(23-11-2021) समाचारपत्रों-के-संपादक


The Challenge of Climate Adaptation
ET Editorials

Adaptation, a critical pillar of the response to climate change, often treated as a ‘local’ issue, received some belated attention at COP26 at Glasgow. The launch of a two-year work programme towards setting a global goal for adaptation is welcome.

The scale of the problem is huge. At1.1° C warming above preindustrial levels, climate impacts — floods, cyclones, droughts, excessive rains and extreme heat — have become routine. Adapting to these will require changes across sectors, going beyond early warning systems. Cropping decisions will have to change, identifying the best crops to grow given climate change impacts and measures to encourage the shift, in the energy and material use. Design regulations for buildings and housing must change, to build in resilience. Adapting to impacts of climate change must be mainstreamed into policy and planning. In its budgetary allocation, central and state governments must account for cost of adaptation. Government should leverage public funds to drive private money into research and development of solutions and products that can help communities, particularly the poor and marginalised, to adapt to the changes wrought by climate change.

The UN warns that annual costs of adaptation in developing countries could be at $280-500 billion by 2050. At Glasgow, developed countries were urged to double climate finance for adaptation to some $40 billion by 2025, 75% of climate finance going to mitigation. That is not enough; India should play a leadership role — leveraging its satellite capacities to help small island States, announced at COP26, must be a beginning. India can provide low-cost solutions and policy design leveraging local communities for domestic use and vulnerable developing countries.


Clamping down on creativity
In Tamil Nadu, little has been done by leaders to uphold an artist’s creative liberties
D. Suresh Kumar

In Tamil Nadu, where cinema serves as a medium for social and political propaganda, Kollywood has not been spared from periodic attacks by politicians and sociocultural groups. A controversy has engulfed Jai Bhim, which has grabbed attention worldwide by racing to the top of the IMDb ratings, displacing the 1994 Hollywood classic The Shawshank Redemption. Hailed for its gripping but fictionalised portrayal of a real incident of police brutality, it has riled up certain political, caste and right-wing outfits. They have accused it of “deliberate and wrong” portrayal of the Vanniyars, a dominant Most Backward Class community, and ‘Hinduisation’ of the film’s villain. Except for some principal characters, the names of others involved in the true incident were fictionalised in the film, which the critics have seized upon to fire salvos.

Firing salvos

The Vanniyar Sangam and its political off-shoot, the Pattali Makkal Katchi (PMK), were upset over a 1995 dated calendar hung on the wall of the house of ‘Gurumurthy’, the villainous police officer. The calendar had an image of the ‘Agni Kundam’ (fire pot), a symbol used by their community. As soon as this was flagged, the film-makers replaced it with an image of a Hindu deity. But the issue rages on. PMK leader Anbumani Ramadoss and Vanniyar Sangam president Pu Tha Arulmozhi contend that the villain was purposely named Gurumurthy to denote ‘Kaduvetti’ J. Guru, a late Vanniyar leader. Some BJP leaders and their affiliates latched on, claiming that the police officer, whose real name was Anthonysamy, “a Christian”, was intentionally given a Hindu name to depict Hinduism in poor light. So, a narrative that started off as an affront to one Hindu community has since then sought to be elevated as a pan-Hindu one.

Actor and co-producer Suriya Sivakumar and director T.J. Gnanavel have insisted that none of the scenes/names were intentional. The actor refused to tender an apology, despite threats. Instead, he urged Dr. Ramadoss to recognise the importance of protecting the freedom of expression and steer clear of “name-politics”. Incidentally, Mr. Suriya, a philanthropist for educational causes, is among the few Kollywood personalities to have openly voiced opinions against certain central government policies.

This is not an isolated case. While past Chief Ministers, who came from the cine world, pampered Kollywood, they did little to uphold an artist’s creative liberties. In 1987, following agitations, the state objected to the release of Ore Oru Gramathile, which advocated for reservations solely based on economic criteria. The Supreme Court, which cleared the film, noted: “Freedom of expression which is legitimate and constitutionally protected, cannot be held to ransom, by an intolerant group of people… We must practise tolerance to the views of others. Intolerance is as much dangerous to democracy as to the person himself.” Though the Court made it clear that it is a State’s duty to prevent any attempt to muzzle freedom of expression, many films ran into trouble subsequently. In 2006, during the DMK regime, the Hollywood film Da Vinci Code was banned following objections from Christian groups. (The ban was set aside by the Madras High Court.) In 2013, Chief Minister Jayalalithaa not only banned Viswaroopam following protests from Muslim outfits but justified it citing inadequate police manpower to provide security to theatres. It would not be out of place to recall what Justice Prabha Sridevan said in the Da Vinci Code case: “Such threats to freedom of artistic expression… [are] not healthy; to echo Justice Brandeis, this trend will rock the stability of the State.”



कुपोषण से पहले भुखमरी पर तत्काल योजना बनाना इसलिए जरूरी

लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों के पलायन के बाद सरकार ने उनकी मैपिंग के लिए उनके मूल राज्य, जाति, पेशा और अन्य ब्योरे के लिए एक पोर्टल शुरू किया, जिसमें अब तक 7.86 करोड़ मजदूरों ने रजिस्ट्रेशन किया है। इनमें से सामान्य वर्ग, पिछड़ी जातियों, एससी और एसटी के क्रमशः 27.4, 40.5, 23.7 और 8.3% मजदूर हैं। आबादी में इनका प्रतिशत क्रमशः 34, 40.9, 16.2 और 8.2% है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से सबसे ज्यादा 53.6% खेत-मजदूर हैं, जबकि 12.2% निर्माण-कार्य से जुड़े मजदूर हैं। 8.71% घरेलू मजदूर हैं। पोर्टल में यह जानकारी भी मिली कि खेत-मजदूरों का एक बड़ा वर्ग खेती के सीजन के बाद शहरों में कमाने चला जाता है। बहरहाल इनमें से 92% की आय दस हजार रुपए महीने से कम है। इन आंकड़ों से एक बात साफ़ है कि संविधान में समानता का अधिकार देने, आरक्षण की व्यवस्था और 70 साल से अधिक की आजादी भी दबे- कुचले वर्ग को ऊपर नहीं ला पाई है। आज भी एक बड़ा वर्ग खेत-मजदूर होकर अभाव का जीवन जीने को मजबूर है। असंगठित क्षेत्र में होने के कारण आपदा के समय ये सबसे अधिक शिकार होता है। जैसे कोरोना-जनित लॉकडाउन में। यहां तक कि पर्यावारण प्रदूषण से मौसम में आ रहे बदवाल के कारण बढ़ रही बाढ़ या सूखे की स्थिति भी इन्हीं लोग को आजीविका से वंचित कर रही है। समुद्र का तापमान बढ़ रहा है तो मछलियां तट छोड़ कर गहरे पानी में जा रही हैं। समुद्री तूफ़ानों की संख्या भी डेढ़ गुना बढ़ गई है। लिहाजा बंगाल, केरल, तमिलनाडु और ओडिशा के मछुवारों को अपना घर-बार छोड़ना पड़ रहा है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि कुपोषण से पहले भुखमरी पर तत्काल योजना बना कर कोर्ट को सूचित करें। कोर्ट का मानना है कि जगह-जगह मुफ्त सामुदायिक किचन शुरू करना कल्याणकारी राज्य का दायित्व है।


हरियाणा के लिए अब तक अहम रहा गुरुग्राम क्या आगे भी देगा योगदान?
कनिका दत्ता

गुड़गांव का नाम बदलकर गुरुग्राम रखे जाने के बहुत पहले से वह हरियाणा के जीडीपी में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता आया है और ऐसा लगता नहीं कि नए कानून की अधिसूचना जारी होने के बाद वहां से कारोबार बड़े पैमाने पर बाहर जा सकते हैं। नए कानून के मुताबिक अगले वर्ष 15 जनवरी से निजी उद्यमों में 75 फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार देना होगा लेकिन यह कानून उन नए कर्मचारियों पर ही लागू होगा जिनकी आय 30,000 रुपये तक होगी और जो कम से कम पांच वर्षों से प्रदेश में रह रहे होंगे। परंतु हमारे सामने कोलकाता (पुराना कलकत्ता) के रूप में एक उदाहरण मौजूद है कि कैसे पूंजी का अंधाधुंध बहिर्गमन एक जीवंत शहर को प्रभावित कर सकता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि आगे चलकर कहीं गुरुग्राम उसी परिणति को न प्राप्त हो।

आक्रामक श्रम नीतियों ने पश्चिम बंगाल में पूंजी के लिए पहले से असुरक्षित माहौल को और घना कर दिया तथा कारोबारी समुदाय को दूसरी जगहों का रुख करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके साथ ही वह बहुसांस्कृतिक विविधता भी चली गई जिसे आजकल सोशल मीडिया पर बहुत चाव से याद किया जाता है। नए भर्ती कानून के रूप में श्रम नीतियां गुड़गांव से भी पूंजी के वैसे ही पलायन को जन्म दे सकती हैं।

उदारीकरण के बाद के तमाम बुरे विरोधाभासों के बावजूद हरियाणा का यह क्षेत्र फलता-फूलता रहा। यह राजधानी नहीं है लेकिन राज्य का प्रमुख शहर है और उसके राजस्व में बहुत अधिक योगदान करता है। राष्ट्रीय राजधानी से इसकी करीबी और डीएलएफ के चलते अचल संपत्ति में विस्तार ने इसे स्वत: ही एक महानगर का स्वरूप दे दिया है। यहां बिना पावर ऑफ अटार्नी की जटिल राह अपनाए अच्छे आकार की संपत्ति हासिल की जा सकती है। दरें भी नई दिल्ली की तरह आसमान नहीं छूती हैं। यही वजह है कि विदेशी कंपनियों ने अपने बैक ऑफिस और आईटी सक्षम सेवा केंद्र यहां स्थापित किए हैं और सुदूर विदेशों में सेवाएं दे रहे हैं। इसके साथ ही यहां अफरातफरी भरे शहरी विकास की शुरुआत हुई।

नोएडा जैसे सुनियोजित रूप से विकसित इलाके के उलट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का यह सिरा नए भारत की अतिरंजनाओं को दर्शाता है। सिंगापुर की तरह कांच और कंक्रीट के ढांचे सड़क पर उग आए हैं जिन पर गुड़गांव की ग्रामीण स्थिति की छाया देखी जा सकती है। ग्रिड आधारित बिजली की आपूर्ति में इतनी दिक्कत है कि कोई बड़ी कंपनी बिना जनरेटर के काम नहीं कर सकती। सार्वजनिक सुरक्षा की अनुपस्थिति के चलते गेट वाले आवासीय परिसरों की भरमार हो गई है जिनमें काम करने के लिए इनके बाहर स्थित बस्तियों से लोग आते हैं।

गुड़गांव वह जगह है जो भारत और दुनिया भर के बड़े नामों को अपनी ओर आकर्षित करता है। देश के किसी भी अन्य शहर की तुलना में प्रति वर्ग किलोमीटर विदेशी उपस्थिति यहां ज्यादा है। ऐसा कारोबारी और रिहाइशी दोनों क्षेत्रों में हो रहा है। देश भर के प्रवासी श्रमिक काम की तलाश में यहां आते हैं और इस जगह की विविधता में इजाफा करते हैं। इसका असर वस्तुओं और सेवाओं पर भी देखने को मिला। महंगे रेस्तरां पहले दिल्ली में खुलते और फिर गुड़गांव में अपनी शाखाएं खोलते। अब यह सिलसिला उलट गया है।

आज साइबर सिटी की इमारतें कर्मचारियों की अनुपस्थिति से सन्नाटे में हैं क्योंकि कर्मचारी अभी भी घरों से काम कर रहे हैं। मॉल भीड़ आकर्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और ऊंचे-ऊंचे टावर खाली खड़े हैं तो ऐसी स्थिति में राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए रोजगार बहाल करना और मांग में इजाफा करना। इसके बावजूद दो माह पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दावा किया था कि उनके राज्य में बेरोजगारी की समस्या नहीं है। सीएमआईई ने अपने आंकड़ों में बताया था कि राज्य में 35.7 फीसदी बेरोजगारी है। खट्टर ने दावा किया कि सही आंकड़ा 9 फीसदी है। अगर उनके मुताबिक यह मान लिया जाए कि ज्यादातर युवाओं ने बेहतर रोजगार की तलाश में रोजगार एक्सचेंज पर नामांकन कराया है, तो शायद यह आंकड़ा कम होकर 4-5 फीसदी रह जाएगा।

यदि रोजगार की कोई समस्या ही नहीं है तो निजी क्षेत्र पर श्रमिकों की भर्ती को लेकर आरक्षण थोपना अनावश्यक है। यदि इसका लक्ष्य जाट युवा हैं जो सरकारी नौकरी पाने के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण मांग रहे हें, तो यह बात और भी बेतुकी साबित होती है। इन युवाओं में अनेक पहले खेती से जुड़े थे लेकिन खेती का रकबा कम होने के कारण वहां प्रतिफल कम हो गया है और वे कारखानों में या लिपिकीय काम नहीं करना चाहते। इसके बावजूद राज्य में स्थापित होने वाले किसी भी नए उपक्रम को या यहां अपना विस्तार करने वाले उपक्रम को इन कामों के लिए युवाओं की तलाश में समय गंवाना होगा या सरकारी निरीक्षक को यह यकीन दिलाना होगा कि उन्हें अपने काम के लिए स्थानीय युवा नहीं मिल रहे हैं। जब गुड़गांव का कमजोर बुनियादी ढांचा सामने आएगा तो दिल्ली और नोएडा स्वाभाविक रूप से आकर्षक विकल्प के रूप में सामने आएंगे। इससे भी बुरी बात यह है कि जब नई नीति स्थानीय रोजगार पर खास प्रभाव नहीं डाल पाएगी तो उस तरह के दंगों के लिए भी तैयार रहना होगा जिनके चलते पिछले वर्षों में मुंबई और बेंगलूरु से लोगों को पलायन करना पड़ा था।

गुड़गांव अतीत में राज्य सरकार के नीतिगत विध्वंस का शिकार रहा है। सन 1990 के दशक के अंत में शराबबंदी के कारण राज्य को राजस्व का भारी नुकसान हुआ और तत्कालीन सरकार तक गिर गई। एक मुख्यमंत्री ने गुड़गांव के राजस्व को अपने क्षेत्र के लिए इस्तेमाल किया और इसकी कीमत शहर की अधोसंरचना को चुकानी पड़ी। हालांकि इन बातों ने कारोबारी गतिविधियों पर कोई असर नहीं डाला। परंतु अब निजी क्षेत्र की नियुक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास नुकसानदेह साबित हो सकता है। संभव है कोलकाता/कलकत्ता की तरह गुरुग्राम/गुड़गांव को भी इसका असर महसूस करने में एक दशक का वक्त लगे।


एमएसपी का मुद्दा

लखनऊ की महापंचायत में किसान संगठनों ने अपनी मांगों को दोहरा कर स्पष्ट संदेश दे दिया है कि जब तक सभी मांगें नहीं मान ली जातीं, तब तक आंदोलन खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता। अभी तक माना जा रहा था कि तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने के सरकार के फैसले के बाद किसान धरना-प्रदर्शन खत्म कर देंगे। पर किसान जिन मांगों को लेकर अड़े हैं, उससे सरकार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। कृषि कानूनों की वापसी के अलावा किसानों की बड़ी मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर कानून बनाने की है। किसानों की यह मांग कम जटिल मुद्दा नहीं है। अगर मामला आसान होता तो तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा के साथ ही सरकार एमएसपी पर भी कोई फैसला कर सकती थी। इससे समझा जा सकता है कि एमएसपी को लेकर सरकार कितनी दुविधा में होगी। दरअसल, एमएसपी का मसला ऐसा है जिस पर कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्रियों के बीच भी आमराय आसानी से नहीं बनती दिखती। जहां एक वर्ग का मानना है कि एमएसपी कानून बनने से ही छोटे किसानों को उपज का लाभ मिल पाएगा, वहीं ऐसा नहीं मानने वाला वर्ग कहीं ज्यादा बड़ा है। जाहिर है, एमएसपी का मुद्दा आसानी से नहीं हल नहीं होने वाला।

सवाल है ऐसे में हो क्या? बिना समाधान निकाले तो आगे बढ़ पाना संभव नहीं होगा। सरकार के सामने व्यावहारिक समस्या यह है कि अगर एमएसपी कानून बन गया तो उसके लिए किसानों की उपज खरीदने की मजबूरी हो जाएगी। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि एमएसपी कानून बन जाने के बाद अगर सरकार ने व्यापारियों को तय दाम पर उपज खरीदने के लिए मजबूर किया तो व्यापारी कम दाम पर आयात करने जैसा कदम उठा सकते हैं। संकट यही है कि जब सरकार पूरी उपज खरीद नहीं सकती, व्यापारी निर्धारित एमएसपी पर उपज खरीदने से बचेंगे, तो किसान करेगा क्या? हालांकि एमएसपी की व्यवस्था देश में छठे दशक के दौरान खाद्यान्न संकट के दौरान शुरू की गई थी, ताकि सरकार किसानों से उपज खरीदे और भंडार भरे। यह किसानों के हित के लिए ही किया गया था। पर आज सरकारी गोदाम गेहूं, चावल आदि से अटे पड़े होने का दावा किया जा रहा है। बात यहीं खत्म नहीं होती। विश्व व्यापार संगठन खाद्यान्न खरीद पर सबसिडी का विरोध करता रहा है। ऐसे में अगर सबसिडी बढ़ती रही तो निर्यात का संकट खड़ा हो जाएगा। कहा यह भी जाता रहा है कि एमएसपी से छोटे और सीमांत किसानों को कोई लाभ नहीं होता है, सिर्फ पांच-छह फीसद बड़े किसान ही इसका फायदा उठाते हैं। इससे तो एमएसपी व्यवस्था की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़ा हो जाता है।

इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा कि किसानों को उपज का पूरा दाम मिलना चाहिए। अगर मौजूदा व्यवस्था से समाधान नहीं निकल रहा है तो इसके लिए नए उपायों पर विचार किया जाना चाहिए। एमएसपी संकट का हल तो कृषि विशेषज्ञों, कृषि अर्थशास्त्रियों और किसान संगठनों के नुमाइंदों की समिति को ही खोजना होगा। प्रधानमंत्री इस मसले पर समिति बनाने की बात कह चुके हैं। दरअसल, पूरी दुनिया में कृषि और कृषि बाजार का स्वरूप बदल रहा है। हम बाजार आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में वक्त के साथ बदलने की जरूरत है। सबसे बड़ी बात तो यही कि जो भी कदम उठाए जाएं, वे मुट्ठीभर किसानों के हितों के लिए नहीं हो, बल्कि अस्सी फीसद से ज्यादा छोटे और मझोले किसानों के हितों को पूरा करने वाले हों।



कालेधन की समस्या
जयंतीलाल भंडारी

कर के लिहाज से जन्नत माने जाने वाले देशों में कालाधन जमा करने का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि कालेधन पर काबू पाने के लिए दुनिया भर में वैश्विक वित्तीय संगठन और सरकारें काम भी कम रही है, कड़े कानून बनाए जा रहे हैं, इस मुद्दे पर सहयोग के लिए देशों के बीच करार हो रहे हैं, पर समस्या कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों समूह-20 देशों के शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच न्यूनतम वैश्विक कारपोरेट कर पंद्रह फीसद किए जाने की सहमति कर वंचना के लिए अनुकूल देशों में कालेधन के बढ़ने पर लगाम लगाने का महत्त्वपूर्ण उपाय बन सकती है। सभी देशों में कर की न्यूनतम दर एक समान सुनिश्चित हो जाने से बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक देश को छोड़ कर कम या शून्य कर दर वाले देशों में अपना कारोबार और अपनी आमदनी को नहीं ले जा पाएगी। इससे कालेधन पर बड़ा नियंत्रण हो सकेगा।

इस साल अक्तूबर में दुनिया में कालेधन के खुलासे का सबसे बड़ा मामला पेंडोरा पेपर्स लीक के रूप में सामने आया। इसमें दुनिया भर के रसूखदार लोगों के वित्तीय लेन-देन को लेकर बड़े खुलासे हुए। इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्टस (आइसीआइजे) ने गहरी छानबीन के बाद पैंडोरा पेपर्स रिपोर्ट तैयार की थी। यह रिपोर्ट लगभग एक करोड़ बीस लाख दस्तावेजों की पड़ताल है, जिसे एक सौ सत्रह देशों के छह सौ खोजी पत्रकारों की मदद से बनाया गया है। इस पड़ताल में पाया गया कि भारत सहित दुनियाभर के दो सौ से ज्यादा देशों के बड़े नेताओं, धन कुबेरों और मशहूर हास्तियों ने धन बचाने और अपने कालेधन के गोपनीय निवेश के लिए किस तरह ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, सेशल्स, हांगकांग और बेलीज आदि में पैसा रखा है। इस रिपोर्ट में तीन सौ से अधिक भारतीयों के नाम भी शामिल हैं।

ऐसे में पैंडोरा पेपर्स के संबंध में मल्टी एजेंसी ग्रुप (एमएजी) ने अपनी सतत बैठकें आयोजित करके जांच शुरू कर दी है। इस बहु-एजंसी समूह में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के प्रमुख की अध्यक्षता में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), रिजर्व बैंक और वित्तीय खुफिया इकाई के अधिकारी शामिल हैं। गौरतलब है कि वर्ष 2017 में पैराडाइज पेपर्स के तहत एक करोड़ चौंतीस लाख से अधिक गोपनीय इलेक्ट्रानिक दस्तावेजों के माध्यम से ने सत्तर लाख ऋण समझौते, वित्तीय विवरण, ई-मेल और ट्रस्ट डीड उजागर किए गए थे। इनमें सात सौ चौदह भारतीयों के नाम भी उजागर हुए थे। इसके पहले वर्ष 2016 में पनामा पेपर्स के तहत एक करोड़ पंद्रह लाख संवेदनशील वित्तीय दस्तावेज सामने आए थे, जिनमें वैश्विक कारपोरेटों के धनशोधन संबंधी रिकार्ड थे। तब पांच सौ भारतीयों के नामों का खुलासा हुआ था।

कर वंचना और कालेधन के शोधन से जुड़े मामले बताते हैं कि कैसे दुनिया के कुछ सर्वाधिक शक्तिशाली लोग अपनी संपत्ति छिपाने के लिए ऐसे छोटे देशों में फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल करते हैं। कर हैवन देश उन देशों को कहा जाता है जहां नकली कंपनियां बनाना आसान होता है और बहुत कम कर या शून्य कर लगता है। इन देशों में ऐसे कानून होते हैं, जिससे कंपनी के मालिक की पहचान का पता लगा पाना मुश्किल होता है। कालाधन वह धन होता है, जिस पर आयकर की देनदारी होती है, लेकिन उसकी जानकारी सरकार को नहीं दी जाती है। कालेधन का स्रोत कानूनी और गैर-कानूनी कोई भी हो सकता है। आपराधिक गतिविधियां जैसे अपहरण, तस्करी या जालसाजी इत्यादि के माध्यम से अर्जित धन भी कालाधन कहलाता है। मादक पदार्थों के कारोबार, अवैध हथियारों के व्यापार, जबरन वसूली, फिरौती और साइबर अपराध से कमाया गया पैसा भी इन नकली कंपनियों में सुरक्षित कर दिया जाता है, ताकि यह कालाधन अपने देश में सफेद धन में बदल जाए।

आक्सफेम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक कर वंचना के लिए मुफीद देशों में पैसा रखने से दुनियाभर में सरकारों को हर साल चार सौ सत्ताईस अरब डालर के कर का नुकसान होता है। सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर होता है। विकासशील देशों से बेईमानी का पैसा बाहर जाने की रफ्तार बढ़ती जा रही है। इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था और विकास पर देखने को मिलता है। विदेशों में गोपनीय रूप से धन छुपा कर रखे जाने का सीधा असर आम आदमी के कल्याण पर भी पड़ता है।

भारत में कालेधन को लेकर बहस दशकों पुरानी है। विदेशी बैंकों में भारतीयों के कालेधन से संबंधित अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन अर्थविशेषज्ञों का मानना है कि यह करीब तिहत्तर लाख करोड़ रुपए हो सकता है। स्विस नेशनल बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 तक स्विस बैंकों में भारतीय नागरिकों और कंपनियों का जमा धन बीस हजार सात सौ करोड़ रुपए से अधिक था। नेशनल काउंसिल आफ अप्लाइड इकोनोमिक रिसर्च के मुताबिक साल 1980 से 2010 के बीच भारत के बाहर जमा होने वाला काला धन तीन सौ चौरासी अरब डालर से लेकर चार सौ नब्बे अरब डालर के बीच था।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि देश में भी कालेधन से निपटने के लिए अब से पहले आय घोषमा योजना, स्वैच्छिक घोषणा योजना, कर दर कम करने, 1991 के बाद व्यापार पर नियंत्रण हटाने, कर कानूनों में बदलाव जैसे कई कदम उठाए गए। हाल के वर्षों में ऐसे विधान बनाए गए हैं जो कर अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने की अनुमति देते हैं कि करदाता कर चोरी नहीं करें। इसमें ‘अपने ग्राहक को जानिए’ (केवाईसी) की व्यवस्था जोड़ी गई जिसमें किसी विशेष क्षेत्र में लेनदेन करने वालों को अपनी पूरी पहचान बतानी होती है, ताकि दूसरे कार्यक्षेत्रों के साथ उस सूचना को साझा किया जा सके। लेकिन फिर भी कालेधन की बढ़ोतरी और देश से कालाधन विदेश भेजे जाने को लेकर कमी नहीं आई है। विदेशी बैंकों में जमा कालेधन के खाताधारकों की सूची मिलने की खबर मात्र को बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता है। सफलता तभी मानी जाएगी जब विदेशों में जमा अधिकांश कालाधन सरकारी खातों में वापस आ जाएगा।

जिस तरह से पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स के खुलासे होने पर केंद्र सरकार ने देश की मशूहर हस्तियों की विदेश में गोपनीय वित्तीय संपत्तियों का खुलासा करने के लिए बहु-एजंसी जांच कराने के आदेश दिए थे, अब इस बार भी पैंडोरा पेपर्स की भी बहु एजंसी जांच सुनिश्चित की गई है। लेकिन अब पैंडोरा पेपर्स लीक मामले में जांच का काम पुराने और सामान्य ढर्रे वाला नहीं रहना चाहिए। चूंकि ये मामले प्रभावशाली तबके से संबंध रखते हैं, अतएव जांच संबंधी कार्रवाई कठोर होनी चाहिए। विदेशों में निवेश संबंधी मानकों को तोड़ने वालों के लिए कठोर कानून बनाए जाने की जरूरत है।

कालेधन की समस्या सीधे तौर भ्रष्टाचार से जुड़ी है। जाहिर है, जब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी, कालेधन की समस्या से निपट पाना संभव नहीं है। भारत 2020 के ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार सूचकांक में छियासिवें स्थान पर रहा। निश्चित रूप से अभी भ्रष्टाचार कालेधन और विदेशी बैंकों में चोरी से धन जमा किए जाने पर नियंत्रण के लिए मीलों चलना जरूरी है। चूंकि भारत में भ्रष्टाचार और कालेधन के नियंत्रण की सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक वित्त पोषण से है, अतएव राजनीतिक पार्टियों के वित्त पोषण में कालेधन के प्रयोग को रोकने हेतु कठोर कदम उठाने होंगे। अब भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए नौकरशाही में सुधार, भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के क्रियान्वयन में कठोरता, न्यायालयों में त्वारित निपटान, प्रशासनिक मामलों में पारदर्शिता सहित भ्रष्टाचार दूर करने और कालेधन पर नियंत्रण के विभिन्न ठोस उपायों की डगर पर आगे बढ़ा जाना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि समूह -20 शिखर सम्मेलन में जो फैसले किए गए उनसे कुछ तो कालेधन के प्रवाह में कमी आएगी।


यह जिद खतरनाक है
अवधेश कुमार

नि:स्संदेह, जिनने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा तीनों कृषि कानूनों की वापसी तथा देश से क्षमा मांगने की घोषणा के बाद उम्मीद की होगी कि अब दिल्ली की सीमा से धरनाधारी वापस चले जाएंगे उन्हें गहरा आघात लगा है। हालांकि कृषि कानून विरोधी आंदोलन और धरने पर गहराई से दृष्टि रखने वाले जानते थे कि यह कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना वाली कुटिल और घातक राजनीति है।

प्रधानमंत्री राष्ट्र के संबोधन में कह रहे हैं कि संसद के अगले सत्र में विधेयक लाकर इसे वापस कर दिया जाएगा, लेकिन इनको उन पर विश्वास नहीं है। क्या इस शर्मनाक सोच और हरकत की कल्पना की जा सकती है कि प्रधानमंत्री वचन दे रहे हैं और ये कह रहे हैं कि जब तक संसद से वापस नहीं होगा धरना खत्म नहीं करेंगे। संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक के बाद तथा उसके पहले राकेश टिकैत के वक्तव्यों पर ध्यान दें तो साफ दिख जाएगा कि ये किसी न किसी बहाने डटे रहने की रणनीति बना चुके हैं। संसद से कानूनों की वापसी हो, किसानों से मुकदमे वापस हों, एमएसपी गारंटी कानून बने और उसके लिए किसानों के साथ बातचीत आरंभ हो यानी जब तक बातचीत होती रहेगी धरना जारी रहेगा। ये पूर्व घोषित कार्यक्रम भी जारी रखेंगे। महापंचायत के बाद 26 नवम्बर को धरना के एक साल पर जगह-जगह ट्रैक्टर और बैलगाड़ी परेड, प्रदर्शन और संसद सत्र की शुरु आत पर 29 नवम्बर को संसद कूच। एक नेता बयान दे रहे हैं कि जितने किसानों की जान गई सबको शहीद का दर्जा मिले, मुआवजा मिले तथा प्रधानमंत्री, मंत्री, भाजपा एवं सरकार के प्रवक्ता माफी मांगे।

कृषि और किसानों की समस्याओं का निदान, उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आदि से बिल्कुल जरूरी है। किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य मिले तथा खेती की लागत कम होना भी आवश्यक है। व्यावहारिक बात यही है कि कृषि हो या उद्योग या सेवा क्षेत्र, केवल सरकार से स्थिति में अनुकूल बदलाव संभव नहीं। यह मांग लंबे समय से थी कि उद्योगों की तरह कृषि क्षेत्र में भी निजी क्षेत्र को निवेश करने का कानूनी एवं ढांचागत आधार दिया जाए। उसके अनुसार ये कानून लाए गए थे। यह इन्हें मंजूर नहीं। आंदोलन के संदर्भ में सरकार की भी समस्या समझ नहीं आई। इसका देशव्यापी व्यापक असर नहीं। सारी कोशिशों के बाद भी पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुछ जिले, उत्तराखंड के तराई तथा हरियाणा के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर इसका असर ही नहीं। लंबे समय से धरने के तंबुओं में लोगों की कमी साफ थी। एक निहायत ही जनिवहीन और निष्प्रभावी आंदोलन या धरना सरकार के गले की हड्डी बन गई तो इसमें उसकी सोच और रणनीति का ही दोष है। कृषि क्षेत्र में सुधार का साहस कोई सरकार नहीं दिखा सकी थी। इस कदम के बाद सरकारें आवश्यक नीतिगत और ढांचागत बदलाव के लिए के लिए आगे नहीं आएंगीं, जिनकी वाकई कृषि को आवश्यकता है।

इन धरनाधारियों की नजर में उनकी विजय है तो मुबारक हो। इसकी पूरी खुफिया रिपोर्ट थी कि आंदोलन को थोड़ा बलपूर्वक भी हटा दिया गया तो इसका कोई व्यापक जन विरोध नहीं होगा। हां, विशेष एजेंडे से पीछे खड़े समूह हर तरह की खुराक आंदोलन को दे रहे हैं और अपने एजेंडे के तहत हिंसा, अशांति जरूर पैदा करने की कोशिश करेंगे। इन धरनों के पीछे की ताकतों का लक्ष्य नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार भाजपा और संघ को हरसंभव क्षति पहुंचाना है। प्रधानमंत्री भले देश से क्षमा मांग लें कि वह किसानों के इस छोटे समूह को कृषि कानूनों के बारे में समझा नहीं सके इनको इस भावना से लेना-देना नहीं। ऐसा लगता है जैसे प्रधानमंत्री से ज्यादा साख और विसनीयता इनकी है। आश्चर्य की बात है कि केंद्र सरकार के साथ पंजाब, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि राज्यों के पास भी इसमें शामिल तत्वों तथा इनके माध्यम से उपद्रव कारी विघटनकारी समूहों की सक्रियता की सूचनाएं हैं। जिस तरह नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के विरोध के नाम पर शाही बाग का धरना मोदी सरकार, संघ, भाजपा और उनके समर्थकों के सभी विरोधियों का प्रत्यक्ष-परोक्ष केंद्र बन गया था; ठीक वही इसमें भी हुआ है।

अगर देश के आम लोगों को यह दिख रहा है तो प्रधानमंत्री या उनकी सरकार या अन्य सरकारों को नहीं दिखे यह कैसे संभव है? इस आंदोलन के पीछे की अनैतिक सोच और दुरभिसंधियों को देखने के बाद साफ था कि एक मांग मानी जाएगी तो दूसरा मांगे, दूसरा मानेंगे तो तीसरा, फिर चौथा, पांचवा..इस तरह अनवरत क्रम रहेगा। राकेश टिकैत और उनके भाई नरेश टिकैत अपने पिता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत के कार्यकाल में उनके उत्तराधिकारी नहीं बन पाए और इनके हस्तक्षेप के कारण भारतीय किसान यूनियन टूटता चला गया। महेंद्र सिंह टिकैत अपने जीवन के अंतिम दशक में लोकप्रियता खो चुके थे और उनके पुराने साथी उन्हें छोड़ चुके थे। लंबे समय तक ये अपने संगठन को ताकत नहीं दे सके तथा चुनाव में इनकी जमानत जब्त हो गई। इस समय पूरा देश और भारत में रुचि रखने वाला विश्व समुदाय इनको जानने लगा है। ऐसी हैसियत का कोई परित्याग करेगा? आश्चर्य की बात है कि विपक्षी दल मोदी, उनकी सरकार और भाजपा के विरु द्ध होने के कारण ऐसे आंदोलन को समर्थन नहीं और ताकत उपलब्ध करा रहे हैं।

यह राजनीति खतरनाक है, शेर की सवारी है। स्थाई रूप से आप सवार रह नहीं सकते और उतरेंगे तो शेर आपको खा जाएगा। ऐसी राजनीति किसी के हित में नहीं। किसी को लगता है कि उसकी पार्टी को इसका राजनीतिक लाभ चुनाव में मिल जाएगा तो अभी भी जनता की नब्ज पर उनका हाथ नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव के जो भी परिणाम आएंगे कृषि कानून विरोधी आंदोलन का उससे कोई संबंध नहीं होगा। प्रधानमंत्री की घोषणा तथा अपील के बाद धरने खत्म होने चाहिए। यह जिद सभी के लिए घातक है। धरने में शामिल और समर्थन करने वाले कई समूह और व्यक्ति इसे खत्म करना चाहते हैं, लेकिन कुटिल रणनीति वाले ऐसी स्थितियां पैदा कर रहे हैं ताकि वो इसका साहस नहीं कर सके। अब सरकार एवं पूरे देश को तय करना है कि इस तरह की जिद करने वाले अनैतिक और कुटिल सोच तथा उनके चेहरा बने लोगों के साथ किस तरह पेश आया जाए।


दक्षिण के खेतों से उठती आवाज
एस श्रीनिवासन, ( वरिष्ठ पत्रकार )

दिल्ली की सीमा पर बैठे किसानों को एक बड़ी जीत नसीब हुई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पर मजबूर कर दिया है। आम धारणा यही थी कि यह मसला दो राज्यों, हरियाणा और पंजाब तक ही सीमित है, क्योंकि इन क्षेत्रों के ही प्रभावशाली किसान आंदोलन कर रहे थे। मगर याददाश्त कमजोर होने के कारण कई लोग यह समझने में विफल रहे कि वर्षों से देश के कई हिस्सों में कृषि संकट पर लगातार मंथन हो रहा है। कई समीक्षक भी इस तथ्य से अनजान हैं कि खेती-किसानी अब लाभदायक पेशा नहीं रही और इसमें लागत इतनी अधिक बढ़ गई है कि किसान अपने बूते साल-दर-साल उत्पादन बनाए रखने में सक्षम नहीं हो पा रहे।

सच यही है कि कृषि संकट के संकेत सिर्फ पंजाब और हरियाणा से नहीं आ रहे, बल्कि दक्षिण के कर्नाटक, अविभाजित आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम में महाराष्ट्र जैसे सूबों में काफी पहले से मिल रहे हैं। इन इलाकों के किसान अपनी समस्याओं को अलग-अलग तरीकों से जाहिर भी करते रहे हैं, जिसकी सुध दिल्ली प्रशासन ने नहीं ली है। भला हो उत्तर प्रदेश चुनाव का, जिसकी आहट में प्रधानमंत्री ने कृषि कानून वापस लिए।

सन् 2010 से 2012 के बीच, अविभाजित आंध्र प्रदेश (उस समय वहां कांग्रेस की सरकार थी) सबसे अधिक आत्महत्या दर के साथ गंभीर कृषि संकट का गवाह बना था। इस अवधि के दौरान प्रति 1,000 की जनसंख्या पर 47 अन्नदाताओं ने खुदकुशी की थी, जबकि उस समय राष्ट्रीय औसत 15 था। तेलंगाना आंदोलन ने जोर पकड़ा और इसके नेता के चंद्रशेखर राव ने अपनी बात मनवाने के लिए हरे रंग का दुपट्टा थाम लिया। आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद जब वह 2014 में सत्ता में आए, तब किसानों के मसलों पर उन्होंने खास संजीदगी दिखाई। वह किसानों के लगभग सभी वर्गों को कर्जमाफी, जमीन पर मालिकाना हक, सिंचाई सुविधाएं, कृषि निवेश आदि के रूप में रियायतें देते रहे हैं। पिछले हफ्ते, प्रधानमंत्री द्वारा गुरु पर्व पर की गई घोषणा से एक दिन पहले वह मुख्यमंत्री होने के बावजूद, केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ हैदराबाद में (सत्ता में आने के बाद पहली बार) हड़ताल पर बैठे। हालांकि, इसका एक कारण राज्य में भाजपा का बढ़ता प्रभाव भी था।

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले कर्नाटक को भी अभूतपूर्व सूखे का सामना करना पड़ा था। तब यह बताया गया था कि 2012 और 2017 के दरम्यान 3,500 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। राजस्थान के बाद यहीं देश के दूसरा सबसे बड़ा शुष्क क्षेत्र है, और इसके बुनियादी ढांचे को निश्चय ही बेहतर बनाने की दरकार है। चूंकि यहां की राजनीति पर जातिगत और धार्मिक मसलों का कब्जा है, इसलिए सियासी बहसों में कृषि संकट को पूरी तरह से भुला दिया गया है।

महाराष्ट्र में मार्च, 2018 में लगभग 60,000 किसानों ने कृषि संकट के खिलाफ विधानसभा घेरने के लिए नासिक से मुंबई तक मार्च किया था। बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और कीटों के हमलों ने उनके खेतों को नुकसान पहुंचाया था। हालांकि, राज्य किसानों को बहुत कुछ दिए बिना यह आंदोलन समाप्त कराने में सफल रहा।

अन्नदाताओं का सबसे मुखर विरोध तमिलनाडु में दिखा, जब 2017 में 72 वर्षीय अय्याकन्नू के नेतृत्व में किसानों ने आंदोलन किया। उन्होंने सरकारी बैंकों से कर्जमाफी की मांग की थी। दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय तक चले आंदोलन ने देश भर के किसानों की दुर्दशा उजागर की थी, लेकिन केंद्र सरकार को मनाने में आंदोलन विफल रहा। तमिलनाडु के किसानों ने विरोध के कई नए तरीके पेश किए थे। इनमें कुछ तरीके अतिवादी ही सही, लेकिन बहुत प्रभावी थे। प्रदर्शनकारियों ने, जिनमें महिलाएं भी थीं, सांप कढ़ी खाते, मरे हुए चूहों को दांतों से दबाते, सड़कों पर लोटते, अपनी कलाई काटते, सिर के बल खड़े होते, सड़क पर चावल खाते, अपने सिर मुंड़वाते, तो कभी आधी दाढ़ी बनाते, एक दिन पुरुषों ने नवविवाहित महिलाओं के कपड़े पहने और अगले दिन मंगलसूत्र काटा, उन्होंने मानव खोपड़ी के साथ प्रदर्शन किया और एक दिन, जब प्रधानमंत्री ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया, तब नग्न प्रदर्शन किया था।

तमिलनाडु सरकार ने 5,780 करोड़ रुपये के कर्ज माफ किए और केंद्र से राहत के रूप में 40,000 करोड़ रुपये मांगे, क्योंकि राज्य 140 वर्षों में सबसे खराब वर्षा के दौर से गुजर रहा था। किसानों ने साल-दर-साल अभूतपूर्व सूखे और चक्रवात के कारण फसलों का नुकसान झेला था। केंद्र सरकार ने 2,000 करोड़ रुपये भिजवाए और राज्य सरकार ने माना कि एक महीने के अंदर कृषि संकट के कारण करीब 100 किसान जान गंवा चुके हैं।

ऐसा नहीं है कि किसानों की समस्याओं से हम अनजान हैं। यह एक खुला रहस्य है कि 60 प्रतिशत भारतीय खेती-किसानी से ही अपना जीवन बसर कर रहे हैं, लेकिन जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 18 फीसदी से भी कम है। साल-दर-साल केंद्र और राज्य सरकारें इस पर अपना बजटीय आवंटन घटाती जा रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान के अनुमान भी इसकी तस्दीक कर रहे हैं। दूसरी ओर, राज्यों में कृषि ऋण बढ़ता जा रहा है। महामारी के पहले के दशक में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह 80 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ गया था। जैसे-जैसे सरकार ने पूंजी बढ़ाई, करीब 60 प्रतिशत किसान औपचारिक कर्ज से बाहर आ गए।

कृषि संकट का विस्तार स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक क्षेत्रों तक हो जाता है। इसके अलावा, किसानों की मौत गहरी सामाजिक दरार का कारण बनती है। बैंक भी खुद को मंझधार में फंसा पाते हैं, क्योंकि रकम को बट्टे खाते में डालने से उनका एनपीए बढ़ जाता है। बिना किसी जवाबदेही के कॉरपोरेट कर्ज को माफ करने और किसानों की अनदेखी की सरकार की प्रवृत्ति पर प्रदर्शनकारी सवाल उठाते ही रहे हैं।

साफ है, मौजूदा किसान आंदोलन कई राज्यों में इसलिए नहीं फैला, क्योंकि या तो संबंधित राज्य सरकार आग लगने से पहले उसे बुझाने के लिए दौड़ पड़ी या उन जगहों पर कृषि अर्थव्यवस्था की संरचना ऐसी थी कि वहां केंद्र की खरीद पर ही सब कुछ निर्भर नहीं था।