14-04-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


The Heat is On, Act To Avoid Meltdown
ET Editorials

The heatwave across northern India underlines the perils of unchecked global warming. The Intergovernmental Panel on Climate Change’s (IPCC) latest report unequivocally warns of worsening impacts if rapid, immediate reduction of greenhouse gas (GHG) emissions is not undertaken. India is among the most vulnerable countries, even as its share of cumulative emissions is about 4%. Global warming is no longer just a first world problem. In fact, if anything, its impact is being felt most by developing countries.

India’s share of annual GHG emissions is rising. At No. 4, it accounted for 7% of emissions in 2020. Development is nonnegotiable for India. But it must do so without shooting itself
— and the world — in more than just the foot. For this, India needs to shift away from coal, oil and gas and increase its share of renewable energy (RE) use and rapid development of alternatives such as green hydrogen and even nuclear. This requires power sector reforms, particularly tariff —ending cross-subsidy of residential electricity use by commercial users, ending free power and improving market design. GoI must institute the ‘no new coal plant’ policy recommended by the expert group led by former CERC chairman Gireesh Pradhan on the National Electricity Policy. Measures such as investing in integrated mass public transport aggregate and reduce energy consumption, as does transitioning to electric vehicles (EVs) in autos.

India must step up efforts to reduce and adapt to climate change, while continuing to push rich countries to do their fair share by stepping up emission reduction and helping developing countries with finance and technology. The temperature is rising, as is woefully evident.


Collective punishment
The demolition of property of ‘rioters’ in M.P. is part of a wider agenda targeting Muslims

The rule of law has a new interpretation in Madhya Pradesh: it is whatever is done by the rulers, and requires neither law nor process. The demolition of about 45 pieces of property, both houses and shops, allegedly belonging to “rioters” at Khargone, a day after a procession to mark Ram Navami, does not appear to be based on any law. It is undoubtedly an instance of collective punishment for the alleged acts of a few. There is little doubt that it was a state-backed drive aimed at Muslims. The basis for the action is the allegation that the Hindu procession was targeted by stones as it passed through a lane adjacent to a mosque. An official spin is sought to be given to the demolition drive that these were “encroachments” and were removed under existing rules. However, the zeal shown in bringing in bulldozers a day after violence marred the Ram Navami procession indicates that punishing those suspected of involvement was the main motivating factor. Chief Minister Shivraj Singh Chouhan has warned that rioters would not be spared and that action would not be limited to arrests, but would extend to recovery of damages from property owned by them. The legal basis is possibly a 2009 order of the Supreme Court, permitting the pinning of the blame on organisers of an event if it ends in violence, and recovering compensation from them against claims. However, even that was allowed only after their involvement in the violence was proved, an element clearly absent here.

Hindutva outfits have been, for some time now, targeting Muslim businesses with calls for boycott and dissemination of rumours about their practices. In the backdrop of an upsurge in calls for violence against Muslims, some with a genocidal tenor, there is reason to believe that there is a larger agenda behind the various incidents of communal colour taking place. The objective seems to be to provoke some sort of retaliation so that they can be portrayed as culprits and severe punishment, both legal and extra-legal, meted out. The ‘othering’ of Muslims is no more discreet, but is being actively promoted in public and shared through social media. In some disturbing visuals, men appearing to be saffron-robed monks are seen handing out death and rape threats. The sight of crowds dancing with raised swords and saffron flags outside mosques, even as obscene slogans and provocative songs are being played, has become a defining visual in the Hindutva project. The country should not be allowed to be driven towards an atmosphere of communal tension with the tacit support of the government machinery in several States.


व्यावसायिक शिक्षा से ही घटेगी बेरोजगारी

तकनीक जिंदगी को सरल और जीने के साधनों को सस्ता बना रही है। सीएमआईई के एक अध्ययन में पाया गया कि पारंपरिक पढ़ाई से ग्रैजुएट होने पर रोजगार के अवसर तीन गुना तक कम हो जाते हैं। देश में औसत बेरोजगारी दर 6.83% है, वहीं ग्रैजुएट्स में यह आंकड़ा 19% का है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के अनुसार हर माह करीब 12.5 लाख नए युवा (15-29 आयु वर्ग के) नौकरियों के बाजार में आते हैं। देश भर में कुल 47 करोड़ कामगार हैं, जिनमें से 92% अनौपचारिक क्षेत्र में हैं। इनमें से केवल 6 फीसदी ने स्नातक और 13% ने प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की है। 31% निरक्षर हैं। केवल दो प्रतिशत ने ही औपचारिक व्यावसायिक शिक्षा ली है, वहीं नौ फीसदी लोगों ने अनौपचारिक। यही कारण है कि देश में 31% प्रशिक्षित ड्राइवरों की कमी है, जिसके चलते 17% ईंधन ज्यादा खर्च होता है। नई शिक्षा नीति में माध्यमिक कक्षाओं से ही व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू होंगे ताकि बढ़ती तकनीकी जरूरतों के लिए युवा तैयार हो सकें। साथ ही बेरोजगारी पर भी लगाम लगे। 2015 में शुरू हुई कौशल विकास योजना महत्वाकांक्षी और दूर दृष्टि वाली थी, लेकिन ढिलाई के चलते यह लक्ष्य को नहीं पा सकी। व्यावसायिक संस्थानों के साथ मिलकर प्रशिक्षण देना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। इसमें सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया भी जरूरी है। बदलती तकनीकों से प्रशिक्षकों का वाकिफ नहीं होना संस्थानों में इस प्रशिक्षण की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसकी तुलना में व्यावसायिक जगत न सिर्फ उन तकनीकों का इस्तेमाल करता है बल्कि नए लोगों को सिखाता भी है। यह उसके लिए ही फायदेमंद है। देश के बड़े पदों पर बैठे लोगों को इस बात का ध्यान रख नई सोच विकसित करनी चाहिए।


देश में डिजिटल क्रांति के साथ ई-कचरा एक गंभीर खतरा है
सत्यवान सौरभ, ( रिसर्च स्कॉलर )

चीन और अमेरिका के बाद भारत ई-कचरे का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। ई-कचरे को दो व्यापक श्रेणियों के अंतर्गत 21 प्रकारों में बांटा गया है जैसे सूचना प्रौद्योगिकी और संचार उपकरण एवं उपभोक्ता इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स। इसके प्रबंधन के लिए देश में कानून हैं। लेकिन उनके क्रियान्वयन का प्रश्न बना हुआ है।

ई-कचरे में विविध पदार्थ होते हैं जिनमें सबसे प्रमुख रूप से खतरनाक पदार्थ जैसे सीसा, पीसीबी, पीबीबी पारा, पीबीडीई, ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स शामिल हैं। ई-कचरा जलने पर हानिकारक रसायन छोड़ता है, जो रक्त, गुर्दे व तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जब इसे लैंडफिल में फेंका जाता है, तो रसायन भूजल में रिस जाते हैं, जो भूमि और समुद्री जीवों दोनों को प्रभावित करते हैं।

ई-कचरा (प्रबंधन) नियम 2016-2017 में आया था। उत्पादकों को ई-कचरे के संग्रह और उसके विनिमय के लिए जिम्मेदार बनाया गया है। भारत में 95% ई-कचरे को अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा पुनर्नवीनीकरण किया जाता है और स्क्रैप डीलर इसे अवैज्ञानिक रूप से एसिड में जलाकर या घोलकर इसका निपटान करते हैं। 2018-19 में एकत्र किए गए ई-कचरे की मात्रा 1.54 लाख टन के लक्ष्य के मुकाबले 78,000 टन थी। ई-कचरे में लेड, मरकरी, कैडमियम, क्रोमियम, पॉलीब्रोमिनेटेड बाइफिनाइल और पॉलीब्रोमिनेटेड डिपेनिल जैसे जहरीले तत्व होते हैं। मनुष्यों पर स्वास्थ्य प्रभावों में गंभीर बीमारियां जैसे फेफड़े का कैंसर, श्वसन संबंधी समस्याएं, ब्रोंकाइटिस, मस्तिष्क की क्षति आदि शामिल हैं जो जहरीले धुएं के सांस लेने के कारण, भारी धातुओं के संपर्क में आने और समान रूप से होती हैं। ई-कचरा एक पर्यावरणीय खतरा है, जिससे भूजल प्रदूषण, मिट्टी का अम्लीकरण और भूजल का प्रदूषण और प्लास्टिक और अन्य अवशेषों के जलने से वायु प्रदूषण होता है।

देश में ई-कचरे के 312 अधिकृत रिसाइकलर हैं, जिनकी सालाना क्षमता लगभग 800 किलो टन है। लेकिन फिर भी 90% से अधिक ई-कचरा अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र ही नियंत्रित करता है। देश में दस लाख से अधिक लोग हाथों से रिसाइकल के काम में शामिल हैं। श्रमिक पंजीकृत नहीं हैं इसलिए श्रमिकों के अधिकार, पारिश्रमिक, सुरक्षा उपायों जैसे रोजगार के मुद्दों को ट्रैक करना कठिन है।

अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों के साथ जुड़ने की रणनीति के साथ आने की जरूरत है क्योंकि ऐसा करने से न केवल बेहतर ई-कचरा प्रबंधन प्रथाओं में एक लंबा रास्ता तय होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी, मजदूरों के स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति में सुधार होगा और बेहतर प्रदान होगा। यह प्रबंधन को पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ और निगरानी में आसान बना देगा।

नियमों का प्रभावी कार्यान्वयन ई-कचरे के प्रबंधन के लिए आगे का रास्ता है। प्रभावी जागरूकता सभी हितधारकों के लिए सही कदम होगा। पर्यावरण के अनुकूल ई-अपशिष्ट को रिसाइकल करने की प्रथाएं अपनाने की आवश्यकता है। जब तक हम इस नियम का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं करते हैं, तब तक देश कई अनौपचारिक प्रसंस्करण केंद्रों का निर्माण करेगा। नियम का सख्ती से क्रियान्वयन, पर्याप्त जागरूकता पैदा करना और अनौपचारिक क्षेत्र के लिए आवश्यक कौशल सेट के लिए प्रशिक्षण एक गेम-चेंजर हो सकता है।


पोषण सुरक्षा में मजबूती

सरकार ने सन 2024 तक पूरे देश में चरणबद्ध ढंग से पोषणयुक्त चावल की आपूर्ति सुनिश्चित करने का निर्णय लिया है ताकि कुपोषण की समस्या को दूर किया जा सके। हालांकि आबादी के एक बड़े हिस्से को भारी भरकम सब्सिडी और कुछ मामलों में तो नि:शुल्क अनाज वितरण के कारण बड़े पैमाने पर भूख और भूख के कारण होने वाली मौतों के मामलों का प्रबंधन करने में काफी मदद मिली है लेकिन अल्पपोषण और असंतुलित पोषण अभी भी न केवल बरकरार है बल्कि इसमें इजाफा देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्षों के मुताबिक 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग में रक्त की कमी का सामना कर रही महिलाओं की तादाद 2015-16 के 53 फीसदी से बढ़कर 2019-20 में 57 फीसदी हो गई। इससे भी बुरी बात यह कि लौह तथा अन्य जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी से जूझ रहे पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की तादाद बढ़कर 67.1 फीसदी पहुंच गई, यानी इस अवधि में उनमें सालाना लगभग 8 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई। पोषण संबंधी ऐसी विसंगति बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है जिसका नतीजा ठिगनेपन और वजन की कमी के रूप में सामने आता है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि 2021 के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत को 116 देशों में 101वां स्थान मिला और वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों से भी पीछे रहा।

आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति की पिछली बैठक में मिली मंजूरी के मुताबिक लौह युक्त चावल की आपूर्ति की योजना से ठिगनेपन और कम वजन की समस्या में दो फीसदी तथा महिलाओं और बच्चों की रक्त अल्पता में सालाना 9 फीसदी की कमी आने की संभावना है। यह चावल लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस), एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम, स्कूली बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन योजना (जिसे अब पीएम-पोषण का नाम दे दिया गया है) तथा अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से वितरित किया जाना है। इस योजना पर लगभग 2,700 करोड़ रुपये वार्षिक व्यय होने का अनुमान है जो कुल खाद्य सब्सिडी के करीब दो फीसदी के बराबर होगा। इसे केंद्र द्वारा वहन किए जाने का प्रस्ताव है। अधिकारियों का दावा है कि इससे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में तकरीबन 50,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। फिलहाल 2019 से चल रही एक प्रायोगिक परियोजना के तहत 11 राज्यों के एक-एक जिले में पोषणयुक्त चावल की आपूर्ति टीपीडीएस के माध्यम से की जा रही है। हालांकि पोषण विशेषज्ञ इस बात को लेकर बहुत आशान्वित नहीं हैं कि यह चावल रक्त अल्पता और अल्पपोषण को समाप्त करने के लक्ष्य को पूरा करने में कुछ खास मदद कर पाएगा। उनकी आशंका मानव शरीर में लौह की खपत से जुड़े मसलों को लेकर है। यह अहम पोषक तत्त्व वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक है लेकिन रक्त में इसकी खपत से हीमोग्लोबिन का निर्माण कई अन्य खनिजों और विटामिनों की उपलब्धता पर निर्भर है। मौजूदा सरकारी पोषण आधारित कार्यक्रमों के साथ दिक्कत यह है कि वे प्राथमिक तौर पर समग्र और पोषक भोजन मुहैया कराने के बजाय पेट भरने पर केंद्रित हैं।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के पोषणविदों तथा हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान के पोषणविदों का मानना है कि भोजन में विविधता के जरिये ही पोषक तत्त्वों की जरूरत पूरी की जा सकती है। यह तभी सुनिश्चित की जा सकती है जब भोजन में अपेक्षाकृत अधिक पोषक खाद्य पदार्थ मसलन बाजरा, ज्वार और रागी तथा दाल, अंडे, दूधे, सब्जियां और फल आदि शामिल किए जाएं।

अहम बात है कि देश का कृषि शोध नेटवर्क पारंपरिक और आधुनिक तकनीक की मदद से फसलों के जीन में बदलाव करके पोषण समृद्ध और जैविक रूप से पोषक किस्में तैयार कर रहा है। इन पोषण युक्त अनाजों को खाद्य कार्यक्रमों में शामिल करना कुपोषण से निपटने का व्यावहारिक और बेहतर तरीका है।


वैश्विक कूटनीति और भारत
सतीश कुमार

रूस-यूक्रेन युद्ध के मसले पर तटस्थता का रुख रखने का भारत का फैसला देश-दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। तटस्थता का रुख छोड़ रूस विरोधी खेमे में शामिल होने के लिए भारत पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश भारत पर इस बात के लिए दबाव बना रहे हैं कि उसे भी रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंध में साथ आना चाहिए। लेकिन भारत का शुरू से मानना रहा है और वह कहता भी आया है कि रूस और यूक्रेन के राष्ट्रपति को शांति प्रयासों पर जोर देना चाहिए। खेमेबाजी से तो युद्ध कभी शांत नहीं होने वाला। इसलिए भारत तटस्थ है और शांति का पक्षधर भी।

रूस का साथ छुड़वाने के लिए भारत के खिलाफ दबाव की कूटनीति मामूली नहीं है। इसके लिए अमेरिका हर तरह से प्रयास कर रहा है। पिछले दिनों अमेरिकी के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार दिल्ली आए थे और भारत को चेताया भी था कि चीन के अतिक्रमण की सूरत में रूस उसकी कुछ भी मदद नहीं कर पाएगा, जो अमेरिका कर सकता है। साथ ही यह भी कहा था कि रूस के खिलाफ प्रतिबंधों का मतलब भारत को समझना चाहिए। दरअसल, अंतराष्ट्रीय राजनीति में हर घटना अपना महत्त्व और नतीजे लिए होती है। इसलिए अमेरिका की इस गीदड़ भभकी का कोई अर्थ नहीं रह जाता। वैसे भी भारत की स्थिति शीत युद्ध के काल वाली नहीं है, जब उसे एक विवश और मजबूर देश के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा था। आज तमाम दबावों के बावजूद भारत अगर अपने फैसले पर अडिग है, तो इसके पीछे उसकी मजबूत और तार्किक विदेश नीति है। भारत का शुरू से कहना रहा है कि वह युद्ध रोकने और किसी भी देश की संप्रभुता की रक्षा के पक्ष में है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मान-मर्यादा और विश्व शांति का हिमायती है।

भारत के तटस्थता के फैसले को व्यापक संदर्भ में देखने और समझने की जरूरत है। युद्ध एक बीमार मानसिकता का द्योतक है। यूक्रेन पर रूस के हमले से केवल यह मान लेना कि दोष रूस का ही है, सही नहीं है। सच तो यह है कि इस युद्ध की पटकथा लिखने में अमेरिका और यूक्रेन भी बराबर के दोषी हैं। नाटो के गठन से लेकर उसकी भूमिका और अतिक्रमण की नीतियों से दुनिया अनजान नहीं है। अस्सी के दशक के दौरान अमेरिका ने रूस के पूर्व राष्ट्रपति गोर्बाचेव से वादा किया था कि किसी भी कीमत पर नाटो का विस्तार पूर्वी यूरोप में नहीं किया जाएगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। पहली बार नाटो का विस्तार 1997 में हुआ था, पर तब रूस चुप रहा। फिर 2004 में हुआ। तब भी रूस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन जब 2008 में यूक्रेन और जार्जिया को नाटो में शामिल करने की बात आई, तो रूस भड़क उठा। यानी इस युद्ध की पटकथा 2008 में ही लिखी जा चुकी थी। इसलिए दोषी कौन और कितना है, यह कोई अबूझ पहेली नहीं रह गई है।

देखा जाए तो नाटो का अभी तक का इतिहास रक्त रंजित ही रहा है। कोसोव, इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी नीतियों ने लाखों जानें ले लीं। करोड़ों लोग बेघर हो गए थे और नाटो ने कई देशों की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को नष्ट कर दिया था। आज नाटो की पीड़ा इसलिए भी है कि उसकी नीतियों को चुनौती मिल रही है। भारत रूस के आक्रमण से भी इत्तफाक नहीं रखता। इसलिए उसने अपनी टिपण्णी में बात की गंभीरता को बेबाकी से रखने की कोशिश की है। यह भी सच है कि 1956 में हंगरी और 1968 में चेकोस्लोवाकिया और फिर 1979 में अफगानिस्तान में रूसी दखल पर भी भारत ने तटस्थता की ही नीति अपनाई थी।

आज रूस यूक्रेन जंग के बीच भारत भी महाशक्तियों के केंद्र में है। भारतीय कूटनीति के लिए यह अग्निपरीक्षा का समय है। प्रमुख देशों के राजनयिक भारतीय विदेश नीति को अपने-अपने हितों के अनुरूप प्रभावित करने में जुटे हैं। भारत को दुविधा और दबाव में डालने का खेल जारी है। इसीलिए ये सवाल सबको हैरान कर रहे हैं कि आखिर विदेश मंत्रियों की यात्रा का मकसद क्या है? पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए प्रमुख विदेश मेहमानों में जापान के प्रधानमंत्री के अलावा रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ही ऐसे नेता थे, जिनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिले थे। इस मुलाकात पर अमेरिका और पश्चिमी देशों की पैनी नजर थी। इसके पहले चीन के विदेश मंत्री भी अचानक भारत यात्रा पर आए थे, लेकिन शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात नहीं कर सके थे। इतना ही नहीं, अमेरिकी राजनयिक की यात्रा भी विदेश मंत्रालय तक सीमित रही। रूसी विदेश मंत्री ने पहली बार भारत-चीन सीमा विवाद पर खुल कर संकेत दिया। उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच स्थिति एक हद से ज्याउदा खराब नहीं हो, रूस यह सुनिश्चित करने के प्रयास में हमेशा रहेगा। इसके अलावा रूसी विदेश मंत्री ने यह संकेत भी दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने के लिहाज से बने भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के चौगुटे (क्वाड) के कारण भारत को लेकर चीन का संदेह खत्म करने का प्रयास भी रूस करेगा। रूसी विदेश मंत्री के ये इशारे हवा-हवाई नहीं कह जा सकते, क्योंकि रूस, भारत, चीन का संगठन- रिक (आरआइसी) इसका आधार मुहैया कराता है।

भारत-रूस रिश्तों का आधार पत्थर पर लकीर की तरह है। 1978 में विदेश मंत्री के रूप में जब अटल बिहारी बाजपयी रूस गए थे तो उन्होंने कहा था कि भारत का एकमात्र दोस्त रूस ही है। 1960 में रूस के राष्ट्रपति ख्रुश्चेव की टिपण्णी भी इसी तरह की थी कि हिमालय से भी भारत आवाज बुलंद करेगा तो रूस उसके लिए हमेशा खड़ा मिलेगा। यह दोस्ती समय के साथ और मजबूत बनती चली गई। शीत युद्ध में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रूस ही था। आज भी हथियारों का बड़ा हिस्सा भारत रूस से ही खरीदता है। तेल और गैस की कमी को भी रूस पूरा करने का वचन दे चुका है। मध्य एशिया और अफगानिस्तान की सुरक्षा में रूस की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

रूस और यूक्रेन युद्ध में कुछ बातें स्पष्ट हुई हैं। भारत एक ऐसा देश बना है जिसकी सोच और नीति ने दुनिया के देशों को प्रभावित किया है। भारत संभवत: दुनिया का अकेला देश है जहां हाल में रूस, चीन और अमेरिका के विदेश मंत्री आए। कारण भी स्पष्ट है। जब अमेरिका ने क्वाड को नाटो की तरह सैनिक तंत्र में बदलने की बात कही थी, तो भारत ने मना कर दिया था। यह भारत की वैश्विक सोच का नतीजा था। संघर्ष और युद्ध का माहौल एशिया महाद्वीप के लिए यथोचित नहीं है। भारत हमेशा युद्ध और संघर्ष के विरुद्ध खड़ा रहा है। इसलिए रूस-यूक्रेन मसले पर भारत के तटस्थता के निर्णय को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इराक, सीरिया, लीबिया, और अफगानिस्तान जैसे देशों में सम्प्रभुता का हनन होता रहा, तो यह कड़ी यूक्रेन के साथ कई अन्य देशों तक बनती चली जाएगी। इसलिए जरूरी है कि अंतराष्ट्रीय संगठनों को मजबूत करना और एक नियम बद्ध वैश्विक व्यवस्था की रचना करना। इसके लिए भारतीय विदेश मंत्री ने भारत की विदेश नीति को दुनिया के सामने स्पष्ट भी कर दिया है। जो देश भारत-रूस रिश्तों को कठघरे में रखने की कोशिश कर रहे हैं, उनका दोहरा चरित्र भी दुनिया देख ही रही है। लेकिन भारत दुनिया को युद्ध की विभीषिका से बचाने की पहल कर रहा है, न कि उन्माद फैलाने की।


दुनिया को अनाज

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रस्ताव दिया है कि यदि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) अनुमति देता है, तो भारत कल से ही अपने भंडार से खाद्य सामग्रियों की आपूर्ति दुनिया भर को कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ सोमवार को हुई वचरुअल बैठक में यह प्रस्ताव रखा। मंगलवार को गुजरात के अडालज में श्री अन्नापुर्णाधाम न्यास के छात्रावास एवं शिक्षा परिसर का वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए उद्घाटन और जनसहायक ट्रस्ट के हीरामणि आरोग्यधाम का भूमि पूजन करने के बाद अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने यह जानकारी दी। अपने संबोधन में मोदी ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दुनिया के विभिन्न हिस्सों में खाद्य भंडार कम होता जा रहा है। दुनिया अनिश्चय की स्थिति का सामना कर रही है क्योंकि जिसे जो चाहिए वह मिल नहीं रहा है। खाद्यान्न को लेकर तमाम देशों में चिंताएं बढ़ गई हैं। पेट्रोल, तेल, खाद की खरीदारी में कठिनाई आ रही है क्योंकि सभी दरवाजे बंद होते जा रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने लोगों में ऐसा भय पैदा कर दिया है कि हर कोई अपने भंडार सुरक्षित करना चाहता है। दुनिया नये संकट के दरपेश है, और दुनिया का खाद्य भंडार तेजी से खाली हो रहा है। मोदी ने कहा कि भारत के पास अपने लोगों के लिए पर्याप्त खाद्यान्न हैं, और अब लग रहा है कि हमारे किसानों ने दुनिया को खिलाने की भी व्यवस्था कर ली है। दरअसल, डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, सरकार द्वारा खरीदा गया गेहूं घरेलू प्रयोग के लिए होता है, सरकार उसका निर्यात नहीं कर सकती। भारत के प्रधानमंत्री की यह पेशकश ऐसे समय आई है, जब भारत घरेलू मोच्रे पर खुदरा महंगाई दर का दंश झेल रहा है। खुदरा महंगाई दर 17 महीने के शीर्ष स्तर (6.95%) पर है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक स्तर से ऊपर है। इसके बावजूद भारत ने मदद की पेशकश की है, तो इसलिए कि देश में खाद्यान्न अतिरेक की स्थिति है। यह हमारे किसानों की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। पर्याप्त खाद्यान्न होने के चलते कोरोना महामारी के दौरान बीते दो साल में भारत ने अपने लोगों को भूखे पेट नहीं सोने दिया। अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मुहैया करा रहा है, जिससे तमाम देश स्तब्ध हैं। युद्ध या आपदाकाल में भारत हमेशा सभी के लिए सुख-शांति की कामना के साथ आगे बढ़कर मददगार भूमिका में रहा और सर्वहित में फैसले लेकर अपनी विसनीय और अनूठी छवि गढ़ी है।