(29-12-2021) समाचारपत्रों-के-संपादक



Step Motherly?
Is the denial of FCRA renewal for the Mother Teresa founded NGO at all justified?
TOI Editorials

This Christmas Day the Missionaries of Charity (MoC) got a painful shock, as the Union home ministry refused its application for renewal of FCRA registration. MoC’s shock is shared by many across the world who support the NGO either in kind or spirit. The specific foreign funding law is intended to check “activities detrimental to the national interest” and if one of India’s most venerable NGOs is indeed being accused of this, evidence must be provided. So far the government has only made a sketchy reference to some “adverse inputs”.

This of course comes on the heels of Amnesty International exiting the country last year as a result of its finances getting choked, and other prominent civil liberty, human rights and charitable groups facing similar straits. Last year the Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 was further amended, so that at a time when India needed the non-profit sector more than ever both its funding and functioning were put under fresh restraints. Yet, from food to education, oxygen to plasma, their service remains invaluable in a country where the state isn’t always there for everyone.

Set up as far back as in 1950, MoC, like Bharat Ratna Mother Teresa herself, has had plenty of critics over the years, even as its work among the sick and poor also won its vast share of admirers. A key suspicion it confronts today can be seen in the FIR filed against one of MoC’s children’s homes in Vadodara earlier this month. This followed allegations of religious conversions. This will be independently debated and litigated. But no matter how politically volatile such accusations have become, they cannot be the touchstone for funding of important services, certainly not for axing a global supply chain serving the most needy.

Even when they are not explicitly speaking truth to power, by its very nature the work of civil society organisations highlights shortfalls of the state. In the best-case scenario their critical commentary feeds a virtuous cycle, improving governance delivery to citizens. It’s not about what governments like to hear but what they need to hear. Of course, no, misuse of funding should not get a free pass. But the nature of misuse must be completely clear. “Adverse inputs” or FIRs on allegations of conversion do not really constitute activities “detrimental to national interest”. On currently known facts, MoC shouldn’t be denied FCRA renewal.



Falling short
Perpetrators of violence in the name of religion must be brought to justice

To overlook the orgy of communal hatred at a recent event in Haridwar that was labelled a Hindu religious congregation as an inconsequential derangement of a fringe group may be a convenient pretext for the inaction by the police and the silence of the ruling Bharatiya Janata Party (BJP), but the reality is scary. The passivity of the BJP is a signifier and eloquent admission of the pernicious mainstreaming of bigotry. The Uttarakhand police have betrayed a cavalier attitude in their investigation by not naming any of the ringleaders, initially, and not showing the urgency the case requires, subsequently. Speakers at the event openly called for genocide and violence. Such bigotry is not the monopoly of adherents of any particular religion, and law enforcement authorities should be eternally vigilant. The murder of two people at Sikh places of worship in Punjab in separate incidents in recent days showed how matters of religion can inflame irrational passion. In one case in Punjab, a person has been arrested and charged with murder. The shameful lynchings were followed by responses from organisations ranging from the Congress to the Rashtriya Swayamsevak Sangh, but none unequivocally condemned the violence. Most reactions appeared to justify the violence, privileging abstract religious sentiments over the fundamental right to life. The Congress chief in Punjab, Navjot Singh Sidhu, spoke for many politicians seeking to exploit religion for electoral purposes when he said those who offended the faith must be hanged publicly.

That mainstream parties are unable to take an unambiguous and universal position that violence and the call for violence, in the name of faith, are unacceptable is unsettling and bodes ill for Indian democracy. Despite sporadic bursts of communal violence, India, unlike its neighbours in South Asia, has survived and thrived as a multicultural and multi-religious nation till date. Keeping it that way requires vigilance and vision. Violence originates in thought, transmits itself through speech and manifests itself in action. Targets in the recent past have ranged from interfaith couples to carol singers to cattle traders to teachers setting question papers. New laws appear to reinforce and institutionalise prejudice and intolerance. The heavy hand of the state that falls too frequently on the critics of the Government has left the mobs that threaten national unity untouched. Those who committed murder in Punjab, those who called for mass murder from Haridwar and those who vandalised Christian institutions in different places must all be brought to justice as per the law. Political parties must rise above their narrow interests during the current election cycle and unite against hate. Later may be too late.



उत्तर-दक्षिण राज्यों के गवर्नेंस में इतना फर्क क्यों है

नीति-आयोग की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 43 पैरामीटर्स के आधार पर बने समग्र-स्वास्थ्य सूचकांक में फिर सबसे ऊपर दक्षिण भारत के चार राज्य केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हैं, जबकि सबसे नीचे उत्तर भारत के उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, और राजस्थान हैं। दोनों क्षेत्रों के ये राज्य भारत का ही अंग हैं, उसी संघीय ढांचे में 70 साल से स्व-शासन में हैं और अलग-अलग भाषा, पोशाक और खानपान के बावजूद समान व्यापक सांस्कृतिक-आध्यात्मिक विरासत में फले-फूले हैं। उत्तर भारत ने सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिए, देश की राजनीति में अधिक आबादी के कारण इस क्षेत्र का हमेशा दबदबा भी रहा। पर क्यों इनमें आज भी चिकित्सा और दवा के अभाव में नवजात और प्रसूति माताएं सबसे ज्यादा दम तोड़ रही हैं? इस इंडेक्स स्कोर में सबसे नीचे के राज्य यूपी (31) और सबसे ऊपर के राज्य केरल (82) के बीच लगभग तीन गुने का अंतर क्यों पिछले चार साल से है। अगर यूपी ने 2018-19 और 2019-20 के बीच छह अंक की उछाल ली भी है तो उसका कारण तुलनात्मक वर्ष के बेहद नीचे का आधार अंक है। विकास के अभाव में सात दशकों से कराह रहे उत्तर भारत के इन राज्यों में मुख्य मुद्दे ‘वो-बनाम-हम’, मंदिर, जिन्ना, गाय, लव-जेहाद और जातिवाद रहा है। सन 2018 में यूके और यूएस की दो यूनिवर्सिटीज ने दुनिया के 106 देशों की 100 वर्षों की स्थिति पर एक चौंकाने वाले अध्ययन में पाया कि पूर्ण वैचारिक-धार्मिक सहिष्णुता विकास की पूर्व शर्त है।


वायु प्रदूषण रोकने के लिएऔद्योगिक स्तर पर सुधार जरूरी
आरती खोसला, ( निदेशक क्लाइमेट ट्रेंड्स )

सर्दियां पीक पर हैं, नतीजतन वायु प्रदूषण भी बढ़ा हुआ है। इस मौसम में ना केवल उच्च पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) का स्तर बढ़ जाता है, बल्कि यह नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी प्रदूषणकारी गैसों को भी प्रभावित करता है। भारत में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड व सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसों के पीएम 2.5 में तेजी से रूपांतरण के लिए मौसम संबंधी स्थितियां बहुत अनुकूल हैं। इसलिए पीएम 2.5 को नियंत्रित करने के लिए इन गैसों का उत्सर्जन नियंत्रित करना जरूरी है। स्थानीय स्तर पर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के संपर्क में आने से पर्यावरण व स्वास्थ्य पर कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं।

नाइट्रोजन डाइऑक्साइड उत्तेजक गैस है, जो ज्यादा मात्रा में होने पर श्वासनली की सूजन का कारण बनती है। वहीं, नाइट्रोजन ऑक्साइड स्मॉग व एसिड रेन बनाने के लिए प्रतिक्रिया करता है। हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि राज्यों में परिवहन में जीवाश्म ईंधन की खपत के कारण, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की वार्षिक औसत सांद्रता, सड़कों पर कमज़ोर लोगों को जैसे फेरीवाले, विक्रेता और बेघर लोगों में कोविड का जोखिम बढ़ा रही है।

नाइट्रोजन ऑक्साइड जहरीली और अत्यधिक प्रतिक्रियाशील गैसों का एक परिवार है, जो उच्च तापमान पर ईंधन जलाने पर बनती है। यह प्रदूषण ऑटोमोबाइल, ट्रक और विभिन्न गैर-सड़क वाहनों जैसे निर्माण उपकरण, नाव आदि द्वारा उत्सर्जित होता है। इसकेे औद्योगिक स्रोत अनिवार्य रूप से जीवाश्म-ईंधन आधारित बिजली संयंत्र, भस्मीकरण संयंत्र, अपशिष्ट जल उपचार सुविधाएं, कांच और सीमेंट उत्पादन सुविधाएं और तेल रिफाइनरी हैं। नाइट्रोजन ऑक्साइड न केवल दहन प्रक्रियाओं के दौरान जारी होता है, बल्कि नाइट्रिक एसिड के साथ काम करते समय भी। वातावरण में बढ़ रही नाइट्रस ऑक्साइड के पीछे कृषि का बहुत बड़ा हाथ है।

सबसे ज्यादा मुसीबत उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा राष्ट्रव्यापी निगरानी किए जाने वाले वायु प्रदूषकों में से एक है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) में सूचीबद्ध सभी 23 राज्यों में इस एनसीएपी ट्रैकर द्वारा किए गए एक विश्लेषण से पता चला है कि इन तीन राज्यों में औसत स्तर ने सुरक्षा सीमा का उल्लंघन किया है।

आईआईटी दिल्ली के सेंटर फॉर क्लीन एयर द्वारा 2021 के एक अध्ययन में दुनिया की सबसे प्रदूषित मेगासिटी, दिल्ली के नौ थर्मल पावर प्लांट से नाइट्रोजन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन स्थापित करता है कि विशिष्ट स्रोतों से, जैसे थर्मल पावर प्लांट, और दिल्ली भर में और आसपास के उपग्रह शहरों में भी, जहां परिवहन अन्य महत्वपूर्ण उत्सर्जक क्षेत्र है, उत्सर्जित अकेले नाइट्रोजन डाइऑक्साइड को अलग करना आसान है।

सेंटर फॉर रिसर्च फॉर एनर्जी एंड क्लीन एयर के एक हालिया विश्लेषण में अनुमान लगाया गया है कि वातावरण में घुलने वाली खतरनाक गैस रोकने के लिए लगाए जाने वाले फ्यूल गैस डी-सल्फराइजेशन सिस्टम (एफजीडी) से युक्त बिजली संयंत्रों (महात्मा गांधी और दादरी पावर प्लांट) को 85 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर पर संचालित किया जाता है, तो अकेले ये दो संयंत्र, अन्य स्रोतों और आयातों सहित, लगभग 314 मिलियन यूनिट दिन पैदा करेंगे, जिससे सर्दियों के मौसम में 300 किमी के भीतर बिजली संयंत्रों को बंद करने का मामला बनता है।

जबकि विश्लेषण सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन को नियंत्रित करने पर केंद्रित है, दिल्ली के आसपास थर्मल पावर प्लांट बंद करने का मामला नाइट्रोजन डाइऑक्साइड सहित सभी प्रदूषकों को नियंत्रित करने में मदद करेगा।



मुश्किल है चीनी उत्पादों का बहिष्कार
सतीश कु. सिंह

जनवरी‚ 2021 से नवम्बर‚ 2021 के दौरान भारत और चीन के बीच कुल 8.57 लाख करोड़ रुपये का कारोबार हुआ जो अब तक उच्चतम स्तर है। पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले यह 46.4 प्रतिशत अधिक है। इस दौरान भारत ने चीन से 6.59 लाख करोड़ रुपये के विविध उत्पाद आयात किए जो पिछले साल के इसी अवधि की तुलना में 49 प्रतिशत अधिक है। हालांकि इस अवधि में चीन ने भी भारत से रिकॉर्ड आयात किया। इस दौरान‚ चीन ने कुल 1.98 लाख करोड़ रुपये के उत्पाद भारत से आयात किए जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 38.5 प्रतिशत अधिक है। बावजूद इसके भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 4.61 लाख करोड़ हो गया‚ जो अब तक का उच्चतम स्तर है।

भारत और चीन के बीच कारोबार तब बढ़ रहा है‚ जब दोनों के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर तनाव बना हुआ है। लेकिन मौजूदा स्थिति दो देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार की महत्ता की तस्दीक करती है। आज युद्ध से ज्यादा जरूरी कारोबार हो गया है। अगर दूसरे देशों से कारोबारी रिश्ते अच्छे नहीं हों तो देश बर्बाद भी हो सकता है। इसके लिए किसी युद्ध की कदापि जरूरत नहीं है। इसलिए बदली परिस्थितियों को आश्चर्य की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। भारत आज भी आत्मनिर्भर नहीं है। चीन के उत्पादों का बहिष्कार करना भारत और आमजन का उठाया गया भावनात्मक कदम हो सकता है‚ लेकिन वास्तविकता में भारत के बाजारों पर चीनी उत्पादों का कब्जा है। भारत के गांव–देहात में हर ग्रामीण चीन में बने उत्पादों का इस्तेमाल कर रहा है। नाई द्वारा कटिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चादर‚ कैंची‚ उस्तरा‚ बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खिलौने‚ दीवाली के दीये‚ देवी–देवता‚ सजावट के समान‚ मोबाइल‚ टीवी‚ लैपटॉप‚ गांव के किराने के दुकान पर अधिकांश सामान आदि चीन के बने हुए हैं। ऐसे में क्या चीन के उत्पादों का बहिष्कार हम कर सकते हैंॽ

भारत अपनी घरेलू जरूरतें पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर चीन निर्मित उत्पादों का आयात करता है। इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर बाजार के मामले में भी चीन का भारत के बाजारों पर कब्जा है। किसी भी देश की निर्यात से अर्जित राशि यदि आयात में खर्च की गई राशि से अधिक होती है‚ तो उसे व्यापार मुनाफा कहा जाता है‚ वहीं‚ जब आयात में खर्च की गई राशि यदि निर्यात से अर्जित राशि से अधिक होती है‚ तो उसे व्यापार घाटा कहते हैं। चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ा है अर्थात भारत चीन से विविध उत्पादों का आयात ज्यादा करता है‚ जबकि निर्यात कम। 2014 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 3.36 लाख करोड़ रुपये था‚ तो 2021 में 4.61 करोड़ रुपये रहा। आंकड़ों से साफ हो जाता है कि चाहे हम चीन के उत्पादों का बहिष्कार करने के लाख दावे करें‚ लेकिन हकीकत में ऐसा करना हमारे लिए संभव नहीं है। हम आज भी और आगामी सालों में भी अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए चीनी उत्पादों पर निर्भर रहेंगे। इतना ही नहीं‚ आज भी हम कई उत्पादों के निर्माण के लिए चीन से कच्चे माल का आयात करते हैं‚ और हमारी यह निर्भरता आने वाले सालों में भी बनी रहेगी। वित्त वर्ष 2014–15 से वित्त वर्ष 2019–20 के दौरान के भारत और चीन के बीच हुए कारोबार के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने चीन को कम मूल्य के कच्चे उत्पादों का ज्यादा निर्यात किया था‚ जबकि वह विनिर्माण से जुड़े उत्पादों का चीन से आयात कर रहा था। इस अवधि में भारत से चीन मुख्य रूप से लौह अयस्क‚ पेट्रोलियम आधारित ईंधन ‚ कार्बिनक रसायन‚ परिष्कृत कॉपर‚ कॉटनयार्न आदि का आयात कर रहा था। खाद्य वस्तुओं में मछली एवं समुद्री खाद्य पदार्थ‚ काली मिर्च‚ वनस्पति तेल‚ वसा आदि भी भारत‚ चीन को निर्यात कर रहा था। साथ ही‚ भारत ग्रेनाइट के ब्लॉक एवं रियल एस्टेट में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टोन और कच्चे कपास का निर्यात भी चीन को कर रहा था।

चीन में ऑटोमोबाइल‚ मोबाइल और कंप्यूूटर के कलपुर्जों का बड़ी मात्रा में निर्माण किया जाता है। चीन से भारत आयातित उत्पादों में इलेक्ट्रॉनिक्स का 20.6 प्रतिशत‚ मशीनरी का 13.4 प्रतिशत‚ ऑर्गेनिक केमिकल्स का 8.6 प्रतिशत और प्लास्टिक उत्पादों का 2.7 प्रतिशत योगदान है‚ जबकि भारत से चीन को निर्यातित उत्पादों में ऑर्गेनिक केमिकल्स का 3.2 प्रतिशत और सूती कपड़ों का 1.8 प्रतिशत का योगदान है। भारत इले्ट्रिरकल मशीनरी‚ मैकेनिकल उपकरण‚ ऑर्गेनिक केमिकल‚ प्लास्टिक और ऑप्टिकल सÌजकल उपकरणों का सबसे अधिक आयात करता है‚ जो भारत के कुल आयात का 28 प्रतिशत है। भारत में भले ही चीन में बने सामानों के बहिष्कार की बात कही जाती है‚ लेकिन भारत के बहुत सारे उद्योग कच्चे माल एवं कलपुर्जों के लिए चीन पर निर्भर हैं। भारत भी कई तैयार उत्पादों के लिए चीन पर निर्भर है। ऐसे में हमें चाइनीज उत्पादों का बहिष्कार करने का ढकोसला करने की जगह ‘मेड इन इंडिया’ सामानों की संख्या को बढ़ाने पर जोर देना चाहिए।