News Clipping on 01-10-2018


Swachh Bharat is succeeding because it combines toilets and waste treatment with community mobilisation

Melinda Gates, (The writer is co-founder of the Bill and Melinda Gates Foundation.)

A little over three years ago, I spent a day in Jharkhand’s Khunti district. The reason for my trip didn’t have anything to do with sanitation – I was there to talk about self-help groups – but, as often happens when I’m in India, the topic of toilets kept coming up. Anywhere people live without access to safe sanitation systems, there is a measurable impact on their lives and communities. Waste-borne illnesses contribute to the deaths of millions of children every year and leave millions more with lifelong consequences like stunting. The combined costs of death and dis-ease and lost opportunity due to inadequate sanitation robs India of more than $106 billion annually.

The hamlet I visited had experienced these challenges first-hand. At the time of my trip, the people living there were still practising open defecation. However, a few of the women in the self-help group told me that was about to change. They had just learned about Swachh Bharat and were in the process of applying for their first toilets. Their hamlet was about to become a part of Prime Minister Narendra Modi’s ambitious vision for making India open defecation free by October 2 next year. Already, India has proven that incredible progress is possible. In 2014, when Swachh Bharat began, only 42% of Indians had access to proper sanitation. Today, that number has more than doubled. The country has built more than 85 million toilets, and 21 states have been declared open defecation free.

But new toilets are only one part of the sanitation revolution Swachh Bharat is driving. Another crucial component is Swachh Bharat’s focus on building systems to safely and effectively dispose of waste. As part of this broad effort, Andhra Pradesh, Odisha, Telangana, Tamil Nadu, and Uttar Pradesh are supporting the construction of faecal sludge treatment plants, a key link in the chain of safe sanitation. While these are important steps in the right direction, it’s also true that more innovation is needed. Sewer systems are expensive to build, use massive amounts of water, and require constant, costly maintenance. That’s why, since 2013, our foundation, together with the science and technology ministry, has invited engineers and entrepreneurs to participate in our Reinvent the Toilet Challenge, which calls on innovators to offer ideas for sustainable sanitation solutions that work without sewers, electricity or running water.

In response to this challenge, we’ve seen developments across multiple categories of innovation that have the potential to be transformative. Examples include reinvented toilets currently being field tested in Tamil Nadu and an “omni processor” which converts waste into fertilizer, green energy and even potable water. This week, ministers of water and sanitation from around the world are meeting at the Mahatma Gandhi International Sanitation Convention to discuss these and other technologies – and to learn from India’s example. For countries currently lacking sanitation infrastructure, Indian innovation holds the promise of billions of dollars and millions of lives saved. For countries still relying on inefficient sewer systems, solutions developed in India have the potential to become the new gold standard.

Another reason for Swachh Bharat’s successes is that the country is combining toilet and waste treatment technologies with community mobilisation. Sanitation initiatives often fail when they focus only on building new infrastructure or on changing human behaviour. India is succeeding because it addresses both. Swachh Bharat has enlisted Bollywood stars, cricket players and everyday ambassadors to amplify the same safe sanitation messages brandished everywhere from public toilets to giant billboards to the currency that passes through their hands. The data proves that Indians are responding, and that Swachh Bharat is truly a people’s movement.

That is also the case for the families I met in Khunti. I’m told that, by 2016, every home in the hamlet had a toilet of its own. While the area doesn’t yet have piped water, both men and women are now in the habit of carrying water to the toilets – even though carrying water was once a chore reserved for women. This break with tradition reflects an increasingly widespread belief that a clean India is everyone’s business, and that toilets make life better not only for women and girls but for all of us.


ऐतिहासिक फैसलों का व्यापक असर

संजय गुप्त, (लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)

उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की सदस्यता वाली पीठों की ओर से हाल में एक के बाद एक जो अनेक फैसले दिए गए उनमें से अधिकतर क्रांतिकारी माने जा रहे है तो इसीलिए कि वे समाज और राजनीति को प्रभावित करने वाले है। इनमें सबसे प्रमुख है सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने का फैसला। यह दूरगामी महत्व वाला फैसला है। यह फैसला न केवल स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव पर विराम लगाता है, बल्कि इस दकियानूसी सोच को भी खारिज करता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाएं मंदिर जाने के योग्य नहीं होतीं।

आज के युग में इस सोच के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता और मंदिर में तो बिल्कुल भी नहीं। आखिर ईश्वर का कोई भी रूप स्त्री-पुरुष में कोई भेद कैसे कर सकता है? जो लोग इस फैसले से सहमत नहीं उन्हें इससे परिचित होना चाहिए कि हिंदू धर्म स्वयं में सतत सुधार के लिए जाना जाता है। इसी के साथ उन्हें इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर देवी मानी जाने वाली स्त्री का ईश्वर के घर यानी मंदिर में ही अनादर करने वाली परंपरा को सही कैसे ठहराया जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण फैसला समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली धारा 377 के अधिकांश हिस्से को खारिज करने का रहा। यह कानून अंग्रेजी शासन के समय बना था। समय के साथ इस तरह के कानून ब्रिटेन समेत अन्य कई देशों में रद किए गए। भारत में भी इसकी मांग हो रही थी। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने बालिगों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को मान्यता प्रदान कर दी। हालांकि समाज का एक बड़ा वर्ग समलैंगिक संबंधों को एक विकृति मानता है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इस धारणा को समर्थन मिल रहा है कि समलैंगिकता व्यक्ति विशेष की अपनी यौन अभिरुचि हैऔर इसे विकृति नहीं कहा जा सकता।

चूंकि भारत में समाज का एक बड़ा वर्ग समलैंगिकता को एक तरह की विकृति मानता है इसलिए राजनीतिक दल और सरकारें उस पर कुछ कहने से बचती रहीं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि मोदी सरकार ने समलैगिकता का विरोध करने के बजाय यह कहा कि उसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला मान्य होगा। समलैंगिकता को अपराध मानने वाली धारा को खत्म करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य ब्रिटिशकालीन कानून की धारा 497 को खत्म किया। सुप्रीम कोर्ट ने विवाहेतर संबंध को सामाजिक बुराई के रूप में देखा और उसे तलाक का आधार भी माना, लेकिन उसे अपराध मानने से इन्कार कर दिया। जैसे तमाम लोग धारा 377 को खत्म करने से खुश नहीं वैसे ही धारा 497 खत्म करने से भी। इतने बड़े देश में ऐसा होना स्वाभाविक है, लेकिन यह निष्कर्ष ठीक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट ने विवाहेतर संबंधों को मान्यता दे दी है।

बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के मन में अर्से से कौंध रहे इस सवाल का भी जवाब दिया कि आधार का क्या होगा? उसने आधार को वैधानिकता पर मुहर लगाकर सरकार को एक बड़ी राहत तो दी, लेकिन कुछ मुश्किलें भी खड़ी कीं। आधार की परिकल्पना के पीछे सरकारी सेवाओं और सब्सिडी को समाज के उस वर्ग तक सही तरह से पहुंचाना था जो विकास से वंचित होने के साथ निर्धनता से ग्रस्त हैं, लेकिन मोदी सरकार ने निजी कंपनियों को भी आधार का इस्तेमाल करने की अनुमति प्रदान कर दी। इसके चलते आधार का विवरण जिसमें लोगों की अंगुलियों और पुतलियों की छाप भी होती है, कई ऐसी जगहों पर भी इस्तेमाल किया जाने लगा जहां पहले नहीं होता था, जैसेस्कूली दाखिले, मोबाइल सिम खरीदने, बैंक खाता खुलवाने और परीक्षाओं में। ऐसा इसलिए किया जाने लगा ताकि व्यक्ति विशेष की सही पहचान हो सके। इस पर कांग्रेस, वामपंथी दलों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने ऐसे आरोप लगाने शुरू कर दिए कि सरकार लोगों की जासूसी करना चाहती है। यह भी कहा जाने लगा कि आधार के डाटाबेस में सेंध लगाई जा सकती है। ये आरोप इसलिए गंभीर नजर आने लगे, क्योंकि कुछ लोगों का आधार का विवरण सार्वजनिक हो गया था।

उच्चतम न्यायालय ने आधार को वैध तो करार दिया, लेकिन कई सेवाओं में उसके इस्तेमाल को अमान्य करार देते हुए निजी कंपनियों को भी उसका प्रयोग करने से मना कर दिया। आम तौर पर इसका स्वागत किया गया, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि निजी कंपनियों के पास लोगों की पहचान साबित करने का वैसा कोई पुख्ता उपाय नहीं जो आधार जितना भरोसेमंद हो। बेहतर होगा सरकार आधार के डाटाबेस को सुरक्षित करने के पुख्ता उपाय करके उच्चतम न्यायालय से नए सिरे से इसकी अनुमति मांगे कि बैैंकों के साथ निजी कंपनियों को आधार का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाए और अगर लोग निजी कंपनियों के समक्ष आधार को अपनी पहचान पत्र के तौर पर पेश करना चाहें तो उन्हें इसकी स्वीकृति दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने समाज के साथ राजनीति पर व्यापक असर डालने वाला एक और फैसला यह दिया कि मस्जिद में नमाज मामले का अयोध्या विवाद से कोई लेना-देना नहीं। इस फैसले के चलते अयोध्या मामले की दिन प्रति दिन सुनवाई का रास्ता साफ हो गया। कुछ महीने पहले जब उसकी सुनवाई शुरू हुई तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकीलों ने इस पर जोर देना शुरू कर दिया कि पहले 1994 के उस मामले पर नए सिरे से विचार किया जाए जिसमें कहा गया था कि नमाज के लिए मस्जिद इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं।

यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले में अड़ंगेबाजी करने वालों को हतोत्साहित किया। एक समय कांग्रेसी नेता एवं वकील कपिल सिब्बल की ओर से दी गई यह दलील अड़ंगेबाजी ही तो थी कि अगले आम चुनाव तक अयोध्या मामले की सुनवाई टाल दी जाए। राजनीति और समाज को कहीं गहरे तक प्रभावित करने वाले अयोध्या मामले की सुनवाई में और देरी का कोई औचित्य नहीं, लेकिन अभी भी देखा जाना चाहिए कि यह मामला आपसी बातचीत से कैसे सुलझे? आपसी बातचीत से इस मसले को हल करने की कोशिश इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिस भी पक्ष के खिलाफ होगा वह उसे आसानी से स्वीकार नहीं करेगा और इसके चलते सामाजिक समरसता प्रभावित हो सकती है और साथ ही इस मसले पर नए सिरे से समाज को बांटने वाली राजनीति भी हो सकती है। सुन्नी वक्फ बोर्ड और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी जैसे संगठनों को चाहिए कि वे अयोध्या में भगवान राम का मंदिर बनने पर अपनी सहमति देकर समरसता का एक नया इतिहास लिखें। इसकी अपेक्षा इसलिए की जाती है कि राम भारत की अस्मिता के प्रतीक है और यदि उनके जन्म स्थान पर उनकी स्मृति में मंदिर नहीं बन सकता तो और कहां बन सकता है? अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो आ जाएगा, लेकिन इसमें संदेह है कि उसके बाद राजनीतिक दल इस मसले की आड़ में विभाजनकारी राजनीति बंद कर देंगे। इस राजनीति से बचने का एक ही उपाय है-सबकी सहमति से राम मंदिर का निर्माण।


भेदभाव के विरुद्ध


शायद कोई भी सभ्य समाज वैसी मान्यता का समर्थन नहीं करेगा, जिसके तहत किसी धार्मिक गतिविधि या ईश्वर के प्रति आस्था की अभिव्यक्ति में दो सामाजिक वर्गों के बीच भेदभाव किया जाता हो। लेकिन केरल के पत्तनमतिट्टा जिले में स्थित सबरीमाला मंदिर में जिस तरह लगभग आठ सौ सालों से दस से पचास साल के बीच की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी लगी हुई थी, उसे ईश्वर की पूजा करने के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच घोर भेदभाव के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि पितृसत्तात्मक मूल्यों से संचालित इस परंपरा पर सवाल उठे और इसे खत्म करने की लड़ाई लंबे समय से जारी थी। अब इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों के पीठ ने बहुमत से शुक्रवार को सबरीमाला मंदिर में जारी विषमता को पूरी तरह से खारिज किया और सभी उम्र की महिलाओं को वहां जाकर पूर्जा-अर्चना की इजाजत दे दी। हालांकि इस पीठ में से जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अपनी असहमति दर्ज की और धार्मिक रिवायतों के बीच में न्यायिक हस्तक्षेप को गैरजरूरी बताया। लेकिन बाकी चार जजों ने इस मसले पर जो राय जाहिर की, उसकी अपेक्षा किसी भी प्रगतिशील समाज को होगी। अदालत ने साफतौर पर कहा कि सभी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए; जैविक आधार पर किसी को भी मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता।

यह अपने आप में एक विचित्र बात है कि जिस धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की तादाद इतनी बड़ी हो, उसकी नैतिकता का फैसला चंद लोग करें। अगर किसी धर्म के संचालक एक समुदाय के स्त्री-पुरुष को अपना अनुयायी मानते हैं तो उन्हें अपनी आस्था की अभिव्यक्ति के लिए सबके एक समान अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। लेकिन पूर्वग्रहों की वजह से लोगों के बीच भेदभाव को कायम रखना या फिर बढ़ावा देना अमानवीय मूल्यों को स्वीकृति देना है। सवाल है कि क्या धर्म-तंत्र के एक संचालक के रूप में सबरीमाला के पुजारी और वहां का प्रबंधन इस तरह की विषमता को बढ़ावा दे रहे थे! हैरानी की बात यह है कि अब तक दुनिया भर में स्त्री-पुरुष समानता के लिए चले आंदोलनों की वजह से आए तमाम बदलावों के बावजूद सबरीमाला मंदिर प्रबंधन से लेकर वहां धार्मिक गतिविधियों में शामिल लोगों को इस परंपरा पर पुनर्विचार करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि कैसे यह महिलाओं के खिलाफ भेदभाव की दृष्टि के जरिए समानता के मूल्यों के विरोध में है।

दरअसल, धार्मिक मामलों को इतना संवेदनशील बना दिया गया है कि उनमें किसी प्रथा पर सवाल उठाना एक जोखिम से कम नहीं होता है। सबरीमाला की तरह देश के कई मंदिरों में अलग-अलग वजहों से महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता रहा है। हालांकि धार्मिक मान्यताओं और उससे जुड़ी पारलौकिक धारणाओं के मामले में ऐसे भेदभाव को भी सहजता से स्वीकार किया जाता है और इन पर आपत्ति जताना किसी परंपरा की कथित पवित्रता को भंग करने की तरह देखा जाता है। जबकि ईश्वर में विश्वास और आस्था की अभिव्यक्ति का अधिकार सबके लिए समान होना चाहिए। यों भी, अगर कोई धार्मिक व्यवस्था अपने अनुयायियों के बीच भेदभाव की परंपरा को कायम रखती है, तो उसे किस आधार पर समानता और न्याय का वाहक माना जाएगा! अच्छा यह है कि हाल के वर्षों में महिलाओं और कुछ अन्य सामाजिक वर्गों के बीच इस मसले पर जागरूकता बढ़ी है और उन्होंने ऐसी भेदभावपरक परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाई है। इस लिहाज से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में समानता के उन्हीं स्वरों को वैधता दी है और यह स्वागतयोग्य है।


Dumping an archaic law

The Supreme Court decision to decriminalise adultery is a step in the right direction

Shonottra Kumar,(Shonottra Kumar is a legal researcher at Nyaaya, an initiative of the Vidhi Centre for Legal Policy)

Following a series of landmark judgments delivered by the Supreme Court this month, it passed yet another remarkable decision on Thursday. It decriminalised the offence of adultery by holding Section 497 of the Indian Penal Code (IPC) unconstitutional.

As of few days ago, India was one of the few countries in the world that still considered adultery an offence. The appalling attribute of the Indian definition of this crime was that it did not punish the erring spouses, but instead punished the adultering man, or rather ‘the outsider’, for having extra-marital relations with a woman who he knows to be married. It was only an offence if the husband had not consented to this relation, implicitly suggesting that the wife was the property of her husband. Hence, the husband was considered to be the “victim” of adultery and could file a case. The same recourse was, however, not available to the wife.

Moral wrong as crime

For any act to be a crime, it has to be committed against society at large. The main argument for retaining the criminal provision was that the outsider should be punished for breaching the matrimonial unit and that the law should mandate punishment for such a moral wrong. This violation was seen as a crime against the institution of marriage, thus justifying it to be a breach of security and well-being of society. Thankfully, and rightly so, this argument was unanimously dismissed by the bench. The court observed that the issue of adultery between spouses was a private matter, and could be a ground for divorce under civil law. It did not warrant the use of criminal sanction against any party involved. Moreover, no justification can be given by the state for penalising people with imprisonment for making intimate and personal choices.

Further, addressing the issue of making the penal provisions of adultery gender neutral, the court held that even then the matter was private, and anything otherwise would be a grave intrusion into the privacy of individuals. In simple terms, as the law previously stood, in this offence, the victim would be the husband alone, whose property (i.e. the wife) was trespassed upon. Dismissing this regressive patriarchal notion of women being “chattels” of their husband, the court held that Section 497, as it existed, denied women ownership of their sexuality and agency over their own relationships. The court even relied on K.S. Puttaswamy v. Union of India to explain this deprivation of autonomy as a violation of their right to privacy and to live with dignity, thus violating their fundamental rights under Article 21 of the Constitution.

The adultery provision also violated the right to equality guaranteed under Article 14. The court observed that women were treated as passive entities, and possessions of their husband. The fact that the commission of the offence would have been in the absence of the husband’s consent proved the inequality between the spouses. Section 497 consumed the identity of a wife, as an individual with rights as an equal partner to the marriage, tipping the scales to favour the husband. The court further explained: “Marriage in a constitutional regime is founded on the equality of and between spouses. Each of them is entitled to the same liberty which Part III [of the Constitution] guarantees.” Therefore, not affording both parties to a marriage equal rights and opportunities would be discriminatory and a violation of their right to equality.

Previous challenges to this provision claimed that exempting women under Section 497 from prosecution and being prosecuted was ‘protecting’ them and was in consonance with Article 15(3) of the Constitution that allowed the state to make laws for the benefit of women and children. This provision was made when bigamy was prevalent and Lord Macaulay, the drafter of the IPC, did not find it fair to punish one inconsistency of the wife when the husband was allowed to marry many others. However, a fallacy in this reasoning was pointed out by the court — the law that takes away the right of women to prosecute, just as her husband had the right to proceed against the other man, could not be considered ‘beneficial’ and was, in fact, discriminatory.

In step with the rest

It is surprising to see that even after the verdict many have opposed this decision of the Supreme Court, most countries around the world have done away with this practice. While the struggle for equality in many other spheres still continues, the decision to scrap this archaic law is definitely a step in the right direction.


Freedom to pray

With its Sabarimala verdict, the SC underlines the Constitution’s transformative power.


The Constitution protects religious freedom in two ways. It protects an individual’s right to profess, practise and propagate a religion, and it also assures similar protection to every religious denomination to manage its own affairs. The legal challenge to the exclusion of women in the 10-50 age group from the Sabarimala temple in Kerala represented a conflict between the group rights of the temple authorities in enforcing the presiding deity’s strict celibate status and the individual rights of women to offer worship there. The Supreme Court’s ruling, by a 4:1 majority, that the exclusionary practice violates the rights of women devotees establishes the legal principle that individual freedom prevails over purported group rights, even in matters of religion.

The three concurring opinions that form the majority have demolished the principal defences of the practice — that Sabarimala devotees have constitutionally protected denominational rights, that they are entitled to prevent the entry of women to preserve the strict celibate nature of the deity, and that allowing women would interfere with an essential religious practice. The majority held that devotees of Lord Ayyappa do not constitute a separate religious denomination and that the prohibition on women is not an essential part of Hindu religion. In a dissenting opinion, Justice Indu Malhotra chose not to review the religious practice on the touchstone of gender equality or individual freedom. Her view that the court “cannot impose its morality or rationality with respect to the form of worship of a deity” accorded greater importance to the idea of religious freedom as being mainly the preserve of an institution rather than an individual’s right. Beyond the legality of the practice, which could have been addressed solely as an issue of discrimination or a tussle between two aspects of religious freedom, the court has also sought to grapple with the stigmatisation of women devotees based on a medieval view of menstruation as symbolising impurity and pollution.

The argument that the practice is justified because women of menstruating age would not be able to observe the 41-day period of abstinence before making a pilgrimage failed to impress the judges. To Chief Justice Dipak Misra, any rule based on segregation of women pertaining to biological characteristics is indefensible and unconstitutional. Devotion cannot be subjected to the stereotypes of gender. Justice D.Y. Chandrachud said stigma built around traditional notions of impurity has no place in the constitutional order, and exclusion based on the notion of impurity is a form of untouchability. Justice Rohinton F. Nariman said the fundamental rights claimed by worshippers based on ‘custom and usage’ must yield to the fundamental right of women to practise religion. The decision reaffirms the Constitution’s transformative character and derives strength from the centrality it accords to fundamental rights.


Opening The Gates

The verdict allowing women devotees to enter Sabarimala is a powerful message for gender equality, constitutional morality.


The Supreme Court, in a 4:1 judgment, has ruled that women of all ages should be allowed the visit the Sabarimala shrine and stuck down the Kerala Hindu Places of Public Worship (Authorisation of Entry) Rules 1965, which prohibited entry of women aged between 10 and 50 in Sabarimala, as unconstitutional. The majority also found that the exclusionary practice at the Sabarimala shrine did not pass the essential practices doctrine test or the principle of constitutional morality; the court also ruled that Ayyappa devotees will not constitute a separate religious denomination. It was held that “the heart of the matter lies in the ability of the Constitution to assert that the exclusion of women from worship is incompatible with dignity, destructive of liberty and a denial of the equality of all human beings. These constitutional values stand above everything else as a principle which brooks no exceptions, even when confronted with a claim of religious belief”. Hence, it was concluded that “a claim for the exclusion of women from religious worship, even if it be founded in religious text, is subordinate to the constitutional values of liberty, dignity and equality” and “exclusionary practices are contrary to constitutional morality”. The verdict is in with the spirit of the times and expands the rights and freedoms guaranteed in the Constitution.

However, the powerful majority of four should not be read as a sanction to ignore Justice Indu Malhotra’s lone dissenting view, which asks for a nuanced reading of constitutional rights and morality. It is ironic that the dissent on a matter projected as an issue of the rights and freedoms of women has come from a woman judge itself. Justice Malhotra has problematised the manner in which matters of faith, tradition and custom are tested against the rationality embedded in the Constitution. “The equality doctrine enshrined under Article 14 does not override the Fundamental Right guaranteed by Article 25 to every individual to freely profess, practise and propagate their faith, in accordance with the tenets of their religion,” writes Justice Malhotra, who had recently ruled against Section 377 and the adultery law. Accordingly, “constitutional morality in a secular polity would imply the harmonisation of the fundamental rights, which include the right of every individual, religious denomination, or sect, to practise their faith and belief in accordance with the tenets of their religion, irrespective of whether the practise is rational or logical”. At a time when the Supreme Court, by its own admission, is underlining the very importance of constitutional morality, Justice Malhotra’s words are a cautionary reminder that it may need more than a judicial pronouncement to enable social reform.