30-05-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


NREG For Cities
A national urban job guarantee is needed. Efficiently designed, it won’t stress the budget
TOI Editorials

Shortly after a report from the Prime Minister’s Economic Advisory Council (PMEAC) that recommended the rollout of an urban employment guarantee programme, Rajasthan launched its own version of the scheme. India is not new to statelevel urban jobs programmes as Kerala launched one over a decade ago. The advent of the pandemic built up cross-party support for it and a few other states followed suit. At the Union level, this idea gained momentum last year when the parliamentary standing committee on labour recommended it. Besides Kerala, Tamil Nadu, Odisha, Himachal Pradesh have a shorter experience in the area.

There’s a case for GoI to join in for two key reasons. In India, CMIE jobs data shows that monthly unemployment has fluctuated between 6. 56% and 11. 84% over a year, with urban employment exceeding rural in 10 of those months. At India’s stage of development, this is relatively high, particularly in urban centres. Second, state-level initiatives are geographically limited and also at a nascent stage. It is difficult to gauge how useful they are for workers from UP, Bihar, Rajasthan and West Bengal – states that were destinations for more than 60% of the 11. 4 million returning migrant workers during the first lockdown. As in the case of GoI’s health insurance scheme that was synchronised with similar state-level initiatives, it’s possible to design an overarching national urban employment guarantee programme.

That leaves two key questions, on cost and design. One estimate by researchers at Azim Premji University showed that 100 days of guaranteed work for 20 million workers with wages fixed at Rs 300 a day, and the overall wage bill capped at 50% of the total outlay, would cost GoI Rs 1 lakh crore. For perspective, the latest GoI annual budgetis pegged at Rs 39. 4 lakh crore. GoI’s existing urban employment schemes can be subsumed into an urban job guarantee scheme to control costs. As for design, it’s prudent to take an intermediate step such as ‘Duet’ (decentralised urban employment and training) proposed by economist Jean Dreze. It envisages using public institutions initially to introduce the scheme. Instead of going all out, it will allow GoI a chance to observe its working in smaller settings as urban governance capacity across India is uneven. But it’s worth sorting out these details because an urban employment guarantee plan can help those most hit by recent economic shocks.



India needs a law to make compensation for unlawful arrest a statutory right

Shoddy investigation is one thing, but a malicious and motivated probe is quite another. The probe conducted by former Narcotics Control Bureau (NCB) official Sameer Wankhede into a purported tip-off about consumption of drugs on board a cruise ship, in October 2021, seems to fall in the latter category. The raid on the vessel resulted in seizure of narcotic substances and the arrest of several people, including Aryan Khan, son of Bollywood star Shah Rukh Khan. Even though nothing was seized from Mr. Khan, the agency made sensational claims in court about his being part of an international drug trafficking network and, quite strangely, cited messages purportedly exchanged on WhatsApp as ‘evidence’. By the time he obtained bail weeks later, the case had all the makings of a witch-hunt. A special investigation team from Delhi, which took over the case after allegations of extortion surfaced against Mr. Wankhede, has now cited lapses in the initial investigation and the lack of prosecutable evidence, and absolved Mr. Khan and five others and excluded them from the charge sheet filed recently. The lapses include failure to video-graph the search of the ship, not conducting a medical examination to prove consumption, and examining Mr. Khan’s phone and reading messages on it without any legal basis.

It is good that the agency made amends for the mischief done by the initial set of investigators by applying the standard of ‘proof beyond reasonable doubt’ while presenting its final report. At the same time, the NCB has to re-examine its priorities. It is an elite agency in the fight against international trafficking in narcotic and psychotropic substances. Its primary focus ought to be on trans-national smuggling networks, while the job of pursuing drug peddlers and raiding rave parties must be left to the local police. While strict disciplinary action is warranted if any officer is found involved in ‘fixing’ someone, it is also time that the Government came out with a legal framework for compensating those jailed without proof. The country does not have a law on the grant of compensation to those maliciously prosecuted. However, constitutional courts do exercise their vast powers sometimes to award monetary recompense; the remedy of a civil suit is also available in law, but it is time-consuming. The Law Commission of India has recommended enactment of a law to make compensation in such cases an enforceable right. Currently, Section 358 of the Cr.P.C. provides for a paltry fine to be imposed on a person on whose complaint a person is arrested without sufficient grounds. Such provisions should be expanded to cover just compensation by the state for unnecessary arrests. It is a sobering thought to note that even people with celebrity status and vast resources are not insulated from the misuse of police powers, even while recognising that it is still possible to vindicate one’s innocence and force the establishment to adopt a course correction.


दुनिया को राह दिखाता नया भारत
अमित शाह, ( लेखक केंद्रीय गृहमंत्री हैं )

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार ने केंद्र में अपने आठ वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवधि को मैं नए भारत के निर्माण की यात्रा के रूप में देखता हूं। नए भारत का अर्थ एक सशक्त, सक्षम, समर्थ और आत्मनिर्भरता की भावना युक्त भारत है। यह सुखद है कि पिछले आठ वर्षों में इस भारत की आधारशिला रखने का काम मोदी जी ने किया है। इस दौरान देश के समक्ष कोविड संकट सहित अनेक बाधाएं और चुनौतियां आईं, लेकिन मोदी जी के कुशल नेतृत्व में देश ने मजबूती से उनका सामना किया और नए भारत के निर्माण की यात्रा सतत जारी रही। कोविड महामारी ने पूरी दुनिया को नुकसान पहुंचाया और अभी भी तमाम देश उससे उबरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार की नीतियों के चलते यह महामारी हमारी अर्थव्यवस्था को अधिक प्रभावित नहीं कर पाई। जब दुनिया के बड़े-बड़े देश कोविड के समक्ष घुटने टेक चुके थे, तब मोदी जी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का आह्वान करते हुए स्पष्ट किया कि यदि संकल्प दृढ़ हो तो आपदा को भी अवसर में बदला जा सकता है।

आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा से जहां हताश हो रहे भारतीय जनमानस में आशा का संचार हुआ, वहीं इसके तहत घोषित बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज ने अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने का काम किया। सरकार के इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि कोविड संकट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारत आज छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। ‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’ में भारत 2015 में जहां 142वें स्थान पर था, वहीं अब 63वें स्थान पर है। भारत दुनिया का इन्वेस्ट डेस्टिनेशन बन गया है। मोदी जी के नेतृत्व में आत्मनिर्भरता की राह पर चलता भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।

जनधन योजना के माध्यम से करोड़ों गरीबों के बैंक खाते खुलवाकर उन्हें देश के अर्थतंत्र में शामिल करते हुए मोदी जी ने यह प्रकट किया कि उनकी सरकार समावेशी विकास के माडल को लेकर आगे बढ़ने वाली है। मोदी शासन का मूलमंत्र ‘सबका साथ-सबका विकास’ ही सर्वस्पर्शी एवं सर्वसमावेशी माडल को लेकर आगे बढ़ने वाला है। इसका उद्देश्य देश के अंतिम व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचाते हुए उसके जीवन स्तर को ऊपर उठाना है। उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, मुद्रा, पीएम किसान सम्मान निधि, स्वच्छ भारत, सौभाग्य, आवास, डीबीटी इत्यादि योजनाओं के माध्यम से मोदी सरकार ने गरीबों का न सिर्फ आर्थिक सशक्तीकरण किया, बल्कि उन्हें सम्मान से जीने का अवसर देने का सफल भी प्रयास किया है। योजनाएं पिछली सरकारों में भी बनती थीं, लेकिन उनके क्रियान्वयन की गति मोदी सरकार की विशेषता रही है। अब योजनाओं को किसी सीमा में बांधे बिना सभी के लिए बनाया जाता है। पिछले आठ वर्षो में स्वतंत्रता के बाद पहली बार गरीब और पिछड़े सरकार में हितधारक (स्टेकहोल्डर) बने और अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जुड़े।

मोदी जी के शासन में राष्ट्रीय सुरक्षा को भी अभूतपूर्व मजबूती मिली है। आतंकवाद के प्रति यह सरकार जीरो टालरेंस का रवैया अपनाते हुए आगे बढ़ रही है। अब आतंकी हमलों पर कांग्रेस सरकारों की तरह केवल निंदा-भर्त्सना करके ही कर्तव्यों की इतिश्री नहीं की जाती, बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक द्वारा आतंकियों को उनके घर में घुसकर मुंहतोड़ जवाब दिया जाता है। यह परिवर्तन देश के नेतृत्व की मजबूती के कारण ही संभव हुआ। कांग्रेस सरकारों के समय अक्सर ऐसा भी सुनने को मिलता था कि भारतीय सेना के पास गोला-बारूद की कमी हो गई है, लेकिन अब सैन्य बलों को सभी अत्याधुनिक संसाधनों एवं उपकरणों से लैस रखने के लिए सरकार लगातार काम कर रही है। आज देश की वायु सीमा की रक्षा राफेल जैसा अत्याधुनिक लड़ाकू विमान कर रहा है तो एस-400 जैसी सर्वश्रेष्ठ मिसाइल रक्षा प्रणाली देश का कवच बनकर तैनात हो चुकी है। रक्षा सामग्री के लिए विदेशी निर्भरता वाले भारत ने 2019 में 10 हजार करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादों का निर्यात किया और 2025 तक इसका लक्ष्य 35 हजार करोड़ रुपये करने का है। यह सब इसीलिए संभव हुआ, क्योंकि मोदी सरकार के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा राजनीति नहीं, राष्ट्रहित का विषय है। हमारी सरकार इससे कोई समझौता नहीं कर सकती।

प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्तर पर तो देश को सुदृढ़ किया ही है, विश्व पटल पर भारत के गौरव को बढ़ाने का भी काम किया है। जलवायु संकट पर दुनिया को राह दिखाना हो या कोविड के विरुद्ध भारत की लड़ाई को विश्व के लिए मिसाल बनाना हो, उन्होंने विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाया है। प्रधानमंत्री जब किसी भी देश या वैश्विक मंच पर जाते हैं, तो उनके वक्तव्यों में भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भरपूर उल्लेख होता है। इससे वह विश्व को भारत के प्रति एक नई दृष्टि देते हैं। अब भारत किसी महाशक्ति के सामने झुके बिना देशहित में अपना मत स्वतंत्रतापूर्वक रखता है। मोदी जी को संयुक्त राष्ट्र सहित विश्व के कई मंच और देश सम्मानित कर चुके हैं। यह भी विश्व में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा का ही द्योतक है। पिछले आठ वर्षों में भारत की महान संस्कृति और परंपराओं को पुनस्र्थापित किया गया है। प्रधानमंत्री के प्रयासों से भारतीय संस्कृति को वैश्विक सम्मान भी मिला है। योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना इसका एक उदाहरण है।

यदि मोदी जी देशहित में बड़े और कड़े निर्णय लेते हैं तो इसका एक प्रमुख कारण उनके प्रति जनता का अपार विश्वास है। आज उनके नेतृत्व पर जनता का ऐसा विश्वास है कि लोग उनके निर्णयों को स्वयं आगे बढ़ाने में लग जाते हैं। स्वच्छ भारत अभियान का आह्वान हो, गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील हो, नोटबंदी का निर्णय हो या कोविड के दौरान लाकडाउन की घोषणा, इन सभी मामलों में मोदी जी के आह्वान पर जनता ने जिस तरह से सरकार का सहयोग किया वह उनके प्रति लोगों के विराट विश्वास को ही दर्शाता है। मोदी सरकार एक ऐसे समय अपने कार्यकाल के आठ वर्ष पूरी कर रही है, जब देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। ये आठ वर्ष अगले 25 वर्षों के लिए देश को आगे ले जाने की दशा-दिशा तैयार करने वाले हैं। मुझे विश्वास है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इन आठ वर्षों में नए भारत की जो मजबूत आधारशिला तैयार की है, उस पर विश्व का नेतृत्व करने वाला एक सक्षम, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत आकार लेगा।


दोषी कौन

अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को आखिरकार स्वापक नियंत्रण ब्यूरो यानी एनसीबी ने बेदाग घोषित कर दिया। अब फिर से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर किस मकसद से आर्यन और उसके साथियों को गिरफ्तार किया गया। क्या वास्तव में एनसीबी के अधिकारी मादक पदार्थ पर रोक लगाने के मकसद से कड़ा संदेश देना चाहते थे, या उनका इरादा कुछ और था। खुद एनसीबी ने इस मामले की जांच में स्वीकार किया है कि कुछ गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। वे अनियमितताएं क्या केवल अधिकारियों की रिश्वतखोरी तक सीमित हैं या उसके दूसरे पहलू भी हैं। पिछले साल एक क्रूज पर चल रहे जलसे में एनसीबी ने अन्य संबंधित महकमों के साथ मिल कर छापेमारी की थी। उन्हें सूचना मिली थी कि वहां मादक पदार्थों का सेवन हो रहा है। उसमें आर्यन खान के अलावा उन्नीस अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उनमें महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नवाब मलिक का दामाद भी था। बताया गया कि उन सबके पास मादक पदार्थ पाए गए थे। सबको जेल भेज दिया गया। मगर नवाब मलिक ने उस गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए एनसीबी के अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उनका कहना था कि गलत इरादे से आर्यन और उनके दामाद को गिरफ्तार किया गया है, उनके पास कोई मादक पदार्थ नहीं था।

इस मामले में गिरफ्तार करने वाले एनसीबी के अधिकारी समीर वानखेड़े के इरादे पर सवाल उठाए गए। नवाब मलिक ने उसकी अनेक अनियमितताओं के सबूत सार्वजनिक किए थे, जिसमें फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाने का भी आरोप था। फिर यह भी आरोप लगा कि वानखेड़े ने शाहरुख खान से मोटी रकम रिश्वत में मांगी थी और कुछ रकम उसे पहुंचा भी दी गई थी। क्रूज पर छापेमारी में जो लोग शामिल थे, उनमें कुछ बाहरी लोग भी थे और उनका संबंध विपक्षी दल से बताया गया। इस तरह इस मामले को खासा सियासी रंग भी दिया गया था। उस गिरफ्तारी में बदले की भावना तलाशी जाने लगी थी। चूंकि उस मामले में रसूखदार लोगों के बच्चे गिरफ्तार थे, इसलिए उसकी जांच आदि के लिए उच्च स्तरीय पहल हुई और अब वह एक नतीजे पर पहुंच गई है। मगर यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि एनसीबी अधिकारियों के ऐसे रवैए से भला मादक पदार्थों की बिक्री पर रोक लगने का भरोसा कहां तक बन सकता है।

हमारे देश में मादक पदार्थों की बढ़ती खपत गंभीर चिंता का विषय है। पिछले कुछ सालों में अकेले गुजरात के बंदरगाहों से हजारों किलो नशीले पदार्थों की खेप पकड़ी जा चुकी है। जो नहीं पकड़ी जा सकी, उसका कोई हिसाब नहीं है। मादक पदार्थ के धंधे में लगे लोगों के तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े होते हैं। एनसीबी के हाथ उनकी गर्दन तक नहीं पहुंच पाते। छोटे-मोटे मामलों में लोगों को पकड़ कर वह अपनी सक्रियता और चौकसी साबित करती रहती है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद भी इसी तरह सक्रिय होकर उसने नाहक बहुत सारे लोगों को परेशान किया था, पर उसके हाथ कुछ नहीं लगा। एनसीबी केवल छिटपुट तरीके से कुछ लोगों पर शिकंजा कस कर देश में नशीले पदार्थों के बढ़ते कारोबार को रोकने में सफल नहीं हो सकती। उसे उस कड़ी को तोड़ने की कोशिश करनी चाहिए, जिसके जरिए मादक पदार्थ देश में फैल और युवाओं की जिंदगी बर्बाद कर रहा है। आर्यन खान मामले से उसे सीख लेने की जरूरत है।


यौनकर्म गुनाह नहीं

सर्वोच्च न्यायालय का सेक्स वर्कर्स को लेकर दिया गया हाल ही का आदेश दूरगामी परिणामों वाला है। वेश्यावृत्ति पर अपने आदेश में अदालत ने कहा है कि सेक्स वर्कर्स को भी सम्मान से जीने का अधिकार है और पुलिस को बेवजह उन्हें परेशान नहीं करना चाहिए। देश के प्रत्येक व्यक्ति को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। यौनकर्मी भी कानून के तहत समान सुरक्षा की हकदार हैं। यह आदेश देकर सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यावृत्ति को ‘पेशे’ के रूप में भी मान्यता दे दी है। लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला यह एक ऐतिहासिक फैसला है। सुप्रीम कोर्ट से नियुक्त एक पैनल ने विभिन्न दिशा-निर्देशों की सिफारिश की है, जिनमें कहा गया है कि जब भी किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाता है तो संबंधित यौनकर्मिंयों को गिरफ्तार या दंडित या परेशान नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि स्वैच्छिक यौन कार्य अवैध नहीं है और केवल वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है। अदालत ने मीडिया को भी इस बारे में संवेदनशील रुख अपनाने को कहा है। छापे और रेस्क्यू के दौरान यौनकर्मिंयों की तस्वीरें प्रकाशित न करने की हिदायत दी गई है। पुलिस बलों को यौनकर्मिंयों के साथ सम्मान से पेश आने और शोषण न करने की बात कही गई है। अदालत ने ये निर्देश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का इस्तेमाल करते हुए जारी किए हैं। ये निर्देश तब तक लागू रहेंगे जब तक केंद्र सरकार कानून लेकर नहीं आती है। यही नहीं यौनकर्मियों के बच्चों को लेकर भी अदालत ने संवेदनशील रुख अपनाते हुए ऐसे बच्चों को भी मानवीय गरिमा और सम्मान की बुनियादी सुरक्षा मिलने की बात कही। अदालत के अनुसार अगर कोई सेक्स वर्कर अपना बच्चा होने का दावा करती है, तो यह पुष्टि करने के लिए परीक्षण किया जा सकता है। कहा जा सकता है कि यह आदेश बेहद दूरगामी असर रखने वाला है। एक अध्ययन के मुताबिक भारत में 11 सौ के करीब रेड लाइट एरिया हैं, और 28 लाख महिलाएं सेक्स वर्कर के तौर पर काम करती हैं। ये भूख, गरीबी, बहलाने या फुसलाए जाने या अवैध व्यापार के कारण यह काम करने को मजबूर हैं। उन पर माफिया और पुलिस का गहरा शिंकजा रहता है। उनकी अरबों रुपए की अवैध कमाई का ये आसान जरिया हैं। यौन कर्म को मान्यता देने से पहले इस गठजोड़ को तोड़ना ज्यादा जरूरी है अन्यथा इन्हें भी अपने धंधे को वैध बताने का जरिया मिल जाएगा।