(29-07-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


Politics & Corruption
Bengal ex-minister’s case has broader governance implications for India
TOI Editorials

Mamata Banerjee did well to sack Partha Chatterjee from her cabinet and from party posts but, in political terms, she had little choice. The ex-minister, who’s now also suspended from Trinamool, and his aide seem to have had a very simple view of hoarding ill-gotten cash – store them in apartments, thereby making law enforcement’s job easy. Even in this country, where political brazenness about corruption is common, footage of trunks of cash being carted out still moves public opinion. Banerjee, always ready to battle the Centre, its agencies and BJP, is also a smart politician who knew Chatterjee had become an embarrassment and a liability. BJP, trying to rediscover its mojo in Bengal after TMC roundly beat off its challenge, will sniff an opportunity here. The question how the CM remained unaware of a senior colleague’s rampant corruption is a valid one. And Chatterjee’s sacking may revive questions on TMC cadres and leaders’ alleged practices on extorting money from businesses.

There are, however, two broader inferences that apply to Indian politics in general. All parties must recognise that the chances of an embarrassing corruption scandal coming to light are higher now than before. It can be central agencies, as in Chatterjee’s case, or a victim going public, as happened to Karnataka’s BJP government. A contractor’s complaints and subsequent suicide pulled the lid off Karnataka’s rampant “commission” system for clearing government projects. Rural development minister KS Eashwarappa had to quit. In Maharashtra’s potboiler politics, MVA was constantly alleging targeting by central agencies. But the fact remains that prima facie evidence of financial dodginess has been apparent in the case of some of those ‘targets’.

The other point is the shameful use of vital services and infrastructure to extract money. Selling of teachers’ posts is a widespread practice. Haryana politicians hit headlines for this some years back. In Karnataka, clearances for government projects that can directly ease citizens’ lives were made conditional on a high ‘commission’. Even in the unlovely spectrum of political corruption, these are particularly ugly practices. Party leaders should be particularly severe on such colleagues.


Narrow view
SC verdict on PMLA fails to protect personal liberty from draconian provisions

The Supreme Court’s verdict upholding all the controversial provisions of the Prevention of Money Laundering Act (PMLA) falls short of judicial standards of reviewing legislative action. Undergirding every aspect of its analysis is a belief that India’s commitment to the international community on strengthening the domestic legal framework for combating money-laundering is so inviolable that possible violation of fundamental rights can be downplayed. The judgment repeatedly invokes the “international commitment” behind Parliament’s enactment of the law to curb the menace of laundering of proceeds of crime which, it underscores, has transnational consequences such as adversely impacting financial systems and even the sovereignty of countries. There is, no doubt, widespread international concern over the malefic effects of organised crime fuelling international narcotics trade and terrorism. Much of these activities are funded by illicit money generated from crime, laundered to look legitimate and funnelled into the financial bloodstream of global and domestic economies. A stringent framework, with apposite departures from the routine standards of criminal procedure, may be justified in some circumstances. However, experience suggests that money-laundering in the Indian context is linked or is seen as a byproduct of a host of both grave and routine offences that are appended to the Act as a schedule. These ‘scheduled’ or ‘predicate’ offences ought to be ideally limited to grave offences such as terrorism, narcotics smuggling, corruption and serious forms of evasion of taxes and duties. However, in practice, the list contains offences such as fraud, forgery, cheating, kidnapping and even copyright and trademark infringements. The Enforcement Directorate has also been manifestly selective in opening money-laundering probes, rendering any citizen vulnerable to search, seizure, and arrest at the whim of the executive.

It is disappointing that the Court did not find the provision for forcing one summoned by the ED to disclose and submit documents, and then sign it under pain of prosecution, as violating the constitutional bar on testimonial compulsion. Nor was it impressed by the argument that the search and seizure provisions lack judicial oversight and are exclusively driven by ED officers. Provisions that allow prosecution for money-laundering even without the scheduled offence being established and amendments deleting safeguards have passed muster with the Bench, solely on the ground that these were for removing lacunae pointed out by international evaluators of the efficacy of the law. Save for an odd comment that the Special Court could examine the documents to decide on continuing detention, there is nothing in the judgment that will attenuate the law’s rigours. It rejects the plea to treat ED officers who record statements as police officers, thus protecting their evidentiary admissibility. At a time when the ED is selectively targeting regime opponents, the verdict is bound to be remembered for its failure to protect personal liberty from executive excess.


भ्रष्टाचार पर सख्त कानून हों पर दुरुपयोग न हो

मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने से संबंधित कानून (पीएमएलए) के सख्त प्रावधानों को देश की सबसे बड़ी कोर्ट ने यह कहते हुए बहाल रखा कि धन-शोधन यानी काले या अवैध तरीके से कमाए धन को सफेद करना, आतंकवाद से भी बड़ा अपराध है। कोर्ट का मानना था कि विभिन्न आपराधिक कृत्यों से पैदा किए गए धन को वैश्विक स्तर पर छिपाने की क्रिया भारत की संप्रभुता और अखंडता पर हमला है। हाल में पश्चिम बंगाल में एक मंत्री की करीबी के घर से बेशुमार नकदी मिलना देश की जनता की सामूहिक चेतना को हिला देता है। इस राज्य की मुख्यमंत्री जब हवाई चप्पल पहनकर चलती हैं तो देश उनका स्वागत करता है और शायद यही कारण है कि पिछले चुनाव में उन्हें राज्य की जनता ने बड़े मतों से जिताया। सरकार ने संसद में बताया कि यूपीए के दस साल के शासन में इस कानून के तहत कुल 112 केस हुए और कोई सजा नहीं हुई, जबकि मोदी-शासन के आठ साल में 3010 केस (27 गुना ज्यादा) हुए और 23 अभियुक्तों को सजा हुई। धन की रिकवरी भी दोनों शासन में 1:19 के अनुपात में हुई। सवाल यह है कि क्या पूर्व की सरकार भ्रष्टाचार पर सहिष्णु थी या वर्तमान सरकार उसके खिलाफ प्रो-एक्टिव? कहीं ऐसा तो नहीं भ्रष्टाचार तो हर शासन में है लेकिन शिकार केवल विपक्ष के नेता हो रहे हैं?


प्रवर्तन की पहुंच

धनशोधन मामलों में प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की तेज होती गतिविधियों से भ्रष्टाचार में लिप्त, खासकर विपक्षी दलों के नेता खासे आहत थे। इसे लेकर उन्होंने अलग-अलग अदालतों में चुनौती दे रखी थी। सर्वोच्च न्यायालय उन सभी दो सौ बयालीस याचिकाओं पर एक जगह सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि प्रवर्तन निदेशालय को गिरफ्तारी, कुर्की और जब्ती जैसे दिए गए अधिकार वाजिब हैं। दरअसल, बीस साल पहले बने कानून में प्रवर्तन निदेशालय को गिरफ्तारी, कुर्की, जब्ती आदि का अधिकार तब तक हासिल नहीं था, जब तक वह इसका औचित्य साबित न कर दे।वर्तमान केंद्र सरकार ने उस कानून को बदल कर और कड़ा बना दिया, जिसके तहत उसे अदालत में अपना पक्ष साबित किए बगैर भी गिरफ्तारी और संबंधित व्यक्ति की संपत्ति जब्त करने का अधिकार दे दिया गया था। इसी संशोधन को अदालतों में चुनौती दी गई थी। अब जब सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारों को संवैधानिक करार दे दिया है, तो इसे लेकर न सिर्फ विवाद की गुंजाइश खत्म हो गई है, बल्कि ईडी के लिए धनशोधन से जुड़े मामलों की जांच, गिरफ्तारी आदि को लेकर मनोबल बढ़ा है। दरअसल, विवाद कानून में संशोधन को लेकर उतना नहीं है, जितना सरकार के इशारे पर ईडी के छापों को लेकर है।

प्रवर्तन निदेशालय ने 2011 के बाद से अब तक सत्रह सौ छापे मारे, जिनमें से करीब पंद्रह सौ सत्तर की गहन जांच की गई, मगर उनमें से केवल नौ को दोषी पाया गया। इससे जाहिर है कि इतनी बड़ी संख्या में बाकी लोगों को नाहक परेशानी और बदनामी झेलनी पड़ी। इनमें से कई लोगों की संपत्ति भी जब्त की गई। फिर पिछले आठ सालों में यह भी स्पष्ट देखा गया कि विपक्षी नेताओं पर ही ईडी का शिकंजा कसा, जबकि जो लोग दूसरे दलों से सत्तापक्ष में शामिल हो गए, उनके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, हालांकि उनके धनशोधन संबंधी अपराध जगजाहिर हैं। इसलिए विपक्षी दलों का एतराज स्वाभाविक है। मगर धनशोधन का मामला देश की सुरक्षा से भी जुड़ा है। इसके जरिए बहुत सारे आतंकी संगठनों और नशीले पदार्थों के कारोबार को भी वित्तीय मदद पहुंचाई जाती है। अदालत ने माना है कि यह किसी आतंकवाद से कम नहीं है। इससे केवल देश और समाज को वित्तीय नुकसान नहीं पहुंचता, बल्कि देश की संप्रभुता और अखंडता को भी खतरा पैदा होता है। इसलिए इस कानून को दी गई चुनौती पर स्वाभाविक ही अदालत ने विपरीत फैसला देने से परहेज किया।

धनशोधन के मामले मुख्य रूप से राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों से जुड़े हैं। अनेक अध्ययनों के आंकड़ों से जाहिर है कि ये लोग किस तरह अपना कालाधन छिपाने के लिए तरह-तरह की तरकीबें अपनाते हैं। मगर जिसकी सत्ता में पहुंच होती है, ईडी उसकी तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता। इसलिए अब तो उसकी कार्य प्रणाली को लेकर सरेआम अंगुलियां उठती रहती हैं। जहां भी किसी पर ईडी के छापे पड़ते हैं, संबंधित व्यक्ति सीधा सरकार पर आरोप लगाना शुरू कर देता है कि यह सब केंद्र के इशारे पर, परेशान करने की नीयत से किया जा रहा है।इस तरह लोगों में भ्रष्टाचार को लेकर एक प्रकार की स्वीकृति का भाव पैदा होता गया है। अदालत की ईडी के अधिकारों की व्याख्या करने की अपनी सीमाएं हैं, पर सरकार अगर सचमुच धनशोधन जैसी गंभीर प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहती है, तो उसे ईडी को मुक्त-हस्त करने की उदारता दिखानी चाहिए।


बाघों को बचाने की निरंतर जारी जंग
साकेत बडोला, ( निदेशक, राजाजी टाइगर रिजर्व )

आज बाघों पर विमर्श का दिन है। बाघों के संरक्षण की दरकार इसलिए है, क्योंकि हमारी खाद्य शृंखला में यह शीर्ष के जीवों में है। संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हमें इसे बचाना ही होगा। यही कारण है कि जब दुनिया में बाघों की संख्या में गिरावट देखी गई, तो 2010 में भारत, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल, रूस, कंबोडिया, चीन, थाईलैंड, वियतनाम जैसे बाघों की रिहाइश वाले 13 देश एकजुट हो गए। सेंट पीटर्सबर्ग में उनके शासनाध्यक्षों का शिखर सम्मेलन हुआ, जिसमें 2022 तक बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य रखा गया और बाघ संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस मनाने का फैसला किया गया। इसमें 12 साल की सीमा इसलिए तय की गई, क्योंकि 2010 चीन के हिसाब के बाघ का वर्ष था, और 2022 में इसकी पुनरावृत्ति होनी थी।

यह सुखद है कि विश्व समुदाय सेंट पीटर्सबर्ग के लक्ष्य को पाने में सफल रहा। हालांकि, यह नतीजा मिला-जुला रहा है, क्योंकि भारत, नेपाल, रूस जैसे कुछ देशों ने जहां उम्मीद से अधिक प्रदर्शन किया, वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देश अपने लक्ष्य नहीं पा सके। वहां बाघों की संख्या कम ही हुई है। माना जा रहा है कि 13 में से तीन देश में बाघ या तो खत्म हो गए हैं या फिर लुप्त होने को हैं। लेकिन बाघ संरक्षण के मामले में भारत की प्रगति उल्लेखनीय मानी जा रही है। यहां हर चार साल पर बाघों की गिनती होती है, और पिछली गिनती में ही (साल 2018) हमने सेंट पीटर्सबर्ग घोषणापत्र का लक्ष्य हासिल कर लिया था।

दुनिया में बाघों की जितनी संख्या है, उसकी 70 फीसदी आबादी भारत में ही बसती है। 2018 की गणना के मुताबिक, भारत में कुल 2,967 बाघ हैं। हम इस लक्ष्य तक इसलिए पहुंच सके, क्योंकि बाघ संरक्षण के प्रयासों को सुनिश्चित किया गया। उनके लिए सुरक्षित आवास और अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई गई। एक समर्पित इकाई राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया गया। हालांकि, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के रूप में यह पहले से काम कर रहा था, लेकिन इसे अधिकृत निकाय बनाया जाना काफी फायदेमंद साबित हुआ। अब बाघ संरक्षण के तमाम काम इसी की निगरानी और नेतृत्व में होते हैं।

बाघ संरक्षण की दिशा में भारत की एक अन्य कोशिश काफी सफल रही, और वह है- टाइगर रिजर्व को विस्तार दिया जाना। साल 1973 में केंद्र सरकार ने नौ टाइगर रिजर्व के गठन के साथ ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत की थी, आज बाघ संरक्षित क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 52 हो गई है। इससे बाघों को अपना प्राकृतिक आवास मिला है। इसमें कोई दोराय नहीं कि इस मामले में हमारे यहां भरपूर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई गई। यहां का शीर्ष नेतृत्व उस सिद्धांत को जीता है, जिससे भारत गुंथा हुआ है, यानी विविधता में एकता। अगर कहीं कोई कड़ी कमजोर जान पड़ी, तो उसे संभालने के लिए पूरा देश एकजुट हुआ। यही कारण रहा कि प्रोजेक्ट टाइगर जैसी परियोजना को हरेक सरकार का पूरा साथ मिला और हमने इसका अच्छा नतीजा प्राप्त किया।

बाघों को बचाने के लिए हमारे यहां तमाम संस्थाओं ने भी हाथ मिलाए। इसके लिए जरूरी संसाधन वक्त-वक्त पर जारी किए जाते रहे। वन विभाग अपने तईं काफी काम कर सकता है, पर यदि संसाधन न मिले, तो उसके काम भी कई तरह की सीमाओं में बंध जाते हैं। अपने यहां बाघ रिहाइशी क्षेत्रों में पेट्रोलिंग के लिए बुनियादी ढांचे का विकास किया गया और कई जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई गईं, जिनसे बाघों की निगरानी आसान हो सकी। स्थानीय समुदायों का भी काफी सहयोग मिला। बिना उनकी मदद के शायद हम बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य नहीं पाते।

इसका यह मतलब नहीं है कि कोई कमी नहीं है। बाघों की संख्या सर्वाधिक होने के कारण भारत पर कई तरह की जिम्मेदारियां हैं। हम दूसरे देशों से अपनी तुलना नहीं कर सकते। कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर हमें विशेष ध्यान देना ही होगा। मसलन, संसाधन के मोर्चे पर अभी और काम करने की आवश्यकता है। चूंकि बाघों की संख्या ज्यादा है, इसलिए उनकी निगरानी के लिए अधिक कर्मचारी और आधुनिक साजो-सामान की जरूरत है। उनका प्राकृतिक वास बना रहे, इसके लिए भी हमें और प्रयास करने होंगे। उनसे संबंधित शोध एवं अनुसंधान भी एक जरूरी क्षेत्र है।

वन्य-जीवों से जुडे़ अपराधों को लेकर हमें अधिक चौकस रहना होगा। दो दिन पहले ही लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने बताया था कि पिछले तीन साल में देश भर में प्राकृतिक और अप्राकृतिक कारणों से 329 बाघों की मौत हुई है। साल 2019 में 96, 2020 में 106 और 2021 में 127 बाघों ने किन्हीं वजहों से अपनी जान गंवाई। हालांकि, अच्छी बात यह है कि बाघों के शिकार में कमी आई है। साल 2019 में जहां 17 बाघ तस्करों की भेंट चढ़े, तो वहीं 2021 में यह संख्या घटकर चार रह गई। जाहिर है, दुनिया भर में बाघ से जुडे़ उत्पादों की मांग होने के बावजूद हमने उनके शिकार को काफी हद तक थाम लिया है। यही वजह है कि पिछले दिनों जब उनकी मौत को लेकर चर्चा गरम हुई थी, तब अप्राकृतिक मौत में कमी आने की बात सामने आई थी। फिर भी, हमें यही कोशिश करनी है कि हमारा एक भी बाघ तस्करों की भेंट न चढ़े। जाहिर है, इसके लिए निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। वन्य-जीवों की तस्करी करने वाले लोगों को कठघरे में खड़ा करने और त्वरित सजा दिलाने की भी दरकार है। इसके साथ-साथ शहरीकरण के विस्तार के कारण बढ़ते मानव-वन्य जीव संघर्ष को भी हमें रोकना होगा। पिछले तीन साल में ही 125 लोग बाघों के शिकार बने हैं।

हमें बाघों के संरक्षण के लिए वैश्विक सहयोग भी बढ़ाना होगा। तस्करों से निपटने के लिए उन देशों से सहयोग लेना होगा, जहां बाघ उत्पादों की भारी मांग है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली संस्थाओं को भी साथ लेने की दरकार है। साफ है, बाघों को बचाना हमारे लिए रोजाना की जंग है, और इसके लिए हमें अनवरत तत्परता दिखानी होगी।