(11-12-2021) समाचारपत्रों-के-संपादक


Cry Over Inequality, Harder Over Poverty
ET Editorials

We join the lament over the high levels of income inequality in India. However, we would like to point out that obsessing over inequality should not be at the expense of recognising that broad-based growth that delivers people out of absolute poverty is more important than keeping a lid on inequality. The latest World Inequality Report’s finding that India is among the most unequal countries is disconcerting. Inequality, exacerbated by the pandemic, is potentially damaging for a society. But even more damaging would be low growth keeping people trapped in poverty, even if inequality remains static.

Updated data for 2021 in the report authored by Lucas Chancel, co-director of the World Inequality Lab, and coordinated by French economist Thomas Piketty, among others, shows that the top 10% hold 57% of the total national income. This includes 22% held by the top 1%, while the bottom 50% hold just 13%. The income gap between the top 10% and the bottom 50% in India is 1 to 22. The gap is wide, but sustained high growth that prises the poor out of the sub-human drudgery of poverty and sets them on a path to realising their innate human potential trumps low rates of growth if that comes combined with static income inequality. The challenge is to create the physical and social infrastructure needed to combat poverty, and create a regulatory framework that promotes, rather than stifles, creativity.

Political empowerment is the first key ingredient of poverty removal. People with political agency will demand and obtain education and healthcare. It will also erode the structural inequality and sectarian divides in society. Social cohesion and individual agency together make for broad-based growth that emancipates.


Green shoots
The Government should build political consensus on plans for reform in farm sector

The repeal of three controversial farm laws by the Narendra Modi government through a parliamentary resolution has defused the conflict over them, but the underlying questions regarding the sector remain unresolved. Farmers who had stayed put at sites around the national capital for a year are now dispersing, but not with much clarity on the road ahead. The defeatism of the Government, and the triumphalism of the farm unions and the Opposition over the repeal of the laws have created a hostile environment for a long-term resolution to the agricultural practices that are economically and environmentally unsustainable. No reform can be possible without building sufficient political support for it, unless unlimited state force is used to suppress the opposition. In this instance, the Government went ahead without adequate consultations and landed in a stalemate with entrenched farming communities. Any aggravation of the situation would have been dangerous for the stability of the country, but what forced the Bharatiya Janata Party (BJP) into retreat was its immediate political calculations for Assembly elections in Uttar Pradesh and Punjab. But farmers remain ambiguous in their approach to the party. A section of them in western Uttar Pradesh might consider voting for the BJP, but for many, the wounds are still fresh, and they distrust the BJP. In Punjab, the BJP has managed to be a part of the conversation, but the road to any political reward over the repeal appears long at the moment.

Farmers have resolved to review the progress of their agreement with the Government in mid-January. Their key remaining demand is a legal guarantee of minimum support prices for all crops. While the Government has promised that the existing minimum support price regime will not be diluted, the questions on extending its coverage and backing it up legally have been left to a committee constituted by the Prime Minister. The committee includes representatives of farmers too. The Indian agriculture sector requires a balance between national development priorities and market linkages, and ensure long-term economic sustainability for those employed by it. Wider coverage of minimum support prices could encourage farmers in Punjab and Haryana to switch from irrigation intensive, and expensive rice to a diverse crop pattern without compromising on the food staple. Water abundant areas could adopt appropriate crops. To achieve an ecologically appropriate geographical spread of crops, the existing regional disparity in the sector needs to be addressed, by giving more state attention to regions and crops that are now in a shadow. Enhancing agriculture incomes is a shared objective of all political parties, and it is most unfortunate that they are unable to put their heads together to achieve this. The calm achieved by rightly repealing the three laws should be wisely used by the Centre to build a political consensus on the country’s agriculture sector.


कानून बनाने के पहले व्यापक लोक-विमर्श जरूरी है

संसद में पक्ष-विपक्ष के बीच शीतकालीन सत्र में भी गर्मी चरम पर है। चुनावी मंचों और जन-सभाओं में एक-दूसरे पर आरोप लगना सामान्य राजनीतिक व्यवहार है, लेकिन ऐसे कानून जिनका सीधा रिश्ता समाज की परंपराओं, आदतों, नैतिक मूल्यों और आजीविका के परंपरागत तरीकों से हो, उन्हें बनाने के पहले व्यापक संवाद जरूरी होता है। यूपीए-2 के अंतिम वर्ष में प्री-लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी, (विधायन-पूर्व विमर्श नीति), 2014 बनी जो आज भी लागू है। इसके तहत संबंधित मंत्रालय कानून के हर मसौदा, उसे लाने के कारण, सामाजिक और आर्थिक लाभ-हानि का ब्यौरा कम से कम 30 दिन तक लोक-विमर्श के लिए वेबसाइट पर डालेगा और संवाद कराएगा। जनता के प्रमुख सुझावों को भी साइट पर डाला जाएगा। लेकिन पिछले सात वर्षों में 301 बिल संसद में लाए गए जिनमें 227 बगैर किसी विमर्श के संसद में पेश किए गए और 40 ऐसे थे जिन पर 30 दिन की अवधि का पालन नहीं किया गया। इनमें से अधिकांश किसी संसदीय समिति को भी नहीं भेजे गए। न्यायशास्त्र की दुनिया में एक कहावत प्रचलित है : ऐसा कोई कानून न बनाएँ जिनके अनुपालन की संभावनाएं क्षीण हों क्योंकि कानून के उल्लंघन से व्यवस्था पर अविश्वास होने लगता है। यूपीए-2 काल में भी लगभग दो दर्जन बिल बिना सदन में चर्चा के पारित हुए थे। कानून की प्रक्रिया को राजनीति की हल्की तराजू में तौलने का सिलिसिला हर सरकार में रहा है। लेकिन देश में ही केरल की सरकार कानून बनाने के पहले व्यापक मशविरा करवाती है। केन्द्रीय स्तर पर भी ऐसा उत्साह जनता में कानून के प्रति भरोसा पैदा करेगा।


पूर्वोत्‍तर में बढ़ी सरकार की जिम्‍मेदारी
प्रकाश सिंह, ( लेखक असम के पुलिस महानिदेशक रह चुके हैं )

नगालैंड में सुरक्षा बलों द्वारा अनजाने में 14 नागरिकों का मारा जाना एक अत्यंत दुखद घटना है। दुर्भाग्य से वहां सक्रिय उग्रवादी और उनके समर्थक घटना के तथ्यों को विरूपित कर राजनीतिक लाभ उठाने की फिराक में हैं। यह घटना नगालैंड के मोन जिले में हुई, जो कोनयक नगा क्षेत्र है। कोनयक नगा सामान्यत: सरकार के समर्थक हैं। जानकारी के अनुसार कुछ श्रमिक कोयला खदान से पिकअप वैन पर सवार होकर घर लौट रहे थे। सुरक्षा बलों को सूचना थी कि एनएससीएन (के) गुट के उग्रवादी उस क्षेत्र से गुजरने वाले हैं। सेना के जवानों ने गाड़ी रोकने का इशारा किया, परंतु ड्राइवर ने गाड़ी और तेजी से दौड़ाई। इस पर सैनिकों को शक हुआ और उन्होंने गोली चला दी, जिसमें आठ श्रमिक मारे गए। गोलीबारी की आवाज सुनकर स्थानीय ग्रामीण आ गए। श्रमिकों के शव देखकर वे उत्तेजित हो गए और उन्होंने जवाबी हमला कर दिया। तब प्रत्युत्तर में सैनिकों ने आत्मरक्षा के लिए गोली चलाई, जिसमें छह अन्य ग्रामीण मारे गए और एक सैनिक की भी मृत्यु हो गई। कई सैनिक घायल भी हो गए।

घटना का संज्ञान लेते हुए सेना ने मेजर जनरल के नेतृत्व में एक कोर्ट आफ इंक्वायरी का आदेश दे दिया है। राज्य सरकार ने भी एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया है और उसे एक महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया है। वहीं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में घटना को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और कहा कि गलत पहचान के कारण यह हादसा हुआ। यहां यह बताना आवश्यक है कि विद्रोहियों के दमन में ऐसी घटनाएं दुनिया भर में यदा-कदा होती रहती हैं।

इस संदर्भ में अन्य देशों से कुछ उदाहरण देना समीचीन होगा। इराक में एक मार्च 2017 को मोसुल के पास आइएस के ठिकानों पर हमले की चपेट में 14 नागरिक भी आ गए, क्योंकि जो बम छोड़ा गया था उसकी वजह से पास में रखे ज्वलनशील पदार्थो में आग लग गई थी। सीरिया में 15 जुलाई 2017 को इस्लामिक स्टेट के चार ठिकानों पर गोलीबारी करते करते समय दुर्भाग्य से 13 नागरिक भी मारे गए, क्योंकि उनकी उपस्थिति निशाने के आसपास ही थी। अफगानिस्तान के आंकड़े तो भयावह हैं। वर्ष 2016 से 2020 के बीच एक आकलन के अनुसार, हवाई हमले में कुल 2,122 नागरिक मारे गए और 1,855 घायल हुए। इन हमलों में बड़ी संख्या में बच्चे प्रभावित हुए। मृतकों और घायलों में 40 प्रतिशत बेहद कम उम्र के बच्चों के होने से इसकी पुष्टि होती है। 30 अगस्त 2021 को अमेरिकी ड्रोन हमले से जो क्षति हुई, वह विशेष चर्चा का विषय रही। अमेरिकी सेना को खबर मिली थी कि आइएस खुरासान के कुछ आत्मघाती हमलावर गाड़ी से जाने वाले हैं। जनरल मार्क मिले के अनुसार गोपनीय सूचना विश्वसनीय थी। इस आधार पर अमेरिकी सैनिकों ने काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास ड्रोन हमला किया। उसमें कोई आतंकी नहीं मारा गया, परंतु 10 निर्दोष लोगों की जान चली गई। अमेरिका ऐसी घटनाओं को ‘कोलेटरल डैमेज’ कहकर रफा-दफा कर देता है। वहीं भारत में ऐसी घटनाओं पर संबधित सुरक्षा बल अथवा सरकार द्वारा आवश्यकतानुसार उचित कार्रवाई की जाती है।

नगालैंड की घटना के संदर्भ में यह आवश्यक है कि जांच शीघ्र संपन्न कराकर उचित कार्रवाई की जाए। यदि यह पाया जाता है कि सेना ने अत्यधिक बल प्रयोग किया या उसकी नीयत में खोट था, तो संबंधित अधिकारियों को अवश्य दंड दिया जाना चाहिए। जांच में समय लग सकता है, इस बीच हमें क्षेत्र के नागरिकों से संपर्क कर उन्हें यह विश्वास दिलाना होगा सेना वास्तव में आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई कर रही थी और जो कुछ हुआ उसका भारत सरकार को अत्यंत खेद है। जिन परिवारों के लोग मारे गए हैं उन्हें समुचित मुआवजा दिया जाना चाहिए और परिवार के एक सदस्य को यथासंभव सरकारी नौकरी में लिया जाए।

खेद का विषय है कि इस घटना से कुछ लोग, जिनकी हमदर्दी या झुकाव विद्रोही संगठनों के प्रति है, अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं। सेना के विरुद्ध दुष्प्रचार हो रहा है और कुछ वर्ग तो नगालैंड से ही सेना को हटाने की मांग कर रहे हैं। एनएससीएन (आइ-एम) के नेता अंदर ही अंदर खुश हो रहे होंगे कि उन्हें भारत सरकार के विरुद्ध दुष्प्रचार का एक मौका मिल गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुरक्षा बल बड़ी कठिन परिस्थितियों में ऐसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जहां अनेक संगठन अलग-अलग मांगों को लेकर विद्रोह कर रहे हैं। अतीत में भारत सरकार ने नगा विद्रोहियों से समय-समय पर समझौते भी किए, परंतु विद्रोहियों का एक वर्ग हमेशा नए मुद्दे उठाकर बगावत करता रहा। वर्ष 1963 में नगालैंड को एक अलग राज्य का दर्जा दिया गया। फिर भी विद्रोह की चिंगारी नहीं बुझी। 1975 में शिलांग समझौता हुआ, परंतु एनएससीएन (आइ-एम) के लोग उससे भी मुकर गए। वर्ष 2015 में एक ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ पर सहमति बनी, परंतु एनएससीएन (आइ-एम) एक अलग संविधान और एक अलग झंडे की मांग पर अड़ा हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि उसकी मांगों का कोई अंत ही नहीं है। आप कितना भी देते जाइए, विद्रोही संगठन और मांगते रहते हैं। अगर यह कहा जाए कि एनएससीएन (आइ-एम) भारत सरकार को बराबर ब्लैकमेल करता आ रहा है तो शायद अतिशयोक्ति न होगी।

इस संदर्भ में ‘आम्र्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट’ (अफस्पा) को समाप्त करने की भी मांग उठी है। नगालैंड और मेघालय के मुख्यमंत्रियों ने भी इस पर आवाज उठाई है। इसमें संदेह नहीं कि इस अधिनियम के औचित्य को लेकर तमाम लोगों को शंका है। जस्टिस जीवन रेड्डी कमीशन ने 2005 में इसे वापस लेने की बात कही थी। वैसे भारत सरकार अपने स्तर पर ही धीरे-धीरे इस अधिनियम को स्वयं वापस ले रही है। त्रिपुरा में 2015 में और मेघालय में 2018 में यह अधिनियम समाप्त कर दिया गया था। वर्तमान में यह अधिनियम असम, नगालैंड और मणिपुर (इंफाल म्युनिसिपल क्षेत्र को छोड़कर) में पूर्णतया और अरुणाचल के केवल तीन जिलों में लागू है। इस अधिनियम को बनाए रहने की जरूरत पर पुनर्विचार हो सकता है, बस हमें यह ध्यान रखना होगा कि मानवाधिकार के तराजू पर राष्ट्रीय सुरक्षा की बलि न चढ़ा दी जाए।


प्रवासी भारतीयों की सफलता
टी. एन. नाइनन

अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में सफल रहा है तो उसकी सराहना अवश्य की जानी चाहिए। मगर क्या हर बार भारत में जन्मे किसी व्यक्ति के विदेश में किसी कंपनी में शीर्ष पद पर पहुंचने की खबर पर आंख मूंदकर इतराना चाहिए? क्या हमें इन बातों पर विचार नहीं करना चाहिए कि अमुक व्यक्ति कौन सी कंपनी का नेतृत्व करेगा और उस कंपनी का कारोबारी व्यवहार कैसा रहा है? या फिर राष्ट्रीय गौरव को अधिक वरीयता देकर हमें इन प्रश्नों पर विचार नहीं करना चाहिए?

इसे लेकर कोई दुविधा नहीं है कि हमें उन लोगों की उपलब्धियों का सम्मान करना चाहिए जो भारत से बाहर किसी नए देश में एक बिल्कुल नए माहौल में अपने को ढालते हैं और वहां अपनी मेहनत एवं लगन से महज 40 वर्ष की दहलीज पार करने के बाद किसी कंपनी या संस्था में शीर्ष पद पर पहुंच जाते हैं। (ट्विटर के पराग अग्रवाल ने तो इससे कम भी कम उम्र में यह कारनामा कर दिखाया है)। इन लोगों की सफलता के पीछे उनकी अपनी खूबी, भारतीय स्कूल एवं तकनीकी शिक्षा, अंग्रेजी का ज्ञान या फिर कठिन परिश्रम करने की क्षमता जैसे कई कारण हो सकते हैं। इन लोगों ने सफलता की सीढ़ियां चढ़ने की राह में आने वाली सभी बाधाओं को पार किया है। अमेरिका में मेधा को सर्वाधिक महत्ता दी जाती है और खासकर तकनीकी कंपनियों के गढ़ सिलिकन वैली में तो इस पर विशेष ध्यान दिया जाता है। लिहाजा पहली पीढ़ी के प्रवासी भारतीयों का सफलता के शीर्ष पर पहुंचना आश्चर्य का विषय नहीं हो सकता है मगर मीडिया हरेक बार उत्साहित हो जाता है।

नजरिया भी महत्त्वपूर्ण है। अगर किसी भारतीय की सफलता वाकई मातृभूमि की विशेष पहचान का द्योतक है तो इस समय अफ्रीका महाद्वीप से संबंध रखने वाले तीन लोग तीन अंतरराष्ट्रीय संगठनों-विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और इंटरनैशनल फाइनैंस कॉर्पोरेशन का नेतृत्व कर रहे हैं। भारतीय मूल का कोई भी व्यक्ति इस तरह के ओहदे पर नहीं है। चीन से अमेरिका गए लोग वहां कंपनी जगत में अपनी अधिक उपस्थिति दर्ज करा सकते थे मगर उनमें ज्यादातर स्वदेश लौट गए हैं। इनमें कुछ लोगों ने फेसबुक, एमेजॉन और अन्य दिग्गज अमेरिकी कंपनियों को टक्कर देने के लिए चीन में कंपनियां खड़ी की हैं। संभवत: कोई भारतीय अब तक ऐसा नहीं कर पाया है।

इन सभी बातों पर गौर करते हुए इन सफल प्रवासी भारतीयों से उनकी कंपनियों के साथ जुड़े अंतहीन विवाद के बारे में एक-दो प्रश्न अवश्य पूछे जा सकते हैं। उन कंपनियों को लेकर भी प्रश्न पूछे जाने चाहिए जो स्वास्थ्य के लिहाज से हानिकारक उत्पाद बेचते हैं। 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट का कारण बनने वाली कंपनियों से भी सवाल पूछे जाने चाहिए। इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो क्या यह वाकई मायने रखता है कि इन कंपनियों को भारतीय चला रहे, न कि किसी दूसरे देश के लोग? इन्हीं बातों से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है। पेप्सिको के मुख्य कार्याधिकारी डॉन केंडल ने 1980 में 17 सोवियत पनडुब्बियां और कुछ पोत खरीदे थे। उन्होंने सोवियत संघ के बाजारों तक पहुंच आसान बनाने के लिए यह पहल की थी। हालांकि इसके बाद एक जुमला चल निकला कि पेप्सी के पास विश्व की छठी सबसे बड़ी नौसेना है!

अब मुख्य विषय पर लौटते हैं। अगर हमें पहली पीढ़ी के प्रवासी भारतीयों की सफलता पर इतराना है तो हमें कुछ सवाल भी पूछने से पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके साथ ही हमें लोक नीति एवं शिक्षण आदि क्षेत्रोंमें सफल लोगों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लोगों की सूची में नाम दर्ज कराने के साथ ही भारतीय मूल के लोग विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी हासिल कर रहे हैं। पहली पीढ़ी की प्रवासी नीली बेंडापुडी इस सप्ताह अमेरिका के एक अग्रणी विश्वविद्यालय की अध्यक्ष बनीं। इसी तरह, गीता गोपीनाथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में दूसरी शीर्ष अधिकारी बन गईं। ऋषि सूनाक को ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री बताया जा रहा है। भारतीय मूल के लोग तेजी से अब दूसरे देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सॉफ्ट पावर कई रूपों में सामने आती है मगर उसमें से कंपनी जगत से संबद्ध प्रवासी भारतीय सवालों के घेरे में आते हैं।


एमएसपी : कानूनी गारंटी के मामले का आकलन जरूरी
मिहिर शाह

सरकार और किसानों के बीच गतिरोध खत्म हो गया है। हालांकि, सभी 23 फसलों के लिए कानूनी रूप से गारंटी युक्त न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कायम है।

अनियमित मुक्त बाजार ऐसे नतीजों वाले हालात पैदा करता है जो किसानों और उपभोक्ता दोनों के लिए हानिकारक है। मौसम के हिसाब से कृषि उत्पादन होने से बड़ी तादाद में ऐसे किसान एक ही समय में बाजार में आते हैं जिनके पास फसलों को रखने के लिए संसाधनों की कमी है। जब बंपर फसल होती है तब कीमतें गिरती हैं और कम कीमतों की वजह से बढ़ने वाली मांग भी किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं है, विशेष रूप से जो खाद्य फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं होने के बावजूद अगर इनकी कीमतें गिरती हैं तब भी उपभोक्ता खाद्य फसलों की बहुत अधिक मांग नहीं करता है।

वहीं दूसरी तरफ, औद्योगिक उत्पादक कीमतों में गिरावट के बावजूद फायदा कमा सकते हैं क्योंकि उनके पास इकाई लागत में कटौती करने का विकल्प होता है लेकिन कृषि क्षेत्र में मौसम, मिट्टी की उर्वरता और पानी की उपलब्धता की अनिश्चितता का मतलब यह है कि ज्यादातर किसानों के लिए बड़े पैमाने पर प्रतिफल मिलना बहुत मुश्किल है। इस प्रकार, बंपर फसल के चलते भारत के अधिकांश लघु और सीमांत किसानों की खेती से होने वाली कमाई में अनिवार्य रूप से कमी आती है। इन किसानों के लिए सबसे अच्छा समय भी सबसे बुरा है।

इसी तरह खाद्यान्न के अनियमित बाजारों का बोलबाला बढऩे से गरीब उपभोक्ता सूखा पडऩे के दौरान या तो भूखे रहते हैं या कंगाल हो जाते हैं और उन्हें बहुत महंगी वस्तुएं खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है जिनकी जमाखोरी व्यापारी करते हैं। यही कारण है कि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों की सुरक्षा के लिए राज्य ने कृषि मंडियों में कम से कम 50 वर्षों तक हस्तक्षेप किया है। भारतीय खाद्य निगम और कृषि मूल्य आयोग, दोनों की स्थापना 1965 में की गई थी।

विचार यह था कि कृषि उत्पादन, हरित क्रांति (जीआर) के साथ बढ़ता है और इसीलिए किसानों को आश्वासन दिया जाना चाहिए कि इस अतिरिक्त फसल को सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदेगी जो उनकी लागत को पूरा करने के बाद, उन्हें मार्जिन देने के लिए पर्याप्त होगा। इसके बाद खरीदी गई फसलों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से रियायती दरों पर उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराया गया। इस प्रकार, सरकार के हस्तक्षेप से बंपर फसलों की पैदावार और बफर स्टॉक में कमी के वक्त यानी सूखे के दौरान उपभोक्ताओं की मदद की गई। इस तरह भारत को पिछले कई दशकों में खाद्य सुरक्षा मिली।

समस्या यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) केवल चावल और गेहूं तक ही सीमित रहा है और यह देश के केवल कुछ क्षेत्रों तक ही केंद्रित रहा है और इसके दायरे में किसानों का एक बहुत छोटा अनुपात ही शामिल होता है। कानूनी रूप से गारंटीशुदा एमएसपी की मांग के पीछे यही सोच है।

यह तर्क दिया जाता है कि एक कानूनी गारंटी से ही यह सुनिश्चित होगा कि सरकार, वास्तव में उन फसलों की खरीद निश्चित रूप से करेगी जिनके लिए वह एमएसपी की घोषणा करेगी। कानूनी गारंटी न होने की वजह से हर साल 23 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा की जाती है लेकिन यह महज एक सांकेतिक घोषणा भर बनकर रह जाती है और ज्यादातर किसानों को इसका कम ही लाभ मिलता है।

भारत के लगभग 90 प्रतिशत पानी की खपत कृषि क्षेत्र में होती है और इसमें से 80 प्रतिशत का उपयोग सिर्फ चावल, गेहूं और गन्ने की खेती के लिए किया जाता है। किसान ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसलों को वैसे क्षेत्रों में भी उगाते हैं जहां पानी की कमी है क्योंकि सार्वजनिक खरीद के रूप में चावल और गेहूं का एक निश्चित बाजार है। इसकी वजह से ही जल संकट बढ़ जाता है।

हाल ही में इकॉनमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली के एक शोध पत्र में हमने 11 प्रमुख राज्यों के लिए विस्तृत गणना की है, जो यह दर्शाती है कि फसल के पैटर्न में विविधता लाते हुए और विभिन्न प्रकार के मोटे अनाज (जिसे अब पौष्टिक अनाज कहा जाता है) दालें और तिलहन को शामिल कर पानी बचाया जा सकता है जो प्रत्येक क्षेत्र की कृषि पारिस्थितिकी के अनुकूल है। बदलाव लाने और किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारों को खरीद कार्यों में जुटना ही चाहिए। इसके बाद खरीदी गई फसलों को स्थानीय स्तर पर आंगनबाड़ी अनुपूरक पोषाहार और स्कूलों के मिड-डे मील कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए।

इसका अर्थ यह होगा कि किसानों के लिए एक बड़ा और स्थिर बाजार तैयार होगा जिससे भारत अब कुपोषण और मधुमेह जैसी दो परेशानियों से आसानी से निपट सकता है क्योंकि इन फसलों में बहुत कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है और इसमें आहार के लिए जरूरी फाइबर, विटामिन, खनिज, प्रोटीन और ऐंटीऑक्सीडेंट की बड़ी मात्रा होती है।

इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य आधारित सार्वजनिक खरीद का विस्तार करने और इसमें विविधता लाने की बात पूरी तरह से स्थापित हो चुकी है। सवाल सिर्फ इतना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे अच्छा रास्ता क्या है? यह समझने की आवश्यकता है कि वास्तव में एमएसपी को कानूनी जामा पहनाने का क्या अर्थ है। जाहिर है कि अगर इसका अर्थ कृषि व्यापार का राष्ट्रीयकरण करना है जहां सरकार सभी कृषि फसलों को खरीदेगी तब यह पूरी तरह नाकामी में तब्दील होगा। साम्यवादी देशों ने भी इसका प्रयास नहीं किया है। इस तरह के दंडात्मक शासन को लागू करना बहुत मुश्किल होगा और आखिर में उल्टा यह नुकसानदायक होगा।

अगर हमें कानूनी न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात करनी है तो इसके लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि आवश्यक संसाधन (जैसे मनरेगा के तहत) के माध्यम से इस गारंटी का समर्थन किया जाए और यह एक समय-सीमा के भीतर केंद्र और राज्य सरकारें क्षेत्रीय कृषि पारिस्थितिकी के अनुरूप अपने खरीद पोर्टफोलियो का विस्तार करेंगी और उसमें विविधता लाएंगी।

यह अच्छी बात है कि भारत सरकार ने अपनी 2018 पीएम-आशा योजना के माध्यम से पहले ही कुछ इसी तरह के प्रस्ताव दिए गए हैं जिसमें उस विशेष मौसम के लिए फसल के वास्तविक उत्पादन का 25 प्रतिशत सरकार द्वारा खरीदा जाएगा (अगर कोई जिंस सार्वजनिक वितरण प्रणाली का हिस्सा है तो उसका विस्तार 40 फीसदी तक किया जाएगा)। ओडिशा जैसे कुछ राज्य सरकारों ने भी कृषि माहौल के अनुरूप अधिक उपयुक्त फसलों की विकेंद्रीकृत खरीद शुरू की है।

‘घाटे वाला मूल्य भुगतान’ तंत्र भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है जिसके तहत सरकार किसान को बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान करती है। एक बार जब सरकार द्वारा खरीदा गया अनाज जरूरतमंद लोगों तक पहुंचेगा तब किसानों के पास वास्तव में खरीदार का एक विकल्प होगा और उनके लिए अपने फसल उत्पाद के लिए एक लाभकारी कीमत मिलने की संभावना होगी। लेकिन उसके लिए पीएम-आशा को गंभीरता से लागू करने की जरूरत है जो अब तक नहीं हो पाया है।

निस्संदेह, किसान और सरकार दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था में सुधार से कृषि संकट का समाधान नहीं होगा। जर्नल इकोलॉजी, इकनॉमी ऐंड सोसाइटी में प्रकाशित होने वाले आगामी शोध पत्र में मैंने भारत के नीतिगत ढांचे में 11 अंतर-संबंधित बाधाओं को रेखांकित किया है जिन्हें खत्म करने की जरूरत है और इसके बिना भारत के किसानों के लिए टिकाऊ संपन्नता दूर का एक सपना होगा।

इन सुधारों में निवेश के असमान क्षेत्रीय वितरण को दुरुस्त करना शामिल है जिसके कारण भारत की शुष्क भूमि की बड़े पैमाने पर उपेक्षा हुई है। कुछ फसलों पर ध्यान देते हुए जिंस आधारित अनुसंधान एवं विकास पर जोर देने के बजाय खेती की एक पूरी प्रणाली की समझ बनाने की ओर बढऩा, सब्सिडी के पैटर्न में फेरबदल करना जो रासायनिक इनपुट के पक्ष में है और इसके अलावा सीमित हरित क्रांति से इतर मृदा की समझ बढ़ाना, रासायनिक इनपुट को नियंत्रित करने वाले कानूनी और नियामकीय ढांचे को मजबूत करना, नए स्तर पर सार्वजनिक कृषि के विस्तार को बहाल करना, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन के लिए फसल कटाई के बाद के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करना, 50 साल पुराने हरित क्रांति मानक से इतर कृषि शिक्षा में बदलाव और सुधार लाना अहम होगा।


दिव्यांगों की फिक्र

सड़कों पर बसों के ठहराव की जगहों पर ऐसे दृश्य आम हैं, जिनमें किसी शारीरिक बाधा का सामना कर रहा व्यक्ति वाहन में सवार होने की कोशिश कर रहा होता है और दिक्कत होने पर उसे आसपास के अन्य व्यक्तियों की मदद लेनी पड़ती है। ऐसा इसलिए होता है कि बसों की सीढ़ियों की बनावट या फिर बस स्टाप की सतह की ऊंचाई ऐसे लोगों की सुविधा के अनुकूल नहीं होती है। लगभग हर जगह दिव्यांग व्यक्ति की मदद के लिए किसी अन्य का आगे आना निश्चित रूप से मानवीय भावनाओं के लिहाज से एक आदर्श स्थिति है, मगर व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि ऐसी नौबत ही न आए। केंद्र सरकार के परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने इस दिशा में एक और पहलकदमी की है। देश भर में दिव्यांग लोगों के अनुकूल बस स्टाप बनाने के मकसद से उसने एक मसविदा तैयार किया और इस संबंध में जनता से राय मांगी है। नई नीति के तहत सभी बस स्टाप इस तकनीक से तैयार किए जाने की बात कही गई है, ताकि कोई भी दिव्यांग उसका आसानी से प्रयोग कर सके।

हालांकि सरकार के स्तर पर दिव्यांग लोगों की जीवन-स्थितियों को सहज और आसान बनाने के लिए विशेष अवसरों से लेकर अन्य कार्यक्रमों की व्यवस्था की गई है। लेकिन कई जगहों पर अब भी ऐसे लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सड़कों के किनारे बने बस ठहराव की बनावट ऐसी होती है कि अगर वहां बस आकर रुके तो किसी दिव्यांग के लिए उसमें सवार होना आसान नहीं होता। ताजा पहल अगर इस समस्या को व्यापक स्तर पर सुलझा पाती है तो इसे व्यवस्था को सरकार के एक महत्त्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जाएगा। यों दिल्ली और अन्य महानगरों में मेट्रो स्टेशनों पर हर स्तर पर दिव्यांगों के अनुकूल व्यवस्था की गई है। सड़कों पर सार्वजनिक वाहनों में इस तरह की समस्या से निपटने के लिए कई शहरों में ऐसी बनावट वाली लो फ्लोर यानी नीची सतह वाली बसें चलाई गई हैं, जिसमें दिव्यांग लोगों को सवार होने में आसानी होती है। लेकिन बस स्टाप की सतह की बनावट कई बार इसमें भी एक बाधक तत्त्व का काम करती है। अगर वहां सतह की ऊंचाई और उसका ढांचा बसों के दरवाजे के मुताबिक तैयार किया जाए, तो यह दिव्यांगों के लिए एक अनुकूल व्यवस्था होगी।

इस लिहाज से केंद्र सरकार की ओर से दिव्यांगों के अनुकूल बस स्टाप तैयार करने को लेकर की गई पहल निश्चित रूप से ऐसे तबके की फिक्र में है, जो जन्म से या फिर किसी हादसे की वजह से शरीरिक रूप से अपंग है, लेकिन अपने साहस और संघर्ष से अपनी सीमा में कुछ करने की कोशिश करता है। किसी अंग से लाचार होने के बावजूद कोई व्यक्ति अन्य तरह से समर्थ और काबिल हो सकता है। ऐसे व्यक्ति को सिर्फ अवसर और सहयोग की जरूरत होती है। हमारे समाज में दिव्यांगों को लेकर एक स्तर पर सहानुभूति या दया का भाव तो दिख जाता है, मगर उनकी क्षमताओं का स्वीकार कम देखा जाता है। बल्कि कई स्तरों पर ऐसे लोगों को लेकर अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं देखी जाती है। इसे सामाजिक स्तर सशक्तिकरण की प्रक्रिया में जरूरी पहलू छूट जाने के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन अगर यही भाव या आग्रह सार्वजनिक सेवाओं के स्तर पर दिखता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।


अब कृषि सुधारों की नई अहमियत
डॉ. जयंतीलाल भंडारी

दिसम्बर 09 को दिल्ली के विभिन्न बार्डरों पर 378 दिनों से चल रहा किसानों का आंदोलन समाप्त हो गया। कृषि कानूनों को रद्द करने के बाद न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सहित अन्य मांगों पर सरकार और संयुक्त किसान मोर्चा के बीच सहमति बनने और इसको लेकर सरकार से आधिकारिक पत्र प्राप्त होने के बाद किसान संगठनों ने घर वापसी की घोषणा की है।

चाहे कृषि कानून वापस हो गए हैं‚ लेकिन कृषि की विकास दर बढ़ाने और छोटे किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए कृषि सुधारों की जरूरत बनी हुई हैं। ज्ञातव्य है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कृषि को प्रभावी बनाने और कृषि संबंधी मसलों के समाधान के लिए विशेष कमेटी बनाने की घोषणा की है। किसानों की आय के स्तर को बढ़ाने और नई कृषि रणनीति बनाने में इस कमेटी की अनुशंसाएं महत्वपूर्ण होंगी। इस कमेटी की अनुशंसाएं किसानों और ग्रामीण गरीबों की आय बढ़ाने की चुनौती के मद्देनजर भी महत्वपूर्ण होगी। नीति आयोग की 26 नवम्बर को प्रकाशित हालिया रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण भारत में गरीबी को कम करने के लिए अधिक कारगर प्रयासों की जरूरत है। वर्ष 2015-2016 के दौरान ग्रामीण इलाकों में 32.75 आबादी और शहरी इलाकों में 8.81 फीसद आबादी बहुआयामी गरीबी में पाई गई है। जहां प्रधानमंत्री के द्वारा गठित नई कृषि विकास कमेटी के द्वारा कृषि उत्पादन का एमएसपी बढ़ाया जा सकता है। किसानों को मांगों के मद्देनजर पीएम आशा और भावांतर भुगतान जैसी योजना शुरू की जा सकती हैं। ऊंचे दाम वाली विविध फसलों के उत्पादन को विशेष प्रोत्साहन हैं छोटे किसानों के जनधन खातों में अधिक नकदी हस्तांतरण उनकी तथा ग्रामीण गरीबों की आर्थिक मदद बढाई जा सकती है। निश्चित रूप से छोटे किसानों को हरसंभव तरीके से प्रोत्साहन और कृषि विकास के विशेष कार्यक्रमों से भी कृषि क्षेत्र में लगातार जीडीपी बढ़ी है। 30 नवम्बर को घोषित चालू वित्त वर्ष 2021-22 की दूसरी तिमाही–जुलाई से सितम्बर 2021 के बीच देश की अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.4 फीसद रही है। कृषि में 4.5 फीसद विकास दर है‚ जोकि कोविड पूर्व स्तर की तुलना में सबसे ज्यादा है। ऐसे में कृषि विकास दर और बढ़ाने के लिए देश में वर्तमान में चलाए जा रहे कृषि विकास कार्यक्रमों को और कारगर बनाया जाना होगा। कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के मुताबिक फसल बीमा योजना में सुधार‚ एमएसपी को डेढ़ गुना करने‚ किसान क्रेडिट कार्ड से सस्ते दर से बैंक से कर्ज मिलने की व्यवस्था‚ कृषि निर्यात तेजी से बढ़ने‚ एक लाख करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर इंफास्ट्रक्चर फंड‚ कृषि बजट के पांच गुना किए जाने‚ सोलर पावर से जुड़ी योजनाएं खेत तक पहुंचाने‚ दस हजार नये किसान उत्पादन संगठन‚ किसान रेल के माध्यम से छोटे किसानों के कृषि उत्पाद कम ट्रांसपोर्टेशन के खर्चे पर देश के दूरदराज के इलाकों तक पहुंचने तथा किसानों को उनकी उपज का अच्छा मूल्य मिलने से किसान लाभांवित हुए हैं। निश्चित रूप से अब ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की जा रही स्वामित्व योजना के तहत देश के 6 लाख गांवों में किसानों को उनकी रहवासी जमीन का कानूनी हक देकर आर्थिक सशक्तिकरण किए जाने का अभियान तीव्रगति से आगे बढ़ाया जाना होगा।

स्थिति यह है कि अभी जीवन भर अपनी जमीन पर रहने वाले किसान जमीन का सम्पत्ति की तरह उपयोग नहीं कर पाते हैं‚ लेकिन वे स्वामित्व योजना के तहत अपनी जमीन का मालिकाना हक पाकर अपनी जमीन का सम्पत्ति की तरह उपयोग करने लगेंगे। चूंकि देश के 80 फीसद किसानों के पास जीविकोपार्जन के लिए पर्याप्त खेत नहीं है अतएव उनकी गैर कृषि आय बढ़ाने का विकल्प आगे बढ़ाना होगा। ग्रामीण इलाकों में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को विशेष प्रोत्साहन दिए जाने होंगे। खेती के वैज्ञानिक प्रबंध‚ बागवानी‚ वानिकी और मत्स्य पालन को बढ़ावा देना होगा। गेहूं व चावल के अलावा फसल का विविधीकरण बहुत महत्वपूर्ण हो गया है।

फसल पैटर्न बदलने के तरीके खोजे जाने होंगे। किसान उत्पादन संघों को अधिकतम प्रोत्साहन देकर बेहतर भंडारण और विपणन सुविधाएं विकसित की जानी होगी। इससे सौदे की शक्ति बढ़ेगी और बिचौलियों का दबाव भी कम होगा। हम उम्मीद करें कि 9 नवम्बर को किसान आंदोलन की समाप्ति और किसानों की घर वापसी के बाद अब प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा गठित की जाने वाली कृषि विकास कमेटी के रणनीतिक कदमों से नये कृषि सुधारों के साथ कृषि विकास का ऐसा नया अध्याय लिखा जाएगा‚ जिससे छोटे किसानों के चेहरे पर नई मुस्कुराहट आ सकेगी और कृषि विकास दर ऊंचाई पर पहुंच सकेगी।



लोकतंत्र के लिए

लोकतंत्र एक कठिन मार्ग है, लेकिन उस पर चलने की पैरोकारी की हर कोशिश का स्वागत होना चाहिए। दुनिया में आधे से ज्यादा देशों में आज अगर लोकतंत्र स्थापित है, तो यह प्रमाण है कि संसार के ज्यादातर लोग लोकतंत्र को पसंद करते हैं। आधुनिक लोकतंत्र की स्थापना करने वाले अग्रणी राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के बुलावे पर विश्वस्तरीय ऑनलाइन लोकतंत्र सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। इसमें पाकिस्तान को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन उसने आखिरी वक्त में भाग लेने से इनकार कर दिया है। दरअसल, इस सम्मेलन में चीन को आमंत्रित नहीं किया गया है और चीनी सत्ता प्रतिष्ठान विगत दिनों से अपनी नाराजगी लगातार जाहिर करने में लगा हुआ है। चीन में भले ही लोकतंत्र नहीं है, पर वह अपनी व्यवस्था को समाजवादी लोकतंत्र से कम नहीं मानता। एक समय तक अमेरिका चीनी व्यवस्था की ओर से आंखें मूंदे हुए था, पर जब चीनी व्यवस्था अमेरिका पर हावी होने लगी, तब उसकी नींद टूटी। लोकतंत्र पर सम्मेलन शायद अलोकतांत्रिक चीन को घेरने की अमेरिकी कोशिश ही है। हाल ही में अमेरिका चीन में आयोजित विंटर ओलंपिक में भाग लेने से इनकार कर चुका है, इससे भी चीन का रोष स्वाभाविक है।

निस्संदेह, बाइडन का आमंत्रण ठुकराकर पाकिस्तान ने चीन को खुश करने की कोशिश की है और अपनी एक पुरानी पड़ती नाराजगी का भी मुजाहरा किया है। बाइडन को सत्ता संभाले दस महीने से भी ज्यादा बीत गए, लेकिन उन्होंने इमरान खान को एक फोन तक नहीं किया है। इसके पीछे अमेरिका की जो रणनीति है, वह धीरे-धीरे साफ होने लगी है। पाकिस्तान जैसे-जैसे चीन के पहलू में जाएगा, अमेरिका की तल्खी वैसे-वैसे बढ़ती जाएगी। पाकिस्तान अभी चीन के साथ खड़े होने में अपना हित देख रहा है और चीन उसे अपना ‘आयरन ब्रदर’ या ‘भाई’ करार दे रहा है। हर देश को लाभ-हानि सोचने का हक है, पर पाकिस्तान को ठीक से सोच लेना चाहिए। उसे यदि चीन से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक मदद मिल रही है, तो क्या भविष्य में उसको अमेरिका की जरूरत नहीं पड़ेगी? क्या पाकिस्तान को चीन के रूप में नया अमेरिका मिल चुका है?

बहरहाल, हमारे लिए यह बड़ा सवाल है कि भारत की जगह कहां है। भारत राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। यहां तमाम विविधताओं के बावजूद लोकतंत्र सलामत है और दुनिया के बहुत से देशों के लिए ईष्र्या की वजह है। हमें अपने लोकतंत्र को और मजबूत व समावेशी बनाना चाहिए। बाइडन ने इस सम्मेलन में लोकतंत्रों में आ रही गिरावट पर चिंता का इजहार किया है, तो दुनिया के 100 से ज्यादा लोकतांत्रिक देशों को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए। यह अच्छी बात है कि दुनिया में इक्का-दुक्का लोकतांत्रिक देश ही ऐसे हैं, जिनका मकसद साम्राज्यवादी है या जो ताकत के जोर पर अपने भूगोल का विस्तार चाहते हैं। जो लोकतांत्रिक होगा, वही संवाद से आगे की राह तय करेगा और जिसका संवाद पर भरोसा नहीं होगा, वह धूर्तताओं और बंदूकों के सहारे आगे बढ़ेगा। राष्ट्रपति बाइडन के नेतृत्व में अमेरिका को भी अपनी वैश्विक नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। क्या अमेरिका दुनिया में लोकतंत्रों को मजबूत करने की दिशा में वाकई ईमानदार होने जा रहा है?


पहाड़ के संसाधनों पर बार-बार हमले से नुकसान
शेखर पाठक, ( इतिहासकार और हिमालयी समाज के अध्येता )

दुनिया में जब पर्वतों की बात आती है, तो हिमालय का जिक्र सबसे पहले आता है। एशिया के बीचोबीच स्थित यह एक विशिष्ट इको तंत्र है। इसमें दुनिया की सबसे बड़ी बसावट वाला इलाका है और यह विरोधाभासों से भरा है। हिमालय खुद अपने एक से दूसरे छोर के बीच कई विरोधाभास लिए हुए है। जहां पूर्वोत्तर, भूटान, नेपाल, उत्तराखंड में यह 90 फीसदी तक हरियाली लिए हुए है, तो वहीं हिमाचल प्रदेश और कश्मीर की ओर जाते हुए पांच से सात प्रतिशत इलाके में ही हरियाली और जीवन दिखते हैं। चीन, भारत, म्यांमार, मध्य एशिया की नदियों का उद्गम स्थल हिमालय है। हमारे उत्तर भारत को बनाने वाली सिंधु, गंगा व ब्रह्मपुत्र नदियों का उद्गम भी यही है। यह जलवायु निर्माता है। इसे एशिया में पानी की मीनार कहा गया है। जलवायु परिवर्तन के हो-हल्ले के बीच आज हिमालय को समझना ज्यादा बड़ी चुनौती है।

हिमालय संस्कृतियों का केंद्र भी है। यहां का खान-पान, वेश-भूषा, समुदाय और जनजातियां खुद में विशेष हैं। आज भी उत्तराखंड की गुफाओं में रहने वाली वनराजि प्रजाति पाई जाती है। शत-प्रतिशत पशुचारक समाज पूरे हिमालय में मिलते हैं। वनगुर्जर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। समाज व संस्कृति के साथ ही अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी हिमालय काफी विविध है। यहां की संस्कृति की विविधता को देखकर ही इसे देवभूमि कहा गया है। कई लोग सोचते हैं कि हिमालय में केवल ब्रह्मा, विष्णु, महेश की पूजा होती है, पर यह बात सही नहीं है। हिमालय के अपने लोक देवता भी हैं, जिनकी संख्या हजारों में है। लोग अपने गांव इन्हीं लोक देवताओं की पूजा करने आते हैं।

हिमालय केवल बर्फ का घर नहीं, बल्कि संसाधनों का घर भी है। यहां के सभी संसाधन मिलकर जो दृश्य बनाते हैं, उसे वन्यता या वाइल्डनेस कहते हैं। वन्यता को कोई सरकार नहीं बना सकती, यह प्रकृति ही प्रदान करती है। हिमालय में सात करोड़ लोग रहते हैं। करीब 70 करोड़ लोग इसके संसाधनों पर निर्भर हैं। यहां के जंगल, नदियों का पानी, बाढ़ की मिट्टी, जड़ी-बूटी, खनिज संपदा बेशकीमती संसाधन हैं। इस संपदा का दोहन केवल भारतीय नहीं, अफगानिस्तान, नेपाल, तिब्बत, भूटान व म्यांमार तक के लोग कर रहे हैं।

अंग्रेज इन्हीं संसाधनों को लूटने यहां पहुंचे थे। दो हजार साल में हिमालय में जो परिवर्तन नहीं हुए, अंग्रेजों ने वह केवल 200 वर्षों में करा दिए। उनके आने से पहले जंगल हिमालय में रहने वाले लोगों के थे, लेकिन उनके आने के बाद हिमालय के संसाधनों को लूटने का सिलसिला शुरू हुआ। आजाद भारत में भी सरकारों ने जंगलों में स्थानीय समुदाय को हिस्सेदारी देने की कोशिश नहीं की, बल्कि वे अंग्रेजों के समय के वन कानूनों को और अधिक कड़ा बनाकर स्थानीय समुदायों को अलग-थलग करती रहीं। अंग्रेजों के बनाए कानून आज भी हिमालय के ज्यादातर इलाकों में लागू हैं। स्थानीय संसाधनों में हक न देने के कारण हिमालय के समाजों ने व्यवस्था का प्रतिरोध किया। पूर्वोत्तर से लेकर भूटान, नेपाल, उत्तराखंड, कश्मीर तक में आंदोलन कई रूपों में हुए। उत्तराखंड राज्य मांगने का आंदोलन भी संसाधनों पर अपने अधिकार की मांग से ही शुरू हुआ था। सरकारें जनता के मर्म को नहीं समझ पाईं।

हम आजादी के 75 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। इस समय पर मणिपुर, असम से लेकर उत्तराखंड के कुली बेगार आंदोलन, जंगलात आंदोलन, हिमाचल के प्रजामंडल आंदोलन, कश्मीर के चननी आंदोलन को भी याद किया जाना चाहिए। इन आंदोलनों के जरिये पहले ब्रिटिश सत्ता और फिर हमारी सरकारों से स्थानीय लोगों ने लड़ाइयां लड़ीं। ये लड़ाइयां केवल स्वाभिमान की नहीं, बल्कि अपने संसाधनों को सुरक्षित करने की भी थीं। संसाधनों पर राजसत्ता बार-बार हमले कर रही है। हमने सड़कें मांगी, पर चारधाम जैसी सड़क नहीं मागी थी। पर्यटन मांगा, मगर ऐसा नहीं कि जिसमें केवल बड़ी कंपनियों का कब्जा हो। हमने बांध मांगा, पर टिहरी जैसा बांध नहीं मांगा था। हिमालय के लोगों के संघर्षों का जो एजेंडा था, वह आज भी है। पहाड़ के लोगों की जमीन नहीं रहेगी, तो उनकी पहचान खत्म हो जाएगी, ठीक उसी तरह, जैसे दिल्ली के आसपास के गांव और वहां के मूल लोगों की पहचान अब लगभग खत्म हो गई है।