07-03-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


Multidisciplinary learning is the way

ET Editorials

The University Grants Commission (UGC) draft guidelines to convert existing higher education institutions into multidisciplinary ones is a step in the right direction. This is in line with the National Education Policy (NEP) 2020. The challenge is to ensure the transition is done properly and changes are integrated into the entire value chain of education.

Collaboration across disciplines, between institutions and with industry and key stakeholders is critical to address global and multifaceted challenges such as climate change and sustainability. A multidimension outlook is also necessary for dealing with complex domestic issues related to development.The guidelines are an attempt to make this move possible. They identify the systemic interventions that are necessary to enable educational and research institutions to become multidisciplinary, such as mobility of credits, more robust online and long-distance education.The transition will require institutions to reconsider faculty requirements as the needs become more diverse, and students have greater freedom in designing their courses. These guidelines will help set up systems that can be used to address uneven quality and educational outcomes across institutions.

For now, the models of collaboration have been kept open and flexible.It would be a good idea to set up a system of review by peers to assess the outcomes of the various interventions. The proposed clustering of colleges is important from the administrative and student perspective. Bringing together colleges will allow for sharing and leveraging of resources. India’s education system must be capable of providing the human resource required to make the required transitions. These guidelines help make that possible.



Quadrilateral queasiness

India cannot be forced to pick a side in the conflict, but Russia could test its resolve


At a snap virtual meeting of the Quadrilateral Security Dialogue or Quad, comprising India, the U.S., Australia and Japan, leaders discussed the crisis of Russia’s invasion of Ukraine along with more traditional topics of interest for the Dialogue, including territorial and maritime security across the Indo-Pacific. In the joint statement, issued after the summit, the four nations reaffirmed their commitment to a free and open Indo-Pacific, “in which the sovereignty and territorial integrity of all states is respected and countries are free from military, economic, and political coercion”. The latest Quad meeting was in part likely motivated by the concern of the U.S., Australia, and Japan that India, in not explicitly condemning Russian President Vladimir Putin’s decision to launch a ground offensive across the Russia-Ukraine border and to bomb Ukrainian infrastructure, might not be on the same page as the other Quad members vis-à-vis this conflict. They have not only condemned Russia’s aggression but have also slapped Kremlin elites and organisations linked to them with crippling sanctions. India, contrarily, has abstained from three UN resolutions condemning Russia. There is also a considerable difference on the Russia-Ukraine issue in terms of the individual readouts of the Quad members. While the U.S., Australia and Japan directly called out Russia’s attempt to unilaterally force changes to the status quo in Ukraine and vowed not to let such action occur anywhere in the Indo-Pacific, India’s readout only referenced Ukraine in passing, in the context of establishing a new humanitarian assistance and disaster relief mechanism for this cause.

Russia’s action has obviously posed complex questions for India’s strategic calculus, even as New Delhi continues to be guided by the 21st century variant of its non-alignment paradigm, and by its need to remain close to Moscow, a major defence supplier. South Block is already well versed at playing hardball with the mandarins at the U.S. State Department over getting a CAATSA waiver for India’s purchase of $5.43 billion worth of the Russian Triumf missile defence system. While the discussions on the Ukraine crisis will continue at the Quad and across other plurilateral platforms where India and the U.S. work together for the greater good of the rules-based international order, the idea that NATO countries or even Russia can force sovereign nations with a proud history of non-alignment to pick a side in a complex geopolitical conflict is quite passé and eminently unviable in today’s interdependent global arena. The Quad, for example, cannot afford to alienate India, a critical partner in the global-strategic plan to balance the rise of China as a potential Asian hegemon. Yet, India may find its resolve and patience with Russia tested should Russian occupying forces begin committing war crimes and human rights violations in contravention of the Geneva Convention, the Universal Declaration of Human Rights and other applicable global treaties.


भारत के समक्ष संतुलन साधने की चुनौती

विवेक काटजू, ( लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं )

यूक्रेन पर रूस के हमले ने भारत के लिए कई चुनौतियां बढ़ा दी हैं। इन चुनौतियों का संबंध आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक एवं मानवतावादी जैसे पहलुओं से है। रक्षा साजोसामान की आपूर्ति के लिए भारत अभी तक रूस पर निर्भर है। इस बीच अमेरिका के साथ भी भारत के व्यापक हित जुड़ते गए। बहरहाल रिश्तों की ये कडिय़ां केवल भारत ही नहीं, बल्कि इन दोनों देशों और कई नाटो देशों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में भारत का कूटनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए रूस और अमेरिका दोनों द्वारा लाबिंग किया जाना स्वाभाविक है। जैसे-जैसे यूक्रेन में रूस की जंग तेज होती जा रही है, वैसे-वैसे रूस और नाटो देशों के बीच कूटनीतिक युद्ध भी तल्ख होता जा रहा है। इस दौरान भारत की पहली प्राथमिकता हजारों छात्रों सहित अपने नागरिकों की सुरक्षित स्वदेश वापसी है। युद्ध के बीच यह कभी आसान नहीं रहता। हजारों छात्र भारत लौट आए हैं और उम्मीद करनी चाहिए कि सभी की सकुशल वापसी होगी। यह दुखद है कि कर्नाटक के एक छात्र की रूसी गोलाबारी में जान चली गई। वहीं एक छात्र का उपचार के दौरान निधन हो गया।

फिलहाल वैश्विक सहानुभूति यूक्रेन के साथ है। दरअसल इस दौर में किसी देश का दूसरे देश पर आक्रमण करना अस्वीकार्य है। अपने सामरिक हितों को अनदेखा करने के लिए अमेरिका एवं यूरोपीय देशों से रूस की वाजिब शिकायतें थीं। वे रूस की पश्चिमी सीम पर स्थित देशों को नाटो सदस्य बनाने में लगे थे। इसे लेकर रूस ने यूक्रेन के मामले में एक लक्ष्मण रेखा खींच दी, जिस देश के साथ उसका गहरा ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है। फिर भी ऐसे तमाम उकसावे के बावजूद यूक्रेन पर रूसी हमले को जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस हमले ने नाटो देशों के समक्ष दुविधा उत्पन्न कर दी है। ऐसा इसलिए, क्योंकि एक तो रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है। दूसरा यह कि दुनिया में परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा भी उसके पास है। स्पष्ट है कि नाटो देश रूस का मुकाबला करने के लिए यूक्रेन में अपनी सेनाएं नहीं भेज सकते, क्योंकि इससे न केवल युद्ध के लंबा खिंचने, बल्कि परमाणु शक्तियों के सक्रिय होने से जोखिम और बढ़ जाएगा। ऐसे संघर्ष के लंबा खिंचने की कल्पना ही सिहरन पैदा कर सकती है। वहीं यह बात भी उतनी ही खरी है कि नाटो इस आक्रमण को अनदेखा नहीं कर सकता है। इसीलिए उसने त्रिस्तरीय रणनीति अपनाई है। पहली यही कि संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से रूस पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाना। दूसरे, यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति सहित हरसंभव सहयोग देना। तीसरा, रूस पर कड़े वित्तीय एवं अन्य प्रतिबंध लगाना ताकि उनसे कुपित रूसी नागरिक पुतिन के खिलाफ भड़क जाएं।

जो के हालात बन रहे हैं उसमें तय है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की सरकार को भले ही कितना समर्थन मिले, लेकिन रूसी आक्रमण के आगे उनका प्रतिरोध लंबे समय तक नहीं टिकने वाला। इसका अर्थ यही होगा कि यदि संपूर्ण यूक्रेन नहीं तो उसका अधिकांश हिस्सा रूसी कब्जे में चला जाएगा। फिर पुतिन वहां अपनी कठपुतली सरकार बिठा देंगे। इसके बाद नाटो यही सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा कि रूसी समर्थन वाली ऐसी सरकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता न मिलने पाए। साथ ही साथ यह संगठन रूस पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने के अलावा प्रतिबंधों का शिकंजा और कसता जाएगा। यह तस्वीर काफी कुछ इस पर निर्भर करेगी कि यूक्रेनी अपनी जमीन पर किस प्रकार निरंतर विरोध कर पाएंगे। इस पूरे परिदृश्य के आकलन में तमाम अनिश्चितताएं जुड़ी हैं, जिनका भारत सहित सभी देशों पर प्रभाव पड़ेगा।

इस मामले में रूस की खुलकर आलोचना करने के लिए अमेरिकी दबाव और रूस के साथ अपने रिश्तों को सुरक्षित रखने की दिशा में भारत ने अभी तक सधा हुआ रुख अपनाया है। भारत की यह सतर्कतापूर्ण नीति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर संयुक्त राष्ट्र के अन्य संगठनों की बैठकों में देखी जा सकती है। चूंकि भारत संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर मतदान से अनुपस्थित रहा तो इसका यह आकलन करना गलत होगा कि भारत की स्थिति स्थैतिक है। भारत अपने बयानों से अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहा है। ऊपरी तौर पर यह दिख सकता है कि भारत रूसी हमले पर आए प्रस्तावों पर मतदान से दूर रहा। इसे रूस के प्रत्यक्ष समर्थन के रूप में देखना गलता होगा। यूक्रेन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर सुरक्षा परिषद में 21 फरवरी से चार मार्च के बीच कुल छह बैठकें हुईं। इन सभी बैठकों में भारत ने इसी बात पर जोर दिया कि विवादों का निपटारा संवाद, वार्ता और कूटनीति के जरिये किया जाए। उसने यह भी कहा कि सैन्य टकराव से बचना होगा। सुरक्षा परिषद की 21 फरवरी को हुई बैठक रूस द्वारा यूक्रेन के दो अलगाववादी प्रांतों को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता प्रदान करने के बाद हुई थी। उसमें भारत ने शांति, संवाद और कूटनीति की बात करने के अलावा यह भी उल्लेख किया था कि सभी देशों के वास्तविक सुरक्षा हितों का भी ध्यान रखा जाए। यह इसका संकेत था कि यूक्रेन के नाटो में शामिल होने संबंधी रूस की आपत्तियों को किसी भी तरह अनदेखा नहीं करना चाहिए। जिस दिन रूस ने यूक्रेन पर हमला बोला, उस दिन भी भारत ने परिषद में ऐसा ही बयान दिया।

हालांकि हमले के बाद 25 फरवरी और उसके उपरांत हुई बैठकों में भारत ने रूस के सुरक्षा हितों संबंधी किसी भी उल्लेख को अपने बयानों से हटा लिया। इसके बजाय भारत ने संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के पालन और हिंसा समाप्त करने की आवश्यकता पर बल देने की बात कही। साथ ही उसने देशों की संप्रभुता एïवं क्षेत्रीय अखंडता अक्षुण्ण बनाए रखने की वकालत भी की। चूंकि रूस ने यूक्रेन की संप्रभुता का उल्लंघन किया था तो भारत ने स्पष्ट रूप से कड़ा संदेश दिया कि यह हमला गलत था। अमेरिका ने भारत के रुख में बदलाव को स्वीकार किया है, क्योंकि उसके विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सीनेट कमेटी को बताया कि भारत का नया रुख उभर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि यूक्रेन मसले पर अमेरिका भारत के संपर्क में है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कूटनीतिक मोर्चे पर अपने पूर्ण समर्थन के लिए अमेरिका भारत पर दबाव और बढ़ाएगा। हालांकि भारत को अपने हितों की परवाह करनी होगी। उसका मौजूदा कूटनीतिक रुख इसी दिशा में है, जो आगे भी कायम रहना चाहिए।


कार्बन क्रेडिट का बाजार


यह अच्छी खबर है कि आखिरकार देश के नीतिगत हलकों में समुचित कार्बन क्रेडिट कारोबार प्रणाली की समस्या का हल तलाश करने के प्रयास में रुचि ली जा रही है जहां किसानों की पहुंच हो। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान निजी क्षेत्र की एक कंपनी के साथ साझेदारी करके कार्बन क्रेडिट का एक बाजार तैयार कर रहा है जो किसानों पर केंद्रित होगा। ऐसे बाजार के पीछे का सिद्धांत एकदम सहज है। किसानों को यह दर्शाकर कारोबार करने लायक कार्बन क्रेडिट मिलता है कि वे कार्बन को अलग कर रहे हैं या कार्बन उत्सर्जन कम कर रहे हैं। ऐसे कदमों में पौधरोपण, जैविक खेती जैसी जलवायु संवेदी कृषि तकनीक अपनाना आदि शामिल हैं। ऐसे प्रत्येक कदम से निश्चित मात्रा में कार्बन या तो अलग होगा यानी वातावरण से हटे या उसका उत्सर्जन नहीं होगा जो कि सामान्य परिस्थितियों में होता। इस क्रेडिट को बाजार में बेचा जा सकता है और कार्बन के इस्तेमाल वाली कंपनियां मसलन उर्वरक और सीमेंट क्षेत्र की कंपनियां अपनी कार्बन इस्तेमाल की छाप कम करने के लिए इसे खरीदेंगी। इस प्रकार कार्बन की कीमत निर्मित होगी जिसे बाजार में प्रयोग किया जा सकता है। आशा की जानी चाहिए कि ऐसे प्रयास सफल होंगे लेकिन इससे संबंधित बाधाओं पर भी ध्यान देना होगा। अन्य देशों में बेहतर विकसित कार्बन क्रेडिट बाजार होने के बावजूद वहां किसानों को बाजार तक पहुंच बनाने में दिक्कत हुई। एक हालिया नीलामी में माइक्रोसॉफ्ट ने लाखों की तादाद में कार्बन क्रेडिट खरीदने की आशा जताई लेकिन वह अमेरिकी किसानों से केवल 200,000 कार्बन क्रेडिट खरीद सकी क्योंकि प्रमाणन और निगरानी की समस्या थी। ऐसे में बाजार में डिजाइन की अहम समस्या है: इस बात की विश्वसनीय निगरानी तैयार करना कि कार्बन का उत्सर्जन कम हो रहा है। यदि कार्बन के उत्सर्जन में कमी आ रही है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि ये कदम नहीं उठाने पर कितना कार्बन उत्सर्जन हुआ होता। वहीं कार्बन को अलग करने की बात करें तो इसकी पुष्टि करनी होगी। उदाहरण के लिए उक्त जमीन पर दोबारा कभी खेती नहीं की गई क्योंकि खेती होती तो वातावरण में कार्बन उत्सर्जन होता। अतीत में पौधरोपण जैसे साधारण कदमों की निगरानी करने में भी समस्या आई है। एक बड़ा उदाहरण दो दशक पुराना है जब ब्रिटिश बैंड कोल्ड प्ले ने दक्षिण भारत में आम के 10,000 पौधे लगाकर अपने कार्बन उत्सर्जन की भरपायी करनी चाही थी। बाद में पता चला कि पौधरोपण के बाद जल्दी ही इनमें से आधे पौधे सूख गये क्योंकि वहां का वातावरण उनके अनुकूल नहीं था, उन्हें लगाने के दौरान सही तकनीक नहीं इस्तेमाल की गई और सिंचाई तथा उर्वरकों आदि की कमी रही। ऐसे में किसानों के लिए प्रोत्साहन आसान नहीं है और बाजार को कारगर बनाने के लिए इस दिशा में काम करना होगा।

हालांकि इसमें संभावनाएं भी हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वैच्छिक कार्बन क्रेडिट कारोबार से भारतीय किसानों को यह सुविधा मिलेगी कि वे दुनिया के अन्य स्थानों की कंपनियों से संभावित राजस्व जुटा सकें जो अपनी गतिविधियों के बदले कार्बन ट्रेडिंग करना चाहती हैं। बैंक ऑफ इंगलैंड के पूर्व गवर्नर मार्क कार्नी एक ऐसे कार्य बल का नेतृत्व कर रहे हैं जो स्वैच्छिक कार्बन बाजारों का आकार बढ़ाने पर काम कर रहा है और ऐसे सीमा पार कारोबार को आसान बनाना चाहता है।

फिलहाल वैश्विक स्वैच्छिक बाजार महज एक अरब डॉलर का है। गत वर्ष आयोजित सीओपी26 जलवायु सम्मेलन में इन क्रेडिट को पेरिस समझौते के अकार्बनीकरण लक्ष्यों के अनुरूप संतुलित करने की प्रणाली पेश की गई थी। परंतु उस समय कार्यकर्ताओं ने कहा था कि ये प्रयास औद्योगिक उत्सर्जन को लेकर छद्म रचने के समान हैं। इन चिंताओं को निराधार साबित करना नीति निर्माताओं, निजी क्षेत्र और नियामकों पर निर्भर करता है।


आखिर पुरुषों को कब तक प्राथमिकता मिलती रहेगी

अश्विनी देशपांडे, ( वरिष्ठ अर्थशास्त्री )

लैंगिक असमानता के बारे में आज भारतीय क्या महसूस करते हैं? जब नौकरियां कम हों, तो क्या पुरुषों को प्राथमिकता देनी चाहिए? क्या महिलाओं को हमेशा अपने पति की बात माननी चाहिए? क्या वे अच्छी राजनेता बन सकती हैं? क्या उनके खिलाफ हिंसा समस्या है? क्या देश में लड़कों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाकर सुरक्षा में सुधार करना चाहिए या लड़कियों को ठीक से व्यवहार करना सिखाना चाहिए?

ऐसे ही कई सवालों के जवाब भारत पर प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए सर्वेक्षण के दूसरे भाग में मौजूद हैं। ज्यादातर भारतीय लैंगिक असमानता को पहचानते तो हैं, लेकिन इसे समस्या के रूप में नहीं देखते। उदाहरण के लिए, 87 प्रतिशत बड़ी महिलाओं (35+) का मानना है कि पत्नी को अपने पति की बात माननी चाहिए, और यह अनुपात कम उम्र की महिलाओं (18-34 वर्ष) के बीच भी ज्यादा अलग (84 प्रतिशत) नहीं है। इससे पता चलता है कि असमान पैमाना व्यापक और परंपरागत है। हालांकि, कुछ दूसरे पहलू भी हैं। सिर्फ 19 प्रतिशत बड़ी महिलाएं इस बात से सहमत हैं कि परिवार में पुरुषों को खर्च के बारे में निर्णय लेने के लिए मुख्यत: जिम्मेदार होना चाहिए। केवल 23 प्रतिशत ऐसी महिलाएं सोचती हैं कि पुरुष तुलना में बेहतर राजनेता बनते हैं। लगभग 34 प्रतिशत बड़ी महिलाएं कहती हैं कि बेटों को विरासत का ज्यादा हक होना चाहिए।

हम जानते हैं कि भारत में निर्णायक भूमिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम रहा है। इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि 55 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि महिला और पुरुष समान रूप से अच्छे राजनेता होते हैं। सभी स्तरों पर महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाकर सभी राजनीतिक दलों को इसका जवाब देना चाहिए और महिला आरक्षण बिल का समर्थन करना चाहिए। 53 प्रतिशत महिलाएं लड़कों और पुरुषों को महिलाओं का सम्मान करना सिखाकर अपनी सुरक्षा में सुधार के पक्ष में हैं; 48 प्रतिशत पुरुष भी इससे सहमत हैं। बहुत कम लोग हैं, जो मानते हैं कि लड़कियों को उचित व्यवहार सिखाना चाहिए। लोगों की इन भावनाओं की रोशनी में सार्वजनिक नीतियों को बदला क्यों नहीं जाता है? अभी की नीतियां महिलाओं की आजादी के प्रतिकूल हैं और उन्हें घरेलू हिंसा के हालात की ओर ले जाती हैं।

जब लैंगिक नजरिये की बात आती है, तो उत्तर-दक्षिण का विभाजन भी टूट जाता है। जरूरी नहीं कि लैंगिक नजरिये के मामले में हिंदी पट्टी की तुलना में अधिक समतावादी हों। उत्तर-दक्षिण के भेद का धुंधला होना हमें वास्तविक लैंगिक समानता पाने के पथरीले रास्ते के प्रति सचेत करता है। कॉलेज में पढ़े-लिखे 80 प्रतिशत भारतीय इस विचार का समर्थन करते हैं कि पत्नियों को पतियों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। बेटों को वरीयता देने के प्रति भी दृढ़ता है। लगभग दो-तिहाई भारतीयों का मानना है कि बेटों को ही माता-पिता का अंतिम संस्कार करना चाहिए। वैसे समय के साथ जन्म के समय का लिंगानुपात समानता की ओर बढ़ रहा है। गौर करें, 1998-99 में 31 प्रतिशत विवाहित स्त्रियों ने कहा था कि उनके पति ने मुख्य रूप से यह तय किया कि पत्नी की कमाई का उपयोग कैसे किया जाए, जबकि 2015-16 में ऐसी स्त्रियों 17 प्रतिशत ही रह गईं।

यह रिपोर्ट भारत में पुत्र वरीयता के आधार को कमजोर करने के लिए ठोस नीतिगत कोशिशों की जरूरत को रेखांकित करती है। जब तक माता-पिता यह मानते हैं कि बेटियां पराया धन हैं और उनमें निवेश पड़ोसी के बगीचे को सींचने जैसा है, तब तक लैंगिक भेदभाव बढ़ता जाएगा। हम इस स्थिति को कैसे बदल सकते हैं? इस रिपोर्ट से पता चलता है कि पितृ-सत्तात्मक व्यवहार और महिलाओं की चुप्पी परस्पर मिली-जुली है, उसके कुछ पहलू मजबूत हैं और कुछ कमजोर। महिलाओं के लिए नीति-निर्माण में कमजोर पहलू का ही उपयोग करना चाहिए। श्रमिकों या उद्यमियों के रूप में अर्थव्यवस्था में भागीदारी की महिलाओं की क्षमता में वृद्धि उनकी आर्थिक आजादी और सर्वाधिक अभिव्यक्ति का आधार तैयार करेगी। साथ ही, सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में निर्णायक भूमिकाओं में महिलाओं की अधिक से अधिक मौजूदगी होनी चाहिए। इस रिपोर्ट के कई बिंदु इशारा करते हैं कि इस राह पर चलना मुश्किल तो है, नामुमकिन नहीं।