24-05-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


Free Speech Lesson
A Delhi magistrate eloquently explains what freedom of expression means. Cops & courts take note
TOI Editorials

A Delhi court’s four-page bail order should become mandatory reading for police and judicial officers everywhere, especially given these fraught times for free speech. While quickly freeing Ratan Lal, an associate professor of history at Delhi University’s Hindu College, arrested Friday night for a Facebook post on the Gyanvapi mosque controversy, chief metropolitan magistrate Siddhartha Malik gave a fine lesson in what free speech means – that another person’s view may offend you doesn’t mean that person has committed an offence, and a democracy is nothing without a wide diversity of opinion. Extraordinarily, Lal was booked under IPC Section 153A (promoting enmity between different groups on ground of religion) on a complaint lodged by a local lawyer.

Malik noted that with over 130 crore Indians, any issue can have 130 crore different views and that feelings of hurt nursed by an individual cannot be equated with targeting an entire group or community. Significantly, given how the police use these laws, he said determining the presence or absence of intention to create animosity “by words” is a subjective exercise, and perceptions of those who read these words are subjective, too. As Malik explained, he personally found Lal’s post “distasteful” and “unnecessary” as a “proud follower of the Hindu religion”, but others may agree with the professor, and still others may have varying degrees of disagreement. Where’s the criminal offence in any of this?

But dangerously for Indian democracy, cops are not making these distinctions, and seem all too willing to create a crime where none exists. Obviously, there’s the motivation to please political masters, and 153A, 124A (sedition), 295 and 295A (blasphemy) or even UAPA are favourite options here. While a citizen’s right to report a crime is sacrosanct, the police’s job is to do due diligence. The lack of that is effectively making these laws tools of denunciation for partisans against political, and even personal, enemies. As the magistrate said, courts have to “adopt higher standards” before jailing citizens.

Let’s also note that the law in question, 153A, has seen a sharp rise in its use as a blunt instrument. Against 861 cases for investigation in 2015, there were 3,026 cases by 2020. Pendency at the police end spiked from 57% in 2015 to 64% in 2020. Courts completed 66 trials in 2015 with a low 13% conviction rate. Comparative figures for 2020 were 186 completed trials and 20% conviction. Such a record demands police officers exercising far greater circumspection before filing cases and, if they don’t, judicial officers ensuring that bails are granted without delay.


Make the ‘Indo’ Yield Extra in Indo-Pacific
ET Editorials

The launch of the Indo-Pacific Economic Framework (IPEF) in Tokyo on the eve of the Quad summit is an effort to systemically establish an open, rules-based partnership for economic growth that is a prerequisite for geopolitical sure-footedness. Conceived by the Joe Biden administration, it provides an alternative to China’s commercial clout in the region. For India, this is an opportunity to build its capacities, focus on strengthening its role in global supply chains and bringing prosperity to its own backyard.

The 13-member IPEF aims to foster innovation that will drive economic transformation, particularly in clean energy, digital and technology sectors. Its role is still sketchy. But what it is not is a tariffs-based trade deal. Instead, its aim is to find common creative solutions to the region’s economic challenges. The benefits of belonging to a grouping that is purportedly ‘writing new rules for the 21st century’ for an economy on the cusp — and trying to dodge the ‘middleincome trap’ — such as India is compelling. Though not a traditional free trade deal focused on tariff rationalisation and reductions, high standard rules and standards will set India the right, global standards.

Narendra Modi emphasised three Ts — trust, transparency, timeliness — crucial to the IPEF project. Alliteration must now translate into action. Facilitating ‘China Plus One’ is, indeed, a raison d’être for the group. But Biden’s first presidential trip to Asia also underlined that IPEF was not a remixed version of the Trans-Pacific Partnership (TPP) that his predecessor pulled out of for domestic pushbacks. For India, the inclusion of ‘Indo’ in ‘Indo-Pacific’ should be made to yield extra, so as to translate into much more than a label change.


सामरिक सक्रियता बढ़ाए क्वाड
श्रीराम चौलिया, ( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं )

टोक्यो में आयोजित क्वाड देशों का तीसरा शिखर सम्मेलन विश्व व्यवस्था के निर्धारण में हिंद-प्रशांत की केंद्रीय भूमिका की पुष्टि का प्रतीक है। इस समय रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अंतररराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पूर्वी यूरोप पर टिका हुआ है। ऐसी स्थिति में क्वाड के चारों देशों भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के राष्ट्र प्रमुखों का जापान में बैठक करना और एशिया के भविष्य की रूपरेखा पर रणनीति बनाना यही संकेत करता है कि एशिया में शक्ति संतुलन ही अंतत: वैश्विक भू-राजनीति एवं भू-अर्थनीति में निर्णायक सिद्ध होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति यही रही कि दुनिया के तीन प्रमुख क्षेत्रों में किसी भी प्रतिद्वंद्वी को हावी नहीं होने देना है। ये प्रमुख क्षेत्र रहे यूरोप, पश्चिम एशिया और पूर्वी एशिया। इसके पीछे अमेरिका का यह सोच रहा कि इनमें से कहीं भी अगर शक्ति संतुलन अमेरिका के विपरीत गया तो उसके लिए वैश्विक महाशक्ति बने रह पाना संभव नहीं होगा। बाइडन प्रशासन द्वारा 2021 में जारी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सामरिक मार्गदर्शन’ में यही दोहराया गया है। उससे यही स्पष्ट होता है कि अमेरिकी सुरक्षा के लिए दुनिया के प्रमुख क्षेत्रों पर विरोधियों का वर्चस्व रोकना होगा।

पश्चिम एशिया और यूरोप में कोई ऐसी शक्ति नहीं जो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे सके। ईरान और रूस जैसे देश अमेरिका को परेशान करते आए हैं, लेकिन उनमें उतना आर्थिक एवं सैन्य बल नहीं, जिससे वे अमेरिका को मात दे सकें। केवल पूर्वी एशिया में स्थित चीन ही अमेरिका को चुनौती देने में सक्षम दिखाई पड़ता है और वह इसके कमर भी कस रहा है। अमेरिका भी इससे भलीभांति अवगत है। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र ही इक्कीसवीं सदी के भविष्य को परिभाषित करेगा और अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन इस मामले में अमेरिकी नेतृत्व एवं भागीदारी को लेकर प्रतिबद्ध हैं। उल्लेखनीय है कि क्वाड के साथ ही अमेरिका एक और महत्वाकांक्षी पहल कर रहा है। इसे ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक ढांचा’ नाम दिया गया है। इसमें अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस फ्रेमवर्क के उद्घाटन पर उपस्थित होना दर्शाता है कि भारत इसके सामरिक लाभ को समझता है। आपूर्ति श्रृंखला को लचीला बनाना, 5जी तकनीक का सुरक्षित एवं भरोसेमंद विकास, उच्च गुणवत्ता वाला बुनियादी ढांचा और स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन आदि इस गठजोड़ के प्रमुख उद्देश्य बताए जा रहे हैं। सुलिवन ने डंके की चोट पर कहा कि इसकी धमक बीजिंग तक सुनाई पड़ेगी। इसमें चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना को टक्कर देने की पूरी संभावना है। यह क्वाड प्लस के रूप में उसका औपचारिक विस्तार तो नहीं, किंतु अनौपचारिक तरीके से आकार लेने वाले इस ढांचे में चीन की काट करने की क्षमता जरूर है।

क्वाड के चार मूल सदस्य ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बहुआयामी क्षमता रखते हैं। ऐसे में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस इकोनमिक फ्रेमवर्क का साझा नेतृत्व करना होगा। ये चारों देश पहले ही इन्फ्रास्ट्रक्चर, वैक्सीन, आपूर्ति शृंखला, सामरिक साझेदारी और सेमीकंडक्टर आदि क्षेत्रों में समझौते कर चुके हैं और उनमें से कुछ पर काम भी शुरू हो चुका है। ऐसे में साझेदारी के इस दायरे को बढ़ाना और नए सहयोगियों को उसमें जोड़ना ही बुद्धिमत्ता होगी। अमूमन यही माना जाता है कि जिन अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचों में अधिक हितधारक होते हैं, वहां समन्वय, सहमति बनाकर अपेक्षित कार्य को शीघ्रता से संपादित करना संभव नहीं होता। इसलिए इस फ्रेमवर्क में विभिन्न पक्षों को देखते हुए उसकी कार्यसंस्कृति को बेहतर बनाने के उपाय करने होंगे। बाइडन प्रशासन कहता आ रहा है कि उसका लक्ष्य यह सिद्ध करना है कि ‘लोकतांत्रिक देश वादों और अपेक्षाओं पर खरे उतर सकते हैं और तानाशाही वाले देशों से बेहतर प्रदर्शन दिखा सकते हैं।’ क्वाड सदस्य इसे तभी चरितार्थ कर पाएंगे जब वे मिलकर एशिया के चुनिंदा संकटग्रस्त देशों को संभाल सकें। रूस-यूक्रेन संकट से क्वाड का बहुत सरोकार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी पिछले कुछ अवसरों पर कह भी चुके हैं कि हमें ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने मूल उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।’

इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि कोविड महामारी के बाद यूक्रेन युद्ध के झटके से न केवल आर्थिक रिकवरी की राह बाधित हुई है, बल्कि दुनिया के तमाम देश खाद्य एवं ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। कई देशों में स्थितियां विस्फोटक हो चली हैं। श्रीलंका इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। पाकिस्तान, कजाखस्तान से लेकर म्यांमार और नेपाल तक की हालत नाजुक बनी हुई है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कुछ देशों में भी इसी प्रकार का जोखिम कायम है। ऐसे में यदि क्वाड देश मिलकर कुछ देशों का भला करें और उन्हें चीनी चंगुल से मुक्ति दिला सकें तो यह एक मिसाल कायम करने वाली जीत होगी। याद रहे कि चीन का दुष्प्रभाव केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामरिक भी है।

एक ‘खुला एवं स्वतंत्र हिंद-प्रशांत’ क्षेत्र ही क्वाड का मूलमंत्र है। ऐसे में चारों सदस्यों की सैन्य सक्रियता में बढ़ोतरी स्वाभाविक है। टोक्यो शिखर वार्ता के पूर्व ही चीन ने अमेरिका और जापान पर ताइवान के मामले में दखलंदाजी का आरोप लगाया है। इतना ही नहीं उसने क्वाड को एक प्रकार से नाटो का एशियाई विस्तार करार दिया है। वहीं बाइडन ने भी यह कहकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं कि यदि चीन ताइवान पर हमला करेगा तो अमेरिका ताइवान का सैन्य संरक्षण करेगा। फिर भी बड़ा सवाल यही है कि क्या क्वाड ताइवान और छोटे दक्षिण एशियाई देशों की रक्षा के लिए कोई कारगर कवच बना सकेगा? शिखर बैठकों में चीन के सैन्य विस्तारवाद की निंदा करना ही काफी नहीं है। न ही कोई आर्थिक पहल हिंद-प्रशांत को चीनी खतरे से बचाने के लिए पर्याप्त होगी। किसी सैन्य घटक के बिना क्वाड हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने में असमर्थ होगा। जो वित्तीय उदारता और सैन्य सहायता अमेरिका यूक्रेन की रक्षा के नाम पर दे रहा है, उससे कई गुना अधिक निवेश उसे क्वाड के साथ एकजुट होकर हिंद-प्रशांत की रक्षा के लिए करना होगा। अन्यथा चीन सबको पछाड़ देगा और हम सब हाथ मलते ही रह जाएंगे।


क्रांतिकारी बदलाव से बदलेगी तस्वीर
प्रमोद भार्गव

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि अब देश में डिजिटल तरीके से ऑनलाइन जनगणना होगी, जिसके आंकड़े शत-प्रतिशत सही होंगे। डिजिटल तरीके से की गई जनगणना के आधार पर अगले 25 सालों की नीति निर्धारित करने में मदद मिलेगी। ई-बाजार,ई-आवेदन,ई-रेल व बस में आरक्षण,ई-भुगतान के बाद अब ई-जनगणना की भी देश में शुभ शुरु आत होने जा रही है। इसमें जन्म और मृत्यु दोनों डिजिटल जनगणना से जुड़े होंगे।

यह क्रांतिकारी बदलाव 2024 से प्रत्येक जन्म और मृत्यु की जानकारी ऑनलाइन जनगणना की सुविधा प्राप्त होने के साथ ही आरंभ हो जाएगी। जनगणना-2021 में नागरिकों को गणना में शामिल होने की एक बेहतर और अनूठी आनलाइन सुविधा दी गई है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने भारतीय नागरिकों को ऑनलाइन स्व-गणना का अधिकार देने के लिए नियमों में परिवर्तन किए हैं। जनगणना (संशोधन)-2022 के अनुसार परंपरागत तरीके से तो जनगणना घर-घर जाकर सरकारी कर्मचारी करेंगे ही, लेकिन अब नागरिक स्व-गणना के माध्यम से भी अनुसूची प्रारूप भर सकता है। याद रहे यह जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन कोरोना महामारी के चलते संभव नहीं हो पाई। अब इस आनलाइन गणना के साथ आगे बढ़ाने की पहल की जा रही है, जिससे भारतीय नागरिकों की गिनती जल्द से जल्द तो होगी ही सटीक भी होगी।

इसमें कोई दो राय नहीं कि आनलाइन प्रयोग अद्वितीय हैं, लेकिन देश की जनता के स्थायी और निंरतर गतिशील पंजीकरण के दृष्टिगत जरूरी था कि ग्राम पंचायत स्तर पर जनगणना की जवाबदेही सौंप दी जाए। गिनती के विकेन्द्रीकरण का यह नवाचार जहां 10 साला जनगणना की बोझिल परंपरा से मुक्त होगा, वहीं देश के पास प्रतिमाह प्रत्येक पंचायत स्तर से जीवन और मृत्यु की गणना के सटीक व विसनीय आंकड़े मिलते रहेंगे। यह तरकीब अपनाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि तेज भागती यांत्रिक व कंप्यूटरीकृत जिदंगी में सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक बदलाव के लिए सर्वमान्य जनसंख्या के आकार व संरचना का दस साल तक इंतजार नहीं किया जा सकता? वैसे भी भारतीय समाज में जिस तेजी से लैंगिक, रोजगारमूलक और जीवन स्तर मे विषमता बढ़ रही है, उसकी बराबरी के प्रयासों के लिए भी जरूरी है कि हम जनगणना की परांपरा में आमूलचूल परिवर्तन लाएं? जनसंख्या के आकार, लिंग और उसकी आयु के अनुसार उसकी जटिल संरचना का कुछ ज्ञान न हो तो आमतौर पर अर्थव्यवस्था के विकास की कालांतर में प्रगति, आमदनी में वृद्धि, खाद्य पदाथरे व पेयजल की उपलब्धता, आवास, परिवहन, संचार, रोजगार के संसाधन, शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा के पर्याप्त उपायों के इजाफे के पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है। भारत की जनसंख्या 1901 में 23,83,96,327 थी। आजादी के साल 1947 में यह आबादी 34.2 करोड़ हो गई थी। 1947 से 1981 के बीच भारतीय आबादी की दर में ढाई गुना वृद्धि दर्ज की गई और आबादी 68.4 करोड़ हो गई थी। जनसंख्या वृद्धि दर का आकलन करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में प्रति वर्ष एक करोड़ 60 लाख आबादी बढ़ जाती हैं। इस दर के अनुसार हमें अपने देश की करीब एक अरब 30 करोड़ लोगों की एक निश्चित जनसंख्या प्रारूप में गिनती करनी है, ताकि व्यक्तियों और संसाधनों के समतुल्य आर्थिक व रोजगारमूलक विकास का खाका खींचा जा सके। जनसंख्या का यह आंकड़ा अज्ञात भविष्य के विकास की कसौटी पर खरा उतरे उसका मूलाधार वैज्ञानिक तरीके से की गई सटीक जनगणना ही है। हरेक दस साल में की जाने वाली जनता-जनार्दन की गिनती में करीब 20 लाख कर्मचारी जुटते हैं। छह लाख ग्रामों, पांच हजार कस्बों, सैकड़ों नगरों और दर्जनों महानगरों के रहवासियों के द्वार-द्वार दस्तक देकर जनगणना का कार्य करना कर्मचारियों के लिए जटिल होता है। यह काम तब और बोझिल हो जाता है जब किसी कर्मचारी-दल को उसके स्थानीय दैनंदिन कार्य से दूर कर उसे दूर गांव में भेज दिया जाता है। ऐसी हालात में गिनती की जल्दबाजी में वे मानव समूह छूट जाते हैं, जो आजीविका के लिए मूल निवास स्थल से पलायन कर जाते हैं। इसलिए जरूरी था कि जनगणना की प्रक्रिया के वर्तमान स्वरूप को बदलकर एक ऐसे स्वरूप में तब्दील किया जाए, जिससे इसकी गिनती में निरंतरता बनी रहे।

इसके लिए न भारी भरकम संस्थागत ढांचे की जरूरत है और न ही सरकारी अमले की। केवल गिनती की केंद्रीयकृत जटिल पद्धति को विकेंद्रीकृत करके सरल करना है। गिनती की यह तरकीब ऊपर से शुरू न होकर नीचे से शुरू होगी। देश की सबसे छोटी राजनीतिक व प्रशासनिक इकाई ग्राम पंचायत है। जिसका त्रिस्तरीय ढांचा विकास खंड व जिला स्तर तक है। हमें करना सिर्फ इतना है कि तीन प्रतियों में एक जनसंख्या पंजी पंचायत कार्यालय में रखनी है। इसी पंजी की प्रतिलिपि कंप्यूटर में फीड जनसंख्या प्रारूप पर भी दर्ज हो। इस गिनती में जितनी पारदर्शिता और शुद्धता रहेगी उतनी किसी अन्य पद्धति से संभव ही नहीं है। बहरहाल ई-जनगणना कराने का निर्णय एक दूरदर्शी पहल है।


टोक्यो में प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा वैश्विक कूटनीति के अलावा क्वाड में शामिल देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है। भारत-अमेरिका-जापान और ऑस्ट्रेलिया के शासनाध्यक्षों की टोक्यो में आज हो रही बैठक क्या अहमियत रखती है, बीजिंग की तिलमिलाहट इसे बताने के लिए काफी है। यह छिपी हुई बात नहीं है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व आर्थिकी में महत्वपूर्ण हैसियत रखता है और बीजिंग यहां अपना दबदबा कायम करने में जुटा है। ‘बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव’ के पीछे की उसकी मंशा को पश्चिम के साथ-साथ भारत भी बखूबी समझता है और इसीलिए उसने इससे दूरी बनाए रखी। फिर भारत उसकी प्रच्छन्न ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल’ नीति से भी अनभिज्ञ नहीं है, जिसके तहत वह पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा, बांग्लादेश में चिटगांव बंदरगाहों के विकास की आड़ में भारत को घेरने में जुटा है। ऐसे में, राष्ट्रपति जो बाइडन का इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी आर्थिक पहल की घोषणा स्वागतयोग्य है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने ‘इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क’ के जरिये उभरती आर्थिक चुनौतियों के मुकाबले का जो इरादा जताया है, उसमें सुरक्षित और लचीली आपूर्ति शृंखला बनाने की बात काफी अहम है। इस समय दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को इस मोर्चे पर भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अनेक चीजों की आपूर्ति काफी प्रभावित हुई है और संसार भर में बढ़ती महंगाई के पीछे यह भी एक बड़ी वजह है। प्रधानमंत्री मोदी ने संकेत दिया भी है कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति से इन तमाम बिंदुओं पर बातचीत करेंगे। भारत व अमेरिका, दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। इनके हितों की साझीदारी न सिर्फ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए, बल्कि लोकतंत्रों की मजबूती के लिए भी जरूरी है। पर यूक्रेन युद्ध के बाद वाशिंगटन का रवैया कई बार नागवार गुजरा था। आशा है, राष्ट्रपति बाइडन के साथ प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत में दोनों देश एक-दूसरे की अपेक्षाओं को समझ सकेंगे।

जापान ने अगले पांच वर्षों में भारत में बडे़ निवेश की घोषणा कर रखी है। प्रधानमंत्री की वहां करीब तीन दर्जन कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से मुलाकात का कदम इस लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल, जिस तरह से जापान की जनसांख्यिकी में असंतुलन पैदा हो रहा है, आने वाले दिनों में उसे भारी मानव संसाधन की जरूरत पड़ेगी, तो वहीं भारत को अपनी विकास योजनाओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है। ये दोनों देश एक-दूसरे की जरूरतें पूरी कर सकते हैं। जापान में भारतीय समुदाय के लोगों ने अपनी कर्मठता से अमिट छाप छोड़ी है। हिंद प्रशांत क्षेत्र में इन दोनों देशों को चीन से चुनौती मिल सकती है। चूंकि विश्व-व्यापार का 75 फीसदी आयात-निर्यात इसी रास्ते से होता है, इसलिए अमेरिका भी की दिलचस्पी किसी सूरत बीजिंग को रोकने में है। एक बड़ा बाजार होने के नाते भारत को इस स्थिति का पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए। बीजिंग को यह समझना ही होगा कि भारतीय सीमाओं पर दबाव बनाने की रणनीति के सहारे वह कुछ भी हासिल नहीं कर सकता। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था अपने हितों से किसी किस्म का समझौता नहीं करने वाली। प्रधानमंत्री मोदी ने टोक्यो से जो संदेश दिया है, यकीनन बीजिंग को उसमें दृढ़ता दिखी होगी। इसलिए उसे क्वाड से चिढ़ने के बजाय अपनी नीतियों पर गौर करना चाहिए।