News Clipping on 04-08-2018


Caste Cauldron

Police reform is the real answer to protecting Dalits

TOI Editorials

Belying the current climate of political polarisation, one issue that’s witnessing bipartisan support in Parliament is the effort to overturn the Supreme Court’s dilution of the SC/ST (Prevention of Atrocities) Act. The apex court in March had ruled regarding the misuse of the Act, prescribing that there wouldn’t be any automatic arrests, and that preliminary inquiries would be carried out before lodging FIRs. It had also introduced the provision of anticipatory bail under the law. This was done in light of NCRB data that 15-16% of the total complaints filed in 2015 under the Act were found to be false and out of the cases disposed of by courts 75% had resulted in acquittals or withdrawals.

However, the apex court decision upset Dalit legislators and social groups. Government now wants to bring in an amendment in the current session of Parliament to overturn the Supreme Court order, while opposition parties contend that an ordinance to this effect should have been brought months ago. Clearly, both camps are vying for Dalit votes here, especially in light of upcoming elections. But stringent laws that are frequently misused defeat the aim of justice. Misuse of the SC/ST Act can ironically reinforce caste hate.

Understandably, there are concerns that given how deep-rooted the caste system is in this country, marginalised Dalits may not get their grievances redressed by prejudiced upper-caste policemen. But this should be addressed through police reforms. Police forces need to be sensitised about caste atrocities and their capacities expanded to take action in such cases. In that sense, enacting harsh laws is the easy way out. Only heavy lifting in the form of police reforms can prevent both – atrocities against Dalits and misuse of law. That’s the path to true justice.


India’s Adultery Law is Crudely Anti-Woman

ET Editorials

Individual members of a Supreme Court bench hearing achallenge to the validity of Section 497 of the Indian Penal Code on adultery have all spoken against the law as it stands, indicating that this could well be struck down. And that would be the right thing to do. Adultery amounts to breach of trust between a married couple and should thus qualify as a strong ground for divorce, but should not carry other penalties such as imprisonment. The law as it stands in India is a colonial creation, formulated 158 years ago. The law has moved on in England, where adultery is no longer penalised except as a ground to claim irretrievable breakdown of marriage.

The alimony that a divorced wife is entitled to is not diminished on account of her adulterous liaison in England and much of Europe, although that is not the case in the US, where 21 of 50 states still deem it a crime (it is a misdemeanour in New York). The Indian law on adultery is an unapologetic articulation of patriarchy. A man who enters into a sexual relationship with a married woman without the knowledge or connivance of her husband is guilty of adultery and can be punished with a jail term of up to five years. If a married man has an affair with an unmarried woman, no adultery subsists.

Adultery is, in Indian law, violation of one man’s marital home by another, in which women are seen as passive objects wholly devoid of agency. Section 497 specifically says that the woman in an adulterous relationship will not be considered an abettor. This does women no favour. Modern India cannot afford to have such gender bias in its laws.

Removing such bias would mean two things. Adultery must be understood as violation of the commitment to sexual exclusivity that marriage entails, not as violation of a man’s marital home. Further, women should qualify as culpable agents, not passive objects of male will, in the offence of adultery. Marriage should sustain on the strength of mutual trust, respect and love, not out of fear of a jail term. Modernising the law on adultery is essential to live up to the commitment to equality offered by the Constitution.


राष्ट्रपति को वैज्ञानिकों की बात पर गौर करना चाहिए

वैज्ञानिकों की मांग है कि इसरो, परमाणु ऊर्जा आयोग जैसी संस्थाओं में राजनीतिक दखलंदाजी न की जाए


इसरो के अहमदाबाद के स्पेस अप्लिकेशन सेंटर के निदेशक तपन मिश्र के तबादले के विरोध में देश के 28 प्रमुख वैज्ञानिकों द्वारा राष्ट्रपति को लिखे पत्र पर गौर किया जाना चाहिए। इन वैज्ञानिकों ने देश के सर्वोच्च शासक से यह मांग की है कि वे वैज्ञानिक संस्थाओं की स्वायत्तता कायम रखें और वैज्ञानिक मनोवृत्ति को नष्ट न होने दें। उन वैज्ञानिकों की मांग है कि इसरो, परमाणु ऊर्जा आयोग, वैज्ञानिक और औद्योगिक शोध परिषद (सीएसआईआर), डीआरडीओ, भारतीय कृषि शोध संस्थान जैसी संस्थाओं में राजनीतिक दखलंदाजी न की जाए और उनका नेतृत्व राजनीतिक विचारधारा की बजाय काम और गुणवत्ता के आधार पर तय हो।

मौजूदा विवाद इसलिए उठा क्योंकि तपन मिश्र को अहमदाबाद केंद्र के निदेशक पद से हटाकर तत्काल प्रभाव से बेंगलुरू में इसरो के चेयरमैन का सलाहकार बना दिया गया। सलाहकार गैर प्रशासनिक पद है और इस जगह से वे इसरो के निदेशक कभी नहीं बन पाएंगे। माना जा रहा है कि तपन मिश्र के राजनीतिक विचार मौजूदा सरकार के अनुकूल नहीं थे, इसलिए चेयरमैन के पद की दौड़ से बाहर करने के लिए उनके साथ ऐसा किया गया है। तपन मिश्र एक परियोजना को मंजूरी मिलने में हो रही देरी और संस्थान के निजीकरण के लिए बनने वाले दबाव का विरोध कर रहे थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे संस्थानों में काम करने वाले अन्य वैज्ञानिकों में गलत संदेश जाएगा और वे हतोत्साहित होंगे। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश में वैज्ञानिक चेतना का विकास करने के लिए कई संस्थानों का निर्माण किया था।

वहां ढूंढ़-ढूंढ़ कर अच्छे वैज्ञानिक लाए जाते थे और उन्हें प्रोत्साहित किया जाता था। इस प्रोत्साहन में कमी का नतीजा देश ने प्रतिभा पलायन के रूप में भुगता है और अमेरिका व यूरोप की तमाम प्रयोगशालाएं भारतीय वैज्ञानिकों से भरी पड़ी हैं। इसी उपेक्षा का परिणाम है कि डॉ. हरगोविंद खुराना जैसे लोग नोबल पुरस्कार पाने के बाद भारत के प्रति कृतज्ञता भी नहीं जाहिर करते। पिछले दिनों गुजरे हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलिकुलर बायोलाजी के निदेशक पीएम भार्गव ने देश में वैज्ञानिक चेतना के विकास के लिए संविधान में अनुच्छेद 51 ए-एच जुड़वाया था। वैज्ञानिकों की इस आवाज का प्रयोजन यही है कि भारत को आगे बढ़ने के लिए नए शोधों की जरूरत है और उसके लिए वैज्ञानिकों को बिना किसी दबाव के काम करने देना चाहिए।


आरक्षण में सुधार का वक्त

जब पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर समर्थ बनाने की तैयारी है, तब कई सक्षम मानी जाने वाली जातियां आरक्षण मांग रही हैं।


लोकसभा में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक के सर्वसम्मति से पारित होने से इसके प्रति सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि उसे राज्यसभा में भी विपक्ष का समर्थन मिलेगा। इस विधेयक को दूसरी बार संसद में इसलिए लाना पड़ा, क्योंकि पिछली बार राज्यसभा में कुछ विपक्षी दलों ने उसके मूल स्वरूप में बदलाव कर दिया था। उम्मीद है कि इस बार ऐसा नहीं होगा और पिछड़ा वर्ग आयोग जल्द ही संवैधानिक दर्जे से लैस हो जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग है।

यह अजीब है कि जब अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण लागू हुए 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, तब उससे संबंधित आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का रास्ता साफ हो रहा है। नि:संदेह संवैधानिक दर्जा हासिल करने के बाद पिछड़ा वर्ग आयोग कहीं अधिक सक्षम होगा, लेकिन यह कहना कठिन है कि वह आरक्षण संबंधी समस्याओं का समाधान करने में भी समर्थ होगा। विभिन्न जातीय समूह जिस तरह ओबीसी आरक्षण के दायरे में आने के लिए जोर दे रहे हैं और इस क्रम में धरना-प्रदर्शन भी कर रहे हैं, उससे लगता नहीं कि पिछड़ा वर्ग आयोग और साथ ही केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए कोई आसानी होने जा रही है। आखिर इसकी अनदेखी कैसे की जा सकती है कि जब पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर समर्थ बनाया जा रहा है, तब कई सक्षम मानी जाने वाली जातियां अपने लिए आरक्षण मांग रही हैं। यह एक तथ्य है कि इन दिनों उग्र तरीके से आंदोलन कर रहे मराठा समूह इसके बावजूद आरक्षण चाह रहे हैं कि वे उसकी पात्रता की परिधि में नहीं आते। कुछ ऐसी ही स्थिति आरक्षण के लिए आंदोलन की राह पर चलने वाले अन्य जातीय समूहों की भी है।

लोकसभा में पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने वाले विधेयक पर चर्चा के दौरान विभिन्न् राजनीतिक दलों की ओर से क्रीमीलेयर हटाने और आरक्षण की सीमा बढ़ाने की जो मांग की गई, उससे यही संकेत मिलता है कि आरक्षण संबंधी मांगों का सिलसिला थमने वाला नहीं है। यह तय है कि यदि किसी एक जातीय समूह को आरक्षण मिला तो कुछ अन्य जातीय समूह आरक्षण की मांग लेकर आगे आ जाएंगे। इसमें संदेह है कि ओबीसी आरक्षण का वर्गीकरण करने से बात बनेगी। अच्छा होगा कि आरक्षण की व्यवस्था को ऐसा स्वरूप देने पर विचार हो, जिससे वह पात्र लोगों को ही मिल सके और उसे सरकारी नौकरी पाने का जरिया भर न माना जाए। अभी तो ऐसा ही अधिक है। इसके अलावा एक विसंगति यह भी है कि आरक्षण का लाभ ले चुके लोग भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे हासिल कर रहे हैं। इनमें वे भी हैं, जो संपन्न् और प्रभावशाली हैं। आरक्षण शोषित-वंचित एवं पिछड़े तबकों के उत्थान का माध्यम है। अच्छा होगा कि अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के साथ अन्य पिछड़ी जातियों को हासिल आरक्षण व्यवस्था की इस दृष्टि से समीक्षा की जाए कि इससे मूल उद्देश्य की प्राप्ति सही तरह हो रही है या नहीं? इसी के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण के दायरे में कैसे लाया जाए।


सोशल मीडिया की समस्या

सोशल मीडिया पर तमाम तत्व नफरत फैलाने, दुष्प्रचार करने, लोगों को उकसाने और आतंक की पैरवी करने तक का काम कर रहे हैं।


सोशल मीडिया केंद्र बनाने की मोदी सरकार की योजना को पहले जिस तरह जासूसी का जाल बिछाने की कवायद के रूप में देखा गया और फिर सुप्रीम कोर्ट ने उस पर जैसी सख्त आपत्ति जताई उसके बाद उसे ठंडे बस्ते में ही जाना था। समझना कठिन है कि अगर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सोशल मीडिया हब का निर्माण सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए करना चाह रहा था तो फिर उसकी व्याख्या इस रूप में कैसे हुई कि सरकार का इरादा लोगों की ऑनलाइन गतिविधियों पर निगरानी करना है? इस सवाल का जवाब जो भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म सूचनाएं हासिल करने, अपनी बात प्रभावी ढंग से कहने, सवाल पूछने और विरोध जताने का अवसर उपलब्ध कराने के साथ कई तरह की समस्याएं भी पैदा कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर तमाम तत्व जिस तरह नफरत फैलाने, दुष्प्रचार करने, लोगों को उकसाने और यहां तक कि उन्माद एवं आतंक की पैरवी करने तक का काम कर रहे हैं वह भारत समेत दुनिया के अनेक देशों के शासन-प्रशासन के लिए एक बड़ा सिरदर्द है। सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफार्म पर सक्रिय अराजक और उन्मादी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने अथवा अवांछित या भड़काऊ सामग्री के प्रसार को रोकने में किस तरह आनाकानी करती हैं, इससे खुद सुप्रीम कोर्ट परिचित है। बहुत दिन नहीं हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध के वीडियो प्रतिबंधित करने में हीलाहवाली पर गूगल, फेसबुक समेत तमाम कंपनियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।

सच तो यह है कि तब इन कंपनियों ने यह तक नहीं बताया था कि वे यौन अपराध के वीडियो का प्रसार रोकने के लिए क्या उपाय कर रही हैं? भीड़ की हिंसा पर सुनवाई कर चुका सुप्रीम कोर्ट इससे भी अनभिज्ञ नहीं हो सकता कि हाल के समय में ऐसी हिंसा के कुछ मामले इसलिए सामने आए, क्योंकि सोशल मीडिया के जरिये यह अफवाह फैलाई गई कि अमुक-अमुक जगह बच्चे चोरी करने वाले दिखे हैं।

बेहतर होता कि सुप्रीम कोर्ट केवल इतने भर से संतुष्ट नहीं होता कि केंद्र सरकार सोशल मीडिया हब बनाने की अपनी योजना से पीछे हट रही है। उसे ऐसे कुछ उपाय भी सुझाने चाहिए थे जिससे सोशल मीडिया के किस्म-किस्म के प्लेटफॉर्म पर सक्रिय अराजक तत्वों पर काबू पाने में मदद मिलती। जैसे इसमें दोराय नहीं कि सोशल मीडिया संवाद-संपर्क के साथ प्रचार-प्रसार का एक प्रभावशाली माध्यम है। वैसे ही यह भी एक तथ्य है कि इस माध्यम का अनुचित इस्तेमाल भी जमकर किया जा रहा है। कुछ अराजक समूह और यहां तक कि आतंकी संगठन तो अपने प्रसार के लिए सोशल मीडिया पर ही निर्भर हैं। नि:संदेह सरकारी तंत्र को आम लोगों की जासूसी करने वाले उपायों से लैस होने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन यह समय की मांग है कि ऐसी कोई व्यवस्था बने जिसके जरिये सोशल मीडिया पर सक्रिय समाज, समरसता और देश विरोधी तत्वों से निपटा जा सके। इस मामले में इस तर्क के लिए गुंजाइश नहीं है कि समय के साथ लोग खुद ही समझदारी और संयम का परिचय देने लगेंगे।