और चर्चित चहेते थे, तो भी सैन्य संरक्षण का सुख हासिल करने वाले कम से कम ऐसे अकेले शख्स तो नहीं ही थे।’ इसी प्रकार, इमरान खान को भी पाकिस्तान के ‘डीप स्टेट’ कहे जाने वाले उस तंत्र का एक और रणनीतिक निवेश (मोहरा) के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जो पूर्ववर्ती दो राजनीतिक दलों पीएमएल-एन और पीपीपी के एकाधिकार को तोड़कर यहां तक आने में सफल हुआ है। यदि मजबूत असैन्य राजनीतिक अभिजात का कोई प्रतिनिधि पाकिस्तानी सेनाओं को वापस बैरकों में भेजने में सफल रहे, तो भारतीय नीति-निर्माता इसका न सिर्फ स्वागत करेंगे बल्कि प्रोत्साहित भी करेंगे, लेकिन यह सब दो मौलिक मान्यताओं पर निर्भर करेगा।

सबसे पहले, तो उस नागरिक अभिजात को वास्तव में पाकिस्तान को एक सकारात्मक राष्ट्रवाद की दिशा में फिर से परिभाषित करने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। पर्यवेक्षक जानते हैं कि पाकिस्तानी राष्ट्रवाद में एक भारत विरोधी पहचान आम समस्या है, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष भारत के विपरीत खड़ा देखती है। अतीत में बोए गए नकारात्मकता के इन बीजों को सैन्य प्रतिष्ठान ने भरपूर खाद-पानी देकर अपने व्यापक राजनीतिक-आर्थिक हितों का ईंधन बना लिया। लेकिन लोकतंत्र के इस पिछले दशक में भी राजनेताओं में पाकिस्तान को लेकर न तो प्रगतिशील सोच दिखी, न ही ऐसा इरादा, जो पाकिस्तान की मूल अवधारणा पर सवाल उठाता दिखता। पाकिस्तान के लिए वैकल्पिक पहचान की परिकल्पना की बजाय उनकी रुचि मुख्य रूप से स्वहित और अस्तित्व बचाए रखने में ही ज्यादा रही।

दूसरी बात, यह माना जाता है कि सेना ‘सिविल-मिलिट्री सिस्टम’ का खेल नहीं खेल सकती, या राष्ट्रीय हित के अपने अधिकार या प्रतिद्वंद्वी अवधारणाओं की किसी भी चुनौती को सफलतापूर्वक बेअसर नहीं कर सकती है। न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और मीडिया के साथ पाकिस्तानी सेना का सफल गठजोड़इसका प्रमाण है कि यह वास्तव में पाकिस्तान के समग्र राजनीतिक क्षितिज पर एक भूमिका तो निभाना चाहती है, लेकिन परदे के पीछे रहकर। वह एक ऐसे अनजान मध्यस्थ की भूमिका चाहती है कि काम भी चलता रहे और साख भी न बिगड़े। अक्तूबर 2017 के गैलप सर्वेक्षण में पाया गया कि वहां 82 प्रतिशत लोग किसी राजनीतिक संस्थान की तुलना में सेना पर ज्यादा भरोसा करते हैं, भले ही एक बड़ी संख्या (62 प्रतिशत) ऐसे लोगों की थी, जिन्होंने राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर लोकतंत्र में ही आस्था दिखाई थी। हालांकि ऐसी अनुकूल रेटिंग मार्शल लॉ के साथ ही बहुत तेजी से गायब हो जाती है, जैसा परवेज मुशर्रफ के शासन काल में सेना को पहली बार महसूस हुआ था।

पाकिस्तान के अतीत में ऐसे सबूत नहीं मिलते, जब किसी राजनेता ने अपने हितों की कीमत पर सेना से टकराव मोल लिया हो। वहां का राजनीतिक अभिजात सेना के साथ तालमेल बनाकर चलने में ज्यादा सहज महसूस करता रहा है। पाकिस्तानी विद्वान आयशा सिद्दीका की थीसिस के अनुसार, सैन्य-नागरिक संबंध- यानी जहां राजनेता शायद ही कभी सेना की प्राथमिकताओं या प्रगति की भूमिका पर सवाल उठाते हों, बल्कि दोनों समूह मिलकर अर्थव्यस्था की सामूहिक लूटपाट करते हैं, और जो अतीत की अपेक्षा कहीं अधिक व्यावहारिक बना रहता है। पाकिस्तान के हालिया चुनावों ने एक और परिष्कृत प्रणाली का संकेत दिया है, जिसे ‘हाइब्रिड’ राज्य कहा जा सकता है। यानी जहां मार्शल लॉ की खामियों से परिचित सैन्य शासन ने एक वैकल्पिक ढांचा तैयार कर आगे बढ़ाया है, जिसमें सेना और समाज के बीच एक बफर बना दिया गया है। जहां असली चेहरे तो पीछे रहते हैं और लोगों की प्रतिक्रियाओं और जायज शिकायतों की जिम्मेदारी राजनेताओं पर आयद होती है।


Mind the Gap

As was feared, the digital revolution, while bringing prosperity to millions, may be perpetuating inequalities of the past.


The digital divide, deemed to be one of the biggest challenges facing developing knowledge economies in the last decade, was conveniently forgotten in recent years as India celebrated the mobile internet boom and an ever-widening broadband network. It was assumed that if every panchayat was connected, and if calling and connectivity costs remain low, the force of rapid growth alone would sweep over inequalities. But a report released by a policy think tank which researches information and communications technology in India, among other markets, comes as a wake-up call: The digital divide is still here, and inequality is deeper than was anticipated.

A study released by LIRNEasia reveals that ironically, the divide is deepest precisely where the internet was supposed to bridge it. Internet access was expected to be a great equaliser between the sexes, giving women access to knowledge and connections that they could not get offline. But it appears that India has the fewest number of women online, and the highest gender gap in mobile phone ownership among 18 similar countries. The gap is 34 per cent in urban areas and rises to 52 per cent in rural areas. Other groups who have been left behind on the information superhighway include rural populations and the economically or educationally weaker sections. Like women, these were expected to be significant beneficiaries of the digital revolution.

The revolution is real enough, improving the lot of huge populations, but it has not been a great equaliser. Partly, inequality must owe to legacy attitudes — if a family owns only one phone, it is likely to be in the hands of a man. But clearly, anticipated components of the divide, like illiteracy, have not been adequately addressed. The methods and concepts of Sugata Mitra’s “hole in the wall computer”, which facilitated self-organised learning, never made it to the smartphone. A staggering 64 per cent of people canvassed did not even know about the internet and, despite the push to roll out broadband to panchayats, about two out of three of these people were rural. And though we perceive ourselves to be living in an internet and mobile boom, internet usage in India remains lower than in Ghana and Cambodia. If the only positive finding is that more than half of Indians mistrust social media news, millions of citizens, especially women, still need a helping hand to join the revolution.


Promise of Moreh

It is poised to be the gateway that will connect India with Southeast Asia.


In the midst of reports of hardening identities and stricter borders, the opening of the Friendship Bridge at Moreh, on the India-Myanmar border, offers cheer. Moreh, a town 110 km from Imphal, is expected to be the gateway to Myanmar: Mandalay, Myanmar’s second largest city, is a 10-hour drive from the Manipur town. Mandalay, where “the flyin’-fishes play”, offers direct land connectivity to both China and Southeast Asia. In short, the road to Mandalay can mean a long drive to East Asian cities including Yangon, Bangkok, Phnom Penh, Vientiane, Hanoi and Ho Chi Minh City and Kunming in Yunnan, China.

Moreh has for some time been designated an immigration check post of India. Citizens of both countries were allowed to cross the border and travel upto 16 km of each other’s territory. Indians, who wished to travel beyond that needed special land permits from Myanmar authorities. Hereafter, Indian passport-holders can get their visas at Moreh and travel on. The easing of travel restrictions at Moreh transforms Manipur from a land-locked, frontier state to a trade and transit hub connecting South Asia and Southeast Asia. The closing of borders in the years since Independence had blocked old travel routes and disrupted community ties.

Myanmar is still home to a large population of Indian origin and Indian soft power has a resonance in this large country, which now has deep trade and strategic ties with China. Since the 1990s, India has recalibrated its Myanmar policy with the Look East and Act East visions. However, the talk of a trans Asian highway and such has hardly been backed by action. In contrast, China has been successful in judiciously investing in the region and also turning it into political capital. The promise of Moreh will be fulfilled only if New Delhi invests in back-end projects and also completes ongoing road and railway projects that ease travel to the border town.


Why Article 35A must stay

Scrapping of special laws would close the last opening for reconciliation in Kashmir and in South Asia.

Naeem Akhtar, [The writer is a member of Peoples Democratic Party of J&K. Views are personal, which may or may not be shared by his party]

As the colonial era withdrew, with the world map redrawn to shape new nation states, two countries took birth on the bas is of religious identity: Pakistan and Israel. The toxicity of the new creations continues seven decades down the line, to increase in intensity and impact, almost hijacking the millennial developments and scripting the 21st century hate discourse.

Jammu and Kashmir, then popularly known as just Kashmir, was a semi-independent country under British suzerainty ruled by a Dogra Hindu king. This sprawling country of diverse ethnicities, climates, topographies, religions and cultures, spread from the Karakoram to Punjab plains, had one commonality: It had almost 80 per cent Muslims living in all areas. The united India was at war with itself on the basis of religious hostility, Muslims demanding a separate country and the Hindu majority acquiescing (or abetting?) to it.

Kashmir stood out in one grand, standalone adventure to reject the idea of separation based on religion. In the post-colonial nation-building effort, that was the most exciting experiment which offered the national leadership of Gandhi and Nehru some basis to retrieve their secular credentials after having been a party to the Partition. It was also the first instance in the 1,400 years of Islam that an overwhelmingly Muslim entity had given itself up to a non-Muslim country of continental size, defying the logic of Partition which unfortunately continues till this day as the defining discourse of India.

To assuage the apprehensions of being swamped in a country which was still a hundred times larger than it in population, constitutional guarantees were built into the relationship as it grew from romance to disillusionment, subterfuge to hostility. The people of the state, Muslims in particular, got to know that the architects of accession were actually trying to trick each other rather than building a nation which could work as a bulwark against the tempestuous forces that were in the womb of time.

As the Supreme Court of India heads towards a decision on the validity of Article 35A of the Constitution of India, this perspective is deliberately kept out of the discourse. It is lost in hateful rants on evening TV shows with the result that Kashmir illiteracy at the national level is now competing with the learning standards of our government schools. To youngsters in the country, Kashmir is at best the abode of Amarnath or a place inhabited by an ungrateful, dangerous species.

This won’t be the first judicial challenge to the constitutional scheme governing J&K to safeguard local laws of the state, mainly the “state subject law” which was introduced by Maharaja Hari Singh in 1927. This law came in response to apprehensions which prevailed then among the Dogras of Jammu and Kashmiri Pandits having monopoly over government jobs and landed estates about the Punjabi Muslim elite which had started acquiring land and poached on jobs in J&K. After Independence, it became the only tool of residents of J&K to safeguard their identity but many in the rest of the country could not sympathise with this genuine feeling. So it came under judicial challenge time and again but stood the test even of a five-judge constitutional bench.

The heightened apprehension this time owes to the fact that, unlike on previous occasions, the Union government is not defending the case but has left it to the court. That can be attributed to the ruling BJP’s agenda of scrapping the special status of the state altogether. The state government under the PDP organised the best possible legal defence but the governor’s administration, in spite of NN Vohra’s deep understanding of the sensitivity of the issue and his empathetic stance, is generally seen as an extension of the Union government. So it seems to an ordinary citizen of the state a lost case, which it may not be, given its strong legal standing.

Whatever the history of this arrangement, there are many contemporary factors that must be seen and considered to reach a modern understanding. In Assam 40 lakh people are sought to be robbed of citizenship rights to address the sensitivities of other citizens of Assam: Demographic change. If there is a citizenship register for the country, which is good, why can’t a state under the same constitutional scheme have its own citizenship register? If Bangladeshis, actually east Pakistanis, can be thrown out, why does someone insist that west Pakistanis should be given citizenship of a state in violation of its law?

The state subject law has served J&K and the country better than its absence would have. The state is a collage of ethnicities, all of which have flourished in a model that should guide other states. Just an example: J&K has almost the same ratio of Muslim and non-Muslim population in reverse order as that of West Bengal. Look at the services of both states for a fair assessment of that claim.

In J&K, non-Muslims outnumber Muslims in the elite Kashmir Administrative Service, which we celebrate. The state secretariat is a unique building in today’s fractured, exclusivist world, housing officials and clients from all major religions in right proportions, not mirroring symbolic representation like our national institutions. There are just a few thousand Shina speaking Dards, Pushtos, Baltis, Hindu Gaddis, nomadic Bakarwals. A mere 1.5 lakh Buddhists of Ladakh occupy a seat, as they must in all federal structures, at par with Jammu and Ladakh. The flood gates that could open with an influx from the mainland will definitely wipe these small entities out.

Finally, scrapping of the special laws would close the last opening for reconciliation in Kashmir and therefore in South Asia. Handing out a final defeat to people of the state at the hands of their own country would come in a situation where even status quo could mean victory for them, so necessary for redeeming the 70 year-old jumla of winning hearts and minds of Kashmir. Their Lordships are the only hope in preventing that disaster as their peers have done in the past. It may only be a judicial issue, but in it could be seeds of the future — whether we continue planting chinars in Kashmir or thorny bushes from the scorched plains of the country.


Sharia courts in fact

Research has shown that sharia councils are approached voluntarily and are often progressive

Faizan Mustafa , [ The writer is vice-chancellor, NALSAR University of Law, Hyderabad.]

Monica Arora has written an emotive response to my article (‘Justice more accessible’, IE, July 16) titled, ‘A parallel injustice system’ (IE, July 27). Javed Anand, a veteran of several battles of civil liberties too has responded with ‘Courts of injustice’ (IE, 30 July). As an academic, I do not have the luxury of ideological leanings. I am duty bound to rely on hard research rather than popular stereotypes or opinions.

Neither Arora nor Anand has challenged the findings of my research and that of Mahendra Shukla, Sylvia Vatuk, Anindita Chakrabarty and Bittu Rani. It seems none of them has read Gopika Solanki of Carleton University who had undertaken a remarkable study in Mumbai. Her primary finding is that it is a faulty presumption that only Muslims use sharia courts as an adjudicatory mechanism. Her detailed ethnography of adjudication shows that different kinds of adjudicatory bodies including sharia courts, caste councils, sect councils, civil society organisations etc, do adjudicate in family disputes. Sharia courts are the norm and not an exception.

Solanki suggests that the rate of litigation in family courts is quite low and cases across religious groups are resolved in private forums. For instance, between 1991-2001, the crude divorce rate in the Mumbai family court remained 0.0001 (number of cases per thousand).

Arora and Anand would be shocked to know that Solanki found that sharia courts in Mumbai follow a procedure that is standardised, informal, inexpensive and, above all, consensual. She also found that during appeal, many litigants did approach state courts without any adverse effects or societal pressure. Even the February 2018 UK report to which Anand has referred found that almost all applicants in some 80 sharia courts were women. The report did not recommend a ban on the sharia courts. It, in fact, noted that Jews and Roman Catholics too have a similar system. Last week, the UK High Court has given legal recognition to Muslim nikah.

Anand, in particular, will be surprised to know that Solanki has documented cases in which sharia courts played a proactive role in helping women recover their dowry, persuading husbands to hand over proof of divorce, helping women who wished to obtain a divorce and even in challenging triple talaq if granted under wrongful conditions and helping the couple reconcile if they so desired.

In fact, Solanki’s research is unique as she found that sharia courts have harmonised religious and state laws. For instance, sharia courts freely granted khula and the grounds for divorce that they followed were quite similar to the grounds for divorce under the Dissolution of Muslim Women’s Act, 1939. If anything, these grounds followed by sharia courts were far more extensive, liberal and pro-women. She has found how these forums combine principles of Islamic jurisprudence and progressive state laws and judgments to provide justice to women. Jeffrey A. Reddying’s research also proves that the personal law board run sharia court in Delhi does follow processes similar to state courts.

Anand is under a wrong impression that all state laws and judgments are gender just and all religious laws are discriminatory. Even today, in a number of states, daughters get no share of agricultural property in the presence of sons. A Hindu wife is still not a coparcener. Did not the Supreme Court in V Valusami (2010) call the second Hindu wife a “mistress” and “keep”? Did not the Madras High Court hold that “divorcees too should maintain sexual purity to claim alimony”?

Arora’s claim of my article being “false” is laughable. She overlooked this crucial line of the Vishnu Lochan Madan judgment (2014): “But this does not mean that existence of Dar-ul-Qaza or for that matter the practice of issuing fatwas are themselves illegal.” She has also contested my claim of sharia courts as an “informal justice system”. This is what the Supreme Court had said about the sharia courts: “It is an informal justice delivery system with an objective of bringing about amicable settlement between the parties. It is within the discretion of the persons concerned either to accept, ignore or reject it.” She should understand that Vishnu Lochan had sought a ban on sharia courts and fatwa and sought an order from the court to hold them unconstitutional. But the court neither accepted his prayer nor issued any direction to the government to ban either the fatwa or sharia courts. There is a distinction between public law and private law. Thus, if parties wish to go to the sharia court, no one can force them to use civil courts. Of course, in criminal cases such an option is not available. If there is rape by a father in law, no fatwa has any meaning. Arora is not aware that in this very case not only did the couple ignore the absurd fatwa but on the victim’s testimony, the accused was convicted and is in jail.

Both Arora and Javed overlooked my central argument — the civil justice system is dying in India. CJI T S Thakur admitted in the Supreme Court Report of 2016 that “access to justice is illusionary”. As against 20,558 sanctioned posts, today we have just 15,540 judges. India has an extremely poor judge-population ratio. Unlike the US, which has 107 judges for 1 million people, we have barely 10 judges for the same number. Arora is also wrong on nomenclature. I said clearly in my article that “sharia courts are not courts in the strict sense of the term but counselling or arbitration centres”. Arora has enhanced the stature of sharia courts by calling them a parallel justice system. Muslim women go to sharia councils because of the failure of our justice system.


Just one citizen

Even one unfair exclusion in the National Register of Citizens is one too many

Kishalay Bhattacharjee ,[The writer teaches journalism in O P Jindal Global University and is author most recently of An Unfinished Revolution: A Hostage Crisis, Adivasi Resistance and the Naxal Movement]

Shillong, 1979. I was in the 6th standard. That was the first time I was called a “dkhar” or an “outsider”. It was a slur. Not much has been written about the “anti-outsider” movement in Meghalaya, a spillover of the Assam agitation that was a mass movement against illegal migrants from Bangladesh. Whatever the motives were, I suffered humiliation. Hundreds of others suffered a fate worse than mine. What continued was a decade of ethnic cleansing.

There have been numerous occasions when I was abused, heckled and threatened. We learnt how to fight these battles. One day in mid-June, I was exiled from my hometown. My parents continued to live there till their 50th marriage anniversary. I was born in Gauhati (now Guwahati), Assam in 1969. My parents were residing in Shillong, the then capital of Assam to be soon part of a new state, Meghalaya. Much later, I would return to Assam to work as a journalist for a television network. I spent a decade covering the region’s tumultuous years.

Recently, when the exercise of updating the National Register of Citizens in Assam picked up steam, I applied for “citizenship” to understand the process that was under a shadow of suspicion and apprehension. At the time of application, I wasn’t living in Assam but had adequate proof of my ancestry there. Or so I imagined. I was told, each applicant must upload a “legacy document” that would prove that either the applicant or her/his father voted in India before 1971. I asked my father, a historian, whether he voted and he said yes but obviously he wasn’t carrying any proof of that. The government uploaded this data for people to locate proof. My father’s name was missing from the relevant electoral rolls. This was the case of the 40 lakh now delisted persons. Producing documentation of this nature by most citizens is a nightmare.

Just by accident, my father dug out a certificate from the 1950s signed by a gazetted officer verifying him as a bonafide Indian citizen. Under the NRC clauses, this appeared to be the only proof of my claim to be an Indian citizen. While it worked for my sister working as a doctor in Assam, in the first round of verification they rejected my father, my daughter (born in Delhi) and me. The NRC office from Zoo Road, Guwahati, wanted me to go and present myself along with my daughter. I was basically summoned. I explained to them my inability to travel from Delhi. Regarding my father, they argued that he worked in Shillong and therefore had no right to claim citizenship in Assam. My mother, however, was already on the rolls. A couple of months later when the draft was actually published, my daughter and my name were there. My father has been delisted.

As per the Assam Accord, all residents of Assam who entered the state till January 1, 1966, would be “regularised”. Those who entered between 1966 and March 25, 1971, could not vote for the next 10 years, and those who came after the midnight of March 24, 1971, would be “detected, deleted and expelled in accordance with law”. My father was born in undivided Assam, shifted to present-day Assam in 1947 and is in possession of a Citizenship Certificate. But his citizenship is in question. How can the same piece of paper that grants his children citizenship deny him the right? This is not mere oversight.

The issue of citizenship is intractable. Apart from the Constitution, there exist a whole lot of laws like the Foreigners’ Act 1946, the Passport Act 1952, and the Citizenship Act of 1956. The rules are a maze of complexities. This 40 lakh is a vindication of sorts for the Assamese nationalist groups like the AASU who have fought a long battle against illegal immigration morphed often into anti-Bengali and anti-outsider xenophobic campaigns. The erroneous claim of the “indigenous” and “original” inhabitants of Assam is the pivot of this movement.

It now appears that majority of this 40 lakh may find themselves in the final list if ever there is one. Till then, the anxiety of a genuine citizen to claim her/his rights is something that the state may not be concerned about. There are reportedly many Assamese names that have been left out but given their “original” inhabitant status they are perhaps not as anxious as the other communities, particularly the Bengalis. The racial profiling of Bengalis as Bangladeshis has been going on since 1947. The fact that a Bengali has written this will also be seen as somewhat biased. As a Bengali in the Northeast, I think I have been far too apologetic. But the facts must be stated and rights claimed. It would be a travesty of justice even if one genuine citizen were left out of the list.