21-05-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


Let’s Keep GST Good & Simple

Post SC ruling, all stakeholders must reaffirm the ‘one nation, one tax’ principle

MS Mani, [ The writer is Partner, Deloitte India. ]

GST was a landmark reform initiative – it removed multiple central and state taxes and enabled corporate India to treat the country as one common market.

But GST’s ease of doing business regime will now likely be revisited following the Supreme Court decision of May 19. We should note that the case – Union of India vs Mohit Minerals Pvt Ltd – was dealing with the levy of Integrated Goods and Services Tax (IGST) on ocean freight and not per se on central and state legislative powers.

But SC has, inter-alia, mentioned that the GST Council decisions are not binding on the central and state governments. It also mentioned that the Union and states are conferred equal powers to legislate on GST.

Many of us would recollect pre-GST days where all products would either have a price excluding local taxes or have multiple prices applicable to a band of states. This was primarily on account of VAT and other local taxes and municipal levies such as Octroi and Entry Tax, which were divergent across states.

While consumers were unable to get an all-inclusive price for products on the product pack, manufacturers had to also factor in the cost of setting up a warehouse in each state to avoid paying the central sales tax, despite logistic considerations frequently not justifying a warehouse. Supply chain planning for corporate India prior to the introduction of GST in 2017 was driven more by the differentiated local tax structure in each state and less by demand and ease of fulfilment – factors that were primary in the developed world.

GST meant that for consumers, every product would come with one all-inclusive price mentioned on the product pack without any caveats. From a supply chain perspective, it meant that demand forecasting and fulfilment would need to be undertaken from a market and consumer base standpoint and not from a tax standpoint, as the tax for a specific product was identical across states.

This uniformity was achieved by a constitutional amendment leading to the GST legislation and its implementation was overseen by the GST Council, which is headed by the Union finance minister and comprises all the state finance ministers.

The GST Council has met 46 times till now and its decisions have largely been unanimous, indicating a high level of fiscal maturity and understanding between the Centre and states. It is also understood that while some states have had divergent viewpoints on some issues, the Council however has been effective in balancing the interests of the Centre and the states, dealt with various implementation issues during the past five years and ensured that the overall aim – a common indirect tax across the country – is not diluted.

The concern after the SC decision is whether various states will now begin pulling in different directions taking indirect taxes back to the VAT era.

The SC decision comes at a time when states have been very concerned about their ability to manage their fiscal situation once the compensation cess provided to defray revenue losses on account of GST comes to an end in June 2022.

Suggestions by states to increase the period of the cess by two or three years, have not yet elicited any positive response from the Centre. In this situation, and given the SC ruling, there is concern on whether the level of uniformity in GST legislation across states, presently in force, will continue in future.

However, while there is certainly a need for more clarity on the issue, there does not appear to be any reason for immediate alarm. Outcomes of GST Council meetings have largely been implemented by all states till now. Also, central and state governments have been on the same page in implementing the decisions taken by the Council. Both the Centre and states have worked on GST in a spirit of cooperative federalism and the uniformity in GST laws across states has benefited both consumers and manufacturers.

What we need right now is a restatement of the principle of ‘One Nation, One Tax’, that it won’t become a ‘One Nation, Many Taxes’ situation all over again.

The Good and Simple Tax, which heralded many other business reforms, should now move further along the path of procedural simplification, improving the ease of doing business. It is in essence a tax collected from consumers by businesses and paid to both central and state governments. Therefore, collective views of both consumers and businesses should be duly considered before considering any changes in the GST decisionmaking framework.


धार्मिक स्थल का आकलन


सुप्रीम कोर्ट ने बहुचर्चित ज्ञानवापी मामले की सुनवाई जिस तरह वाराणसी की सिविल अदालत के बजाय जिला अदालत को सौंपी और उसे आठ हफ्ते में सुनवाई पूरी करने को कहा, उससे यही प्रतीत होता है कि वह इस मामले का जल्द निस्तारण चाहता है। वास्तव में ऐसा ही होना चाहिए। चूंकि यह एक बेहद संवेदनशील प्रकरण है, इसलिए यह सभी के हित में है कि इस मामले का जितनी जल्दी संभव हो, समाधान किया जाए। नि:संदेह ऐसा न्यायपालिका की सक्रियता से ही संभव है। इस मामले में न्यायपालिका के स्तर पर वैसी देरी नहीं होनी चाहिए, जैसी अयोध्या मामले में हुई और जिसके नतीजे अच्छे नहीं रहे। एक उपाय यह भी है कि आस्था से जुड़े इस तरह के मामले आपसी संवाद और सहमति से हल करने की कोई ईमानदार कोशिश हो। इससे सामाजिक सद्भाव को बल मिलने के साथ ही राष्ट्रीय एकता का भाव भी प्रबल होगा। अयोध्या मामले में ऐसा नहीं हो पाया था तो इसीलिए कि स्वस्थ संवाद के बजाय वाद-विवाद को ज्यादा तूल दिया गया। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अयोध्या मामले को आपसी बातचीत से हल करने में कई राजनीतिक दल बाधक बने थे। उनका स्वार्थ इसी में था कि किसी तरह इस विवाद का समाधान न होने पाए। कम से कम इस बार ऐसे राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए।

यह सही है कि काशी का ज्ञानवापी प्रकरण अयोध्या मामले से भिन्न है और इसके संदर्भ में 1991 में बनाए गए धर्मस्थल कानून को भी रेखांकित किया जा रहा है, जो यह कहता है कि सभी धार्मिक स्थल उसी स्थिति में रहेंगे, जिसमें वे 15 अगस्त 1947 को थे, लेकिन इस कानून में कुछ अपवाद भी हैं। यह उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानवापी मामले की सुनवाई करते हुए यह कहा कि किसी स्थल के धार्मिक चरित्र यानी उसके रूप-स्वरूप का आकलन प्रतिबंधित नहीं है। इससे यही स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट ने वाराणसी की सिविल अदालत के उस फैसले को सही पाया, जिसमें उसने ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण का आदेश दिया था। यह भी महत्वपूर्ण है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगाने की कोई जरूरत नहीं समझी-और वह भी तब जब उसके समक्ष धर्मस्थल कानून का संदर्भ दिया गया था। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धर्मस्थल कानून किसी स्थान के धार्मिक चरित्र के आकलन पर पाबंदी नहीं लगाता, तब फिर सवाल यह है कि यदि ज्ञानवापी परिसर अथवा इसी प्रकार के अन्य धार्मिक स्थलों का सर्वेक्षण ऐसे किसी नतीजे पर ले जाता है कि वह वैसा नहीं, जैसा दावा किया जा रहा है तो क्या उसकी अनदेखी कर दी जाएगी? वास्तव में यह वह जरूरी सवाल है जिसका जवाब सामने आना ही चाहिए।


धर्मस्थल कानून की सीमाएं

प्रो. हरबंश दीक्षित, ( लेखक विभिन्न विश्वविद्यालयों में विधि शास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं )

वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में अदालती आदेश पर परिसर का स्थलीय सर्वे और उसमें हिंदू प्रतीक चिन्हों के मिलने की खबरों के बाद धर्मस्थल कानून एक बार फिर चर्चा में है। इस कानून को 1991 में नरसिंह राव सरकार ने तब पारित कराया था, जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था। इस कानून की धारा तीन तथा चार के अनुसार किसी उपासना स्थल में या उसके धार्मिक स्वरूप में 15 अगस्त, 1947 तक की स्थिति से इतर कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसके उल्लंघन को दंडनीय अपराध घोषित किया गया, जिसके लिए तीन साल की जेल और जुर्माने का प्रविधान है। इसी कानून की धारा 4(2) में यह भी कहा गया कि यदि 15 अगस्त, 1947 तक किसी धार्मिक स्थल में परिवर्तन संबंधी कोई याचिका या कार्यवाही किसी अदालत, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकरण में लंबित है तो उसे समाप्त माना जाएगा। फिलहाल ज्ञानवापी का जो मामला चर्चित है, उसके दो पहलू हैं। पहला सामाजिक और दूसरा विधिक। एक धारणा यह है कि धर्मस्थल कानून जल्दबाजी में लाया गया। यह संविधानसम्मत नहीं है और जनभावनाओं की अनदेखी करने के लिए लाया गया। इसका दूसरा पहलू कानूनी है, जिसके अंतर्गत ज्ञानवापी परिसर में सर्वे के आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

किसी भी उपासना पद्धति के पूजा स्थल उस समाज की आस्था के केंद्र और उसके स्वाभिमान के प्रतीक होते हैं। जब ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हों कि उन्हें तहस-नहस करके दूसरी उपासना पद्धति के धार्मिक केंद्र के रूप में जबरन परिवर्तित किया गया तो उसमें आस्था रखने वाले समाज को पहुंची ठेस का अनुमान लगाना कठिन नहीं। किसी अस्मिता को बलात नष्ट करने के प्रयास को भूलना किसी समाज के लिए संभव नहीं होता। इसे सुलझाने का सर्वमान्य तरीका यही है कि अतीत की भूलों के सुधार के लिए व्यापक मुहिम चलाई जाए। दक्षिण अफ्रीका में ऐसा सफल प्रयास हो चुका है। आजादी मिलने के बाद वहां अश्वेतों के मन में गोरे लोगों के प्रति घृणा और प्रतिहिंसा की तीव्र भावना थी, क्योंकि वे गोरों के अत्याचार से उबर नहीं पा रहे थे। इससे निपटने के लिए उन्होंने ट्रुथ एंड रिकंसीलिएशन कमीशन का गठन किया। उसके जरिये अतीत में हुई घटनाओं की जांच करने के बाद उनसे भावनात्मक रूप से उबरने के लिए ऐसे तौर-तरीकों का विकास किया गया, जिससे सामाजिक खाई को पाटा जा सके। इस कवायद केउत्साहजनक परिणाम भी निकले। हम भी ऐसी ही कोई युक्ति निकाल सकते थे, लेकिन उसके बजाय हमने कानून बनाकर जनभावनाओं को दबाने का प्रयास किया। सांप्रदायिक सौहार्द को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

ज्ञानवापी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के सामने वही 15 अगस्त, 1947 की मियाद वाली दलील दी गई है, जिसे शीर्ष अदालत ने एक तरह से दरकिनार ही कर दिया। दूसरी ओर वाराणसी की सिविल अदालत ने वही किया, जो कानून उससे अपेक्षा करता था। तथ्यों की जांच के लिए कमीशन जारी कर दिया। अफसोस की बात है कि उसके आदेश के संबंध में निराधार भ्रम फैलाया जा रहा है। धर्मस्थल कानून के बारे में 15 अगस्त, 1947 की मियाद वाली दलील तो पेश की जा रही है, किंतु उसी कानून की धारा 4(3) और पांच के बारे में कुछ नहीं कहा जा रहा, जिसमें कुछ अपवाद हैं, जिन पर यह कानून लागू नहीं होता। धारा 4(3) का उपखंड (क) यह कहता है कि यदि कोई उपासना स्थल, जो प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 या अन्य किसी कानून के अंतर्गत कोई प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या पुरातात्विक स्थल या अवशेष है, तो उस पर यह कानून लागू नहीं होगा। इसके लिए प्राचीन स्मारक की परिभाषा जानना जरूरी है। प्राचीन स्मारक तथा पुरावशेष कानून, 1958 की धारा 2 में यह परिभाषा बताई गई है। उसकी धारा 2(क) में उल्लेख है कि ऐसी कोई संरचना या स्मारक या कोई स्तूप या कब्रिस्तान या कोई गुफा, शैल-रूपकृति, उत्कीर्ण लेख जो ऐतिहासिक, पुरातात्विक या कलात्मक रुचि का है और जो कम से कम सौ वर्षो का हो, वह प्राचीन स्मारक की परिभाषा में आएगा। स्पष्ट है कि किसी स्थल को प्राचीन स्मारक का दर्जा देने के लिए दो शर्तो का होना आवश्यक है। पहली यह कि वह कम से कम सौ वर्ष पुराना हो और दूसरी यह कि वह कोई स्तूप या स्मारक या कोई गुफा, शैलकृति इत्यादि में से कोई एक हो। यह तय करना अदालत का काम है कि कोई संरचना इस परिभाषा पर खरी उतरती है या नहीं? इसलिए अदालत यदि एडवोकेट कमिश्नर के माध्यम से स्थलीय निरीक्षण करके तथ्यों को जानने का प्रयास कर रही है तो वह कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। उसे सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं है। इससे अदालतों पर अनावश्यक मानसिक दबाव बनता है और उनके लिए अपना काम करना बहुत कठिन हो जाता है।

वस्तुत: धर्मस्थल कानून की धारा तीन किसी उपासना स्थल के धार्मिक प्रारूप में किसी प्रकार के बदलाव को प्रतिबंधित करती है। ज्ञानवापी प्रकरण से जुड़े मामलों में से एक में यह दलील दी गई है कि हम धार्मिक प्रारूप में किसी प्रकार के बदलाव की मांग नहीं कर रहे, अपितु उसे जारी रखने की मांग कर रहे हैं। ऐसी दलील देने वालों का कहना है कि ज्ञानवापी में श्रृंगार गौरी की पूजा 1991 तक लगातार प्रतिदिन होती रही। उनके मुताबिक अभी भी साल में एक बार यह पूजा होती है। इन दलीलों के आलोक में तथ्यों की जांच करके सच तक पहुंचना और कानून के अनुसार निर्णय देना अदालत की जिम्मेदारी है। एडवोकेट कमिश्नर या किसी दूसरी एजेंसी से स्थलीय निरीक्षण भी इस प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए इस न्यायिक कार्यवाही को सांप्रदायिक रंग देने से बचना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

कानूनी दांवपेच अनंत काल तक चल सकते हैं। उनसे सामाजिक सामंजस्य नहीं बन पाता। आस्था से जुड़े भावनात्मक मामलों में जनभावना की अनदेखी करने वाले कानून भी उसमें कारगर नहीं होते। सुलझाने के बजाय उनसे उलझाव की आशंका अधिक रहती है। इसके लिए धर्मस्थल अधिनियम जैसे कानून के बजाय दक्षिणी अफ्रीकी अनुभव का अनुसरण कहीं उचित होगा। वास्तव में अतीत की कमियों को दुरुस्त कर और सबके मन में न्याय-बोध विकसित करके ही इसका स्थायी समाधान निकल सकता है।


आर्थिक असमानता से बढ़ती मुश्किलें

कृष्ण जांगिड़

गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ती खाई आज भारत के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। आक्सफैम इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘इनक्वालिटी किल्स’ के मुताबिक कोविड-19 के बाद जहां दुनिया की एक बड़ी आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी जद्दोजहद कर रही है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के दस सबसे अमीर लोगों की संपत्ति बीते दो वर्षों में दोगुनी हो चुकी है। यानी करीब बावन लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर एक सौ ग्यारह लाख करोड़ को पार कर चुकी है। इसका मतलब है कि हर दिन उनकी संपत्ति में लगभग 9656 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ।

इस रिपोर्ट का दूसरा पहलू बड़ा चिंताजनक है, जो बताता है कि इन्हीं दो वर्षों में दुनिया की निन्यानबे फीसद आबादी की आमदनी में कमी दर्ज की गई है। कोविड महामारी के चलते दुनिया में करीब सोलह करोड़ लोग गरीबी की मार झेलने को मजबूर हुए हैं। आक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक गैब्रिएला बुचर ने कहा था कि अगर ये दस लोग कल अपनी संपत्ति का निन्यानबे फीसद हिस्सा खो भी देते हैं, तो वे धरती के निन्यानबे फीसद लोगों से ज्यादा अमीर होंगे।

आर्थिक असामानता को लेकर भारत के मामले में आंकड़े कहते हैं कि 2021 में देश के चौरासी फीसद परिवारों की आय घटी है, लेकिन भारतीय अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़ कर 142 हो चुकी है। कोविड महामारी के दौरान भारतीय अरबपतियों की संपदा 23.14 लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर 53.16 लाख करोड़ रुपए हो गई है। वैश्विक स्तर पर देखें तो चीन और अमेरिका के बाद भारत में अरबपतियों की तीसरी सबसे बड़ी संख्या है। वहीं एक ओर संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में पैदा होने वाली नई गरीबी में लगभग आधी भारत में सृजित हो रही है।

आर्थिक विषमता जीवन के हर पहलू पर प्रभाव डालती है। एक बड़े वर्ग के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी कर पाना असंभव होता है तो एक छोटे समूह के पास साधन-संसाधन विलासिता की तरह रहते हैं। नतीजतन, शोषित और गरीब जन में क्षोभ पनपता और ऐसी गतिविधियां बढ़ती हैं, जिन्हें मोटे तौर पर अपराध में वर्गीकृत किया गया है।

आर्थिक तौर पर यह गैर-बराबरी सबसे गरीब लोगों, महिलाओं और लड़कियों को अधिक प्रभावित करती है। गरीबी के चलते उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और अन्य मूलभूत साधनों से पहुंच दूर होती है। 2021 के नवंबर माह में भारत के नीति आयोग ने देश में पहला बहुआयामी गरीबी सूचकांक जारी किया था। इसके अनुसार गरीबी स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनस्तर के अनेक पहलुओं से जुड़ी होती है। इस रिपोर्ट के अनुसार 37.6 प्रतिशत भारतीय परिवार पर्याप्त पोषणयुक्त भोजन नहीं कर पाते और करीब चौदह प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जहां दस या इससे अधिक उम्र के बच्चे स्कूलों में छह वर्ष तक पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि बिहार में गरीबी का अनुपात सबसे अधिक है, इसके बाद झारखंड और उत्तर प्रदेश का स्थान है। सर्वाधिक कुपोषण के मामले में क्रमश: बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश हैं। इसका सीधा अर्थ है कि गरीबी पोषण से सीधे तौर पर संबंधित है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पंद्रह से उनचास आयु वर्ग की आधी से अधिक भारतीय महिलाएं शरीर में खून की कमी से पीड़ित हैं और पिछले कुछ वर्षों में ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ी है। हमारे देश में पांच वर्ष से कम उम्र के सत्रह फीसद से अधिक बच्चों का वजन उनकी लंबाई और उम्र के मुताबिक कम है। बीते वर्ष ही संसद में दिए गए एक जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बताया कि नवंबर 2020 तक भारत में 9.2 लाख से अधिक बच्चे ‘गंभीर रूप से कुपोषित’ थे।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और आक्सफोर्ड पावर्टी ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव द्वारा पिछले ही वर्ष जारी किए गए वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक को देखें तो गरीबी के मामले में दुनिया के 109 देशों में भारत 66वें स्थान पर है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों का दूसरा लक्ष्य गरीबी उन्मूलन करना है। भारत ने भी इन लक्ष्यों को अपनाया है, लेकिन हमारे देश में गरीबी के ये भीषण आंकड़े इस लक्ष्य को असंभव-सा बना रहे हैं।

भारत दुनिया में चौथा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार वाला राष्ट्र है। हमने पांच खरब डालर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है और मानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अगले तीन वर्ष तक दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। इस सबके साथ ही हमारे यहां कारपोरेट घरानों की संपदा बढ़ रही है और गरीबी का विस्तार हो रहा है। इस दौर में गाड़ी चलाने से लेकर चूल्हा जलाने के महंगे ईंधन से धनिक वर्ग पर शायद ही खास प्रभाव पड़े, मगर निम्न और मध्यवर्ग के लिए यह गंभीर संकट की तरह है। देश की एक बड़ी आबादी, जो पहले मध्य या निम्न मध्यवर्ग में शामिल थी, महामारी और पूर्णबंदी के चलते गरीबी रेखा से नीचे खिसक चुकी है। वहीं बंदी के चलते आनलाइन कार्य संस्कृति के विस्तार में साधन-संसाधन युक्त एक वर्ग सहजता से फिट हुआ और कई सफल बिजनेस माडल इस दौर में फले-फूले हैं। ऐसी भीषण आर्थिक विषमता किसी भी सभ्य और संतुलित व्यवस्था के अनुकूल नहीं होती। लोकतंत्र में तो कदापि नहीं; क्योंकि ऐसे समाज में सत्ता के शीर्ष पर पूंजीपति वर्ग का आधिपत्य होना अवश्यंभावी होता है। चूंकि इस स्थिति में पूंजीपति और पूंजीहीनों के मध्य टकराव स्वाभाविक हो जाता है और बहुसंख्यक के हितों को दरकिनार कर लोकतंत्र के स्थायित्व की उम्मीद बेमानी हो जाती है।

गौरतलब है कि सत्तर वर्ष पहले हमारे देश में शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति के आधार पर शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिया गया था। पर इन दशकों में हमने गैर-बराबरी के एक और पैमाने को विकसित किया है और वह है आर्थिक आधार। भारत में तेजी से बढ़ती गरीबी और असमानता ने हमारे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। देश में गरीबी उन्मूलन के लिए जो नीतियां-कार्यक्रम और योजनाएं तैयार की गर्इं, आर्थिक विषमता के चलते उनकी सफलता पर भी सवाल उठते हैं। देश में अमीरी-गरीबी की गहराती खाई को पाटने के लिए आज आवश्यकता है कि सरकारें पारदर्शी प्रशासन के साथ अपनी कल्याणकारी भूमिका का विस्तार करें। भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता की नीति के साथ नागरिकों को स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, आवास और भोजन का मौलिक अधिकार दें। सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार के साथ ही रोजगार सृजन, क्षमता निर्माण, ग्राम सशक्तिकरण, लघु और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन और संपत्ति के पुनर्वितरण जैसे उपायों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। साथ ही प्रगतिशील कर यानी अधिक धनिक पर अधिक करारोपण की व्यवस्था सख्ती से लागू कर देश में आर्थिक गतिशीलता पैदा करें।

महात्मा गांधी का आर्थिक दर्शन न्यासिता की अवधारणा देता है। यानी समाज का संसाधन संपन्न तबका अपनी आवश्यकताएं पूर्ण कर उन लोगों को धन वितरित करे, जिन्हें जरूरत है। यह कार्ल मार्क्स की वर्ग संघर्ष अवधारणा से सर्वथा विपरीत है, जिसमें मार्क्स कहते हैं कि सर्वहारा वर्ग हिंसा के जरिए बुर्जुआ वर्ग को सत्ता और संसाधनों से बेदखल कर देगा। विनोबा भावे ने संपन्न भूमिपतियों से भूमिहीनों के हित में भूदान लिया था। हमारा संविधान भी नीति निर्देशक तत्त्वों में समाजवाद के दर्शन पर बल देता है, आर्थिक समानता पर बल देता है। एक सौ पैंतीस करोड़ भारतीयों के विकास के लिए साधन-संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण वर्तमान भारत की एक महती आवश्यकता है।