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आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY)

आयुष्मान भारत


यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (यू-एच-सी) के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, भारत सरकार की एक प्रमुख योजना “आयुष्मान भारत” का प्रक्षेपण राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के द्वारा अनुशंसित किया गया। यह पहल, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और इसकी रेखांकित प्रतिबद्धता को पूरा करने के लिए तैयार की गई है, जिसका उद्देश्य है की “कोई भी पीछे ना छूटे।”

“आयुष्मान भारत” स्वास्थ्य सेवा वितरण के क्षेत्रीय और खंडित दृष्टिकोण से हट कर, एक व्यापक और अपेक्षित स्वास्थ्य सेवा की ओर बढ़ने का प्रयास है। इस योजना का उद्देश्य प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर पर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली (प्रिवेन्शन, प्रमोशन एवं एंबुलेटरी केयर) को समग्रित रूप से सम्बोधित करना है। आयुष्मान भारत अबाध्य स्वास्थ्य सेवाओं की ओर एक बड़ा क़दम है। इसमें दो अंतर-संबंधित घटक शामिल हैं, जो निमलिखित हैं: –

  • स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWC’s)
  • प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जय)
1. स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWCs)


फरवरी 2018 में, भारत सरकार ने मौजूदा उप केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को बदलकर 1,50,000 स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र (HWCs) बनाने की घोषणा की। यह पहल, व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (CPHC) और स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के घरों तक पहुंचाने की कोशिश हैं। इन केंद्रों में नि:शुल्क आवश्यक दवाइयाँ, गैर-संचारी रोगों सहित नैदानिक एवं मातृ और बाल स्वास्थ्य सेवाएँ भी उपलब्ध हैं।

इन स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की परिकल्पना अपने क्षेत्र की संपूर्ण आबादी में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार एवं सार्वभौमिकता के लक्ष्य से की गई। स्वास्थ्य संवर्धन और रोकथाम की रचना व्यक्तियों और समुदायों में स्वस्थ व्यवहारों को अपनाने और लोगों को स्वस्थ व सशक्त बनाने के लिए की गयीं हैं ताकि वे जटिल बीमारियों और उनसे उत्पन जोखिम से सुरक्षित रह सकें।

2. प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना


आयुष्मान भारत के तहत दूसरा घटक प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना है जिसे लोग (पीएम-जय)के नाम जानते हैं। यह योजना 23 सितंबर, 2018 को भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के द्वारा रांची, झारखंड में शुरू की गई।

आयुष्मान भारत (पीएम-जय)दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आश्वासन योजना है, जिसका उद्देश्य प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का मुफ़्त इलाज माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 10.74 करोड़ से भी अधिक गरीब और वंचित परिवारों (या लगभग 50 करोड़ लाभार्थियों को) मुहैया कराना जो भारतीय आबादी का 40% हिस्सा हैं। यह संख्या और शामिल किए गए परिवार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011 (SECC 2011) के अभाव और व्यावसायिक मापदण्डों पर आधारित हैं। (पीएम-जय)को पहले राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (NHPS) के नाम से जाना जाता था। पूर्ववर्ती राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना (RSBY), जिसका प्रमोचन 2008 में हुआ था, का विलय (पीएम-जय)में किया गया। इसलिए (पीएम-जय)के तहत, उन परिवारों को भी शामिल किया गया है जो RSBY में उल्लिखित थे, लेकिन SECC 2011 के डेटाबेस में मौजूद नहीं हैं। (पीएम-जय)पूरी तरह से एक सरकार द्वारा वित्त-पोषित योजना है जिसकी कार्यान्वयन की लागत केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बाटी गई है।

(पीएम-जय) की मुख्य विशेषताएं


  • (पीएम-जय)पूरी तरह से सरकार द्वारा वित्त-पोषित दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा/आश्वासन योजना है।
  • यह योजना भारत में सार्वजनिक व निजी सूचीबद्ध अस्पतालों में माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य उपचार के लिए प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक की धन राशि लाभार्थियों को मुहया कराती है।
  • 10.74 करोड़ से भी अधिक गरीब व वंचित परिवार (या लगभग 50 करोड़ लाभार्थी) इस योजना के तहत लाभ प्राप्त कर सकतें हैं।
  • (पीएम-जय)सेवा संस्थान अर्थात “अस्पतालों” में लाभार्थी को स्वास्थ्य सेवाएँ निशुल्क प्रदान करती है।
  • (पीएम-जय)चिकित्सा उपचार से उत्पन अत्यधिक ख़र्चे को कम करने में मदद करती है, जो प्रत्येक वर्ष लगभग 6 करोड़ भारतीयों को गरीबी की रेखा से नीचे पहुचा देता है।
  • इस योजना के तहत अस्पताल में भर्ती होने से 3 दिन पहले और 15 दिन बाद तक का नैदानिक उपचार, स्वास्थ्य इलाज व दवाइयाँ मुफ्त उपलब्ध होतीं हैं।
  • इस योजना के तहत परिवार के आकार, आयु या लिंग पर कोई सीमा नहीं है।
  • इस योजना के तहत पहले से मौजूद विभिन्न चिकित्सीय परिस्थितियों और गम्भीर बीमारियों को पहले दिन से ही शामिल किया जाता है।
  • (पीएम-जय)एक पोर्टेबल योजना हैं यानी की लाभार्थी इसका लाभ पूरे देश में किसी भी सार्वजनिक या निजी सूचीबद्ध अस्पताल में उठा सकतें हैं।
  • इस योजना में लगभग 1,393 प्रक्रियाएं और पैकिज शामिल हैं जैसे की दवाइयाँ, आपूर्ति, नैदानिक सेवाएँ, चिकित्सकों की फीस, कमरे का शुल्क, ओ-टी और आई-सी-यू शुल्क इत्यादि जो मुफ़्त उपलब्ध हैं।
  • स्वास्थ्य सेवाओं के लिए निजी अस्पतालों की प्रतिपूर्ति सार्वजनिक अस्पतालों के बराबर की जाती है।

पीएम-जय के तहत लाभ


भारत में कई सरकारी वित्त-पोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं रही है जिनके अंतर्गत विभिन्न राज्यों में प्रति परिवार 30,000 रुपये से लेकर 3,00,000 रुपये तक की धन राशि मुहैया कराई जाती थी जो असमानता उत्पन करती थीं। (पीएम-जय) समस्त लाभार्थियों को सूचीबद्ध माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्रति परिवार प्रति वर्ष 5,00,000 रुपये मुहैया कराती है। इस योजना के तहत निम्नलिखित उपचार निशुल्क उपलब्ध हैं।

  • चिकित्सिक परीक्षा, उपचार और परामर्श
  • अस्पताल में भर्ती से पूर्व ख़र्चा
  • दवाइयाँ और चिकित्सा उपभोग्य
  • गैर-गहन और गहन स्वास्थ्य सेवाएँ
  • नैदानिक और प्रयोगशाला जांच
  • चिकित्सा आरोपण सेवाएं (जहां आवश्यक हो)
  • अस्पताल में रहने का ख़र्चा
  • अस्पताल में खाने का ख़र्चा
  • उपचार के दौरान उत्पन्न होने वाली जटिलताएँ
  • अस्पताल में भर्ती होने के बाद 15 दिनों तक की देखभाल

इस योजना में 5,00,000 रुपये का लाभ पूरे परिवार को मिलता है, यानेकि इसका उपयोग परिवार के एक या सभी सदस्यों द्वारा किया जा सकता है। RSBY योजना के तहत पाँच सदस्यों की पारिवारिक सीमा थी। उन योजनाओं से सीख लेते हुए, (पीएम-जय)की संरचना इस प्रकार की गई है कि परिवार के आकार या सदस्यों की उम्र पर कोई सीमा नहीं रखी गई है। इसके एलवा, पहले से मौजूद विभिन बीमारियों को इस योजना में पहले दिन से ही शामिल किया जाता है। इसका मतलब यह है कि (पीएम-जय)में नामांकित होने से पहले किसी भी क़िस्म की बीमारी या स्वास्थ्य अस्थिथि से पीड़ित व्यक्ति उन सभी चिकित्सीय परिस्थितियों के लिए, और साथ ही पीएम-जय योजना के तहत सारे उपचार, प्राप्त करने के लिए पहले दिन से ही लाभार्थी है।

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Source: https://pmjay.gov.in/
भारत समुद्री उत्‍पादों के निर्यात में विश्‍व में चौथे सबसे बडे निर्यायत के रूप में उभरा है

सूचना और प्रसारण राज्‍य मंत्री एल. मुरूगन ने कहा है कि भारत समुद्री उत्‍पादों के निर्यात में विश्‍व में चौथे सबसे बडे निर्यायत के रूप में उभरा है। कल चेन्‍नई में ताम्‍बरम स्थित मद्रास निर्यात संबर्धन जोन में विदेश व्‍यापार महानिदेशालय द्वारा आयोजित विजय सप्‍ताह का उद्धाटन करते हुए उन्‍होंने कहा कि देश में कुल कृषि उत्‍पाद निर्यात में समुद्री उत्‍पादों का योगदान 17 से 18 प्रतिशत है। उन्‍होंने कहा कि केन्‍द्र सरकार का मत्‍स्‍य संपदा कार्यक्रम अत्‍यन्‍त लाभदायक सिद्ध हुआ है।

चक्रवाती तूफान गुलाब

बंगलादेश में चक्रवाती तूफान गुलाब उत्‍तर-पश्चिम खाड़ी तथा पश्चिम-मध्‍य खाड़ी से पश्चिम की ओर बढ़ रहा है

बंगलादेश में चक्रवाती तूफान गुलाब उत्‍तर-पश्चिम खाड़ी तथा पश्चिम-मध्‍य खाड़ी से पश्चिम की ओर बढ़ रहा है। रविवार दोपहर बारह बजे चक्रवाती तूफान चटग्राम से 725 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में केन्द्रित है। इसके उत्‍तर आन्‍ध्र प्रदेश और दक्षिण ओडिशा तट की ओर बढ़ने की संभावना है।

बंगलादेश के चटग्राम, कोक्‍स बाजार, मोंगिया और पायरा बन्‍दरगाहों को स्‍तर-2 की चेतावनी पर रखा गया है। मछुआरों को समुद्र में तटों के पास लौटने सलाह दी गयी है।
Source : newsonair

भारत-अमेरिका स्वास्थ्य संवाद 2021

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री डॉ. भारती प्रवीण पवार ने आज स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में चौथे भारत-अमेरिका स्वास्थ्य संवाद के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित किया। इस आयोजन की मेजबानी भारत कर रहा है।

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संवाद में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वहां के स्वास्थ्य मंत्रालय के वैश्विक मामलों के विभाग की निदेशक सुश्री लॉयस पेस ने की। प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों में अमेरिका के स्वास्थ्य मंत्रारय के वैश्विक मामलों के विभाग की एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र की निदेशक सुश्री मिशेल मैक्कॉनल, डॉ. मिचेल वूल्फ और सुश्री डायना एम. बेनसिल शामिल थीं।

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भारत की तरफ से स्वास्थ्य सचिव श्री राजेश भूषण, बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सचिव डॉ. रेणु स्वरूप, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक और स्वास्थ्य अनुसंधान सचिव डॉ. बलराम भार्गव और मंत्रालय के अन्य आला अधिकारियों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

दो दिवसीय संवाद के माध्यम से एक ऐसा मंच उपलब्ध होगा, जहां भारत और अमेरिका के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में किये जाने वाले विभिन्न सहयोग पर चर्चा की जायेगी। इस दौर की बातचीत के लिये जिन विषयों का चयन किया गया है, उनमें महामारियों से सम्बंधित अनुसंधान, निगरानी, वैक्सीन विकास, ‘वन-हेल्थ,’ (मनुष्य, जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों से सम्बंधित स्वास्थ्य कड़ी) पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाली बीमारियां, मच्छरों और अन्य जीवाणुओं द्वारा फैलने वाले रोगों, स्वास्थ्य प्रणालियों और स्वास्थ्य नीतियों, आदि शामिल किये गये हैं।

मंत्री महोदया ने कोविड-19 महामारी के दौरान दोनों पक्षों के बीच आपसी एकजुटता का उल्लेख करते हुये कहा कि इस मामले में दोनों देशों ने एक-दूसरे का भरपूर सहयोग किया। उन्होंने इस बात की सराहना की कि भारत और अमेरिका ने अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया है, खासतौर से दवाओं, इलाज और वैक्सीन के विकास के क्षेत्र में। यह सहयोग इस बात से साबित होता है कि भारतीय वैक्सीन कंपनियां कोविड-19 वैक्सीन के विकास के लिये अमेरिका स्थित एजेंसियों के साथ सहयोग कर रही हैं।

डॉ. पवार ने मानसिक स्वास्थ्य पर 2020 में हुये समझौते के हवाले से कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग और द्विपक्षीय सम्बंधों को मजबूती मिली है। भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा अमेरिका के स्वास्थय और मानव सेवा मंत्रालय के बीच एक और समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया है। इसमें स्वास्थ्य सुरक्षा और संरक्षा, संचारी और गैर-संचारी रोगों, स्वास्थ्य प्रणालियों और स्वास्थ्य नीति जैसे बड़े विषयों को शामिल किया गया है।

डॉ. पवार ने कहा कि संक्रामक रोगों को रोकने और नियंत्रण करने सम्बंधी उभरते क्षेत्रों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके तहत सही और प्रामाणिक वैज्ञानिक तरीके से काम करना तथा दोनों देशों के बीच सहयोग को शामिल किया गया है, ताकि वैज्ञानिक खोजों को बढ़ावा मिले एवं वैश्विक स्वास्थ्य आपदाओं से निपटा जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस उद्देश्य को पूरा करने के लिये सार्वजनिक और निजी सेक्टर को मिलकर काम करना होगा तथा नवाचार के जरिये मिलकर स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत बनाना होगा, ताकि सबको वह उपलब्ध हो सके तथा गैर-बराबरी समाप्त हो।

दो दिवसीय संवाद के शुरू होने के अवसर पर डॉ. पवार ने कहा कि इस मंच से सभी प्रतिभागियों को यह मौका मिलेगा कि वे विस्तार से चर्चा करें, जिनके नतीजों को भारत और अमेरिका की विभिन्न एजेंसियों के बीच स्वास्थ्य साझेदारी की संभावना बढ़ाने में उपयोग किया जा सके

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Source : PIB

एनसीडब्ल्यू ने डेयरी फार्मिंग में महिलाओं के लिए देशव्यापी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किया

ग्रामीण महिलाओं को सशक्त करने और उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के एक प्रयास के तहत, राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने डेयरी फार्मिंग में महिलाओं के लिए एक देशव्यापी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू किया है। आयोग डेयरी फार्मिंग और संबद्ध गतिविधियों से जुड़ी महिलाओं की पहचान और प्रशिक्षण के लिए पूरे भारत में कृषि विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग कर रहा है। इन गतिविधियों में मूल्यवर्धन, गुणवत्ता वृद्धि, पैकेजिंग और डेयरी उत्पादों का विपणन अन्य शामिल हैं।

परियोजना के तहत पहला कार्यक्रम हरियाणा राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से राज्य के हिसार जिले में स्थित लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के लिए ‘मूल्य वर्धित डेयरी उत्पाद’ के विषय पर आयोजित किया गया था। परियोजना का शुभारंभ करते हुए, एनसीडब्ल्यू की अध्यक्ष श्रीमती रेखा शर्मा ने कहा कि वित्तीय स्वतंत्रता महिला सशक्तिकरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत की महिलाएं डेयरी फार्मिंग के हर हिस्से में शामिल हैं, फिर भी वे वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में असमर्थ हैं। एनसीडब्ल्यू का लक्ष्य अपनी परियोजना के माध्यम से महिलाओं को डेयरी उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने, उनके मूल्यवर्धन, पैकेजिंग और शेल्फ लाइफ को बढ़ाने तथा उनके उत्पादों के विपणन से जुड़ा प्रशिक्षण देकर सशक्त करना और वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में उनकी मदद करना है।

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राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं की उनकी पूरी क्षमता हासिल करने और एक स्थायी अर्थव्यवस्था के निर्माण में योगदान देने में मदद करने के लिए काम कर रहा है। आयोग हमेशा महिलाओं की समानता के लिए खड़ा रहा है क्योंकि यह दृढ़ता से मानता है कि अर्थव्यवस्था सफल नहीं हो सकती अगर हम अपनी आधी आबादी को उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने से रोकेंगे।

एनसीडब्ल्यू का उद्देश्य डेयरी फार्मिंग क्षेत्र में विस्तार संबंधी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण और व्यावहारिक विचारों की एक श्रृंखला के माध्यम से महिला किसानों और स्वयं सहायता समूहों की मदद करना है। आयोग महिलाओं को उनके व्यवसाय को बढ़ाने और उन्हें उद्यमिता के लिए प्रोत्साहित करने की खातिर प्रशिक्षण प्रदान करेगा। एनसीडब्ल्यू ऐसे प्रशिक्षकों का भी चयन करेगा जो महिला उद्यमियों, महिलाओं द्वारा संचालित दूध सहकारी समितियों, महिला स्वयं सहायता समूहों आदि को प्रशिक्षित करेंगे। एनसीडब्ल्यू का उद्देश्य डेयरी क्षेत्र में एक स्थायी और अनुकरणीय जिला स्तरीय मॉडल बनाना है जिसे आगे देश के डेयरी फार्मिंग क्षेत्रों में अपनाया जा सके। परियोजना का उद्देश्य डेयरी उत्पादों के निर्माण एवं विपणन के लिहाज से गांवों में उपलब्ध अपार क्षमता का दोहन करना और इस प्रक्रिया के साथ-साथमहिलाओं को सशक्त बनाना है ताकि वे वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त कर सकें।

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PIB

वतर्मान में शासन-व्यवस्था में प्रायः नैतिक मूल्यों का अभाव देखा जाता है। आपके विचार से शासन-व्यवस्था में नैतिक-मूल्यों का सुदृढ़ीकरण कैसे संभव है?
आकाशवाणी समसामयिकी चर्चा (27, सितंबर 2021):
  • चर्चा का विषय – सेवा और समर्पण – 20 साल सुशासन के, श्रृंखला के अंतर्गत “देश की अष्टलक्ष्मी पूर्वोत्तर राज्य” पर विशेष कार्यक्रम


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27-09-2021-समाचारपत्रों-के-संपादक

Date:27-09-21

Tariffs & Strategy

China can be countered by getting global value chains to shift here. But we have high trade costs

TOI Editorials

The first in-person leaders’ summit last week of the Quad grouping resulted in a promising outcome that meshes economic integration with the overarching strategic motive. India is an immediate beneficiary of this thrust. The Quad Vaccine Partnership is financing a manufacturing expansion of domestic vaccine maker Biological E. The summit’s joint statements highlighted other potential areas of collaboration. The clean hydrogen partnership, a semiconductor supply chain initiative and telecommunications are three areas where India will potentially be presented with opportunities to make a technological and economic leap.

If the Quad’s economic potential is to materialise, it will come through private sector collaboration. In economic terms, the Quad economies are the antithesis of China, private firms operating in rules-based market economies drive things forward. For sure, agreements between governments will create an enabling environment. The potential will however have to be realised by private firms. In other words, if the Indian economy is to benefit from the opportunity arising out of the realignment, private firms need enough incentive to invest here.

In practical terms it translates into India’s tighter integration into global value chains (GVCs). An important factor influencing integration is the level of trade costs in India, through both tariff and non-tariff barriers. India’s trade policy in the recent past has pushed up costs through tariff increases. WTO data shows that India’s simple average applied MFN (most favoured nation) tariff increased from 13% in 2014-15 to 15.4% in 2020-21. At a more granular level, the percentage of tariff lines in the 10-30% duty category increased from 12.1% in FY15 to 22.1% in FY21. There’s been a marked shift towards protectionism that has on average increased trade costs. It will only discourage potential GVC investments. The prevailing favourable strategic environment needs supportive trade policies that persuade GVCs to come here.

India’s FDI inflows have increased recently in absolute terms but a look at the nature of flows suggests that access to the domestic market has been an important pull factor. There will be more positive spin-offs if an increasing incidence of inflows locks the domestic firms into GVCs. It will lead to diffusion of advanced technology and raise productivity across-the-board. Therefore, the historic opportunity arising out of closer ties of the Quad grouping can be realised if India reorients its trade regime to draw in FDI that binds the Indian economy to GVCs extensively. India is a more stable and dependable alternative to China for GVCs.


Date:27-09-21

Four Plus Two Minus

Quad summit shows India matters in an emerging world order. But the Af-Pak challenge remains

Indrani Bagchi

The first in-person Quad summit in Washington DC marked the start of 21st-century foreign policy. India, the US, Japan and Australia took the high road to “recognise that our shared futures will be written in the Indo-Pacific.” Buried in the Quad joint statement, this acknowledgement effectively pivots the Quad towards the oceans, China, and a whole new set of challenges that will test these powers as never before. Because what’s at stake is a new world order, with new standards and ways of cooperation. It’s not the United Nations, but interlocking groups of converging and connecting countries.

Technology, big enough, is foreign policy, and that was the singular message from the summit. It is deeply reassuring because a collaborative future by building 21st-century technology backbone is key to a multipolar world order.

While it might be argued that the core of the Quad is the US-China rivalry, the fact is all four powers – and several more besides – would be opposed to a Sino-centric, closed world order. The alternative won’t always be fair or equitable, but at least one in which India can have its share and say.

The three Cs – Covid, critical technologies and climate – dominated proceedings. India announced the restart of its vaccine exports – among the most lamentable decisions by GoI in recent times has been shutting the vaccine export pipeline, because it failed to do basic math.

Biological E will roll out J&J doses from October, and other Indian vaccine producers are expected to put their shoulder to the wheel. India will do penance by financing 50% of the first J&J rollout. The Quad fine print is more promising – pandemic surveillance, therapeutics trials, etc – essentially pooling resources, technologies and capacities, in different permutations and combinations, but with similar overarching aims.

A Quad commitment to keeping supply chains for vaccines and therapeutics open came after a US-EU pact on open vaccine supply chains a week prior to the summit. But that was also when the US and EU were on cordial terms before AUKUS ate their lunch.

Much more important was the agreement on emerging and critical technologies, which should work to diversify from China and create alternate trusted networks. The summit flagged the immediate importance of securing supply chains for semiconductors – “resilient, diverse and secure technology supply chains, for hardware, software and services – are vital for our shared national interests.”

Using Open-RAN for 5G and beyond 5G has a strong geopolitical imperative – keeping China’s closed networks at bay by opening up to vendor-agnostic ecosystems, provides for greater openness, innovation and security. That leaves wiggle room for individual countries and their systems while allowing apparently disparate networks to “talk” to each other. This is a pushback against China’s sneaking in on communication platforms and against the likes of Huawei and Tencent.

On climate, India quietly signed on to a “net-zero by 2050” pledge, albeit with a rider on “national circumstances”. At least now the monkey is off its back, and COP26 in Glasgow promises to be a smoother experience. The key here is for India to secure financing and technology for its energy transition – there is no shortage of ambition, but a big gap in capacities has to be filled.

In all of these, India can leverage its strengths for a bigger share of the pie – for instance, India has the tech brains for chip designs but not the manufacturing abilities, no matter how persuasive GoI is. Similarly, in vaccines and climate, India should put itself in a position to trade one for the other.

But to put this 21st-century foreign policy into practice India’s domestic policies have to be in sync – rewrite “atmanirbhar” to mean something other than 1970s protectionism.

This brings us to the new animal in the room, AUKUS. The new security partnership between UK, US and Australia and centres on the supply of nuclear-propelled attack submarines to Canberra. This will mean a couple of things – Australia has burnt its boats with China, will no longer be wooed back, and therefore be a stronger member of the Quad.

The deal blows many non-proliferation sensitivities out of the water, and opens a path for India that could lead to French Suffren/Barracuda subs for the Indian navy. AUKUS does not steal the Quad thunder, it merely adds to China’s challenges. It will allow India to focus much more in the Indian Ocean and Japan to the Chinese threat in its waters.

AUKUS also opens the way for other minilateral groupings for specific purposes. India-Australia-Indonesia; India-Japan-Australia; India-Vietnam-Japan; India-US-South Korea … and so on. The big one – India-Australia-France – will be offline until France feels more comfortable. Whatever else, AUKUS countries showed shabby diplomacy doesn’t pay.

The event was also the ceremonial pivot away from Af-Pak and the adjoining continental theatre. The US’s shambolic withdrawal from Afghanistan has opened space for extremism and terrorism that Washington wants to look away from. India has no such luxury. So it was important for the Quad to “denounce the use of terrorist proxies and emphasised the importance of denying any logistical, financial or military support to terrorist groups which could be used to launch or plan terror attacks, including cross-border attacks.” This should translate into helping India as it faces off a renewed terror challenge from Pakistan’s proxies.

When China looks up from the Evergrande crisis and Russia from its elections, they will have their hands full with Pakistan and Taliban. In a sense, so will India. The trouble for India is this – just as it pivots to a 21st-century foreign policy, the troubles of the past are returning with renewed nastiness.

There is a tide in the affairs of men, which taken at the flood, leads on to fortune. Omitted, all the voyage of their life is bound in shallows and in miseries. On such a full sea are we now afloat – this, as Shakespeare predicted, is India’s lot.


Date:27-09-21

Indo-Pacific Ties Enhance Security

Keeping the Indo-Pacific free, open critical

ET Editorials

The India-US relationship and India’s participation in efforts to maintain stability and openness in the Indo-Pacific region have grown deeper and more strategic. The focus of the India-US bilateral relationship on global good, and Quad partnership’s accent on infrastructure, technology and health are both welcome.

For India, the new Indo-Pacific coalition Aukus — Australia, Britain and US — is a positive development. It signals strong political resolve, particularly in Washington, to deal with the security challenges that Beijing poses in the region. The coalition, designed to deter China, will give India, even without its active participation, a security fall back and support. This gives India the space to focus on the infrastructure, technology, health and climate change aspects of the Quad partnership. These are interlinked. The mapping of the region’s infrastructure needs, coordinating regional needs and opportunities, providing technical assistance, empowering regional partners with evaluative tools and promoting sustainable infrastructure development will be a powerful engine for sustainable growth in the region as well. It will push to create certain standards, transparency and, most importantly, an opportunity for the region to develop without worrying about their assets being in the hock to a rapacious regional power, and possibly forfeited, as with Sri Lanka’s foreign-financed port. Deploying public finance, with the purpose of leveraging private investment, and the availability of loans at concessional rates would be critical to give the Build Back A Better World initiative the edge it needs to counter the Belt and Road Initiative. The Quad’s vaccine initiative to address the inequity that plagues large parts of the global south and its partnership on critical technologies provide other pillars of the fight to keep the Indo-Pacific region open.

India, the Asean countries and the broader Asia-Pacific region all gain from the new alliances in the Indo-Pacific. These must be nurtured, intelligently.


Date:27-09-21

संयुक्त राष्ट्र में मोदी

संपादकीय

संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न विषयों पर जिस प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रखी, उससे उन्होंने न केवल खुद को दुनिया की चिंता करने वाले राजनेता के रूप में चित्रित किया, बल्कि भारत के बढ़ते हुए कद को भी रेखांकित किया। इस मंच से एक ओर जहां उन्होंने दुनिया को भारत की कामयाबी की कहानी बयान की, वहीं दूसरी ओर कोविड महामारी के इस दौर में भारत के योगदान को भी स्पष्ट किया। उनके वक्तव्य ने यह साफ किया कि भारत अपने हितों के साथ दुनिया के हितों की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है। उन्होंने न केवल कोरोना रोधी टीकों के निर्यात का आश्वासन दिया, बल्कि टीका निर्माता कंपनियों को भारत आने का निमंत्रण भी दिया, ताकि दुनिया के गरीब देशों को जल्द से जल्द टीका उपलब्ध हो सके। अवसर की मांग के अनुरूप उन्होंने अफगानिस्तान का भी जिक्र किया और साफ तौर पर कहा कि इस देश की जमीन का इस्तेमाल अन्य देशों में आतंकवाद फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए। एक ऐसे समय जब चीन और पाकिस्तान बंदूक के बल पर अफगानिस्तान में काबिज हुए तालिबान की पैरवी में जुटे हों, तब यह आवश्यक था कि किसी की ओर से उस खतरे के प्रति सावधान किया जाता, जो अफगान क्षेत्र से उभरता हुआ दिख रहा है। यह अच्छा हुआ कि भारतीय प्रधानमंत्री ने इस दायित्व का निर्वहन बखूबी किया। और भी अच्छा यह हुआ कि इस क्रम में उन्होंने चीन और पाकिस्तान को खरी-खरी सुनाने में कोई संकोच नहीं किया।

भारतीय प्रधानमंत्री ने आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए जहां पाकिस्तान को निशाने पर लिया, वहीं विस्तारवादी प्रवृत्ति का परिचय दे रहे चीन को भी आईना दिखाया, जो हिंद प्रशांत समेत अन्य समुद्री क्षेत्रों में अपनी मनमानी करने में लगा हुआ है। इस मनमानी के खिलाफ आवाज उठनी ही चाहिए। नि:संदेह इसी के साथ यह भी आवश्यक था कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग की जाए। भारतीय प्रधानमंत्री ने केवल यह मांग ही नहीं की, बल्कि सीधे-सपाट शब्दों में यह भी कहा कि यदि संयुक्त राष्ट्र सुधारों की दिशा में आगे नहीं बढ़ता तो वह अप्रासंगिक हो जाएगा। सच तो यह है कि वह अप्रासंगिक होता हुआ नजर भी आने लगा है और इसी कारण भारतीय प्रधानमंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि इस संस्था को खुद को प्रासंगिक बनाए रखना है तो उसे अपने प्रभाव और विश्वसनीयता को बढ़ाना होगा। यह एक तथ्य है कि कोविड महामारी और आतंकवाद के मामले में संयुक्त राष्ट्र अपेक्षित भूमिका का निर्वाह नहीं कर सका।


Date:27-09-21

बहुपक्षीय विश्व का आह्वान

संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका की अपनी यात्रा से लौट आए हैं। उनकी इस यात्रा के दौरान ही क्वाड समूह के नेता पहली बार आपस में प्रत्यक्ष तौर पर मिले और इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित भी किया। अमेरिका की कुछ पिछली यात्राओं के उलट प्रधानमंत्री की यह यात्रा सुर्खियों में नहीं रही और इसे उस लिहाज से तैयार भी नहीं किया गया था। यह एक कार्यकुशल आधिकारिक यात्रा थी जिसके तहत भारत के सहयोग और उसकी बहुपक्षीय महत्त्वाकांक्षाओं के दायरे का विस्तार करना अहम चाह थी। मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में जो भाषण दिया उसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बहुपक्षीय संस्थानों के प्रभाव और उनकी विश्वसनीयता में सुधार करना होगा तभी वे अपनी प्रासंगिकता बरकरार रख पाएंगे। यह बात ध्यान देने लायक है कि एक भारतीय प्रधानमंत्री क्षतिग्रस्त विश्वसनीयता के लिए मौजूदा संस्थानों का उल्लेख कर रहा है। इसे भारत की लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा परिषद में और अधिक अधिकारों की मांग के दोहराव के रूप में भी देखा जा सकता है जिसे अमेरिका का भी समर्थन मिला। लेकिन हकीकत में मोदी ने विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक का विशेष उल्लेख किया। विश्व स्वास्थ्य संगठन अभी भी इसलिए विवादों में है क्योंकि वह महामारी के शुरुआती दौर में उसका सही ढंग से प्रबंधन नहीं कर सका और कोविड-19 के स्रोत की पड़ताल नहीं कर सका। विश्व बैंक की विश्वसनीयता को तब धक्का पहुंचा जब हाल ही में एक आंतरिक रिपोर्ट में कहा गया कि अतीत में उसकी कारोबारी सुगमता रैकिंग में अनियमितता देखी गई हैं।

मोदी ने विश्वसनीयता को पहुंची इस क्षति को सीधे कोविड-19 और जलवायु संकट जैसे वैश्विक संकटों से निपटने में दिखी निष्प्रभाविता से जोड़ दिया। मोदी ने जो आलोचना की वह उचित है और उनकी यह शिकायत बहुपक्षीयता को लेकर भारत की पुरानी शिकायतों से अलग है। वे शिकायतें पश्चिमी देशों के पास मौजूद विरासती शक्ति के बारे में थीं जिनके कारण विश्वयुद्ध के बाद की व्यवस्था बनी। जबकि ताजा टिप्पणियां चीन की बढ़ती शक्ति के कारण मची संस्थागत उथलपुथल का संदर्भ प्रस्तुत करती हैं। बहुपक्षीय प्रणाली में सुधार लाने के लिए कई स्तरों पर बदलाव लाने होंगे जिससे पारदर्शिता बढ़े और सत्ता संबंध में खुलापन आए। यदि अमेरिका ऐसा करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है तो चीन की बढ़ती शक्ति एक के बाद एक संस्थानों को क्षति पहुंचाती जाएगी। इसके बावजूद अमेरिका बहुपक्षीय सुधारों को लेकर धीमा रहा है। विश्व व्यापार संगठन की अपील व्यवस्था में सुधार में उसकी नाकामी यही दर्शाती है।

क्वाड को लेकर काफी ऊर्जा देखने को मिल रही है। क्वाड देशों के चारों नेताओं ने व्हाइट हाउस में मुलाकात की। इसके अलावा भी उनके बीच अनेक द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकें आयोजित हुईं। इससे पता चलता है कि इन देशों के बीच सहयोग व्यापक और गहरा हो रहा है। इस बैठक में भी वह रुझान बरकरार रहा जो मार्च 2021 में क्वाड की आभासी बैठक में देखने को मिला था। सदस्य देशों के बीच महामारी से जुड़ी राहत, जलवायु परिवर्तन तथा अन्य अहम अंतरराष्ट्रीय विषयों पर चर्चा हुई। अन्य क्षेत्रों में भी काफी प्रगति हुई। उदाहरण के लिए तकनीकी विकास को रेखांकित करने वाले साझा सिद्धांत जारी करना, अपनाना और उनका संचालन। अनुमान है कि ये सिद्धांत नई पीढ़ी के संचार ढांचे के चयन और प्रबंधन का संचालन करेंगे। यह अच्छी प्रगति है और इससे यह संभावना उत्पन्न होती है कि क्वाड उस क्षेत्र को लेकर ज्यादा मजबूत, खुला और मुक्त विकास पथ मुहैया कराने के दावे को मजबूत करेगा जहां चीन अपने निवेश और व्यापार की बदौलत दबदबा कायम कर रहा है। आशा की जानी चाहिए कि सैद्धांतिक सहयोग की यह नयी भावना जलवायु परिवर्तन, बुनियादी वित्त और संस्थागत सुधार में भी बरकरार रहे।


Date:27-09-21

कूटनीति और रणनीति

संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बार की अमेरिका यात्रा कूटनीतिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण कही जा सकती है। पिछले डेढ़ सालों में देश और दुनिया में स्थितियां काफी कुछ बदल गई हैं। अमेरिका में बाइडेन सरकार आने के बाद वहां के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। अफगानिस्तान में तालिबान ने लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्थ कर सत्ता हासिल कर ली है। चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत वहां अपनी जड़ें रोपना चाहता है। पाकिस्तान को भी लग रहा है कि अफगानिस्तान के सहारे वह कश्मीर में भारत को अस्थिर कर सकता है। ऐसे में अमेरिका ने ब्रिटेन, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत को शामिल करके चार देशों का जो क्वाड नामक चतुर्गुट बनाया है, वह दुनिया की बदलती स्थितियों से निपटने के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। हालांकि कुछ लोगों का मानना रहा है कि भारत को अब अमेरिका से वैसी नजदीकी नहीं हासिल होगी, जो पहले थी। मगर क्वाड सम्मिलन ने उस धारणा को निराधार साबित कर दिया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी की दुनिया के कुछ प्रमुख उद्योगपतियों से मुलाकात और संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनके भाषण से स्पष्ट हो गया कि आने वाले समय में दुनिया के राजनीतिक समीकरण और बदलेंगे।

प्रधानमंत्री का संयुक्त राष्ट्र में दिया भाषण न सिर्फ साहसिक और बेबाक था, उन देशों के लिए एक तरह से चुनौतीभरा भी था, जो भारत की तरफ टेढ़ी नजर रखते हैं। माना जा रहा है कि क्वाड का गठन चीन को चुनौती देने के मकसद से किया गया है, पर किसी भी सदस्य देश ने अभी तक उसका नाम नहीं लिया है। इस बैठक को अफगानिस्तान में हुए सत्ता परिवर्तन के मद्देनजर अधिक महत्त्वपूर्ण माना जा रहा था और सारी दुनिया की नजरें लगी थीं कि इसके सदस्य देश इस मुद्दे पर क्या रुख अख्तियार करते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति ने दुनिया में लोकतंत्र की अहमियत बताते हुए रेखांकित किया कि किसी भी रूप में इसका गला घोटा जाना बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने भी लोकतंत्र के महत्त्व को रेखांकित किया और चीन तथा पाकिस्तान का नाम लिए बगैर कह दिया कि कुछ देश अफगानिस्तान की जमीन को अपने राजनीतिक मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। फिर समुद्री सीमा में बेजा दखल की कोशिशों और आतंकवाद को शह देने वाले देशों की भी उन्होंने जम कर आलोचना की।

चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत भारत की सीमाओं पर चुनौतियां पेश करता रहा है। पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद के प्रति उसका नरम रुख और संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ लाए गए प्रस्तावों पर विरोध में चीन का खड़ा होना भी जगजाहिर है। इसलिए अफगानिस्तान में आतंक के बल पर बनी सरकार के साथ उसका खड़ा होना दुनिया के तमाम देशों के लिए चिंता का विषय बन गया है। इससे निपटने की रणनीति में संयुक्त राष्ट्र के ढांचे को बदलने की जरूरत अब पहले से कहीं अधिक गाढ़ी हो गई है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर दोहराया कि संयुक्त राष्ट्र में बदलाव किया जाना चाहिए। अमेरिकी राष्ट्रपति ने न सिर्फ इसका समर्थन किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत की सदस्यता की हिमायत भी की। अमेरिका अगर इसे लेकर गंभीरता दिखाता है, तो यह निस्संदेह चीन के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इस तरह इस बार की प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा न सिर्फ व्यापारिक और वाणिज्यिक, बल्कि कूटनीतिक सामरिक रणनीतिक दृष्टि से भी दूरगामी नतीजे लाने वाली साबित हो सकती है।


Date:27-09-21

निर्यात लक्ष्य की चुनौतियां

जयंतीलाल भंडारी

पिछले कुछ समय में निर्यात बढ़ने के संकेत मिले हैं। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिहाज से यह राहत की बात है। लेकिन निर्यात के मोर्चे पर दो बड़ी चुनौतियां कायम हैं। पहली तो यही कि वित्त वर्ष 2021-22 में चार सौ अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्य हासिल करना और दूसरी, वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना। गौरतलब है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक निर्यात में भारत की स्थिति अभी कमजोर बनी हुई है। कुल वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी दो फीसद से भी कम है। निर्यात से संबंधित वैश्विक रिपोर्टों में बार-बार कहा जा रहा है कि भारत के निर्यात परिदृश्य पर गुणवत्तापूर्ण और वैश्विक स्तर के घरेलू विनिर्माण की कमी बनी हुई है। परिवहन और आपूर्ति संबंधी समस्याएं भी बनी हुई हैं। केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा निर्यातकों के लिए समन्वित रूप से काम करने का अभाव है। भारतीय उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार के विस्तार की समस्या है। आपात ऋण सुविधा गारंटी योजना और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के कारगर क्रियान्वयन की कमी है। निर्यात के नए व आधुनिक उत्पादों की पहचान का भी संकट बना हुआ है। इन विभिन्न निर्यात चुनौतियों के बीच देश से निर्यात को गतिशील करने की अहम जरूरत दिखाई दे रही है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल अगस्त में भारत से उत्पादों का निर्यात 33.14 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल (2020) की समान अवधि की तुलना में 45.17 फीसद अधिक है। चालू वित्त वर्ष (2021-22) में अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत का निर्यात 163.67 अरब डॉलर रहा, जो एक साल पहले की समान अवधि की तुलना में 66.92 फीसद अधिक है और 2019 की समान अवधि की तुलना में 22.93 फीसद अधिक है। लगातार पांच महीने से निर्यात में बढ़ोतरी न सिर्फ बेहतर अर्थव्यवस्था का संकेत दे रही है, अपितु यह निर्यात में स्थिरता का भी प्रतीक हैं। पेट्रोलियम उत्पादों, इंजीनियरिंग सामान, दवा और रत्न व आभूषण क्षेत्र में मांग ज्यादा होने की वजह से निर्यात में बड़ी तेजी आई है।

गौरतलब है कि ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना से निर्यात में बढ़ोतरी होने लगी है। उदाहरण के लिए एक साल पहले देश आठ अरब डॉलर मूल्य के मोबाइल फोन का आयात करता था। अब तीन अरब डॉलर के मोबाइल फोन का निर्यात कर रहा है। यदि वर्तमान निर्यात परिदृश्य पर नजर डालें तो पाते हैं कि अमेरिका, यूरोप, संयुक्त अरब अमीरात सहित दुनिया के विभिन्न विकसित और विकासशील देशों को निर्यात तेजी बढ़ रहे हैं। यह भी कोई छोटी बात नहीं है कि कोरोनाकाल में जब दुनिया के कई खाद्य निर्यातक देश महामारी के व्यवधान के कारण कृषि पदार्थों का निर्यात करने में पिछड़ गए, तब भारत ने इस अवसर का दोहन करके कृषि निर्यात बढ़ा लिया।

इसमें कोई दो मत नहीं कि कोरोनाकाल में दुनिया के विभिन्न देशों में दिए गए प्रोत्साहन पैकेजों और दुनिया में बाजारों के तेजी से पटरी पर आने से विभिन्न उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ रही हैं। अमेरिका में दिए गए विभिन्न प्रोत्साहन पैकेज उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सत्ताईस फीसद के बराबर हो गए हैं। विश्व बैंक का अनुमान है कि वर्ष 2021 में विश्व अर्थव्यवस्था 5.6 फीसद की दर से बढ़ेगी। मॉर्गन स्टेनले के मुताबिक विश्व अर्थव्यवस्था 6.4 फीसद अमेरिकी अर्थव्यवस्था 5.9 फीसद, यूरो अर्थव्यवस्था पांच फीसद और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था 5.3 फीसद की दर से बढ़ सकती है। इससे भारत से होने वाले निर्यात की गति भी बढ़ेगी।

भारत से निर्यात में तेजी आने के कई और कारण भी हैं। संक्रमण की दूसरी लहर के बीच विनिर्माण क्षेत्र को पूर्णबंदी से बाहर रखने के कारण उत्पादन में गतिरोध नहीं आया। देश में कॉरपोरेट कर की दरों को घटाया गया है। कई अहम क्षेत्रों में पीएलआइ योजनाओं ने पहली बार कच्चे माल के बजाय उत्पादन को बढ़ावा दिया है। श्रम कानूनों को सरल किया गया है। एमएसएमई की परिभाषा को सुधारा गया है ताकि कई मध्यम आकार की इकाइयों को भी एमएसएमई का लाभ मिले। इन कदमों से घरेलू उद्योग का आकार बढ़ाने में मदद मिली और निर्यात भी बढ़े। विदेशी कंपनियों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) से जुड़े नियमों को उदार बनाने से उन्हें भारत में परिचालन शुरू करने और यहां से दूसरे देशों में निर्यात बढ़ाने में मदद मिली। ढांचागत व्यवस्था में किए गए सुधार से भारत को वैश्विक मूल्य शृंखला से जुड़ने में मदद मिली और भारत में सामान बनाने वाले निर्यातकों के लिए सस्ते श्रम की तलाश में देश के दूरदराज के भागों तक पहुंचने में सरलता हुई। इससे दुनियाभर में यह धारणा भी मजबूत बनी कि भारत उत्पाद निर्यात के लिहाज से एक बढ़िया ठिकाना है।

अर्थव्यवस्था में निर्यात की भूमिका को प्रभावी बनाने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। उद्योगों के लिए बिजली की लागत में कमी और श्रम कानूनों सहित अन्य बाधाएं दूर करने की जरूरत है। यह भी जरूरी है कि सरकार यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात आदि देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बातचीत को जल्द अंतिम रूप दे। इससे देश के निर्यात में तेजी से वृद्धि होगी। यह भी जरूरी है कि निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए देश में नियामकीय और कारोबारी माहौल में सुधार किया जाए। जीएसटी रिफंड की गति तेज की जाए। जीएसटी का दायरा बढ़ाया जाए। साथ ही कर व्यवस्था को भी सरल व एकीकृत किया जाए। जिस तरह उत्पादों के निर्यात के लिए नई योजनाएं लागू की जा रही हैं, उसी तरह सेवा के निर्यात के लिए भी नई योजना लाई जाए जिसमें सेवा निर्यात से संबंधित वापस न किए गए करों व शुल्कों को वापस किया जाना सुनिश्चित करना हो। ऐसी योजना से देश के सेवा निर्यातकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, सेवा निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के मौके भी बढ़ेंगे।

यह भी जरूरी है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज), निर्यातोन्मुखी इकाइयों (ईओयू), औद्योगिक नगर और ग्रामीण इलाकों में काम कर रही निर्यात इकाइयों से निर्यात बढ़ाने के विशेष प्रयत्न किए जाएं। निर्यातकों को सस्ती दरों और समय पर कर्ज दिलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। सरकार द्वारा अन्य देशों की गैर-शुल्कीय बाधाएं, मुद्रा का उतार-चढ़ाव, सीमा शुल्क अधिकारियों से निपटने में मुश्किल और सेवा कर जैसे निर्यात वाली मुश्किलों से रणनीति पूर्वक निपटा जाना होगा। यह भी जरूरी है कि निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए देश में नियामकीय और कारोबारी माहौल में सुधार किया जाए। जीएसटी रिफंड की गति तेज की जाए। जीएसटी का दायरा बढ़ाया जाए। साथ ही कर व्यवस्था को भी सरल तथा एकीकृत किया जाए।

हाल में सरकार ने निर्यातकों को प्रोत्साहन देने के लिए जो दो महत्त्वपूर्ण योजनाएं घोषित की हैं, उन पर तेजी से अमल निर्यात को ऊंचाई दे सकता है। इनमें से एक योजना निर्यात की संभावना रखने वाले सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को प्रोत्साहन देने के लिए ‘उभरते सितारे’ योजना है और दूसरी योजना रेमिशन ऑफ डयूटीज एंड टैक्सेस ऑन एक्सपोर्ट प्रोडक्टस (आरओडीटीईपी) स्कीम है। इसके तहत सरकार द्वारा आगामी तीन वर्ष तक साढ़े आठ हजार उत्पादों को तैयार करने वाले निर्यातकों को केंद्र, राज्य सरकार व स्थानीय निकायों को दिए गए कर का रिफंड दिया जाएगा। खास बात यह है कि आरओडीटीईपी के तहत जो कर छूट दी गई हैं, वे विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप हैं और इन पर कोई आपत्ति नहीं उठाई जा सकेगी।


Date:27-09-21

न्यायिक व्यवस्था में सुधार की जरूरत

पूनम नेगी

ढाई हजार साल पहले आचार्य चाणक्य ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘अर्थशास्त्र’ में कहा था कि जिस राष्ट्र में प्रजा को समय पर उचित न्याय नहीं मिलता‚ उस राष्ट्र में अराजकता छा जाती है। देश की वर्तमान न्यायिक व्यवस्था के संदर्भ में यह कथन सही साबित हो रहा है। न्यायाधीशों की भारी कमी‚ न्याय व्यवस्था की खामियों और लचर बुनियादी ढांचे के कारण जहां देश भर की अदालतें मुकदमों के भारी बोझ से कराह रही हैं‚ वहीं वकीलों की महंगी फीस और न्यायालयों में तारीख पर तारीख लगने की प्रवृत्ति से पीड़ितों का शारीरिक और मानसिक ही नहीं‚ बल्कि आर्थिक दोहन भी धड़ल्ले से हो रहा है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायालय‚ उच्च न्यायालयों और स्थानीय जिला न्यायालयों में लगभग 4.4 करोड़ मामले लंबित पड़े हैं। विधि आयोग के अनुसार प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 50 न्यायाधीश होने चाहिए‚ लेकिन यह संख्या इसकी आधी भी नहीं है। आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के 160 पद स्वीकृत हैं‚ लेकिन इनमें 68 पद खाली हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट में 72 में से 36 पद रिक्त हैं। बंबई हाईकोर्ट में 94 के मुकाबले 33 तथा दिल्ली हाईकोर्ट में 50 फीसद से अधिक पद खाली हैं। पटना में 64 फीसद और राजस्थान में न्यायाधीशों के 50 फीसद से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। ऐसी ही स्थिति कमोबेश अन्य सभी राज्यों की है। इस महीने की शुरुआत में बार काउंसिल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश एनवी रमन और कानून मंत्री किरण रिजिजू ने देश की इस गंभीर समस्या का संज्ञान लेते हुए न्यायिक व्यवस्था की खामियों के निवारण पर विस्तृत चर्चा की थी। जानना दिलचस्प है कि कानून मंत्री की पहल पर कोलेजियम की सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में नौ न्यायाधीशों की नियुक्ति को सकारात्मक पहल बताते हुए सीजेआई रमन ने कहा है कि जिस तरह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम पर मुहर लगाई है; वैसा ही कदम हाई कोर्ट और निचली अदालतों के लिए भी यथाशीघ्र उठाया जाना चाहिए। बताते चलें कि इस दिशा में कोलेजियम ने हाईकोर्ट के लिए 82 नामों की अनुशंसा की है। विगत अगस्त में न्यायमूर्ति एम. एम. कुमार की अध्यक्षता में हुई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और इसके कोर ग्रुप की बैठक में भी त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए अदालती दस्तावेज के डिजिटलीकरण के साथ ही स्मार्ट पुलिसिंग की वकालत की गई थी। गत वर्ष राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक न्यायिक समारोह को संबोधित करते हुए कहा था कि ऐसे कदम उठाने बेहद जरूरी हैं‚ जिनसे सभी को समय से न्याय मिले‚ न्याय व्यवस्था कम खर्चीली हो और निर्णय देने की व्यवस्था सामान्य आदमी की भाषा यानी हिंदी में हो। उन्होंने जोर देकर कहा था कि न्यायालयों को तारीख पर तारीख लगाने की प्रवृत्ति और मुकदमों की सुनवाई टालने से बचना चाहिए।

उत्तर प्रदेश उपभोक्ता फोरम के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अशोक चौधरी न्यायिक व्यवस्था में सुधार की बाबत कई महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं। कहते हैं कि अधीनस्थ न्यायालयों के स्तर पर अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन किया जा सकता है। यह जजों की योग्यता और गुणवत्ता में सुधार में सहायक होगा। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के कुशल उपयोग से भी न्यायिक डेटाबेस बनाया जा सकता है। इसके जरिए जजों के अलग–अलग प्रदर्शनों के आकलन के साथ ही एक संस्था के रूप में न्यायालय के समग्र प्रदर्शन का आकलन भी किया जा सकेगा। कहते हैं कि त्वरित न्याय के लिए स्मार्ट पुलिसिंग बहुत जरूरी है। पुलिसकर्मियों में विभिन्न कानूनों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के साथ ही आबादी के मुताबिक पुलिसकर्मियों और पुलिस स्टेशनों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए।

अशोक चौधरी लैंगिक व बाल अधिकार जैसे संवेदनशील मसलों की सुनवाई के दौरान पैनल में सामाजिक कार्यकर्ताओं व मनोवैज्ञानिक को शामिल किए जाने को भी जरूरी बताते हैं। उनके मुताबिक अदालत परिसरों तथा उनमें जलपान‚ शौचालय‚ स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। कहते हैं कि पारदर्शिता का अभाव भी न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी समस्या है। न्यायालयों में लंबे अवकाश की प्रथा भी मामलों के लंबित होने का प्रमुख कारण है। अधिवक्ताओं के लिए आचार संहिता के अनुपालन को प्रभावी बनाया जाना जरूरी है ताकि मामले जानबूझकर विलंबित न किए जा सकें। अधिवक्ताओं की अनावश्यक हड़तालों पर भी प्रतिबंध लगाना जरूरी है।


Date:27-09-21

प्रधानमंत्री का दौरा

संपादकीय

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विदेश दौरा देश के लिहाज से सकारात्मक और स्वागतयोग्य रहा है। यह दौरा मूल रूप से संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के लिए था, जहां दुनिया के 100 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों या राष्ट्र-प्रतिनिधियों ने अपना-अपना उद्बोधन पेश किया। अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी दुनिया में कई नेताओं ने परोक्ष, तो कई नेताओं ने प्रत्यक्ष उपस्थिति से महासभा को सार्थक सिद्ध किया। वहां भारतीय प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष उपस्थिति से भारत के पक्ष को नि:संदेह मजबूती मिली है। ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं, जब दुनिया के राष्ट्र आपकी बात सुनते हैं। जम्मू-कश्मीर की सांविधानिक स्थिति में परिवर्तन, कोरोना महामारी के तांडव, भारत-चीन संघर्ष, अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी और तालिबान के शिकंजेकी पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र की यह बैठक कमोबेश हर देश के लिए महत्व रखती थी। अब अमेरिका की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह आक्रामक हो। वह ऑकस और क्वाड जैसे नए गठजोड़ों में भविष्य तलाशता दिख रहा है और महासभा के दौरान भी उसकी कोशिशें इस दिशा में तेज थीं। यह एक ऐसा मोर्चा है, जहां भारत की अपनी चिंताएं और सीमाएं हैं।

हालांकि, यह कोई अच्छा संकेत नहीं है कि हम महासभा के समय छोटे गठजोड़ों का महत्व देख रहे थे। क्या दुनिया की महाशक्तियां संयुक्त राष्ट्र के प्रति पूरी तरह ईमानदार हैं? संयुक्त राष्ट्र में अगर हम दुनिया के अन्य देशों के प्रतिनिधियों के संबोधनों पर गौर करेंगे, तो पाएंगे कि दुनिया तालिबान और कट्टरपंथियों के उभार के चलते चिंतित है, दुनिया के बहुत से देशों को आर्थिक-सामाजिक रूप से मदद चाहिए, दुनिया के ज्यादातर देश परस्पर मिलजुल कर चलना चाहते हैं। ऐसे में, गौर करने की बात है कि इस बार दुनिया की महाशक्तियों को अलग-अलग ढंग से निशाना भी बनाया गया है, जो एक तरह से जरूरी भी था। भारतीय प्रधानमंत्री की अगर बात करें, तो विशेष रूप से चीन की ओर इशारा खास मायने रखता है। उन्होंने न केवल कोरोना की उत्पत्ति, बल्कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग से खिलवाड़ का भी मामला उठाया है। पूरे साहस के साथ समुद्र पर अधिकार की कोशिश में लगे देशों को भी आईना दिखाया है।

भारत पहले दिन से इस प्रयास में लगा है कि अफगानिस्तान में जिसके भी हाथों में सत्ता हो, वह समावेशी सरकार चलाए। अगर तालिबान अपने समाज, अपने लोगों के प्रति समावेशी नजरिया नहीं रखते, तो उन्हें मान्यता देने से पहले इंतजार करने में ही दुनिया की भलाई है। भारत के इस रुख को दुनिया के अधिकतर देशों ने समर्थन दिया है। रूस और चीन जैसी शक्तियों के साथ ही पाकिस्तान की कोशिशें भी नाकाम रही हैं। तालिबान पर महासभा से जो दबाव पड़ा है, उसकी रोशनी में हम सुधार की उम्मीद रख सकते हैं। जहां तक भारत की उपलब्धियों का सवाल है, तो प्रधानमंत्री का यह दौरा अमेरिका से किसी सौदे-समझौते के लिए नहीं था। फिर भी अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री की मुलाकात को हम सकारात्मक करार दे सकते हैं। बातचीत में भारत के लिए कोई अप्रिय बात नहीं हुई है। जहां तक कश्मीर का सवाल है, तो उसकी बात इक्का-दुक्का देशों ने की है, जिनको वहीं यथोचित जवाब दे दिया गया है।


Date:27-09-21

घटती आजादी के दौर में इंटरनेट

हरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )

तकरीबन 31 साल पहले मानव सभ्यता ने संवाद का एक नया माध्यम हासिल किया था। संवाद का हर नया माध्यम न सिर्फ अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोलता है, बल्कि ज्ञान-विज्ञान को भी नए पड़ाव तक ले जाता है। इन सारे दबावों के बीच लोग भी बदलते हैं और समाज भी पूरी तरह बदल जाते हैं। कई बार तो इतना बदल जाते हैं कि फर्क जमीन-आसमान का हो जाता है। अतीत में जाकर उस समाज को देखिए, जिसमें भाषा का विकास नहीं हुआ था और उसकी तुलना उस समाज से कीजिए, जिसमें भाषा का विकास हो गया था, अंतर बहुत साफ नजर आएगा। लगेगा कि जैसे दोनों दो अलग ग्रह के वासी हैं।

कुछ इसी तरह का बदलाव तीन दशक पहले इंटरनेट ने हमारी झोली में डाला था, जिसने इस दरम्यान हमारी जमीन और हमारे आसमान को पूरी तरह बदल दिया। जब हमने भाषा का विकास किया, या जब हमने लिखना शुरू किया, या जब छापेखाने ने पूरी दुनिया पर अपनी छाप छोड़ी, या जब रेडियो, टीवी और टेलीफोन जैसे संवाद के माध्यम हमारे बीच आए, कभी भी बदलाव इतनी तेजी से हमारे घरों और दिल-ओ-दिमाग में नहीं घुसा, जितना पिछले 30 साल में तकरीबन हर जगह घुसपैठ कर गया है। एक फर्क यह भी रहा कि बाकी ज्यादातर माध्यम भूगोल या रेडियो तरंगों की सीमाओं से बंधे थे, लेकिन इंटरनेट के इस नए माध्यम ने पुरानी बाधाओं को पार करते हुए पूरी दुनिया को एक साथ जोड़ दिया। ये फर्क अपनी जगह हैं, लेकिन सबसे बड़ा फर्क कुछ और था, जो उस दौर में एक बड़ी उम्मीद बंधा रहा था। यह माध्यम उस दौर में आया, जब आजादी और खासकर अभिव्यक्ति की आजादी एक बड़ा मूल्य बनती जा रही थी। तानाशाही खत्म हो रही थी और लोकतंत्र का विस्तार हो रहा था। बर्लिन की दीवार टूट चुकी थी और चीन को छोड़कर बाकी साम्यवादी देशों में सर्वहारा की कथित तानाशाही या तो विदा हो चुकी थी या अंतिम सांसें गिन रही थी। ऐसे देश, जिनमें लोकतंत्र है, उनकी संख्या अचानक ही बढ़ने लगी थी। इसी माहौल ने अमेरिका के एक राजनीतिशास्त्री फ्रांसिस फुकुयामा को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इतिहास के अंत की घोषणा कर दी। द एंड ऑफ हिस्ट्री ऐंड द लास्ट मैन नाम की उनकी किताब की सबसे ज्यादा आलोचना उसके शीर्षक को लेकर ही हुई थी। हालांकि, इसमें उन्होंने जो कहा था, वह उस समय बहुत से लोगों को सच लगता था। उन्हें लग रहा था कि मानव सभ्यता अब अपने वैचारिक विकास के शिखर पर पहुंच चुकी है। धीरे-धीरे लोकतंत्र पूरी दुनिया में पहुंचेगा और सभी देश इसी की परंपराओं से चलेंगे। मगर 30 साल में दुनिया कहां पहुंच गई, इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे, फिलहाल बात इंटरनेट की।

उस समय उम्मीद यह थी कि एक ऐसा मंच तैयार हो गया है, जो पूरी दुनिया के लोगों को जोडे़गा और इससे बहुत सी खाइयां पाटी जा सकेंगी। दिल्ली के वन बेडरूम में बैठा एक व्यक्ति जब लिस्बन, काहिरा और रियो डी जेनेरो के अनजान लोगों से जुड़ेगा, तब उसका नजरिया भी विस्तृत होगा। उसकी सोच अपने पूर्वाग्रहों के तिनकों और फूस से लदे-फदे कबूतरखानों से बाहर निकलेगी, तो उसे एक नई विश्व दृष्टि भी मिलेगी। यह भी उम्मीद थी कि तानाशाही में गुजर-बसर करने वालों का संपर्क जब लोकतंत्र की जीवन-शैली जीने वालों से होगा, तो उनके अपने देश में लोकतंत्र कायम करने का दबाव बनेगा। इसी के कुछ बाद जब पश्चिम एशिया में वे आंदोलन दिखे, जिन्हें हम ‘अरब स्प्रिंग’ के नाम से जानते हैं, तो एकबारगी लगा कि यह सपना सच होकर ही मानेगा। लेकिन सुंदर सपनों के टूटने का इतिहास भी उतना ही बड़ा है, जितना खुद मानव सभ्यता का इतिहास।

और अब, जब हम साल 2021 में हैं, तब हमें मिली है अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस की एक रिपोर्ट- फ्रीडम ऑन द नेट। इंटरनेट पर दुनिया भर के देशों में आजादी का हाल बताने वाली यह रिपोर्ट हर साल जारी होती है। यह रिपोर्ट बता रही है कि तकरीबन पूरी दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों पर सरकारों का नजला गिरा है। सोशल मीडिया पर पोस्ट के कारण कहीं लोगों को मारा-पीटा गया, तो कहीं उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। यहां आप चाहें, तो यह मान सकते हैं कि भारत में कम से कम इतने बुरे हाल तो नहीं हैं, और चाहें, तो आप ऐसे कुछ भारतीय उदाहरण भी दे सकते हैं, जहां लोगों को सोशल मीडिया पर पोस्ट के लिए प्रताड़ित किया गया। यह मामला सिर्फ भारत या किसी इस या उस देश का नहीं है, कमोबेश यह सब लगभग पूरी दुनिया में हो रहा है।

बेशक, इंटरनेट की किसी पोस्ट के कारण अगर कोई सरकार किसी को गिरफ्तार करती है, तो इससे इंटरनेट की ताकत भी समझी जा सकती है। दुनिया भर के तानाशाहों को अब खतरा आंदोलनों से ज्यादा इंटरनेट से लगने लगा है। लेकिन यह भी सच है कि इंटरनेट से हम जिस दबाव और बदलाव की उम्मीद बांध रहे थे, न सिर्फ वह उम्मीद अधूरी रह गई, बल्कि दुनिया उसकी उल्टी दिशा में भागती दिख रही है। हम यह सोच रहे थे कि इंटरनेट हर किसी की सोच को नया विस्तार देगा, लेकिन मानसिकता के कबूतरखाने अब और छोटे होते जा रहे हैं।

यह इंटरनेट की आभासी दुनिया के आस-पास ही नहीं हो रहा, उसके बाहर के समाजों का हाल भी वही है। उदारवाद, नागरिक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को जब गाली की तरह इस्तेमाल किया जाने लगे, तब भला यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह आजादी बची रह जाएगी, जिसकी ये सब उपलब्धियां थीं। ये सब वे उपलब्धियां हैं, जो पूरी 20वीं सदी की राजनीतिक चेतना से उपजी थीं और हमारे जैसे बहुत से देशों ने तमाम संघर्षों के बाद इनको हासिल किया था। जिन्हें नहीं हासिल हो सकीं, उनके लिए वे एक हसरत थीं। 21वीं सदी के कुछ शुरुआती वर्षों में ही हमने वह राजनीतिक चेतना खोनी शुरू कर दी है। वह भी उस समय, जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।