(23-06-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक



Good Jobs First

Justice Chandrachud argues private sector needs anti-discrimination law. First formalise the economy

TOI Editorials

Over two lectures in the UK this week, Supreme Court judge DY Chandrachud foregrounded key points about the overarching goal of the Indian Constitution and its relevance when the state is no longer the primary employer. In one lecture he said the Constitution’s transformative dimension comes from its attempt to remedy discrimination. Flowing from it, working towards equality needs to consider pre-existing social and economic imbalances. Hence, the need for affirmative action.

In another lecture, he located this goal in the backdrop of India’s economic transformation. The state, earlier the primary employer, is now a facilitator of private participation in economic activity. The Constitution’s provisions against discrimination in public employment exists only against the state. This, therefore, leads to the question if there’s a need for a comprehensive anti-discrimination law. The case against any form of discrimination is unexceptionable. But a discourse on constitutional protections in private employment is of relevance to only a sliver of the workforce as the structure of employment puts most of them beyond the ambit of legal safeguards.

A mere 21% of the workforce earns a regular salary and not all of them in workplaces covered by legislation. In 2019-20, just 16.6 million people out of more than 400 million-strong workforce were employed in factories covered by legislation. Therefore, most Indians work without any legal protection against discrimination. If the constitutional promise is to be realised, India first needs an enabling economic condition that lifts most people to a level where legal protections kick in. It’s possible only through an environment that allows the economy to formalise. That’s the pre-condition to actually access constitutional rights. A sweeping anti-discrimination law now would just be a paper tiger. A charade of our constitutional fidelity.


High office

The Opposition did not use the presidential election to counter the BJP’s narrative


The BJP has stolen a march over the Opposition by naming Droupadi Murmu as its candidate for President. With the support of BJP allies and regional parties such as Odisha’s BJD and Andhra Pradesh’s YSRCP, she is poised to win and become the first from a tribal community to occupy the highest office of the Republic. The significance of her elevation is particularly pronounced in the 75th year of India’s independence. A tribal woman succeeding a Dalit in the highest office of the country is a remarkable testimony to the deepening of Indian democracy, notwithstanding the disturbing signs of the mobilisation of subaltern communities for majoritarian politics. Ms. Murmu will be the second woman to hold the highest office, after Pratibha Patil, and at 64, she will be the youngest President in the country’s history. From Mayurbhanj in Odisha, part of the region that houses a vast majority of India’s aboriginal population, Ms. Murmu was a teacher, and joined the BJP in 1997. She was a Minister in Odisha and the Governor of Jharkhand between 2015 and 2021. Her nomination by the BJP for the highest office of the country signifies the party’s sustained efforts to incorporate tribal communities politically and culturally. Prime Minister Narendra Modi’s personal signature on the decision is unmistakable and is in line with his relentless efforts to expand the BJP’s social base wide and far.

With numbers tilted in the BJP’s favour, the Opposition could have only used the contest for the highest office as an opportunity for political messaging. The joint candidate of the Opposition parties, Yashwant Sinha — a former BJP leader and Union Minister in the Janata Dal and BJP governments — hardly serves that purpose. For all his track record, Mr. Sinha hardly represents anything political. That he turned into a strong critic of Mr. Modi after being ignored for positions, if anything, weakens any claim of his candidacy being an ideological counter to the BJP. The lack of imagination, initiative and capacity for any radical politics in the Opposition comes across starkly in the selection of the candidate. While Mr. Modi uses every election as an opportunity to respond to group aspirations of various communities, the Opposition remains adrift and ensconced in cocoons. That Mr. Sinha comes from a tribal State, Jharkhand, makes the optics of this contest even more damaging for the Opposition. The Opposition is right to point out that the BJP did not make any serious effort to field a consensus candidate. But excusing its own limitations by blaming the BJP is self-defeating. This turned out to be yet another missed opportunity for the Opposition to construct a counter narrative to the BJP, which is inclusive in its messaging in instances such as this, while not giving up its pursuit of an exclusivist politics.



राजनीतिक चेतना का विस्तार भी जरूरी है


अश्वेत नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर का मशहूर कथन है, ‘जरूरी नहीं कि कानून बना देने से हर व्यक्ति मुझसे प्यार करने लगे लेकिन इतना जरूर है कि कानून के कारण वह मुझे लिंच (घृणा-जनित हत्या) नहीं करेगा और मैं समझता हूं कि इतना भी मेरे लिए काफी अहम है।’ बौद्धिक स्तर पर सोचें तो किसी दलित आदिवासी समाज से शीर्ष स्थान पर पहुंचने वाला व्यक्ति राजनीति में प्रतीकात्मक होता है। यह पूछा जा सकता है कि दलित राष्ट्रपति बनाने से क्या देश में एससी वर्ग की स्थिति पूर्णतया बदल गई या क्या समाज में जाति-भेद बंद हो गया। लेकिन यह भी सच है कि उनकी प्रताड़ना के स्वरूप और विस्तार में कमी आई है। भाजपा ने इतिहास का दूसरा दलित राष्ट्रपति देकर और अब इस पद पर पहली बार एक एसटी (आदिवासी) महिला प्रत्याशी खड़ाकर अच्छा संदेश दिया है। प्रजातंत्र में प्रतीकों की राजनीति होती है लेकिन इसके साथ राजनीतिक चेतना को इतना विस्तार भी देना होगा कि आदिवासियों और दलितों की स्थिति को और बेहतर करने के लिए समाज की सोच बदले। आज भी जब दलित के घोड़ी पर चढ़कर बारात जाने पर कोई सवर्ण अपने घर की छत पर बंदूक लेकर धमकी देने लगता है या पंचायत सवर्ण लड़की द्वारा दलित लड़के से शादी पर सजा देता है, तो लगता है संविधान के प्रावधान और समाज की सोच में खाई बनी हुई है।


दक्षिण और उत्तर भारत का गहराता अंतर

ए के भट्टाचार्य

आठ नवंबर, 2016 को हुई नोटबंदी के कुछ दिन बाद दक्षिण भारत के दो राज्यों की कुछ दिनों की यात्रा ने मुझे यह बात अच्छी तरह याद दिला दी थी कि कैसे दक्षिण भारत के राज्य उत्तर के राज्यों से अलग हैं। वहां बैंकों के बाहर पुराने नोट बदलने की कोई कतार नहीं दिख रही थी। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के जरिये या वॉलेट भुगतान अथवा ऑनलाइन लेनदेन अपेक्षाकृत आसान था। दुकानदार भी इस बात पर जोर नहीं देते थे कि हम कुछ खरीदने के बदले नकद राशि ही दें। टूर ऑपरेटर भी बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के पुराने नोट लेने को तैयार थे। अपेक्षाकृत शांति थी और जीवन सहज और तनावमुक्त नजर आ रहा था।

यह सिलसिला उत्तर भारत के शहरों और कस्बों के एकदम उलट था। न केवल राजधानी नई दिल्ली बल्कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और यहां तक कि गुजरात के कई इलाकों में भी बैंकों के बाहर लोग लंबी कतार लगाये पुराने नोट बदलने की कोशिश में खड़े थे। इन जगहों के कारोबारी भी ऑनलाइन भुगतान लेने के इच्छुक नहीं थे और नकदी पर जोर दे रहे थे। कुल मिलाकर असहज करने वाला माहौल था।

2020 और 2021 में किसानों द्वारा तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करने पर भी ऐसा ही घटनाक्रम हुआ। पहले माना जा रहा था कि इन कृषि कानूनों का विरोध देशव्यापी है और पूरे देश के किसान इन कानूनों को लेकर परेशान हैं। लेकिन महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में कुछ शुरुआती विरोध के बाद किसान आंदोलन जल्दी ही पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों का आंदोलन बनकर रह गया। दक्षिण भारत के किसानों ने इन नये कानूनों की अनदेखी की। एक बार फिर दक्षिण के राज्यों ने केंद्र के नीतिगत फैसले पर उत्तर के राज्यों की तुलना में अलग ढंग से प्रतिक्रिया दी।

पिछले कुछ दिनों से मोदी सरकार की सैनिक भर्ती योजना अग्निपथ को लेकर भी विरोध का सिलसिला मोटे तौर पर उत्तर भारत में ही केंद्रित है। तेलंगाना में कुछ घटनाएं हुईं लेकिन बाद के दिनों में विरोध मोटे तौर पर उत्तर भारत में सीमित रहा। इससे पता चलता है कि कैसे केंद्र की अहम नीतिगत पहलों को लेकर दक्षिण भारत का रुख उत्तर से एकदम अलग है।

पुराने लोग याद करेंगे यह कोई नया रुझान नहीं है। जून 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तब भी दक्षिण भारत के राज्यों का रुख उत्तर के राज्यों से एकदम अलग था। ऐसी तमाम अन्य घटनाएं भी मिलेंगी जहां केंद्र की अहम आर्थिक या राजनीतिक पहलों पर इस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली। परंतु इस सवाल का जवाब आवश्यक है कि दक्षिण भारत की प्रतिक्रिया उत्तर से अलग क्यों रहती है और क्या यह देश के संचालन ढांचे में किसी गहरी खामी की ओर इशारा करता है।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो दक्षिण भारत उत्तर और पूर्वी भारत की तुलना में बेहतर गति से विकास कर रहा है। दक्षिण के अधिकांश राज्यों में औसत आबादी वृद्धि उत्तर के राज्यों खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश की तुलना में कम रही है।

इस वजह से दक्षिण के राज्यों की प्रति व्यक्ति आय भी अपेक्षाकृत बेहतर रही। दक्षिण के कई राज्यों में आबादी की कृषि पर निर्भरता कम हुई है। इसके चलते विनिर्माण को गति मिली और इन राज्यों में तकनीक सक्षम सेवा क्षेत्र में भी मजबूती आई। शिक्षा के प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ। इन क्षेत्रों में दक्षिण के राज्य उत्तर के राज्यों से काफी आगे हैं। इसके विपरीत दक्षिण भारत के राज्यों का राष्ट्रीय राजनीति में वह कद नहीं है जो उत्तर और पश्चिम के राज्यों का है। अगर 2026 के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन दोबारा हुआ तो दक्षिण भारत की स्थिति और बिगड़ सकती है। 2002 में हुए संविधान संशोधन के मुताबिक 2026 तक ऐसा किया जाना है। स्पष्ट है कि राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर भारत के राज्यों की दावेदारी मजबूत होगी क्योंकि संसद के दोनों सदनों में उनके प्रतिनिधि अधिक होंगे। वहीं दक्षिण के राज्यों की हैसियत कम होगी।

एक राष्ट्रीय दल देश की सरकार चला रहा है लेकिन दक्षिण में उसकी सरकार केवल एक ही अहम राज्य में है। यह तथ्य परेशान करने वाला है और इस बात को रेखांकित करता है कि दक्षिण के राज्यों की चुनावी और राजनीतिक अहमियत कम हो रही है।

उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीति में आ रही इस विसंगति का भारत के भविष्य पर भी बुरा असर पड़ सकता है। आर्थिक नजरिये से देखा जाए तो देश के दक्षिणी इलाकों के राज्यों का शेष भारत के बढ़ते बाजार में काफी अहम योगदान हो सकता है। लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों की घटती राजनीतिक महत्ता वहां के क्षेत्रीय दलों के लिए भावनात्मक मुद्दा हो सकती है। उत्तर भारत के राज्यों की बढ़ती निर्वाचन शक्ति आगे चलकर इसे और अधिक चुनौती देगी। दक्षिण के राज्य पहले ही वित्त आयोगों द्वारा केंद्रीय संसाधनों के राज्यों के आवंटन में आबादी और विकास मानकों को आधार बनाने का विरोध कर रहे हैं। इन मानकों के चलते उत्तर भारत के राज्यों को केंद्रीय संसाधनों में अपेक्षाकृत अधिक हिस्सा मिल रहा है। दक्षिण भारत के राज्यों को यह भी लगता है कि वे वस्तु एवं सेवा कर के नये ढांचे में भी मात खा रहे हैं। इस व्यवस्था में खपत करने वाले राज्य को अधिक कर मिलने की प्रवृत्ति है जबकि उन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करने वाले राज्यों के हिस्से कम कर आता है। दक्षिण भारत के राज्य इस बात को लेकर भी नाराज हो सकते हैं। यह बात महत्त्चपूर्ण है कि केंद्र सरकार दक्षिण भारत की उत्तर भारत के साथ लगातार बढ़ती इस दूरी पर ध्यान दे। बहुत संभव है कि यह एक अभी शुरू हुई बड़ी समस्या को हल करने के लिए सही समय हो। नीतिगत पहलों तथा सकारात्मक हस्तक्षेपों के माध्यम से इसे जितनी जल्दी हल किया जाएगा, उतना ही अच्छा होगा। यदि ऐसा किया जाता है तो आने वाले दिनों में देश के संचालन ढांचे के लिए बेहतर बात होगी।


प्रतिनिधित्व का लोकतंत्र


अगले महीने होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के संदर्भ में देश में सत्ता पक्ष और विपक्ष की ओर से उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही अब राजनीति के मोर्चे खुल गए हैं। विपक्षी दलों ने जहां पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया है, वहीं सत्ताधारी खेमे से भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग ने झारखंड में राज्यपाल रह चुकीं द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का चेहरा घोषित किया है। जाहिर है, अब इसके बाद दोनों पक्षों की कोशिश संख्या बल को अपने पक्ष में करने पर केंद्रित होगी। हालांकि फिलहाल राजग की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोटों का गणित साफ झुका लगता है, इसलिए अभी से ही माना जा रहा है कि अगर कोई बड़ा उलटफेर नहीं हुआ तो वे राष्ट्रपति चुन ली जाएंगी। अगर ऐसा संभव हो जाता है तो देश को राष्ट्रपति के रूप में पहला आदिवासी चेहरा मिलेगा और इस बार के चुनाव की सबसे बड़ी अहमियत यही होगी। माना जा रहा है कि राजग ने इस मसले पर बहुत सोच-समझ कर अपना दांव चला है, क्योंकि उम्मीदवारों के चुनाव के क्रम में शायद यह पहलू विपक्ष के फैसले के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने खड़ा हो गया है।

दरअसल, देश की राजनीति में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने के संदर्भ में सबसे ज्यादा इस पक्ष पर विचार किया जाता रहा है कि सत्ता की मुख्यधारा में समाज के अलग-अलग तबकों को कितना और किस रूप में प्रतिनिधित्व मिल पाता है। खासतौर पर हाशिये के समुदायों को लेकर राजनीतिक तबका कितना संवेदनशील हो पाता है। इस लिहाज से देखें तो राष्ट्रपति पद के लिए राजग की ओर से ओड़ीशा की जनजातीय पृष्ठभूमि से आने वाली द्रौपदी मुर्मू का चुनाव एक अहम घोषणा है, जिसके तहत यह बताने की कोशिश की गई है कि भाजपा और उसके सहयोगी दल आदिवासी समुदाय को भी वाजिब प्रतिनिधित्व दिलाने के प्रति गंभीर हैं। यों इससे पहले मौजूदा राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविंद को भी अनुसूचित जातियों के बीच से एक चेहरे को आगे लाने की कोशिश के तौर पर देखा गया था। अब द्रौपदी मुर्मू अगर राष्ट्रपति के रूप में चुन ली जाती हैं तब भाजपा यह दावा कर सकने की स्थिति में होगी कि देश के राजनीतिक ढांचे में सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने को लेकर वह बाकी दलों के मुकाबले ज्यादा गंभीर है।

गौरतलब है कि द्रौपदी मुर्मू को ओड़ीशा में जमीनी स्तर की एक मुखर राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर देखा जाता रहा है। ओड़ीशा के रायरंगपुर में पार्षद के पद पर जीत के साथ उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया। उसके बाद सन 2002 में उन्होंने वहीं से विधानसभा चुनाव जीता और बीजू जनता दल व भाजपा की गठबंधन सरकार में मंत्री भी रहीं। उस दौरान अपने काम से द्रौपदी मुर्मू ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था। आदिवासी समुदाय से आने वाली वे ऐसी पहली महिला हैं, जिन्हें देश के किसी राज्य में राज्यपाल नियुक्त किया गया। झारखंड में उन्होंने अपना 2015 से 2021 का कार्यकाल बिना बाधा के पूरा किया। अब राष्ट्रपति के तौर पर अगर वे चुन ली जाती हैं तो इसके कई मायने होंगे। हालांकि कुछ राज्यों में विधानसभा के भावी चुनावों के मद्देनजर भी यह भाजपा के लिए अहम फैसला है और इसके जरिए आदिवासी समुदायों के बीच उसकी पहुंच का विस्तार होने की संभावना बन रही है। लेकिन देश की राजनीति में सामाजिक तबकों के प्रतिनिधित्व को लेकर जैसी बहसें चलती रही हैं, उसमें द्रौपदी मुर्मू के चुनाव का एक प्रतीकात्मक, लेकिन व्यापक महत्त्व होगा।



सामाजिक न्याय के लिए


नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में द्रौपदी मुर्मू की घोषणा भारतीय राजनीति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में मुर्मू की जीत होती है, तो राष्ट्रपति पद पर पहली बार कोई दलित और उसमें भी महिला आसीन होंगी। महिला के रूप में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल भी राष्ट्रपति रही हैं, लेकिन वह सवर्ण जाति से थीं। विरोधी खेमे की ओर से यशवंत सिन्हा राजनीति और शासन के अनुभवी उम्मीदवार हैं। भाजपा के नेतृत्व में राजग ने पिछली बार रामनाथ कोविंद के रूप में दलित को राष्ट्रपति पद पर आसीन कराया था। इस तरह देखें तो मोदी सरकार ने सामाजिक न्याय और सामाजिक अभियांत्रिकी की दृष्टि से इतिहास रच दिया है। पिछली बार कोविंद के विजित होने के बाद आम विश्लेषकों का मत था कि यह दलित वोटों के सुदृढ़ीकरण का कदम है। निश्चित रूप से इस बार इसे आदिवासी वोटों के लिए उठाया गया कदम भी विरोधी बता सकते हैं। राजनीति में वोट प्राप्त करने का लक्ष्य बुरा नहीं है। भारत का दुर्भाग्य है कि यहां जातीय गोलबंदी या समीकरण राजनीति में मूलत: वोटों की दृष्टि से ही बनाए और बिगाड़े जाते हैं। किंतु राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में मुर्मू के चयन को इस परिधि में सीमित करना ठीक नहीं होगा। पहले दलित, इस बार आदिवासी और उसमें भी महिला राष्ट्रपति बनती हैं तो इसका संदेश सामाजिक समरसता की दृष्टि से ही नहीं, भारत और संपूर्ण वि में बहुआयामी होगा। संसद और विधानसभाओं के साथ राज्य एवं केंद्र की सरकारी सेवाओं में दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के अनुसार आरक्षण उपलब्ध है। बावजूद सामाजिक न्याय के नाम पर क्रांतिकारी योद्धा बने लोग भारत में दलितों और आदिवासियों के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार का आरोप लगाते रहते हैं। इनके नाम पर राजनीति ही नहीं होती, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक सुधार आदि के नाम पर हजारों एनजीओ चलते हैं। कोविंद के बाद मुर्मू जीतती हैं, जिसकी संभावना है, तो बिना कहे पूरी दुनिया में संदेश जाएगा कि भारत में जब शीर्ष पद पर इन वगरे के लोग बैठ सकते हैं, तो वहां सामाजिक अन्याय कैसे हो सकता है। मुर्मू का राजनीतिक अनुभव और जनप्रतिनिधि से लेकर राज्यपाल के रूप में व्यवहार कभी ऐसा नहीं रहा जिसे गरिमा के विपरीत माना जाए। इस दृष्टि से देखें तो मोदी सरकार या भाजपा का अंतिम नाम पर मोहर लगाना सही दिशा में उठाया गया कदम लगेगा।



बिखरे विपक्ष से कोई कैसे करे सार्थक राजनीति की उम्मीद

सीपी राय, ( वरिष्ठ पत्रकार )

इस बार राष्ट्रपति चुनाव विपक्ष की मजबूत एकता की मिसाल बन सकता था। इसके बहाने केंद्र की वर्तमान सत्ता को चुनौती दी जा सकती थी। मगर संपूर्ण विपक्ष इस बार भी चूक गया। यूं भी लंबे समय से वह भाजपा की सत्ता को न तो संसद में कभी परेशानी में डाल पाया है और न सड़क पर गंभीर चुनौती दे सका है। पिछले पांच-छह वर्षों में विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा कर सका है। असरदार किसान आंदोलन हुआ भी, तो वह किसानों और किसान संगठनों की मेहनत- मजबूती का नतीजा था, उसमें विपक्ष कहीं नहीं था। एनआरसी और सीएए के खिलाफ शाहीन बाग से आवाज उठी, तो वह भी विपक्ष के बिना ही थी। और, रोजगार के सवाल पर या अभी अग्निपथ योजना के खिलाफ चल रहे आंदोलन से भी विपक्ष दूर-दूर ही है।

कलमकारों और सामाजिक चिंतन करने वालों की जिम्मेदारी सिर्फ सत्ता के कान मरोड़ना नहीं है, बल्कि सिद्धांतहीनता और विचलन के शिकार विपक्षी दलों को भी लगातार आईना दिखाना है। हालांकि, राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल पर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए थे, उन पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए काम करने के आरोप लगे थे। यह भी सत्य है कि भारत का राष्ट्रपति महज देश की सार्वभौमिकता का प्रतीक नहीं होता, बल्कि संपूर्ण देश का प्रतीक होता है, तीनों सेनाओं का सर्वोच्च कमांडर भी होता है। वह दुनिया में कहीं आता-जाता है या किसी राष्ट्राध्यक्ष-शासनाध्यक्ष से मिलता है, तो वह संपूर्णता में, यानि शिक्षा, संस्कृति, ज्ञान आदि सब कुछ में भारत का परिचायक होता है। द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी भी इन कसौटियों पर कसी ही जाएगी।

ऐसा मानने वाले लोग भी कम नहीं कि अपने सपने को साकार करने की बेचैनी में सत्तारूढ़ पार्टी चुनावी मशीन बन चुकी है। वह आने वाली पीढ़ी के लिए नहीं, आने वाले चुनाव के लिए सब करती दिखती है। द्रौपदी मुर्मू का नाम भी उसने राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर चुना है। मगर सवाल यह है कि क्या विपक्षी दल ने कोई मजबूत विकल्प पेश किया ? वे ऐसा उम्मीदवार खड़ा कर सकते थे, जिससे एनडीए खेमे के नेतागण भी उनको वोट देने के लिए मजबूर हो जाते, जैसे भाजपा ने कुशलता से किया। सिर्फ आदिवासी उम्मीदवार होने के कारण कई लोग द्रौपदी मुर्मू का विरोध नहीं कर पाएंगे।

बढ़ा सवाल यह है कि क्या विपक्ष के बड़े नेताओं की भाजपा की रणनीति पर निगाह थी और क्या उसे गंभीरता से चुनौती देने के बारे में सोचा गया? मनमोहन सिंह, प्रकाश सिंह बादल, चंद्रबाबू नायडू, माणिक सरकार, देवेगौड़ा, शरद यादव, पवन कुमार चामलिंग इत्यादि के अलावा कोई प्रतिष्ठित पूर्व प्रधान न्यायाधीश, पूर्व सेनाध्यक्ष, प्रसिद्ध शिक्षाविद, समाजसेवी के साथ दक्षिण का होना या वंचित होना जैसी रणनीति विपक्ष की भी तो हो सकती थी। भाजपा के वर्तमान नेतृत्व को बेचैन करने के लिए आगे बढ़कर रणनीतिक रूप से उन्हीं के खेमे के लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी या वर्तमान उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के नाम पर चर्चा चलाई जा सकती थी। जब पता था कि आदिवासी कार्ड खेला जा सकता है, तब विपक्ष के पास भी तो आदिवासी नेता हैं, जो शिक्षित हैं और अनुभवी भी। और, यदि केवल नाम के लिए चुनाव लड़ना था, तो वे किसी आम आदमी, कामगर या खेतिहर मजदूर को उम्मीदवार बना सकते थे।

विपक्ष को यह समझना होगा कि आधे-अधूरे मन से या आपसी काट-छांट से भारतीय जनता पार्टी से नहीं लड़ा जा सकता, और विकल्पहीनता या कमजोर विकल्प व वैकल्पिक कार्यक्रम व मजबूत सैद्धांतिक धरातल के बिना चुनावी जीत हासिल नहीं की जा सकती। विपक्ष की सबसे बड़े पार्टी कांग्रेस खुद इस वक्‍त राहुल गांधी को ईडी से बचाने की लड़ाई तक सीमित है। देश की राजनीतिक लड़ाई भी वह केवल राहुल गांधी के नेतृत्व तक सीमित रखना चाहती है। देश, लोकतंत्र सब कुछ दांव पर लगा है लेकिन सब अपना-अपना ढोल पीट रहे हैं। कोई सामूहिक प्रयास नहीं दिख रहा।

क्या भाजपा में भीतरी असंतोष नहीं है? क्या वहां सभी नेता और कार्यकर्ता संतुष्ट हैं? कतई नहीं, पर वह तो नहीं टूट रही है और न उसकी सरकारें गिर रही हैं। फिर विपक्ष की क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि विपक्ष इसके लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं करता है। यह कहना कि भाजपा ने हमारे लोगों को तोड़ लिया, आधा-अधूरा सच है। पूरी हकीकत तो यह है कि आप अपनों को अपना बनाकर नहीं रख पाते हैं। आखिर आप अपनों से जुड़े क्यों नहीं रह पाते हैं? इस पर विपक्ष को आत्मचिंतन करना चाहिए।