17-06-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


Baptism By Fire
Army pension needs pruning. But Agnipath protests show future soldiers’ anxiety needs better responses.
TOI Editorials

Violent protests erupted in parts of India’s Hindi-speaking belt against GoI’s new recruitment scheme for the military, Agnipath. Frustrated young men from key catchment areas for the military setting trains on fire is a symptom of the jobs crisis in the country. This crisis is particularly acute among young men. CMIE’s April 2022 jobs data showed for males in the 15-19 age group, unemployment was 50%, and 38. 7% for the 20-24 cohort. Unemployment was as high as 76% for the 15-19 cohort in Bihar, the epicentre of protests. Losing one long-term job option is a big blow to these young men.

But that cannot be a reason to postpone Agnipath after its announcement. As this newspaper and others have argued, the military has a pension problem. A parliamentary committee report in 2020 said there are 3. 2 million defence pensioners, with about 55,000 added annually. In 2010-11, pension outgo was 19% of total defence expenditure. In November 2015, OROP was introduced. By 2020-21, pension outgo rose to 26% of defence expenditure. The fallout of pension’s rising share is a corresponding decrease in expenditure to buy new equipment.

A comparative study of defence pensions by the Manohar Parrikar Institute of Defence Studies and Analysisis insightful. The US in FY-2018 set aside 10% of the defence department’s total expenses towards pension. In the UK, the pension outgo in FY-2019 was 14% of the total defence spending. Given the lopsidedness in resource allocation in the Indian military budget, something had to give. Ideally, the approach should have been to prune intake and raise quality standards. However, political considerations seem to have played a role and a workaround was conceived to meet multiple aims.

Having decided on Agnipath, GoI should have anticipated the anxiety and pre-empted it. Post-announcement assurances of job preferences in paramilitary or police, or bank loans for potential entrepreneurs are inadequate to assuage youth who see the military as a career that meets aspirations. In this context, GoI needs to quickly design a more effective package to help demobilised Agniveers’ transition to civilian life. One reason why the US is able to keep pensioncosts down is that it takes 20 years of service to be eligible for a pension. It’s possible because America is more effective in employing former soldiers. That’s what young men of the Hindi heartland want too.


Waiting for jobs
The Centre’s decision to recruit personnel to fill vacancies is a nod to the festering unemployment issue.

For a nation that has had a significant demographic dividend — the working age population is much larger than the non-working age sections — finding productive employment for its youth was to be an imperative for India. Yet, in the last few years, unemployment has remained a major concern — the leaked Periodic Labour Force Survey (PLFS) in 2018 revealed that India’s unemployment rate was the highest (6.07%) in four decades. The latest PLFS suggests that the numbers now are not so drastic, with the overall unemployment rate at 4.2% in 2020-21 compared to 4.8% in 2019-20 and the labour force participation rate (LFPR) increasing to 41.6%, up from 40.1% in 2019-20. In terms of the more widely used statistic internationally, the current weekly status of unemployment, the figure of 7.5% for all persons in 2020-21 is still worrying. But, the PLFS data will not bring much cheer to the Government despite a decrease in unemployment, according to official data. This is because the decrease, says the PLFS, has also coincided with the transfer of employment into lower productive and unpaid jobs away from salaried employment. Worryingly, industrial jobs have decreased with more employment in agricultural and farm-related jobs — a trend that accelerated following the lockdown and has not reversed since then. Unemployment rates among the educated (above secondary education — 9.1%) and the youth (age between 15-29 — 12.9%) have only declined marginally.

Wage rates have continued to remain lower for those employed in either salaried jobs or self-employed compared to the pre-pandemic period, with the increases being marginal in the year following lockdown-driven days of the pandemic. It is clear that the Government must tackle unemployment and, concomitantly, the quality of employment issue, on a war footing. In this regard, Prime Minister Narendra Modi’s announcement that the Government will be recruiting 10 lakh personnel within the next 18 months (vacancies in the Railways, the armed forces and GST departments among others) should be seen as a step in the right direction. The latest data showed that there were 8.86 lakh vacant jobs among all central government civilian posts as of March 2020. Mr. Modi’s announcement was not about the creation of a large chunk of new jobs; the bulk of the promised employment is to fill up vacancies. But even this measure would be ameliorative in the real economy that continues to remain distressed, a consequence of the BJP-led government’s mismanagement and the effects of the pandemic in the last few years. The country cannot afford to squander more years in its race to reap the benefits of its demographic dividend, and the push to provide jobs for those seeking to enter the labour force, even if belated, will help ease matters for the medium term.



सैन्य ढांचे को सशक्त बनाने का प्रयास
ब्रिगेडियर आरपी सिंह, ( लेखक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं )

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तीनों सेनाओं के प्रमुखों के साथ मिलकर 14 जून को अग्निपथयोजना का एलान किया। इसे सैन्य बलों में युवाओं की भर्ती के दृष्टिकोण से क्रांतिकारी योजना बताया जा रहा है। इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने कहा कि इसका उद्देश्य सैन्य बलों के ढांचे को युवा बनाना है। इसका उद्देश्य समकालीन तकनीकों और रुझान से परिचित युवाओं को सैन्य बलों से जोड़कर उन्हें आवश्यक कौशल प्रदान कर अनुशासित एवं अनुप्रेरित मानव संसाधन में परिणित कर समाज एवं राष्ट्र को लाभान्वित करना है। सरकार का दावा है कि इस योजना से विभिन्न क्षेत्रों में नए कौशल के साथ रोजगार अवसरों में वृद्धि होगी।

अग्निपथ योजना में युवाओं को चार वर्षों के लिए भर्ती किया जाएगा। इस दौरान उन्हें आवश्यक कौशल के लिए जरूरी प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें अग्निवीर का टैग मिलेगा। इसमें हर साल 46,000 अग्निवीरों की भर्ती की जाएगी, जिनमें से 25 प्रतिशत की सेवा को और 15 वर्षों के लिए जारी रखा जाएगा। यह भर्ती अखिल भारतीय स्तर पर होगी। सेवा के लिए साढ़े सत्रह वर्ष से 21 वर्ष आयु वर्ग निर्धारित किया गया है। अग्निवीरों के लिए शैक्षिक अर्हता वैसी ही रहेगी, जैसी तमाम अन्य श्रेणियों के लिए है। उन्हें 30,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये प्रतिमाह का वेतन मिलेगा। साथ ही ‘जोखिम एवं कठिनाई’ भत्ता उसी प्रकार लागू होगा, जैसा तीनों सेवाओं में दिया जाता है। सेना में चार वर्षीय सक्रियता के बाद अग्निवीरों को एकमुश्त ‘सेवा निधि’ दी जाएगी। इसमें सेवा काल के दौरान जितना योगदान अग्निवीर का होगा, उतना ही सरकार करेगी, जिस पर ब्याज का लाभ भी मिलेगा। इस प्रकार करीब 11.71 लाख रुपये की यह निधि कर मुक्त होगी। हालांकि उनके लिए ग्र्रेच्युटी और पेंशन जैसे लाभ नहीं होंगे। सैन्य बलों में रहने के दौरान अग्निवीरों को 48 लाख रुपये का बीमा कवर मिलेगा, जिसके लिए उन्हें कोई योगदान नहीं करना होगा।

जहां कुछ जानकारों ने अग्निपथ योजना की सराहना की है, वहीं कुछ ने आलोचना। सराहना करने वालों ने इस योजना को क्रांतिकारी बताया है। उनका कहना है कि इसके माध्यम से सैन्य बलों में युवा, फिट और बदलते तकनीकी परिवेश में बेहतर प्रशिक्षण योग्य युवाओं का प्रवेश होगा। लेफ्टिनेंट-जनरल अनिल पुरी का कहना है, ‘युवा अपने जोश, जज्बे और जुनून के लिए जाने जाते हैं। जब उन्हें अच्छा नेतृत्व मिलता है तो उनमें उच्च जोखिम लेने वाली क्षमताएं विकसित होती हैं।’ इस योजना का सबसे बड़ा लाभ तो आर्थिक मोर्चे पर होगा, क्योंकि इससे पेंशन पर खर्च होने वाली सरकार की भारी-भरकम रकम बचेगी। साथ ही इससे सैन्य बलों में मानव संसाधन के भारी अभाव की भी पूर्ति होगी। इस समय तीनों सेनाओं में करीब नौ हजार अधिकारियों और विभिन्न रैंक पर एक लाख से अधिक रिक्तियां हैं। अग्निपथ के आलोचक भी अपने तर्कों के साथ डटे हैं। वे रूसी कांसक्रिप्ट (अनिवार्य सैन्य सेवा जैसे माडल) के लचर प्रदर्शन का उदाहरण देते हैं। सैन्य अभियान संचालन महानिदेशक रहे लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया का कहना है, ‘भारतीय सैनिकों का समर्पण, जोश और पेशेवर रुख अतुलनीय है, क्योंकि वह नाम, रेजीमेंट की प्रतिष्ठा, वफादारी और देशभक्ति की भावना के लिए लड़ता है। यह अनूठी पहल असल में लागत-लाभ विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें मारक क्षमताओं और परिचालन तत्परता जैसे पहलुओं को अनदेखा किया गया है। अग्निपथ भारतीय सैन्य बलों की प्रकृति के अनुरूप भी नहीं है।’ उन्होंने संक्षिप्त प्रशिक्षण अवधि को लेकर भी यह कहा है कि कि कोई नौसिखिया सैनिक तमाम लोगों का जीवन जोखिम में डाल सकता है।

यहां मैं भी अपना कुछ अनुभव साझा करना चाहूंगा। यह अनुभव 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्र्राम में मुक्ति वाहिनी के गुरिल्ला अनुभवहीन लड़ाकों से जुड़ा है। युद्ध की शुरुआत से पहले मेरी यूनिट लड़ाई में शामिल नहीं हुई और सैन्य मुख्यालय के लिए रिजर्व में रखी गई थी। उसी दौरान लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा के नेतृत्व में 30 नवंबर, 1971 को भारत-बांग्लादेश संयुक्त कमान गठित की गई। उस समय मैं मुक्ति वाहिनी के अधिकारी प्रशिक्षण प्रभाग में इंस्ट्रक्टर था। उसमें हमने 132 अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया, जिनमें बांग्लादेश की मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना के भाई कैप्टन शेख कमाल भी शामिल थे। युद्ध के दौरान बांग्लादेशी अधिकारियों की कमी पड़ने के चलते जनरल अरोड़ा ने स्वयंसेवकों से मुक्ति वाहिनी के सैनिकों का नेतृत्व करने के लिए कहा। कोई प्रशिक्षु अधिकारी आगे नहीं आया। चूंकि मेरी यूनिट सैन्य मुख्यालय के लिए रिजर्व थी तो स्वैच्छिक रूप से आगे आकर मैंने युद्ध के रोमांच का अनुभव लेने का फैसला किया। जिन सैनिकों का नेतृत्व मैंने संभाला, उनसे मैं परिचित नहीं था। न ही मैंने उन्हें प्रशिक्षित किया। मैं उन गुरिल्ला लड़ाकों के नाम या उनकी पृष्ठभूमि से भी अवगत नहीं था। मैंने 3 दिसंबर, 1971 को मुक्ति वाहिनी की एक यूनिट की कमान संभाली, जिसमें 850 स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी आयु 18 से 35 वर्ष के बीच थी। अगले ही दिन यानी 4 दिसंबर को हम रण क्षेत्र में उतर गए। उसी बीच शकरगढ़ सेक्टर में एक अभियान के दौरान मैंने पाया कि अनुभवहीन सैनिकों में खतरे के प्रति अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने को मिली। जहां कुछ डरे हुए थे, क्योंकि जीवन में पहली बार उनका इस प्रकार की स्थितियों से सामना हो रहा था, जहां दुश्मन की गोलियां उन्हें निशाना बना रही हों। वहीं कुछ संयत थे। हालांकि एक-दो मुठभेड़ के बाद करीब-करीब सभी में डर का स्तर कम होता गया। उसमें सबसे प्रमुख पहलू तो आयु एवं वैवाहिक स्थिति का था। जिनकी उम्र 25 साल से कम रही और जिनकी शादी नहीं हुई थी वे अपने से उम्रदराज एवं विवाहितों की तुलना में जोखिम लेने और जान की बाजी लगाने के लिए कहीं ज्यादा तत्पर थे।

पुन: अग्निपथ योजना पर विचार करें तो यही लगता है कि उसमें चार साल की अवधि कम है, क्योंकि तीन से चार साल तो नौकरी के साथ समायोजन में बीत जाते हैं। बेहतर होता कि यह अवधि पांच से सात वर्षों की निर्धारित की जाए। साथ ही उनके लिए अर्धसैनिक बलों, राज्य पुलिस और सार्वजनिक उपक्रमों आदि में भर्ती की ठोस व्यवस्था प्राथमिकता के आधार पर की जाए। अग्निपथ एक बढ़िया कदम है और यह माना जाना चाहिए कि कमांडिंग अधिकारियों एवं सेवा प्रमुखों के स्तर पर नियमित समीक्षा एवं उनके सुझावों से इसमें और निखार होगा। उत्कृष्ट नेतृत्व के साथ अग्निपथ का प्रवर्तन सहज ही संभव होगा।


भारत के साथ आई2यू2

भारत के साथ सहयोग से अमेरिका एक और नया बहुराष्ट्रीय गठबंधन आई2यू2 बनाने जा रहा है। इसमें इस्रयल और यूएई भी शामिल होंगे। इसकी पहली बैठक ऑनलाइन शिखर सम्मेलन के रूप में अगले महीने होगी। आई2यू2 के जरिए मध्य पूर्व और पश्चिमी एशिया में अमेरिका अपनी साझेदारियों को मजबूत करने का इरादा रखता है। ‘आई2यू2’ से तात्पर्य ‘इंडिया, इस्रयल, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका और यूएई’ है। ‘आई2यू2’ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन, इस्रयल के प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट और यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान हिस्सा लेंगे और खाद्य सुरक्षा संकट तथा सहयोग के अन्य क्षेत्रों पर चर्चा करेंगे। सम्मेलन 13 से 16 जुलाई के बीच बाइडन की पश्चिम एशियाई देशों की यात्रा के दौरान होगा। पिछले साल अक्टूबर में इन चारों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी। इस्रयल में यह बैठक तब हुई थी जब भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर मध्य पूर्व के दौरे पर थे। उस वक्त इस समूह को ‘इंटरनेशनल फोरम फॉर इकॉनमिक कोऑपरेशन’ कहा गया था। ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां ये देश एक साथ काम कर सकते हैं, चाहे वह तकनीकी, व्यापार, जलवायु या कोविड-19 से निपटना हो और यहां तक कि सुरक्षा के क्षेत्र में भी। अक्टूबर की बैठक में जल-सीमा सुरक्षा, डिजिटल विकास और परिवहन के मुद्दों पर विशेष चर्चा हुई थी। तब भारत में यूएई के राजदूत अहमद अलबाना ने इस समूह को ‘पश्चिम एशियाई क्वॉड’ नाम दिया था। क्वॉड चार देशों का संगठन है जिसमें भारत के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं। पिछले कुछ सालों में क्वॉड सबसे महत्त्वपूर्ण वैश्विक संगठनों में से एक बनकर उभरा है। पिछले दो साल में अमेरिका ने एक के बाद एक कई संगठन बनाए हैं। आई2यू2 से कुछ ही हफ्ते पहले जापान में बाइडन ने 13 देशों के हिंद-प्रशांत व्यापार समझौते का ऐलान किया था। उससे पहले पिछले साल जो बाइडेन ने ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ मिलकर आकुस नाम का संगठन बनाया है, जो प्रशांत क्षेत्र में सैन्य सहयोग का आधार बन रहा है। अमेरिका सहित इन संगठनों में शामिल सभी देश चीन से त्रस्त हैं। इसलिए उसे घेरने के प्रयास करते रहते हैं। चीन ने अब आस्ट्रेलिया के पड़ोस में सोलोमन आइलैंड में अड्डा बनाना शुरू किया है।


बढ़ रहा रेगिस्तान बना चुनौती
ललित गर्ग

वर्ष 1995 से प्रत्येक साल 17 जून को विश्व रेगिस्तान एवं सूखा रोकथाम दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बंजर और सूखे के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए जागरूकता को बढ़ावा देना है, और भूमि, पर्यावरण एवं जल आदि से संबद्ध समस्याओं के प्रति सर्तक करना है। मरुस्थलीकरण यानी उपजाऊ भूमि का मानव गतिविधि के माध्यम से मिट्टी के अत्यधिक दोहन के कारण शुष्क हो जाना। वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बंजर और सूखे से जुड़े मुद्दे पर वि-जन का ध्यान आकर्षित करने और सूखे व मरुस्थलीकरण का दंश झेल रहे देशों में मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन के कार्यान्वयन के लिए विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम एवं सूखा दिवस की घोषणा की।

राजस्थान प्रदेश में थार का रेगिस्तान दबे पांव अरावली पर्वतमाला की दीवार पार कर पूर्वी राजस्थान के जयपुर, अलवर और दौसा जिलों की ओर बढ़ रहा है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राजस्थान में चल रहे प्रोजेक्ट में ऐसे संकेत मिल रहे हैं। अब तक 3000 किमी. लंबे रेगिस्तानी इलाकों को उत्तर प्रदेश, बिहार और प. बंगाल तक पसरने से अरावली पर्वतमाला रोकती है। कुछ वर्षो से लगातार वैध-अवैध खनन के चलते कई जगहों से इसका सफाया हो गया है। उन्हीं दरारों और अंतरालों के बीच से रेगिस्तान पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ चला है। यही स्थिति रही तो यह हरियाणा, दिल्ली, यूपी तक पहुंच सकता है। लगातार बढ़ रहा रेगिस्तान गंभीर चिंता का विषय है। भूमि और सूखा एक जटिल और व्यापक सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों के साथ प्राकृतिक खतरे के अतिक्रमण के अलावा किसी भी अन्य प्राकृतिक आपदा की तुलना में अधिक लोगों की मृत्यु और अधिक लोगों को विस्थापित करने के लिए जाना जाता है। इससे अनुमान है कि वर्ष 2025 तक 1.8 बिलियन लोग पूर्ण रूप से पानी की कमी का अनुभव करेंगे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी दूसरी पारी में अब प्रकृति- पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण-मुक्ति के साथ बढ़ते रेगिस्तान को रोकने के लिए सक्रिय हैं। बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने एवं पर्यावरण की रक्षा को लेकर प्रधानमंत्री का संकल्प शुभ संकेत है, नये भारत के अभ्युदय का प्रतीक है।

प्रधानमंत्री ने भारत में वर्ष 2030 तक 2.1 करोड़ हेक्टेयर बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने के अपने लक्ष्य को बढ़ाकर 2.6 करोड़ हेक्टेयर किया है। अगर मोदी सरकार ने कुछ ठानी है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए। क्या कुछ छोटे, खुद कर सकने योग्य कदम भी नहीं उठाए जा सकते?

जल, जंगल और जमीन, इन तीन तत्वों से प्रकृति का निर्माण होता है। विश्व में ज्यादातर समृद्ध देश वही माने जाते हैं, जहां इन तीनों तत्वों का बाहुल्य है। लेकिन बात इन मूलभूत तत्व या संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। आधुनिकीकरण के इस दौर में जब इन संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है तो ये तत्व भी खतरे में पड़ गए हैं, और भूमि की उत्पादकता कम होती जा रही है, पानी की कमी हो रही है। चिंतन एवं चिंता का एक ही मामला है लगातार विकराल एवं भीषण आकार ले रही बंजर भूमि, सिकुड़ रहे जल स्रोत, विनाश की ओर धकेली जा रही पृथ्वी एवं प्रकृति के विनाश के प्रयास। बढ़ती जनसंख्या, बढ़ता प्रदूषण, नष्ट होता पर्यावरण, दूषित गैसों से छिद्रित होती ओजोन की ढाल, प्रकृति एवं पर्यावरण का अत्यधिक दोहन-सब देश के लिए सबसे बड़े खतरे हैं। इन खतरों का अहसास करना एवं कराना ही विश्व रेगिस्तान तथा सूखा रोकथाम दिवस का ध्येय है।

प्रति वर्ष धरती का तापमान बढ़ रहा है। आबादी बढ़ रही है, जमीन छोटी पड़ रही है। ऑक्सीजन की कमी हो रही है। हमारा सुविधावादी नजरिया एवं जीवनशैली भी पर्यावरण एवं प्रकृति के लिए गंभीर खतरे पेश कर रहे हैं। वन क्षेत्र का लगातार खत्म होना भी इसकी बड़ी वजह है लेकिन सबसे बड़ी वजह है निर्माण क्षेत्र का अराजक व्यवहार। शहरीकरण की तेज प्रक्रिया में इधर खेतों में कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए गए हैं। कहीं कॉलोनियां बसाने के लिए झीलों, नदियों तक को पाट दिया गया, कहीं जमीन के बड़े हिस्से पर सीमेंट और रेत भर दी गई जिससे धरती बांझ होती जा रही है। नदियों से दूर बसी कॉलोनियों को भू-जल पर आश्रित छोड़ दिया गया, जिसके लगातार दोहन से हरे-भरे इलाके भी मरुस्थल बनने की ओर बढ़ गए। सरकार सचमुच जमीन को उपजाऊ बनाना चाहती है, तो उसे कंस्ट्रक्शन सेक्टर को नियंत्रित करना होगा। लेकिन इस दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ाने के लिए हमें विकास प्रक्रिया पर ठहरकर सोचने के लिए तैयार होना होगा। बात तभी बनेगी जब सरकार के साथ-साथ समाज भी अपना नजरिया बदले।


सैन्य सुधार की राह के अग्निवीर
कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री )

सत्ता संभालने के बाद से ही नरेंद्र मोदी सरकार की पहली प्राथमिकता रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा रही है। देश के सशस्त्र बलों को अत्याधुनिक तकनीकी से सुसज्जित कर एक आधुनिक युद्धक बल के रूप में विकसित करने के लिए विगत आठ वर्षों में सरकार ने कई सार्थक कदम उठाए हैं। इसी कड़ी में एक नई क्रांतिकारी पहल है- अग्निपथ योजना! यह योजना देश के स्वर्णिम कल को साकार करने वाली। देश की वे युवा प्रतिभाएं, जो समकालीन तकनीकी प्रगति को लेकर जागरूक हैं, अग्निपथ योजना के अंतर्गत अग्निवीर के रूप में सेना का भाग बनने को आकर्षित होंगी। इससे भारतीय सेना तो आधुनिकतम और सर्वश्रेष्ठ बनेगी ही, चार वर्ष की सेवा के बाद जब ये युवा वहां से निकलकर आएंगे, तो इनके रूप में हमारे समाज को दक्ष, अनुशासित और प्रेरित मानव संसाधन मिलेगा।

अग्निपथ योजना शारीरिक रूप से स्वस्थ और उत्साह से परिपूर्ण देशभक्त युवाओं को सेना का गौरव धारण करने का अवसर देने वाली पहल है। इसके अंतर्गत 46,000 अग्निवीरों की भर्ती तीन महीने के भीतर कर ली जाएगी। लंबे समय से अनुभव किया जा रहा था कि भारतीय सेना को और अधिक युवा बनाना चाहिए। यह उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब सेना में युवा शक्ति की नियमित भागीदारी सुनिश्चित हो पाए और अल्पवधि सेवा वाले सैनिकों की संख्या अधिक हो। अग्निपथ योजना इस लक्ष्य को पूरा करने में सक्षम होगी और युवा सैनिकों की निरंतर भर्ती का मार्ग प्रशस्त करेगी। भारतीय सेना के तीनों अंगों- थल सेना, वायु सेना और नौसेना में अखिल भारतीय सभी वर्ग, यानी एआईएसी के आधार पर भर्ती होगी और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों जैसे मान्यता प्राप्त तकनीकी संस्थानों के जरिये केंद्रीकृत ऑनलाइन प्रणाली के साथ-साथ विशेष भर्ती अभियानों व परिसर साक्षात्कार के माध्यम से प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसमें स्वास्थ्य पात्रता व कठिन प्रशिक्षण मानकों का पूरा पालन किया जाएगा।

अग्निवीर के रूप में भर्ती किए जाने वाले इन नौजवानों के प्रत्येक बैच से 25 प्रतिशत सैनिकों को नियमित कैडर की सेवा में लिया जाएगा, जो योग्यता आधारित आकलन पर होगा और उनकी सैन्य सेवाएं न्यूनतम 15 वर्षों के लिए होंगी। सैन्य सेवा से मुक्त होने के बाद जब ये अग्निवीर नागरिक जीवन में लौटकर आएंगे, तो उनके पास विशेष योग्यता प्रमाणपत्र होगा। इनके वैकल्पिक रोजगार या नौकरी की व्यवस्था के साथ समाज में सम्मिलन और आजीविका का प्रयास तो किया ही जाएगा, उच्च शिक्षा के इच्छुक अग्निवीरों की सहायता की जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय और अनेक राज्य सरकारों ने सैन्य सेवा से मुक्त होकर आने वाले इन युवाओं को अपने यहां सशस्त्र बलों में नियुक्ति में वरीयता देने की भी घोषणा की है।

आज विश्व की सभी प्रमुख सेनाएं सुधार की ओर अग्रसर हैं। वैश्विक रुझान यह है कि सैन्य कर्मियों की संख्या के बजाय सेना के लिए अत्याधुनिक हथियारों पर पूंजीगत व्यय बढ़ाया जाए। चीन तो 1980 से इस पर काम कर रहा है और उसने अपने सैनिकों की संख्या 45 लाख से घटाकर 20 लाख कर दी है। वह सैनिकों की संख्या घटाने के साथ तकनीक और प्रौद्योगिकी में व्यय करके सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है। अच्छी बात यह है कि मोदी सरकार चीन से भी तेज गति से भारतीय सेना का आधुनिकीकरण कर रही है। मौजूदा डिजिटल युग में युद्ध कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस’ की मदद से स्वचालित प्रणालियों, दूरस्थ केंद्रों से संचालित होने वाले शस्त्रों व अंतरिक्ष आधारित गोपनीय चौकसी व टोह आदि के जरिये लड़े जा रहे हैं। युवा व तकनीक के प्रति जागरूक अग्निवीरों की भर्ती से भारतीय सेना की यह आवश्यकता पूरी होगी। साथ ही, इससे भारतीय सैनिकों की औसत आयु चार-पांच वर्ष तक नीचे आ जाएगी। विश्व की आधुनिक सशस्त्र सेनाओं में सक्रिय सैन्य सेवा की औसत अवधि दो से आठ वर्ष तक है। दुनिया की उत्कृष्ट सेना कही जाने वाली इजरायल की सेना में पुरुष सैनिकों की औसत सैन्य सेवा मात्र 30 महीने और महिला सैनिकों की 22 माह की होती है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस में भी सैनिकों की औसत सेवा एक से दस वर्ष तक ही होती है।

अग्निपथ योजना भारतीय सेना को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना बनाने की योजना का अंग है। अग्निवीरों को जो प्रशिक्षण दिया जाएगा, वह विश्व स्तरीय सशस्त्र बलों को दिए जाने वाले प्रशिक्षण के बराबर का होगा। देश की सेना को सशक्त करने की योजना तो पहले से ही चल रही है। सरकार ने रक्षा बजट लगभग दोगुना कर दिया है। वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट में रक्षा बजट को 5,25,166 करोड़ रुपये तक बढ़ाया गया है। हथियारों के मामले में दूसरे देशों पर निर्भरता से मुक्ति के लिए सरकार ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के तहत देश में ही रक्षा उत्पादन पर बल दे रही है। आत्मनिर्भर भारत योजना के अंतर्गत 101 रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक लगा दी गई है। इसी तरह, रक्षा उपकरणों का उत्पादन करने वाली कंपनियों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दी गई है। सरकारी रक्षा कंपनियों के लिए वित्तीय वर्ष 2023 तक अपने कुल राजस्व का 25 प्रतिशत भाग निर्यात के जरिये जुटाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 2022-23 के बजट में रक्षा पर व्यय की जाने वाली कुल राशि का 68 प्रतिशत देश में ही उत्पादित रक्षा उपकरणों पर खर्च किए जाने की व्यवस्था की गई। यही नहीं, भारत में रक्षा उत्पादन बढ़ाने के लिए 41 कंपनियों को मिलाकर सात नई कंपनियां बनाई गईं और रक्षा उत्पादन गलियारा बनाया जा रहा है।

अग्निपथ योजना हमारे सशस्त्र बलों में युवा प्रोफाइल को बढ़ाएगी और उनको ‘उत्साह’ व ‘भावना’ के नए संसाधन प्रदान करेगी। जाहिर है, इस तरह तकनीकी रूप से दक्ष सशस्त्र बलों की दशा-दिशा में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। चार वर्ष की सैन्य सेवा करके लौटे युवा राष्ट्र-निर्माण की थाती सिद्ध होंगे। अल्पकालिक सैन्य सेवा की दिशा में आगे बढ़ने का एक बड़ा लाभ यह भी है कि बाहरी व आंतरिक खतरों और प्राकृतिक आपदाओं के समय राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन उपलब्ध होंगे। अत: इस सराहनीय योजना के बारे में देश के नौजवानों और जनता को प्रेरित किया जाना चाहिए।