News Clipping on 08-04-2019


Bragging Rights

South Korea and America launch 5G mobile networks, it means superfast superpower

TOI Editorials

Last week five South Korean celebrities became the world’s first 5G subscribers. The service was activated for them late Wednesday night and opened to regular subscribers two days later. Simultaneously the US also saw a limited commercial launch of 5G networks. The intensity with which telecoms in the two countries are claiming they did it first, underscores the stakes in this battle for supremacy and how competitive it will be.

2G took mobile telephony mainstream, 3G opened up the app economy and social platforms, 4G redefined businesses from banking to entertainment and transportation, 5G equals superfast communications that backers say will transform life as we know it. Its speed, responsiveness and reach could indeed revolutionise agriculture, utilities, law and order, healthcare, manufacturing, AI and virtual reality. This technological leap promises to unlock the Internet of Things. While no country is close to providing a nationwide 5G experience yet, those like China have been working on this for years. It therefore has high 5G readiness.

India on the other hand is yet to allocate spectrum even for 5G trials by operators. And there is no doubt that rolling out this technology is seriously capital intensive, where too there are domestic constraints. The same problem confronts France and Italy, for example, where an unlimited monthly data package can be cheaper than a nice cup of coffee. But would getting left behind be more costly? Given a choice, wouldn’t consumers pay more to get much more? By the way two of the first 5G subscribers were Baekhyun and Kai from Korean boy band EXO, underlining the role of entertainment in today’s communication ecosystem. From Japan and India to the US, youth will be batting for faster downloads, including of K-pop.


Stir the IPR Pot for Innovation

Ranjana Smetacek , (The writer is former director general, Organisation of Pharmaceutical Producers of India)

Last month, the US Chamber of Commerce’s Global Innovation Policy Centre (GIPC) released its 7th annual International Intellectual Property (IP) Index, which assesses the IP climate in 50 world economies. India moved from 44th rank in 2018 to 36th in 2019. But, looking at the scores across the eight categories assessed, India comes in well below the average score of the top five economies, and scores considerably lower than the Asia average.

India’s national IP Rights Policy (IPR) was created in 2016. One of its stated objectives was ‘to guide and enable all creators and inventors to realise the potential for generating, protecting and utilising IP which would contribute to wealth creation, employment generation and business development’. It also aimed to ‘foster predictability, clarity and transparency in the entire IP regime in order to provide a secure and stable climate for stimulating inventions and creations’.

India has certainly made progress on the seven objectives laid down in the National IPR Policy across patents, trademarks, copyrights and designs. It has acted to increase public awareness, commissioned technology and innovation support centres, and instituted training programmes in some states. But much is left to be done: strengthening the legislative framework to respect IP; improving the enforcement and adjudicatory mechanisms that deal with infringements; supporting the generation and commercialisation of innovation; developing human capital to bolster capacity for research and skillbuilding. We need to recognise IP as avalue creator for India, and build the country’s capability for innovation through IP creation, protection, and commercialisation.

In healthcare, for instance, to develop and deliver new treatments to patients, innovator companies must be able to rely upon predictable and enforceable IP rights. Regretfully, GoI’s initial momentum has not continued to translate into any meaningful change in policy or practice. The pharma industry’s concerns range from weak patent enforcement, an unpredictable environment, and the threat of compulsory licensing, to nontransparent market access policies, high tariffs and taxes, and an unpredictable environment for clinical research.

India’s patent examination backlog is another problem, where patents being examined currently were filed six to eight years ago. Such backlogs postpone clinical trial activity and ultimately the introduction of new medicines.

The inability to pay out-of-pocket and the lack of insurance cover will hopefully be addressed to a great extent by the Ayushman Bharat initiative. The National Health Protection Scheme (NHPS) proposes to extend health insurance cover to 40% of the population that’s most in need. State governments could work with the pharma industry on optimising drug procurement and distribution to address healthcare access challenges. Increased access to medicines can go hand-in-hand with pro-innovation policies for the benefit of patients.

India’s IP system needs to be thoughtfully assessed, and legal flexibilities used judiciously for humanitarian non-commercial use in treating diseases that are epidemic or communicable, with compulsory licensing being invoked only as a rare exception in rare circumstances. Not only would strong IPR make India more attractive to innovators, but a robust IP framework would also deliver increased investment in clinical research, high-paying and skilled jobs, transfer of medical knowledge and early access to new medicines.


अफस्पा पर बढ़ती बहस

कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र परअफस्पा पर संशोधन करने की बात कही है। बता दें कि अफस्पा एक फौजी कानून है जिसे डिस्टर्ब क्षेत्रों में लागू किया जाता है।


यह ठीक नहीं कि चुनाव के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मसलों पर भी राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हुए हैं। बीते कुछ दिनों से कांग्रेस और भाजपा के बीच सशस्त्र बलों संबंधी अधिनियम यानी अफस्पा को लेकर जो बयानबाजी हो रही है उससे बचा जाना चाहिए था। यह बयानबाजी इसीलिए शुरू हुई, क्योंकि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा किया कि अगर वह सत्ता में आई तो इस कानून की समीक्षा करेगी और कुछ मामलों में सुरक्षा बलों को इस कानूनी कवच से बाहर किया जाएगा।

यह समझना कठिन है कि कांग्रेस को अफस्पा में खामी अभी ही क्यों दिखी? आखिर दस साल तक सत्ता में रहने के दौरान उसे इस कानून में कोई खामी क्यों नहीं दिखी या फिर वह यह कहना चाह रही है कि बीते पांच सालों में ऐसा कुछ हुआ है जिससे इस कानून में संशोधन-परिवर्तन आवश्यक हो गया है? अफस्पा आज का कानून नहीं है। इसे 1958 में तब बनाया गया था जब कांग्रेस के सामने विपक्ष की कहीं कोई गिनती नहीं होती थी। समस्या यह नहीं है कि कांग्रेस ने अफस्पा की समीक्षा की बात की। समस्या यह है कि वह यह कह रही है कि लोगों के लापता होने और प्रताड़ना एवं यौन हिंसा के मामलों में सुरक्षा बलों को अफस्पा के दायरे से बाहर किया जाएगा।

क्या इसका मतलब यह है कि कांग्रेस यह मान रही है कि सुरक्षा बल लोगों को प्रताड़ित करते हैं या फिर यौन हिंसा में लिप्त रहते हैं? क्या वह इस नतीजे पर उन आरोपों के आधार पर पहुंची है जो सुरक्षा बलों पर कभी-कभार लगते हैं? कम से कम कांग्रेस के नेताओं को तो यह अच्छे से पता होना चाहिए कि अक्सर इस तरह के आरोप सुरक्षा बलों को बदनाम करने और उनका मनोबल प्रभावित करने के लिए लगाए जाते है कहीं कांग्रेस उन मानवाधिकारवादियों से तो प्रभावित नहीं जो कश्मीर में सुरक्षा बलों की सख्ती को मुद्दा बनाते रहते हैं? यह वही मानवाधिकारवादी हैं जो घाटी में पत्थरबाजों के गिरोहों और उन्हें मिल रहे राजनीतिक संरक्षण पर कुछ नहीं कहते। इस पर हैरत नहीं कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में अफस्पा की समीक्षा के वादे का घाटी के नेताओं ने स्वागत किया।

अच्छा होता कि कांग्रेस केवल यहीं तक सीमित रहती कि वह सत्ता में आने पर अफस्पा की समीक्षा करेगी। किसी भी कानून की समीक्षा करने में हर्ज नहीं। सच तो यह है कि समय के साथ पुराने कानूनों की समीक्षा होनी ही चाहिए, लेकिन यह ध्यान रहे कि अफस्पा जैसे कानूनों की समीक्षा चुनावी मुद्दा नहीं बन सकता। इसी के साथ यह भी ध्यान रहे कि अगर सेना को अशांत क्षेत्रों में तैनात करना है तो उसे कुछ विशेष अधिकार देने ही होंगे। ये अधिकार क्या होने चाहिए, इस पर सैन्य अधिकारियों के दृष्टिकोण को सबसे अधिक महत्व देना होगा। यह अजीब है कि कांग्रेस ने कुछ खास मामलों को अफस्पा से बाहर करने की बात तो कह दी, लेकिन इस बारे में सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी डीएस हुड्डा की राय लेना जरूरी नहीं समझा जिन्होंने उसके लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक विस्तृत दृष्टिकोण पत्र तैयार किया था।


ट्रेड वॉर की दस्तक

डॉ विमल कश्यप

जिस तरह से आर्थिक मोर्चे पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को झटका दिया था, उससे साफ हो गया था कि भारत में भी अब ‘‘ट्रेड वार’की शुरुआत हो चुकी है। अपनी अमेरिका फस्र्ट नीति के तहत ट्रंप ने भारत पर अमेरिकी व्यापारिक हितों के प्रतिकूल व्यवहार करने का आरोप लगाया था। इसी क्रम में उन्होंने भारत और टर्की से 60 दिनों के भीतर ‘‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज’ (जीएसपी) को समाप्त करने का प्रस्ताव संसद में पेश कर दिया था। अब ट्रंप खुद बैकफुट पर आ गए हैं, भारत समर्थक लॉबी तथा राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार तुलसी गब्बार्ड ने इस प्रस्ताव को तत्काल टालने की अपील की है तो इसे लागू करने की समय सीमा बढ़ सकती है। इसके अंतर्गत ट्रंप भारत को मिली, तरजीही व्यापार दरजे में कटौती करना चाहते थे। इसके मायने थे कि भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले कुल निर्यात में मिलने वाले 5.7 अरब डॉलर की ड्यूटी फ्री छूट बंद हो जाती।

जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज व्यवस्था मुक्त व्यापार संबंधित एक अमेरिकी व्यवस्था है, जो 1 जनवरी, 1976 से कार्य कर रही है। इसके तहत, अमेरिका विकासशील देशों के तीव्र आर्थिक विकास हेतु उनके व्यापार पर कुछ रियायतें देता है। इसका लाभ यह होता है कि इससे विकासशील देश अमेरिकी बाजारों में अपनी पहुंच बना पाते हैं, और अपने कुछ उत्पादों की कर-मुक्त बिक्री भी कर पाते हैं। इस व्यवस्था के तहत 129 देशों के लगभग 4800 वस्तुओं को अमेरिकी बाजारों में डयूटी फ्री प्रवेश मिलता है। मूल रूप से यह कोई संधि न होकर विकासशील देशों को मिलने वाली एक प्रकार की अमेरिकी सहायता है।अगर भारत के संदर्भ में देखा जाए तो इस व्यवस्था में उसके लगभग 50 उत्पाद शामिल हैं। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से ही वह लगातार व्यापार को सुगम बनाने वाली नीतियों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यही कारण है कि, भारत ने ‘ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस’ तालिका में उल्लेखनीय सुधार किया है। इससे ट्रंप का भारत पर आरोप लगाना कि भारत, अमेरिकी उत्पादों हेतु विषम परिस्थितियां पैदा कर रहा है, सही नहीं लगता।

अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर चिंतित नजर आते हैं। वास्तव में अमेरिका का असल व्यापार घाटा तो चीन के साथ है, जो बढ़कर 419 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। अमेरिका को उसकी चिंता करनी चाहिए। अमेरिका भारत पर लगातार दबाव बनाता रहा है कि भारतीय बाजार अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए खोले पर भारत की अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएं हैं। यहां बहुत से लोग जीवनयापन के लिए पहले से ही डेयरी उत्पादों के व्यापार में संलग्न हैं। साथ ही हमारी कछ धार्मिंक भावनाएं भी आहत हो सकती हैं क्योंकि कहना मुश्किल होगा कि अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट्स भारतीय भावनाओं के अनुरूप होंगे या नहीं। अमेरिका में पशुओं को चारे के रूप में मांस भी खिलाया जाता है जिससे भारत चिंतित रहता है। भारत ने पिछले एक दशक में चिकित्सीय क्षेत्र में काफी तरक्की की है, लेकिन नियंतण्र स्तर पर चिकित्सीय उपकरणों और प्रत्यारोपण में इस्तेमाल होने वाले कृत्रिम अंग बनाने में अमेरिकी और जर्मन कंपनियों का वर्चस्व है। ये अपने उत्पाद भारत में भारी कीमत पर बेचती हैं। भारत ने घुटनों के प्रत्यारोपण से संबंधित कृत्रिम अंगों की कीमत निर्धारित कर दी हैं ताकि ये कंपनियां मनमानी न कर सकें। इससे ट्रंप पर लगातार दबाव रहा।

बड़ा सवाल है कि अमेरिका के इस कड़े कदम से भारत की अर्थव्यवस्था और बाजार पर क्या असर पड़ेगा और भारत और अमेरिका के रणनीतिक संबंधों पर भी क्या कोई नकारात्मक असर पड़ेगा? कहा जा सकता है कि लागू होने की स्थिति में भी भारत पर इसका इतना व्यापक असर नहीं होता जितने कयास लगाए जा रहे हैं। जिस तरह भारत में भी अब ट्रेड वार की धमक हो चुकी है तो भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी होने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। भारत से अमेरिका को निर्यातित आभूषण और रत्न तथा दवाओं पर दबाव बनेगा जिसका फायदा अन्य देश उठाना चाहेंगे। भारत के पास डब्लूटीओ जाने का विकल्प था, पर बेहतर होगा कि दोनों देश थोड़ी बहुत रियायतें देकर आपसी समझ से विवाद सुलझाएं। भारत भी अमेरिकी उत्पादों पर प्रतिक्रिया स्वरूप ड्यूटी लगा सकता है पर इससे क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहेगी। ट्रंप अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारी दबाव में हैं, जिन्हें नियंतण्र स्तर पर अपने वर्चस्व खोने और स्थानीय हस्तक्षेप की चिंता सताए जा रही है।