11-05-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


A Bit Cont₹actiona₹y, A Bit Expansiona₹y

Let the rupee find its own level

ET Editorials

The rupee is plumbing fresh lows despite the Reserve Bank of India (RBI) dipping into foreign exchange reserves to slow the descent. This was an expected fallout of capital flight, combined with the trade shock to an energy-importing country like India. How long the RBI proceeds on this course of action will depend on India’s assessment of the prospects of conflict de-escalation, which are not very promising. Capital flight will impose a separate conditionality on the pace of interest-rate hikes. Last week, the RBI acted out of turn to manage the interest-rate differential with the US Federal Reserve. India has, over the course of a few weeks, lost considerable leeway in managing its interest and foreign exchange rates.

There are two textbook prescriptions in such situations. The first is to allow the rupee to find its level. Tightening monetary policy will temper inflation, slow growth and thus imports, pulling back trade into balance. The second approach is to push the exchange rate lower, advantaging exports and disadvantaging imports to bring trade into balance without inordinately compressing domestic output. This could also be achieved by letting the rupee find its own level. The two sets of interventions are self-reinforcing, although one uses monetary contraction while the other is expansionary.

India’s policy response will most likely be somewhere in the middle, with interest-rate tightening slower than in the US and a managed depreciation of the rupee. Economic activity has not yet recovered to pre-pandemic levels and the scope of substituting energy imports is limited. There are also questions over whether a weakening rupee can aid merchandise exports in a slowing global economy. Especially if competing nations allow their currencies to depreciate more. India has a cushion in technology service exports. But there are limits to depleting its foreign exchange reserves. The RBI, however, now has a bigger toolkit to negotiate the economic trilemma of managing interest and forex rates with free capital movement.


Measuring the change

India should invest more to enhance the reliability of various socio-economic surveys


The fifth edition of the National Family Health Survey (NFHS) provides a valuable insight into changes underway in Indian society. It throws light on traditional parameters, for instance immunisation among children, births in registered hospital facilities, and nutritional levels. While there is a general improvement in these parameters, there were mixed signals in nutrition. Gains in childhood nutrition were minimal as were improvements in obesity levels. The prevalence of anaemia has actually worsened since the last survey in 2015-16. But the survey’s major contribution is its insight into behavioural and sociological churn. When highlights were made public last year, the focus was on India’s declining total fertility rate that had, for the first time in the country’s history, dipped to below the replacement level, or a TFR (Total Fertility Rate) of 2.1. If the trend were to persist, India’s population was on the decline in line with what has been observed in developed countries, and theoretically means improved living standards per capita and greater gender equity. Because this TFR had been achieved across most States, two notable exceptions being most populous Uttar Pradesh and Bihar, it was also evidence that population decline could be achieved without coercive state policies and family planning has struck deep roots. The more detailed findings, made public last week, suggest that this decline is agnostic to religion.

The fertility rate among Muslims dipped to 2.3 in 2019-2021 from 2.6 in 2015-16, the sharpest among all religious communities when compared to the 4.4 in NFHS 1 in 1992-93. Another set of subjective questions that the NFHS attempts to answer using hard data is gender equity. Less than a third of married women are working and nearly 44% do not have the freedom to go to the market alone. However, a little over 80% have said that they can refuse demands for sex from their husband. This has implications for legal questions surrounding marital rape. Only 72% of Indian men think it is not right to coerce, threaten or use force on a woman if denied sex, which again points to the vast territory that needs to be covered in educating men about equality, choice and freedom in marriage. This question made it for the first time in the family health survey as did another question, about the number of registered births and deaths, in the family survey. Multiple surveys such as the NFHS, Sample Registration Surveys, the Census, labour, economic surveys and ways of interrogation are necessary for insights about a country as vast and complex as India; the Centre should invest more substantially in improving their reliability.


डब्ल्यूएचओ की सोच पर सवाल खड़े होते हैं


डब्ल्यूएचओ के संविधान का पहला अनुच्छेद उसे दुनिया के हर व्यक्ति के लिए सर्वोत्तम स्वास्थ्य उपलब्ध कराने का उद्देश्य देता है और अनुच्छेद (2) दुनिया की सरकारों, विशेषज्ञ एजेंसियों से समन्वय करने और ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने को कहता है, जिनसे महामारी समूल खत्म हो सके। दुनिया को कोरोना का पता चलने के दो माह बाद भी चीन के दबाव में संस्था ने ट्रैवल बैन एडवाइजरी जारी करने और कोविड-19 को महामारी घोषित करने में देरी की। आरोप था कि संस्था के महानिदेशक के चुनाव में चीन ने अन्य देशों से वोट दिलवाने में मदद की थी। भूतपूर्व महानिदेशक ने सन् 2003 में इतने ही अधिकारों के तहत चीन ही नहीं कई देशों को महामारी नियमों को मानने के लिए मजबूर किया और महामारी बिलकुल थम गई थी। कोरोना के प्रसार को रोकने या वैक्सीन की खोज में भी संस्था की कोई भूमिका नहीं रही। संस्था के पास केवल वायरस वैरिएंट के ग्रीक नाम रखने के अलावा रोकथाम की कोई भी कारगर सलाह नहीं थी। ऐसे में अमुक देश में कितनी मौतें इस महामारी में हुईं, यह बताना संकेत देता है कि संस्था अपने मूल काम से भटक कर अपनी वैश्विक मान्यता का इस्तेमाल देशों की छवि खराब करने में कर रही है। जब खुद संस्था कबूल करती है कि भारत में सरकारी आंकड़ों से दस गुना ज्यादा मरने वालों की संख्या का आधार मीडिया/वेबसाइट की खबरें है तो इसकी वैज्ञानिक सोच पर ही प्रश्न खड़ा होता है। महज 17 राज्यों की रिपोर्ट के आधार पर सभी राज्यों के आंकड़े तय करना भी वही गलती है, क्योंकि हर राज्य में इस महामारी से मरने वालों का प्रतिशत अलग-अलग है। पूर्व में कितने मरे, यह बताने की जगह संस्था को ‘अब न मरें’ की चिंता करनी चाहिए।


भारत रूस के पाले में नहीं है जैसा कि पश्चिम को लगता है

तन्वी मदान, ( लेखिका और इतिहासकार )

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से ही भारत के रुख को मॉस्को-समर्थक माना जाता रहा है। नई दिल्ली ने स्पष्ट शब्दों में रूस की निंदा नहीं की है और संयुक्त राष्ट्र में इस विषय पर हुई अनेक वोटिंग्स में हिस्सा भी नहीं लिया है। न ही उसने रूस से हथियार या तेल खरीद पर रोक लगाने की बात कही है। रूस के विदेश मंत्री सेर्गेई लव्रोव भारत आए और प्रधानमंत्री मोदी से मिले। इतना ही नहीं, चीन और रूस दोनों ने ये संकेत दिए हैं कि मौजूदा संकट में भारत उनके नजरिए का समर्थन करता है। लेकिन इसके बावजूद भारत रूस के कैम्प में नहीं है। वो अगर रूसी आक्रमण की निंदा नहीं करता तो उसका समर्थन भी नहीं करता है। उलटे रूस की इस हरकत से भारत के हितों को नुकसान ही पहुंचा है। इससे यूक्रेन में बसे 20 हजार से ज्यादा भारतीय नागरिकों के जीवन पर संकट आ गया था। दुनिया का ध्यान यूरोप पर केंद्रित होने का लाभ कहीं चीन उसकी सीमारेखाओं पर न उठा ले, यह चिंता भी सता रही है। भारतीय फौजें जिन हथियारों की सप्लाई पर आश्रित हैं, वह भी इस युद्ध से प्रभावित हुई है। आर्थिक मुश्किलें बढ़ी हैं सो अलग।

अगर कूटनीतिक दृष्टिकोण से बात करें तो रूस-यूक्रेन युद्ध ने चीन और रूस को एक-दूसरे से अलग-थलग करने के भारत के दीर्घकालीन लक्ष्य को क्षति पहुंचाई है। 1960 और 70 के दशक में भारत-सोवियत संबंधों का एक आधार चीन के प्रति दोनों की साझा चिंताएं भी थीं। भारत यूरेशिया में मॉस्को को बीजिंग के शक्ति-संतुलन की तरह देखना चाहता है। लेकिन अब रूस चीन पर और ज्यादा निर्भर हो गया है। इसके क्या नतीजे होंगे, इस पर भारत में पहले ही चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। जैसे कि अगर भविष्य में चीन भारत के विरुद्ध कोई कदम उठाता है तो क्या रूस उस पर अंकुश लगाने की स्थिति में होगा? युद्ध से भारत के अमेरिका, यूरोप, जापान से संबंधों पर प्रश्नचिह्न लगा है। ये सभी भारत के लिए रूस से ज्यादा महत्व रखते हैं।

फिर भी भारत ने रूस की निंदा क्यों नहीं की? वास्तव में भारत चाहता है कि रूस उसके पक्ष में रहे, जबकि उसे डर है कि शायद ऐसा हो न सकेगा। भारत को यह भी अंदेशा है कि अगर भारत-चीन सीमा पर तनाव बढ़ता है तो रूस उसे हथियारों की सप्लाई से हाथ खींच सकता है और चीन से जा मिल सकता है। चीन और पाकिस्तान के परिप्रेक्ष्य में और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में रूस भारत के हितों के प्रतिकूल कदम भी उठा सकता है। भारत की सरकार सामान्यतया अपने सहयोगियों की सीधे शब्दों में निंदा करने से कतराती है। युद्ध के शुरुआती दिनों में वह रूस के साथ बातचीत की गुंजाइश इसलिए भी कायम रखना चाहती थी, ताकि वहां फंसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकाल सके।

लेकिन बीते कुछ सप्ताह में दिल्ली का रुख कड़ा हुआ है। भारत ने ‘सभी पक्षों के वैधानिक सुरक्षा हितों’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है और युद्ध को रूस और नाटो के बीच चल रहे टकराव की तरह देखना बंद कर दिया है। भारत के विदेश मंत्री ने यूएन और संसद में पहले से अधिक आलोचनात्मक रवैया अपनाया और कहा कि भारत इस युद्ध के सख्त खिलाफ है। साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून, राष्ट्रों की सम्प्रभुता, यूएन चार्टर आदि के प्रति सम्मान भी प्रदर्शित किया है। विवादों के हल के लिए सेना के उपयोग का उसने समर्थन नहीं किया, साथ ही बूचा में हुई हत्याओं की निंदा भी की है। इस तरह से उसने स्वयं को चीन की पोजिशन से अलग कर लिया है। एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा है कि भारतीय नीति-निर्माताओं ने निजी वार्ताओं में युद्ध का और स्पष्ट शब्दों में विरोध किया होगा। भारत ने यूक्रेन को मानवीय सहायता पहुंचाई है और मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा है। पश्चिमी देशों की तुलना में रूस से भारत के आर्थिक संबंध इतने गहरे नहीं हैं। भारत जिस बहुध्रुवीय विश्व की कामना करता है, उसमें रूस अब एक महत्वपूर्ण प्लेयर नहीं बना रह सकता है, न ही वह चीन को काउंटर-बैलेंस करेगा और शायद भारत को हथियारों की सप्लाई भी पहले की तरह नहीं कर पाए।


कच्चे तेल से निर्भरता घटाकर ही आर्थिक महाशक्ति बनेगा भारत

शिवेश प्रताप, ( पूर्व छात्र, आईआईएम कोलकाता )

आईएमएफ की मई 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2029 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर जाएगा। लेकिन साथ ही भारतीय रुपया प्रति अमेरिकी डॉलर 94 रुपए के स्तर को भी पार कर जाएगा। वहीं दूसरी ओर हमारे देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने फरवरी 2022 में कहा था कि भारत वित्त वर्ष 2026 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बन जाएगा। आइए इस विरोधाभास को समझते हैं।

किसी भी देश की मुद्रा को मजबूत होने के लिए विश्व बाजार में उसका निर्यात उसके आयात से हमेशा अधिक होना चाहिए। भारत बीते दिनों अपने रिकॉर्ड निर्यात की स्थिति में पहुंचा परंतु यह अर्धसत्य है। दरअसल आयात भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। इसमें सबसे बड़ा आघात वैश्विक स्तर पर बढ़े हुए कच्चे तेल के दामों से पहुंचा है। आज विश्व बाजार में भारत के निर्यात की विकास दर 40.38% है, तो आयात की विकास दर 59.07% है। आईएमएफ ने वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप ही भारतीय रुपए का भविष्य तय किया है।

वी. अनंत नागेश्वरन आशान्वित हैं क्योंकि देश जिस तरह से मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत विनिर्माण व निर्यात को बढ़ा रहा है, मुमकिन है कि 2-3 वर्षों में वित्तीय घाटे की खाई को पाटकर देश निर्यात को आयात से आगे ले जाए। साथ ही कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए भी देश इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रसार हेतु कदम बढ़ा चुका है।

यह सबसे कठोर सत्य है कि कच्चे तेल से निर्भरता घटाकर ही भारत आर्थिक महाशक्ति बन सकता है। 2022 में हमारा वित्तीय घाटा 192 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, इसमें 100 बिलियन डॉलर वित्तीय घाटा केवल कच्चे तेल के आयात के कारण है। यदि आज हम खनिज तेलों की निर्भरता को आधा भी कर दें तो इससे देश का 50 बिलियन डॉलर घाटा कम हो सकता है। साथ ही यदि अपने ही देश में ईवी इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) बनाएं और खरीदें तो हमें दोगुना लाभ मिलने वाला है।

आज के समय में विदेशी मुद्रा भंडार के ऊपर 256 बिलियन डॉलर के बॉन्ड चुकाने का दबाव है, इससे यह भंडार 600 बिलियन डॉलर से भी कम हो गया है। यह देश के अर्थशास्त्र पर दोहरी मार है और यह दुर्दशा केवल कच्चे तेलों के आयात के कारण है। देश के जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम जितनी शीघ्रता से इलेक्ट्रिक ऊर्जा चलित वाहनों को अपनाएंगे इससे देश की इकोनॉमी में दोहरा योगदान देंगे। इससे स्वदेशी वाहनों की खरीद होगी और जीवाश्म ईधन की मांग कम होगी। हालांकि अभी ईवी की बैटरी में आग लगने की घटनाओं से इन वाहनों की ब्रिकी पर असर पड़ा है।

ईवी की गंभीर आवश्यकता को समझकर मोदी सरकार ने अपने पहले ही कार्यकाल में ईवी की त्वरित स्वीकार्यता एवं विनिर्माण हेतु फेम इंडिया कार्यक्रम 2015 में शुरू किया था। ईवी खरीद पर जीएसटी भी 28% से घटाकर 12% कर दिया गया था, जिसका लक्ष्य 2030 तक कुल वाहनों का 30 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहन करने का था। अब फेम इंडिया का दूसरा चरण शुरू हो गया है। इसका उद्देश्य सात हजार इलेक्ट्रिक बसों, 55 हजार चौपहिया यात्री वाहनों, 5 लाख तीन पहिया वाहनों और एक लाख दो पहिया वाहनों के लिए सब्सिडी प्रदान करना है। ई‌वी ही हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर सकती है।


संकट में कपड़ा क्षेत्र


बीते कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों ही बाजारों में कपास की कीमतों में लगातार इजाफा हुआ है। इस बढ़ोतरी ने भारतीय कपड़ा उद्योग को मुश्किल में डाल दिया है। कई धागा उत्पादकों, पावर लूम, हॉजरी यूनिट और वस्त्र निर्माताओं तथा निर्यातकों को या तो अपना उत्पादन रोकना पड़ा या उसे निलंबित करना पड़ा। इसके चलते हजारों कामगार बेरोजगार हो गए हैं। वस्त्र एवं उससे संबद्ध उत्पादों का निर्यात जो वित्त वर्ष 2022 में करीब 70 प्रतिशत बढ़कर 40 अरब डॉलर के आंकड़े तक पहुंच गया था, वह दबाव में है क्योंकि कीमतें गैर प्रतिस्पर्धी हो चुकी हैं। उद्योग जगत के मुताबिक कई निर्यात ऑर्डर ऐसे हैं जिनको लेकर नये सिरे से बातचीत करनी पड़ी क्योंकि लागत बढ़ने के कारण हालात बदल गए। ऐसे कई ऑर्डर या तो आयातकों ने रद्द कर दिए या फिर उन्हें भारत के प्रतिस्पर्धी बांग्लादेश, वियतनाम, चीन और पाकिस्तान के हवाले कर दिया।

हालांकि सरकार ने उद्योग जगत को उबारने के लिए कपास पर आयात शुल्क हटाने जैसे कदम उठाए लेकिन इन कदमों से कुछ खास मदद नहीं मिली। वैश्विक बाजार और मजबूत हुए हैं, ऐसे में इस बात की संभावना भी नहीं है कि घरेलू बाजार में कीमतें थम सकेंगी। ये कीमतें पिछले वर्ष के स्तर से दोगुनी हो चुकी हैं। वैश्विक उत्पादन में कमी और कोविड-19 महामारी की स्थिति में सुधार के बाद बढ़ी हुई मांग ने आपूर्ति पर दबाव बना दिया है। इस बात ने कीमतों को नयी ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। भारतीय कपड़ा क्षेत्र में व्याप्त संकट का ताजा संकेत है तिरुपुर के वस्त्र उद्योग द्वारा 16 मई से दो दिवसीय हड़ताल की घोषणा। तिरुपुर को दक्षिण भारत में तैयार वस्त्रों का गढ़ माना जाता है। यह हड़ताल कच्चे माल की बढ़ती लागत के विरोध में की जा रही है।

कपड़ा उद्योग की चिंताओं की मूल वजह यह है कि देश और विदेशों में तैयार वस्त्र तथा कपड़ा संबंधी अन्य उत्पादों की जरूरत के लिए जितने कपास की आवश्यकता है, उतना उत्पादन नहीं हो पा रहा है। हालांकि कपास की खेती के रकबे में लगातार विस्तार हुआ है क्योंकि उत्पादकों को इससे लाभकारी कीमत हासिल हो पा रही है। परंतु कुल उत्पादन अभी भी कमतर बना हुआ है क्योंकि फसल उत्पादन कमतर हुआ है। भारतीय कपास निगम के अनुसार देश का औसत कपास उत्पादन जो 2010 के मध्य में बढ़कर 550 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया था, अब वह घटकर 470 किलोग्राम रह गया है। यह 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के वैश्विक औसत से काफी कम है। कपास वैज्ञानिकों के मुताबिक यह गिरावट इसलिए आई कि नई फसल सुधार प्रौद्योगिकी में और सुधार की आवश्यकता है। खासतौर पर उच्च उत्पादन और कीटनाशकों के प्रतिरोध वाली उन्नत किस्मों में। यह कमी इसलिए भी है कि सरकार जीन संवद्र्धित किस्मों को लेकर अनावश्यक रूप से चिंतित है।

देश की कपास क्रांति में बीटी-कॉटन हाइब्रिड का बहुत योगदान था जिसे 2002-2003 में पेश किया गया था। परंतु नयी जीएम किस्मों पर रोक के साथ ही इसने गति खो दी। इसके साथ ही बीटी-कॉटन के बीजों की कीमतों को भी नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। ऐसे में बहुराष्ट्रीय बीज प्रौद्योगिकी कंपनियों ने भारत में अपना कारोबार समेट लिया। कई पुरानी बीटी-कॉटन हाइब्रिड किस्में अब अपनी उत्पादक आयु पूरी कर चुकी हैं और उनकी जगह नयी किस्मों की जरूरत है। इस बीच अन्य कपास उत्पादक देशों ने कपास बीज प्रौद्योगिकी में काफी प्रगति की है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह जीएम नीति पर नए सिरे से विचार करे और अल्पकालिक उपायों से आगे बढ़े। ऐसा करके ही कपास क्षेत्र में नयी जान डाली जा सकती है। जब तक उत्पादकता नहीं बढ़ेगी तब तक कपड़ा एवं वस्त्र उद्योग मुश्किल में बना रहेगा।


न्यायपालिका की नाकामी के क्या हैं कारण ?

आर जगन्नाथन, ( लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं )

सार्वजनिक बुद्धिजीवी और मीडिया टिप्पणीकार ‘विधि के शासन’ पर अत्यधिक विश्वास रखते हैं, यह और बात है कि नियम शक्तिशाली लोगों द्वारा बनाये जाते हैं और एक ऐसी व्यवस्था में लागू किये जाते हैं जहां संसाधन संपन्न लोग उनकी व्याख्या अपने फायदे के लिए कर सकते हैं। इस आलेख में हम इस विषय में बात करना चाहेंगे कि विधि का शासन सभ्य समाज के लिए एक आवश्यक शर्त है लेकिन यह न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले हम न्यायपालिका पर ध्यान केंद्रित करेंगे, खासतौर पर उच्च न्यायपालिका पर, इस कड़ी के अगले आलेखों में हम पुलिस सुधार और नागरिक समाज पर ध्यान केंद्रित करेंगे। आखिरी आलेख में मैं यह दलील दूंगा कि स्थानीय समुदायों के अधिकारों और कर्तव्यों की सफलता की संभावना तब अधिक होती है जब विधि के शासन और सांप्रदायिक शांति को कायम रखा जाए, बजाय कि केवल संविधानवाद पर जोर देने के।

सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक अदालत और अंतिम अपील अदालत के रूप में अपना काम करने में नाकाम रहा। वह न तो कानून का प्रवर्तन संतोषप्रद ढंग से कर सका है और न ही निर्णय में एकरूपता सुनिश्चित कर सका ताकि न्याय होता दिख सके। राह चलते किसी भी व्यक्ति से पूछिए कि क्या उसे अदालत से न्याय मिलेगा? ज्यादातर लोग अनिश्चित दिखेंगे। ऐसा न केवल अंतहीन देरी की वजह से है बल्कि निर्णयों में भारी अंतर के कारण भी है। गत माह न्यायमूर्ति यू यू ललित (जो अगस्त में देश के प्रधान न्यायाधीश बनेंगे) की अध्यक्षता वाले तीन न्यायधीशों के एक पीठ ने चार वर्षीय बच्चे का बलात्कार और हत्या करने वाले की सजा घटा दी। दलील यह दी गई कि हर पापी का भविष्य होता है। सोशल मीडिया पर इसकी जमकर आलोचना हुई। उसी दिन ठाणे की एक अदालत ने सात वर्षीय बच्चे का बलात्कार और हत्या करने वाले को मौत की सजा सुनाई। ऐसे ही एक मामले में बंबई उच्च न्यायालय ने मौत की सजा बरकरार रखी। निर्भया मामले में सभी दोषियों को मौत की सजा दी गई। यदि समान मामलों में निर्णय अलग-अलग हो सकते हैं तो न्याय की आशा कैसे की जाए?

गत वर्ष लेखक डेनियल कानमैन, ओलिवियर सिबोनी और कास आर सस्टीन ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका शीर्षक था: अ फ्लॉ इन ह्यूमन जजमेंट। उन्होंने दिखाया कि कैसे अमेरिका में एक जैसे मामलों में अलग-अलग निर्णय सुनाये जा सकते हैं। सन 1984 में वहां सेंटेंसिंग कमीशन गठित किया गया ताकि एक जैसे मामलों में समान सजा सुनायी जा सके। परंतु समय बीतने के साथ अमेरिकी उच्च न्यायपालिका ने इन दिशानिर्देशों को शिथिल कर दिया ताकि न्यायाधीश अपने सोच से निर्णय ले सकें।

हमारे उच्चतम न्यायालय ने भी अदालतों को किसी केंद्रीय दिशानिर्देश से मुक्त करने के लिए यही किया। सन 1999 और 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता में अहम बदलाव किए और दीवानी मामलों के स्थगन, समन जारी करने तथा लिखित वक्तव्यों की सीमा तय की। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए इन्हें लगभग निष्क्रिय कर दिया कि ये केवल दिशानिर्देश हैं, कोई वैधानिक सीमा नहीं। प्रश्न यह है कि न्याय अगर समय पर न मिले तो उसे न्याय कैसे कहा जाए?

दूसरी बात यह है कि सर्वोच्च न्यायालय प्राय: सुर्खियां बटोरने वाली जनहित याचिकाओं को तवज्जो देता है, बजाय कि आम लोगों की जरूरत से जुड़े मामलों के। सुप्रीम कोर्ट ऑब्जर्वर के एक विश्लेषण के अनुसार सन 1985 से 2019 के बीच सालाना औसतन 26,000 जनहित याचिकाएं लगायी गईं। सर्वोच्च न्यायालय उनमें से अपनी मर्जी से मामलों की सुनवायी करता है। हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने राजमार्गों पर बार हों या नहीं, दिल्ली आने वाली एसयूवी पर ज्यादा कर हो या नहीं और कोविड के दौरान ऑक्सीजन और टीकों की आपूर्ति तक हर तरह के मामले सुने। दुनिया के किसी अन्य देश में आपको ऐसा देखने को नहीं मिलेगा कि सरकार के साथ-साथ न्यायालय भी ऐसे नीतिगत मसलों में उलझा हो।

दूसरी ओर वास्तविक संवैधानिक मसले- नागरिकता संशोधन अधिनियम की वैधानिकता, हिंदुओं के अपने उपासना स्थलों पर पूजा करने के अधिकार, अनुच्छेद 370 को रद्द करना और सबरीमला फैसले की समीक्षा जैसे मामले वर्षों से लंबित हैं। अयोध्या विवाद का निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के निर्णय के नौ वर्ष बाद आया। यह भी कहा जा सकता है कि अगर 2019 के आम चुनाव के नतीजे इतने निर्णायक न होते तो अदालत शायद अभी और समय लेती। दूसरी ओर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग जिसे संसद और राज्य सरकारों की आपसी सहमति से एक कानून बनाकर स्थापित किया गया था उसने न्यायपालिका ने खुद जल्द निस्तारण के लिए चुन लिया। एक ऐसा निस्तारण जहां न्यायपालिका स्वयं एक पक्ष थी।

संवैधानिक अदालतें भी मामलों का चयन इस आधार पर करती हैं कि वह कितनी सुर्खियां बटोर सकता है। खासकर अंग्रेजी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में। हालांकि इसका कारोबार और अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है या कई बार यह निष्प्रभावी भी साबित होता है। यही कारण है कि हमें 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला ब्लॉक आवंटन मामलों में ऐसे निर्णय सुनाये गए जहां उन लोगों को भी नुकसान हुआ जो धोखाधड़ी का हिस्सा नहीं थे। अदालतें कहती हैं कि सरकारें संविधान के कुछ बुनियादी गुणों में संशोधन नहीं कर सकतीं लेकिन वे उन गुणों के बारे में कुछ नहीं बतातीं। संपत्ति का अधिकार तो बुनियादी गुण नहीं है लेकिन न्यायाधीशों द्वारा न्यायिक नियुक्तियों पर निर्णय करना बुनियादी गुण है। निजता मूल अधिकार है जबकि लाखों भारतीय अपने अधिकार बड़ी तकनीकी कंपनियों को सौंप रहे हैं। जेल नहीं बल्कि जमानत मानक होना चाहिए लेकिन निचली अदालतें किसी भी शक्तिशाली नेता की निंदा करने वाले की गिरफ्तारी पर मुहर लगा देती हैं।

विधि आयोग ने सुझाव दिया है कि सर्वोच्च न्यायालय को दो हिस्सों में बांटा जाना चाहिए। दिल्ली में एक हिस्सा संवैधानिक अदालत हो जबकि दूसरा हिस्सा गैर संवैधानिक मामलों की अंतिम अपील अदालत हो। परंतु अब तक सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही सुधार में कोई रुचि नहीं दिखायी है। यदि वह स्वयं में सुधार के लिए तैयार नहीं हो सकता तो भला आम लोगों के लिए विधि का शासन कैसे सुनिश्चित करेगा?


निरस्त हो राजद्रोह कानून


सर्वोच्च अदालत में राजद्रोह कानून की वैधता को चुनौती देने पर सुनवाई चल रही है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को 24 घंटे का समय दिया है कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस बात का निर्देश दे कि जब तक भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124-अ की समीक्षा की जा रही है तब तक इसके तहत दर्ज केस पर रोक लगाई जाए। सरकार आज इस पर अपना जवाब देगी। हालांकि इस कानून पर बीते सोमवार को सरकार के रुख में भारी परिवर्तन आया और उसने शीर्ष अदालत को बताया था कि वह धारा 124-अ के प्रावधानों की फिर से जांच, परीक्षण और इस पर पुनर्विचार करेगी। केंद्र के इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए कि वह इस कानून पर पुनर्विचार करने पर राजी हो गई है। अब तक वह इस कानून का बचाव कर रही थी।

वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक शासन के इस दमनकारी कानून के अंत का समय आ गया है। यह कानून लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का विरोधी है। अंग्रेजों ने भारत की आजादी की लड़ाई का दमन करने के लिए 1860 में इस कानून को बनाया था और 1870 में इसे भारतीय दण्ड संहिता में शामिल किया गया। यह विडंबना है कि आजाद भारत में भी पुलिस, प्रशासन और सरकारें इस कानून का दुरुपयोग करती रही हैं। सोशल मीडिया पर सरकार की नीतियों या किसी राजनीतिक नेता की आलोचना को इस कानून के दायरे में लाकर राजद्रोह का केस बनाना आम बात हो गई है। हालांकि आंतरिक और बाह्य खतरों से देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए ऐसे दंडात्मक प्रावधानों की अनिवार्यता को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन यह भी सच है कि प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में औपनिवेशिक काल के ऐसे डंडे नहीं देने चाहिए जो उन्हें दमनकारी बनाएं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2016 और 2019 के दौरान आईपीसी की धारा 124-अ (राजद्रोह) के तहत दर्ज होने वाले मामलों में 160 फीसद बढ़ोतरी हुई है, लेकिन दोषसिद्धि की दर महज 03 फीसद ही रही है। इससे पता चलता है कि नागरिकों को परेशान करने के लिए ही इस कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है। केंद्र ने राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है तो इसका अर्थ है कि जिनके हाथ में सत्ता व शक्ति है, उनके द्वारा इस कानून के दुरुपयोग की चिंता का प्रकटीकरण हुआ है।


देशद्रोह को फिर समझने की कवायद

पवन दुग्गल, ( साइबर कानून विशेषज्ञ )

भारतीय दंड संहिता की धारा 124 (ए) में उन प्रावधानों का जिक्र है, जिनसे किसी शख्स को देशद्रोही साबित किया जाता है। यदि आप ऐसा कोई काम करते हैं, जो अपने शब्दों (चाहे वे लिखित हों या मौखिक) से या परिणामों से भारत सरकार के प्रति विरोध जताता है या लोगों को भारत सरकार के खिलाफ करने की कोशिश करता है, तो वह देशद्रोह कानून के दायरे में आता है। इसमें कैद (जो आजीवन भी हो सकती है), जुर्माना या दोनों तरह की सजा के प्रावधान हैं। अगर इस कानून के तहत कोई दोषी साबित हो गया, तो उसे कम से कम तीन साल की कैद या जुर्माना या फिर दोनों तरह की सजा मिलेगी ही।

यह औपनिवेशिक काल का कानून है, जिसका इस्तेमाल ब्रिटिश साम्राज्य में होता था। स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज इससे कुचली जाती थी और उनके आंदोलन को विफल करने के प्रयास होते थे। मगर आज हमारा राजनीतिक और सामाजिक परिवेश पूरी तरह से बदल चुका है। देश अपनी आजादी की 75वीं सालगिरह मनाने जा रहा है। ऐसे में, इस कानून का भला क्या औचित्य है? यह सवाल विभिन्न प्रकार की जनहित याचिकाओं में सर्वोच्च अदालत के सामने उठाए गए हैं। इसकी वजह थी पिछले कई वर्षों से इस कानून का हो रहा दुरुपयोग। न सिर्फ राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और उनको परेशान करने के लिए, बल्कि आलोचना के स्वर को शांत करने के लिए भी इसका जमकर इस्तेमाल हो रहा है। आलम यह है कि अगर कोई व्यक्ति हनुमान चालीसा का पाठ करने जा रहा हो, तो उसके ऊपर भी देशद्रोह कानून लगा दिया जाता है, जिसका न कोई औचित्य है और न धारा 124 (ए) का कोई प्रावधान उस पर लागू होता है।

सुप्रीम कोर्ट इस कानून के दुरुपयोग को लेकर ही चिंतित था। 2021 में भी उसने एक सुनवाई के दौरान सरकार से इसको निरस्त करने को कहा था। उसके तर्क थे कि इनमें जिन प्रावधानों का जिक्र है, वे औपनिवेशिक युग के हैं, जो स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ इस्तेमाल होते थे। आज माहौल बदल चुका है और कोविड-19 के बाद ज्यादातर भारतीय इंटरनेट पर हैं। चूंकि भारत इंटरनेट की दुनिया में सबसे बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है, इसलिए इस कानून के दायरे को या तो छोटा करना चाहिए या फिर इनमें संशोधन होना चाहिए। शायद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के मूड को अब जाकर पढ़ा है, क्योंकि हाल-फिलहाल तक वह इस कानून का समर्थन कर रही थी। माना जा रहा है कि सरकार के अचानक यू-टर्न की वजह तीन जजों की खंडपीठ का वह कथन है, जिसमें उसने 10 मई, 2022 को इस पर बहस सुनने की बात कही थी कि यह मामला पांच जजों की पीठ के पास जाना चाहिए अथवा नहीं? सरकार को जब लगा कि यह मामला सांविधानिक पीठ के हवाले किया जा सकता है, जिससे उसके सामने असहज परिस्थिति पैदा हो सकती है, तो उसने इस कानून की तत्काल समीक्षा करने की बात कही। शीर्ष अदालत ने भी सरकार की दलील को मान लिया है।

जब इस कानून की समीक्षा की बात होती है, तो तीन तरह की सोच सामने दिखती है। पहली, इस तरह के कानूनी प्रावधान खत्म कर देने चाहिए, क्योंकि इनकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं बची। दूसरी, इस कानून को बनाए रखना चाहिए, क्योंकि देश को इसकी सख्त जरूरत है, खासकर राष्ट्रविरोधी ताकतों को देखते हुए। और तीसरी सोच उन लोगों की है, जो मानते हैं कि यह कानून तो कायम रहना चाहिए, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए इसके इस्तेमाल पर कुछ वाजिब अंकुश लगाया जाना चाहिए। इस सोच के समर्थक मानते हैं कि अगर कानूनी किताब से इसे पूरी तरह से हटा दिया जाएगा, तो देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता को नुकसान पहुंच सकता है।

जाहिर है, सरकार इनमें से तीसरे विकल्प को चुन सकती है, क्योंकि हर हुकूमत इस तरह के कानून की हिमायती दिखती है। उसका मानना है कि अगर कोई व्यक्ति भारत के हितों के खिलाफ काम करता है, तो उसके ऊपर कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए। मगर हां, इस कानून के पंख जरूर काटे जा सकते हैं। संभव है कि इसमें ‘चेक ऐंड बैलेंस’ का भी प्रावधान बने। सरकारों को यह समझना होगा कि उनकी आलोचना देशद्रोह के दायरे में नहीं आती। इसके अलावा, उन सीमित परिस्थितियों को भी परिभाषित किया जाना चाहिए, जिनमें इस कानून के इस्तेमाल की अनुमति हो सकती है। फिर, ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि सरकार अपनी मनमानी करे। अगर सरकारों को देशद्रोह निर्धारित करने का पूरा अधिकार दे दिया जाएगा, तो उनके तमाम आलोचक देशद्रोही ठहरा दिए जा सकते हैं। इसलिए, जिस तरह से संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले स्वतंत्र अभिव्यक्ति संबंधी मौलिक अधिकार पर कुछ बंदिशें हैं, उसी तरह से देशद्रोह कानून को आयद किए जाने संबंधी परिस्थितियों पर भी कुछ अंकुश जरूर लगने चाहिए।

साफ है, इस कानून के औचित्य पर किंतु-परंतु का कोई सवाल नहीं है। वैसे भी, देश के अंदर और बाहर इतने ‘नॉन-स्टेट एक्टर्स’ काम कर रहे हैं कि भारत की स्थिरता को हमेशा खतरा बना रहता है। ऐसे में, इस कानून की जरूरत हमें हर वक्त पड़ेगी। मगर हां, हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष नागरिकों के खिलाफ इसका बेजा इस्तेमाल नहीं हो। इसकी हरसंभव कोशिश होनी चाहिए कि लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो, और इसकी जिम्मेदारी स्वाभाविक तौर पर सरकार की होनी चाहिए। उसे इस तरह से सामंजस्य बनाना होगा कि एक तरफ उसके हितों की रक्षा हो सके, तो दूसरी ओर लोगों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा। सरकार यह ‘गोल्डन बैलेंस’ किस तरह बनाती है, इस पर नजर बनी रहेगी। हालांकि, हर राष्ट्र यही चाहता है कि वह ऐसे प्रावधान बनाए रखे, जो उसके हितों को चोट पहुंचाने वाली ताकतों के खिलाफ कारगर हो। अमेरिका, ब्रिटेन, सिंगापुर जैसे उन्नत देशों में भी देशद्रोह कानून जैसे प्रावधान हैं। जाहिर है, अपने देश में इस कानून की समीक्षा एक सराहनीय कदम है, और यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता का परिचायक भी है, जो औपनिवेशिक काल के कानूनों के खिलाफ हमेशा मुखर रहे हैं।