05-05-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक


Ed Reform Gone Rogue
UGC’s draft curriculum for the 4-year undergrad programme is rife with confusion and contradiction
Amber Habib, [ The writer is Professor of Mathematics at Shiv Nadar University. ]

On March 17 of this year, the University Grants Commission released a draft curriculum for a ‘Four-Year Undergraduate Programme’, or FYUGP, a key component of the National Education Policy. The FYUGP is a thorough transformation of the old system, and so it is vital that both academia and the general public take a close look at it and make their thoughts known.

The curriculum demarcates three phases for the students’ progression. The first stage consists of three semestersand is devoted to basic courses labelled as Language, Common, Introductory and Vocational. In the Introductory portion, the student must take courses from each of Sciences, Social Sciences and Humanities. At the end of this stage, students will be allotted their Major discipline based on their grades (and not their performance in entrance tests or school).

During the second stage, in semesters four through six, students will complete their Major along with a significant portion of two Minors. At the end of the third year, the student can graduate with a plain Bachelor’s degree. Some students can stay for a fourth year, the final stage, and complete a Bachelor’s degree called Honours or Research. These students will be eligible for direct admission to PhD programmes in India.

The current three-year Honours degree consists of 148 credits, of which 108 are assigned to the Major discipline. A student completing all four years of the FYUGP will complete 160 credits, of which 48 are for the Major and another 18 for Research. What is striking is how little is gained and how much is lost.

Due to the proliferation of breadth requirements, the FYUGP students will study an extra year and yet emerge with much less knowledge of their main subject than preceding batches. One market for FYUGP is students hoping to go abroad for graduate studies, for whom it is useful to be able to show an extra year of study. However, this benefit will not accrue once foreign universities discipline has actually decreased!

From the student’s viewpoint, the new curriculum is strange indeed. The first three semesters ignore achievements in school or any predilection towards a particular discipline. Someone wishing to major in Mathematics may be rejected due to poor performance in the common demonstrate aptitude for Mathematics itself. Having stagnated or even regressed for three semesters, students will be asked to suddenly shift gears and complete the requirements for a standard Bachelor’s degree in just three semesters. This is a recipe for disaster.

Instead of justifying these curious choices, the document provides long lists of imagined benefits, with no justification. We look for a unified vision, but instead we find confusion and contradiction.

Consider the statement that while students may opt for a three-year degree, the four-year option is “a preferred option since it would allow the opportunity to experience the full range of holistic and multidisciplinary education”. However, the fourth year is only available to students whose CGPA is at least 7. 5 and this will restrict its benefits to, at best, only a quarter of the student population. The rest will complete a mutilated three-year programme shorn of its most useful parts.

I am a teacher whose career has occurred in the internet age. When students turn in an essay which is verbose and inconsistent, the most likely explanation is that they did not think through the theme and merely browsed websites with related content, finally copying the nicest-sounding parts. On exploring this possibility, I quickly discovered that a major part of the UGC document was directly copied from a webpage of the University of Michigan. I found another significant portion on a webpage of the University of Arizona.

This plagiarism has revealed the inner workings of the committees that formulate the national policies and curricula. Today, these committees are faceless. A curriculum that will completely alter our higher education ought to be designed by the best minds in the country, yet it was issued with no mention of who was responsible for it.

It has evidently been put together by a group that pooled their individual suggestions but did not try to harmonise them in a common cause. They probably delegated the actual writing of the document and did not even check whether the numbers entered in one section matched those in another.

There are various models for introducing breadth in undergraduate education. A university adopts a particular model depending on the nature of its student intake and the goals of its undergraduate programme. A committee that wishes to choose a uniform and rigid model for all institutions of our country faces an impossible task. So how do you describe your vision, when you do not have one? You copy from others.

The FYUGP draft makes many promises about vocational training, exposure to research practices, immersion in societal issues, unfettered pursuit of individual interests, and so on. However, as we have seen, this icing is only to obscure the fact that there is no cake under it.


स्किल इंडिया सफल बनाना ही उपाय है

आरबीआई ने वर्ष 2021-22 की ‘रिपोर्ट ऑन करेंसी एंड फाइनेंस’ में स्पष्ट रूप से कहा है कि कोरोना के कारण देश की अर्थव्यवस्था को जो क्षति (52.70 लाख करोड़ रु. के आउटपुट का नुकसान) हुई, उससे पूरी रिकवरी में 13 साल लगेंगे। लेकिन उबरने की कुछ सलाह भी रिपोर्ट में दी गई हैं, जिनके आधार पर सरकार को भावी ढांचागत नीतियां बनानी चाहिए। उनमें सबसे अहम् है स्किल इंडिया के माध्यम से श्रम की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए शिक्षा एवं स्वास्थ्य में सरकारी खर्च बढ़ाना। आरबीआई जानता है कि ग्रामीण भारत पर आबादी का भारी लोड है। गांव से युवाओं को अच्छी शिक्षा-स्वास्थ्य देकर उन्हें उद्योग-सापेक्ष कारीगर बनाने पर ही वे बाहर नौकरी पाएंगे या उद्यमी बनेंगे अन्यथा गांव की स्थिति बिगड़ती रहेगी क्योंकि हर पीढ़ी के साथ खेती की जमीन बंटकर और छोटी होती जाती है। लेकिन रिपोर्ट की एक अन्य सलाह थोड़ी विवादास्पद है। आरबीआई चाहता है कि ऐसे स्पष्ट कानून बनाए जाएं जिनसे उद्यमियों के लिए सस्ती जमीन बिना किसी कानूनी अड़चन के उपलब्ध हो। यहां दिक्कत है कि एमएसएमई सेक्टर के छोटे उद्यमियों को जमीन शहर के पास चाहिए जहां स्किल्ड वर्कर हों और उत्पादों का बाजार भी नजदीक हो। ऐसी जमीनें शहरों के पास के गांवों में ही मिलेंगी। लेकिन वे सस्ती कैसे होंगी? जमीन बेचने का मतलब है किसान हमेशा के लिए पुश्तैनी खेती से वंचित हो। ऐसा वह तभी कर सकता है जब मुआवजा इतना अधिक हो कि आजीविका का संकट न रहे। दूसरा, उद्योग के लिए जमीन का मतलब है खेती का रकबा कम करना। याद रहे कि पिछले किसान कानून के कृषि भू-खरीद के प्रावधानों पर किसान काफी आशंकित हुआ था।


चीन की आपदा में हमारे लिए अवसर
चेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )

भारत के किसी भी शहर के पब्लिक एरिया में बाहर निकलें- फिर वह चाहे रीटेल दुकानें हों या ट्रेन स्टेशन- ऐसा लगता है जैसे कोविड नाम की कोई चीज कभी हुई ही नहीं थी। ठीक है, कुछ लोग अब भी मास्क पहने दिख जाते हैं, अलबत्ता उनमें भी अधिकतर के मास्क नाक या मुंह के नीचे लटके रहते हैं। कहीं किसी कोने में आपको सोशल डिस्टेंसिंग या कोविड प्रोटोकॉल्स के पालन की अपील करने वाला कोई फटा-पुराना पोस्टर भी दिखलाई दे सकता है। लेकिन कुल-मिलाकर भारत के लोग अब कोविड को पीछे छोड़ चुके हैं। वे ऑफिस जा रहे हैं और शादियां अटेंड कर रहे हैं। वे शॉपिंग कर रहे हैं या बाहर जाकर कुछ खा रहे हैं। वे बस, ट्रेन, फ्लाइट पकड़ रहे हैं। मोबिलिटी डाटा को गूगल करें तो आप पाएंगे कि आज अधिकतर पब्लिक स्पेस उतने ही बिजी हो चुके हैं, जितने कि वो कोविड से पहले हुआ करते थे।

जाहिर है, कोविड अभी गया नहीं है। केस बढ़ रहे हैं, भले ही मौतों की संख्या नहीं बढ़ रही। कोविड आने वाले कल में क्या करेगा, इसका पूर्वानुमान लगाना नामुमकिन है। लेकिन अभी तो हम फिर से पहले जैसे हो गए हैं। दूसरी तरफ हमारा पड़ोसी देश चीन एक भिन्न परिस्थिति का सामना कर रहा है। वहां कोविड के मामले तेजी से बढ़े हैं और कठोर लॉकडाउन लौट आया है। चीन ने दो साल तक कोविड को अंकुश में रखा था, जबकि दुनिया उससे जूझ रही थी। लेकिन चीन की तथाकथित जीरो-कोविड पॉलिसी काम नहीं आई। ठीक उसी तरह, जैसे वह दुनिया में कहीं भी काम नहीं आई है- न्यूजीलैंड से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक। जिन देशों ने कठोरता से कोविड-नियमों का पालन किया था, उन्हें भी देर-सबेर महामारी की लहर का सामना करना पड़ा। जिन देशों को समय मिला, वे अच्छे-से तैयारी कर सके और वैक्सीनेशन कर सके, लेकिन आखिरकार यह वायरस पूरे सिस्टम से होकर गुजरा ही, इससे बचा कोई नहीं।

और अब वह चीन के सिस्टम से होकर गुजर रहा है। केसेस बढ़ेंगे और फिर घटने लगेंगे, जैसा कि दुनिया के हर कोने में हुआ है। भारत और चीन के बीच चाहे जैसे रिश्ते हों, हम तो यही कामना करेंगे कि चीन जल्द से जल्द रिकवर करे। पर अभी तो वह एक दु:स्वप्न से होकर गुजर रहा है। शंघाई जैसा महानगर- जिसकी आबादी 2.6 करोड़ है- पूर्णतया बंद है और लोग अनेक सप्ताह से घरों में कैद हैं। अनेक दूसरे शहरों की भी यही कहानी है। यह कारोबारियों के लिए भी कठिन समय है। इसने सप्लाई चेन की समस्याओं को भी उजागर कर दिया है, जो आज पूरी दुनिया के लिए बड़ा प्रश्न बन चुका है। कामगार फैक्टरियों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, उत्पादन ठप हो गया है और लोग जरूरत की चीजों के लिए तरस रहे हैं। अमेरिका में भी अनेक जरूरी आइटम्स के लिए लोगों को लम्बा इंतजार करना पड़ रहा है।

लेकिन हर समस्या अपने साथ एक अवसर भी लेकर आती है। किसी एक की समस्या किसी दूसरे के लिए उस समस्या को सुलझाने का अवसर सिद्ध हो सकती है। आज भारत के पास ग्लोबल सप्लाई चेन की समस्याओं का समाधान है। चीन अपनी दक्षता, उत्पादकता, उचित लागतों और बेहतरीन बुनियादी ढांचे के चलते दुनिया का मैन्युफेक्चरिंग-किंग बन गया था। पूरी दुनिया चीनी माल खरीदने के लिए आतुर हो गई थी। लेकिन आज चीन पर वही निर्भरता सबके लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है। अब जाकर दुनिया की कम्पनियां उस बात को सुनने के लिए तैयार हैं, जिसे हम वर्षों से कह रहे हैं- मेक इन इंडिया।

लेकिन हमें किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए। चीन का मौजूदा संकट वर्षों में एक बार निर्मित होने वाली परिस्थिति है। इसलिए भारत के पास खुद को चीन के विकल्प के रूप में पेश करने के लिए सीमित मात्रा में समय और अवसर हैं। कोविड और लॉकडाउन देर-सबेर चीन में भी खत्म होंगे। तब दुनिया चीन की मैन्युफेक्चरिंग समस्याओं को उसी तरह भूल जाएगी, जैसे आज भारत की भीड़-भरी शादियों में शामिल होने वाले अंकल्स यह भूल गए हैं कि पिछले साल कोविड ने क्या तबाही मचाई थी। जैसे ही सस्ता और टिकाऊ चीनी माल फिर से बाजार में आने लगेगा, दुनिया अपनी परिपाटी पर लौट आएगी। इसलिए निवेशकों को अपनी ओर खींचने के लिए भारत को आज ही कुछ करना होगा। पूरी दुनिया सिर खुजा रही है कि पिछले हफ्ते उन्हें जहाज भरकर जिन स्नीकर्स या इंजिन पार्ट्स की जरूरत थी, वह उन्हें कहां से मिलेंगे। कुछ करने का यही सही समय है।

भारत को अपने यहां अधिक कम्पनियों को आकर्षित करने के लिए एक मेगा-प्लान की घोषणा करनी चाहिए। ये सच है कि मैन्युफेक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए पहले ही कई योजनाओं की घोषणा की जा चुकी है। आज एप्पल भारत में उत्पादन कर रहा है। टेस्ला को मनाया जा रहा है। लेकिन यह विशिष्ट अवसर फिर नहीं मिलने वाला, जब चीन में संकट है और हम बिजनेस के लिए पूरी तरह से खुले हुए हैं। दुनिया की हर कम्पनी को भारत में मैन्युफेक्चरिंग सेटअप लगाने को प्रेरित करने के लिए हम आज क्या कर रहे हैं? क्या हम राह में आने वाली रूकावटों को साफ कर रहे हैं? क्या हमारे वरिष्ठ अधिकारीगण को इसके लिए प्रेरित किया जाता है कि वे कुछ नया करें, क्योंकि मुश्किल हालात में काम बंद कर देने के लिए तो हमारे निरीक्षक और नौकरशाह हमेशा तत्पर रहते हैं। क्या हम कुछ नौकरशाहों का मूल्यांकन इस बात के लिए नहीं कर सकते कि उन्होंने कितनी नई कम्पनियों को चालू करवाने में योगदान दिया है?


बड़ी उम्मीद जागते मुक्त व्यापार समझौते
जयंतीलाल भंडारी, ( लेखक अर्थशास्त्री हैं )

यूरोपीय देशों की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बर्लिन में कहा कि कोविड महामारी के बाद भारत तेज आर्थिक वृद्धि के साथ वैश्विक रिकवरी का महत्वपूर्ण स्तंभ बन रहा है। भारत ने हाल में संयुक्त अरब अमीरात और आस्ट्रेलिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को मूर्त रूप दिया है। अब भारत ब्रिटेन और उसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ भी एफटीए वार्ता में त्वरित प्रगति के लिए प्रतिबद्ध है। इसका मतलब है कि वैश्विक व्यापार और कारोबार के लिए भारत के दरवाजे तेजी से खुल रहे हैं। भारत और यूएई के बीच हुआ एफटीए एक मई से लागू हो गया है। इस एफटीए से भारत और यूएई के बीच वस्तुओं का कारोबार पांच साल में दोगुना बढ़ाकर सौ अरब डालर किए जाने का लक्ष्य रखा गया है, जो इस समय करीब 60 अरब डालर है। इसके साथ ही सेवाओं का व्यापार 15 अरब डालर से अधिक की ऊंचाई पर पहुंचने की उम्मीद है। इस समय यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साङोदार है और अमेरिका के बाद दूसरा बड़ा निर्यात केंद्र है।

पिछले माह भारत-आस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते पर भी एक आभासी समारोह में हस्ताक्षर किए गए। दोनों देशों के बीच इसे लेकर दस साल से बातचीत जारी थी। भारत-आस्ट्रेलिया एफटीए लागू होने के बाद आस्ट्रेलिया को भारत का करीब 96 प्रतिशत निर्यात और भारत को आस्ट्रेलिया का करीब 85 प्रतिशत निर्यात शुल्क मुक्ति के साथ किया जा सकेगा। ध्यान रहे कि पड़ोसी बांग्लादेश का आस्ट्रेलिया के साथ पहले से एफटीए है और उसे बेहद कम विकसित देश होने के कारण पांच प्रतिशत का लाभ मिलता है। यह भारत को नहीं मिलता था। अब नए समझौते से भारत को हो रहे इस नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी और भारत प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाकर आस्ट्रेलिया में निर्यात बढ़ा सकेगा। भारत ने आस्ट्रेलिया के लिए जिन वस्तुओं पर शून्य शुल्क की पेशकश की है, उनमें मुख्य रूप से कोयला, खनिज आदि शामिल हैं। भारत और आस्ट्रेलिया के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच मौजूदा द्विपक्षीय व्यापार को 27 अरब डालर से बढ़ाकर अगले पांच वर्षो में 50 अरब डालर तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। गत अप्रैल में ही ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन की दो दिवसीय भारत यात्र के मौके पर दोनों देशों के बीच विगत जनवरी माह से शुरू हुई एफटीए वार्ता की समीक्षा की गई। इस समीक्षा में दीपावली तक एफटीए के एक अंतरिम समझौते को पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है।

(यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर निकलने की प्रक्रिया) के बाद ब्रिटेन भारत के साथ औद्योगिक एवं आर्थिक रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने पर ज्यादा जोर दे रहा है और इसके लिए वह ज्यादा भारतीय पेशेवरों को ब्रिटेन में काम करने के लिए वीजा भी देने को तैयार है। 2021 के आंकड़े बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने प्रशिक्षित पेशेवरों को जितने वीजा दिए, उनमें से 40 प्रतिशत भारतीयों को दिए। भारत और ब्रिटेन के बीच एफटीए के अंतरिम समझौते से दोनों देशों के बीच व्यापार में शामिल 60-65 प्रतिशत वस्तुओं के आयात शुल्क को उदार किया जाएगा, जबकि अंतिम समझौते के बाद 90 प्रतिशत से ज्यादा सामान के लिए उदार आयात शुल्क सुनिश्चित हो जाएंगे। इससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2030 तक दोगुना होकर 100 अरब डालर पहुंच सकता है। भारत द्वारा यूएई और आस्ट्रेलिया के साथ एफटीए को मूर्त रूप दिए जाने के बाद अब यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, कनाडा, खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका और इजरायल के साथ एफटीए के लिए जारी प्रगतिपूर्ण वार्ता राहत की बात हैं। ये ऐसे देश हैं, जिनके साथ एफटीए भारत के लिए अधिक लाभप्रद है। ये देश भारत के विशेष उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने को उत्सुक हैं। इससे भारतीय वस्तुओं और सेवाओं की पहुंच दुनिया के एक बहुत बड़े बाजार तक हो सकेगी।

चीन के प्रभुत्व वाले बड़े क्षेत्रीय व्यापारिक समझौतों से जुड़ने के बजाय प्रमुख देशों के साथ एफटीए करने की भारत की नीति लाभपूर्ण दिखाई दे रही है। ज्ञातव्य है कि भारत ने अपने कारोबारी हितों के चलते नवंबर 2020 को अस्तित्व में आए दुनिया के सबसे बड़े ट्रेड समझौते रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनामिक पार्टनरशिप (आरसेप) में शामिल होना उचित नहीं समझा था। भारत ने आरसेप से दूरी बनाने के बाद एफटीए की डगर पर आगे बढ़ने की जो नीति अपनाई, उसके अच्छे नतीजे सामने आते दिख रहे हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि हाल के वषों में विश्व व्यापार संगठन के तहत विश्व व्यापार वार्ताओं में जितनी उलझनें खड़ी हुई हैं, उतनी ही तेजी से विभिन्न देशों के बीच एफटीए बढ़ते गए हैं। एफटीए असल में ऐसे समझौते हैं, जिनमें दो या दो से ज्यादा देश वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात-निर्यात पर सीमा शुल्क, नियामक कानून, सब्सिडी और कोटा आदि संबंधी प्रविधानों में एक-दूसरे को तरजीह देने पर सहमत होते हैं। भारत ने ऐसे ही लाभ हासिल करने के लिए एफटीए की तरफ तेजी से कदम बढ़ाए हैं।

एफटीए देश के वैश्विक व्यापार को बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे और इससे चालू वित्त वर्ष 2022-23 में वस्तु निर्यात करीब 500 अरब डालर और सेवा निर्यात करीब 300 अरब डालर की रिकार्ड ऊंचाई पर दिखाई दे सकेंगे। एफटीए भारत को पांच लाख करोड़ डालर की इकोनामी बनाने के लक्ष्य को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यही कारण है कि आर्थिक नीति प्रतिष्ठान इन समझौतों पर गंभीरता से आगे बढ़ रहा है।


जरूरी सुधार

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने आखिरकार सामने आ रही आर्थिक हकीकत के साथ संतुलन कायम करने का निर्णय लिया है। मौद्रिक नीति समिति ने अपनी नियमित बैठकों से इतर एक बैठक में बुधवार को फैसला किया कि नीतिगत रीपो दर में तत्काल प्रभाव से 40 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जाएगी। उसने स्थायी जमा सुविधा और सीमांत स्थायी सुविधा दरों को भी इसी अनुरूप समायोजित किया। आरबीआई ने नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में 50 आधार अंकों का इजाफा किया जो 21 मई से प्रभावी होगा। अब यह दर 4.5 प्रतिशत हो गई है। दरें तय करने वाली इस समिति ने अप्रैल की बैठक में नीतिगत दरों को अपरिवर्तित रहने दिया था, हालांकि आरबीआई ने नकदी समायोजन सुविधा को सामान्य करने के लिए स्थायी जमा सुविधा पेश कर दी थी। एक अनियमित बैठक में नीतिगत कदम उठाने की बुनियादी वजह है मुद्रास्फीति का असहज करने वाले स्तर तक पहुंचना।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर मार्च में बढ़कर 6.95 प्रतिशत हो गई। अप्रैल के आंकड़े अगले सप्ताह जारी किए जाएंगे लेकिन अनुमान है कि ये और अधिक होंगे। ऐसी कई वजह हैं जिनके चलते मुद्रास्फीति ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है। कच्चा तेल तथा अन्य जिंसों की कीमतें ऊंची हैं। इससे मुद्रास्फीति और अधिक हो सकती है। वैश्विक खाद्य कीमतों में भी अहम इजाफा हुआ है जिसके पीछे आंशिक रूप से रूस-यूक्रेन सैन्य संघर्ष भी एक वजह है। खाद्यान्न के मामले में भारत अपेक्षाकृत सहज स्तर पर है लेकिन वैश्विक स्तर पर ऊंची खाद्यान्न कीमतें जरूर असर डालेंगी। उदाहरण के लिए खाद्य तेलों की ऊंची कीमतें, महत्त्वपूर्ण चुनौती होंगी। इसके अलावा दुनिया के कुछ हिस्सों, खासकर चीन में कोविड के मामलों में इजाफा होने के कारण आपूर्ति शृंखला की चुनौतियां भी कीमतों को प्रभावित कर रही हैं। इस संदर्भ में ही आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने अपने वक्तव्य में उचित ही कहा है, ‘इस बात का जोखिम है कि अगर मुद्रास्फीति लंबे समय तक इस ऊंचे स्तर पर बनी रहती है तो, यह मुद्रास्फीति से जुड़ी अपेक्षाओं को बेपटरी कर सकता है जो अपने आप में वृद्धि और वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।’

हालांकि तथ्य यह है कि ये सारी बातें अप्रैल में समिति की बैठक के समय ही स्पष्ट थीं। सवाल यह है कि उस वक्त समिति को किस बात ने रोका। वास्तव में केंद्रीय बैंक समायोजन हटाने में पीछे रह गया। यह सही है कि यूक्रेन युद्ध के कारण मूल्य जोखिम बढ़ा है लेकिन आरबीआई मुद्रास्फीति को काफी समय से कम करके आंक रहा था। बीते 24 महीनों की औसत मुद्रास्फीति की दर 5.8 फीसदी रही। अप्रैल में यह अनुमान लगाया गया था कि मुद्रास्फीति की दर लगातार तीन तिमाहियों में तय दायरे से ऊंची रह सकती है जो कानून के मुताबिक मुद्रास्फीति संबंधी लक्ष्य हासिल करने में विफलता मानी जाएगी। ऐसे में नीतिगत कदम को गलती में सुधार के रूप में देखा जा सकता है। व्यवस्था में नकदी की स्थिति बहुत बढ़ी हुई है और सीआरआर में इजाफा इसे आंशिक रूप से ही हल करेगा। यद्यपि नीतिगत सामान्यीकरण अपेक्षाकृत तेज गति से होगा।

यदि आरबीआई ने मुद्रास्फीति के दबाव पर निरंतर ध्यान दिया होता और वृद्धि के समर्थन और मूल्य स्थिरता में जरूरी संतुलन कायम करने पर ध्यान दिया होता तो उसे यूं आपातकालीन ढंग से मूल्य में इजाफा न करना पड़ता। विकसित देशों के केंद्रीय बैंक भी नीतिगत समायोजन को शिथिल कर सकते हैं। इस संदर्भ में भी भारत लंबे समय तक अलग-थलग नहीं रह सकता था क्योंकि ऐसा करने पर पूंजी प्रवाह और मुद्रा बाजार का कामकाज प्रभावित होगा। ऐसे में नीतिगत कदम का स्वागत किया जाना चाहिए, हालांकि अनियमित बैठक और आपातकालीन ढंग से दरों में इजाफा करने से बचा जा सकता था। यह व्यवस्था की दृष्टि से बेहतर नहीं दिखता।


देश के सूक्ष्म वित्त संस्थानों के समक्ष बड़ी चुनौतियां
तमाल बंद्योपाध्याय

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वर्ष 2011 में बचत बैंक खातों पर ब्याज दरों को विनियंत्रित कर दिया था। इसके बाद कुछ निजी बैंकों ने ग्राहकों को आकर्षित करने में पूरी ताकत झोंक दी थी। अब करीब एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद जब बैंङ्क्षकग नियामक ने पिछले महीने सूक्ष्म ऋण के लिए उधारी दर विनियंत्रित करने का निर्णय लिया तो सूक्ष्म वित्त संस्थानों (एमएफआई) ने पहले दिन से ही अपनी ब्याज दरें बढ़ानी शुरू कर दीं। बैंकों के मामले में उपभोक्ताओं को लाभ हुआ तो दूसरी तरफ बैंकों ने भी एक अवधि के दौरान बचत जमा के रूप में काफी रकम एकत्र कर ली। सूक्ष्म ऋण के मामलों में उपभोक्ताओं को नुकसान हुआ क्योंकि उनके लिए ब्याज का बोझ बढ़ गया।

कोविड-19 महामारी के बाद कुछ बैंकों ने अपनी ब्याज आय बढ़ाने के लिए ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। अधिक आय प्राप्त होने से वे फंसे ऋण के लिए अधिक मात्रा में प्रावधान कर पाएंगे। दूसरी तरफ कुछ सूक्ष्म वित्त संस्थानों में फंसे ऋण का अनुपात उनके ऋण खातों का 20 प्रतिशत हिस्से से अधिक हो गया है।

मार्च मध्य में आरबीआई ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए जो अप्रैल से लागू हो गए हैं। नए दिशानिर्देशों के तहत सूक्ष्म वित्त संस्थानों को ब्याज दरें तय करने का अधिकार तो मिल गया मगर उन्हें निदेशकमंडल द्वारा स्वीकृत पारदर्शी नीति का पालन करना होगा। ग्राहकों के पिछले रिकॉर्ड एवं उनकी जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर वे अलग-अलग ब्याज दर तय कर सकते हैं। नए दिशानिर्देशों में सूक्ष्म कर्जदार की भी परिभाषा तय की गई है। सालाना 3 लाख रुपये आय वाले परिवारों को उनकी आधी कमाई के अनुपात में सूक्ष्म ऋण दिया जा सकता है। एनबीएफसी-एमएफआई के लिए असुरक्षित ऋण की हिस्सेदारी उनकी ऋण सूची (पोर्टफोलियो) का 85 प्रतिशत से कम कर 75 प्रतिशत कर दी गई है।

ज्यादातर लोगों को ब्याज दरें नीचे आने की उम्मीद थी। खासकर, जिन बैंकों को पूंजी जुटाने में अधिक लागत नहीं आती है उनके बारे में लग रहा था कि वे ब्याज दरें घटाएंगे। एमएफआई के मुकाबले बैंकों को रकम जुटाने में लगभग आधी लागत आती है। बैंक इस आधार पर ऊंची ब्याज दरों को वाजिब ठहरा सकते हैं कि सूक्ष्म ऋण असुरक्षित समझे जाते हैं। अधिकांश छोटे ग्राहकों के लिए ऋण पर लगने वाले ब्याज की तुलना में ऋण की उपलब्धता अधिक मायने रखती है। ऊंची ब्याज दर वसूलने के बाद भी बैंक ग्राहकों के लिए रकम के अन्य स्रोतों की तुलना में अधिक सहज होते हैं। बैंकों को ब्याज दरें कम करने में थोड़ा समय लगेगा। इस बीच सूक्ष्म ग्राहकों के समक्ष थोड़ी असहज स्थिति पैदा हो गई है। कुछ सूक्ष्म वित्त संस्थानों की वेबसाइटों पर ब्याज दरों में बहुत अंतर दिख रहा है। पहली बार कर्ज लेने वाले को शुरू में मौजूदा ग्राहकों की तुलना में दोगुना ब्याज का भुगतान करना पड़ सकता है।

सूक्ष्म ऋण की ब्याज दर तय करने में बीमा खर्च शामिल करने से भी उलझन बढ़ रही है। ज्यादातर सूक्ष्म ऋण बीमित होते हैं। बीमा प्रीमियम शामिल होने की वजह से ब्याज दरें अधिक होंगी मगर प्रीमियम बैंकों के पास नहीं जाते हैं। कर्जदाता संस्थानों को इस पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करनी चाहिए मगर इतना तो तय है कि ब्याज दरें तय करने के लिए बीमा प्रीमियम शामिल करना ब्याज दर संरचना को बिगाड़ सकती है। नए दिशानिर्देशों के परिणाम देखने के लिए हमें एक से दो वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है। सूक्ष्म ऋणों के जिला स्तर से लेकर छोटी जगहों तक पहुंचने में भी इतना समय लग सकता है। समय बीतने के साथ ही कुछ नई चुनौतियां भी सामने आएंगी। उदाहरण के लिए सूक्ष्म उधारी के लिए दशकों पुराना संयुक्त उत्तदायित्व समूह या जेएलटी प्रारूप धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। इसकी वजह यह है कि समूह के सभी सदस्यों की साख एक जैसी नहीं होती है। लिहाजा जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग ब्याज दर का भुगतान करना होगा। मगर समूह आधारित उधारी अब लंबे समय तक टिकती नजर नहीं आ रही है।

कर्जदाता संस्थान अब कर्जदाता के कर्ज-पूंजी अनुपात पर ध्यान देंगे क्योंकि सालाना 3 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवार उतना ऋण पा सकेंगे जितना वे अपनी आधी कमाई से भुगतान कर पाएंगे। इस आधार पर अगर कोई परिवार 12,500 रुपये मासिक किस्त चुकाने में सक्षम है तो उसे 2.45 से 3.45 लाख रुपये के बीच ऋण मिल सकता है। ऐसे ऋण पर ब्याज दर 18-20 प्रतिशत और इसकी परिपक्वता अवधि दो से तीन वर्षों के बीच रह सकती है। यह गणना सरल जरूर लगती है मगर इसका क्रियान्वयन उतना आसान बिल्कुल नहीं है। उदाहरण के लिए जिस परिवार ने कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं-बीज, उर्वरक, कीटनाशक आदि-खरीदने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत ऋण लिया है वह हरेक महीने इस ऋण का भुगतान नहीं करता है। ऐसे परिवार द्वारा मासिक ब्याज भुगतान की गणना कैसे हो पाएगी?

किसी परिवार की सालाना आय की गणना किस आधार पर होगी? कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में बाल मजदूरी खूब दिख जाती है। चाय दुकानों पर रोजाना 100-100 रुपये कमाने वाले किशोर लड़कों की आय उनकी पारिवारिक आय में जोड़ी जा सकती है। इसी तरह विवाह के बाद किसी स्कूल में पढ़ाने वाली महिला शिक्षिका का वेतन उसके माता-पिता और उसके पति के परिवार दोनों में गिना जा रहा है। यह दोहरी गणना कैसे रोकी जा सकती है? आने वाले वर्षों में नए उत्पाद, प्रक्रिया एवं डिजिटलीकरण के पहलू सामने आएंगे और ब्याज दरें कम हो जाएंगी। सूक्ष्म वित्त उद्योग में भी बदलाव आएगा क्योंकि कुछ छोटे सूक्ष्म वित्त संस्थानों पर बंद होने या बड़े संस्थानों में विलय का दबाव बढ़ रहा है। सूक्ष्म वित्त संस्थानों की पहुंच बढ़ेगी और ग्राहकों को कम ब्याज दरों का लाभ मिलेगा। इससे 3 लाख रुपये सालाना आय का प्रावधान समाप्त हो जाएगा और ऐसे परिवार नियमित ग्राहक बन जाएंगे। इसके साथ ही सूक्ष्म वित्त खंड में नए ग्राहक जुड़ते जाएंगे।


विश्वयुद्ध के नये दौर में नेतृत्व करे भारत
नितिन देसाई

अमेरिकी इतिहासकार बारबरा टचमैन ने एक पुस्तक लिखी थी, मार्च ऑफ फॉली: फ्रॉम ट्रॉय टु वियतनाम। अब अगर इस पुस्तक को अद्यतन किया जाए तो निश्चित रूप से इसमें रूस और अमेरिका की अफगानिस्तान में नाकामी, पश्चिम एशिया में दोनों देशों के हस्तक्षेप और यूक्रेन में मौजूदा रूसी आक्रमण को शामिल करना होगा। अमेरिका ने जो मूर्खताएं कीं उन्होंने उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था को उस कदर प्रभावित नहीं किया जितना कि यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने रूस को किया है। रूस के महाशक्ति होने का आधार केवल आर्थिक या पारंपरिक सैन्य शक्ति भर नहीं है बल्कि उसका परमाणु हथियार भंडार इसकी वजह है। आशा की जानी चाहिए कि वह यूक्रेन में इसका इस्तेमाल नहीं करेगा।

अहम पारंपरिक सैन्य क्षमता की मदद से प्रभावित देश के घरेलू प्रतिरोध को समाप्त नहीं किया जा सकता है। रूस को अफगानिस्तान में अपने अनुभव से यह बात जान लेनी चाहिए थी। अब यूक्रेन में उन्हें इसका अंदाजा हो रहा है। यूक्रेन में रूस अनुमान के मुताबिक ही सैन्य क्षमता इस्तेमाल कर रहा है। हो सकता है रूस कुछ मोर्चों पर जीत जाए और यूक्रेन का कुछ भूभाग हासिल कर ले। परंतु समूचे यूक्रेन पर कब्जा कर लेने के बाद भी वह यह जंग नहीं जीत पाएगा। वह सैन्य जीत की घोषणा कर सकता है लेकिन स्थानीय प्रतिरोध, कड़े प्रतिबंध तथा पश्चिम की नजर में उसका अछूत राज्य होना बना रहेगा। यूरोप के साथ उसका आर्थिक संपर्क टूट जाएगा जो उसकी आर्थिक स्थिरता के लिए अहम है। वह चीन के साथ गठजोड़ में अधीनस्थ भूमिका में आ जाएगा।

ऐसे में अगले कुछ वर्षों में वैश्विक भूराजनीति के हालात कैसे रह सकते हैं?

पहला आशावादी लेकिन कम संभावना वाला नतीजा यह हो सकता है कि रूस और यूरोप के बीच रिश्ते सुधरें। हालांकि यह तभी संभव लगता है जब वर्तमान घटनाक्रम के चलते व्लादीमिर पुतिन सत्ता से हट जाएं। इसकी एक दूसरी वजह बन सकती है रूसी तेल और गैस पर रूस की निर्भरता तथा यूरोपीय बाजारों पर पहुंच के लिए रूस की निर्भरता। इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है क्योंकि यूरोप रूस से ईंधन आयात कर रहा है और इससे संबंधित भुगतान करने वाले बैंकों को सावधानीपूर्वक प्रतिबंधों से अलग रखा गया है। बहरहाल, ऐसे नतीजों की संभावना कम है क्योंकि रूस और पुतिन की छवि बेहद खराब हो चुकी है।

ज्यादा संभावना इस बात की है कि चीन और अमेरिका-नाटो के बीच एक नया शीतयुद्ध शुरू हो जाए और रूस चीन का कनिष्ठ सहयोगी बने। यह सिलसिला कितना लंबा चलेगा और वैश्विक भूराजनीति तथा विश्व अर्थव्यवस्था के लिए कितना नुकसानदेह होगा यह दो बातें पर निर्भर करेगा। पहला, रूस शायद चीन का कनिष्ठ सहयोगी होना स्वीकार न कर पाए क्योंकि वह महाशक्ति रहा है। दूसरा, नये शीतयुद्ध का तनाव इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन को ज्यादा महत्त्वपूर्ण क्या लगता है: उसका भूराजनीतिक दावा और दक्षिण चीन सागर तथा ताइवान में उसकी महत्त्वाकांक्षा या पश्चिम के साथ उसका आर्थिक तकनीकी और निवेश संबंध।

फिलहाल ऐसा लगता है कि चीन, ताइवान तथा दक्षिण चीन सागर में शक्ति प्रदर्शन नहीं करेगा क्योंकि उस स्थिति में उसकी अर्थव्यवस्था पर भी पश्चिमी प्रतिबंध लग सकते हैं। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के देशों पर निर्भरता तथा विकसित देशों के निवेश की आवश्यकता भी उसे पश्चिमी देशों का कट्टर शत्रु बनने से रोकेगी। एशियाई देशों के साथ भी उसके व्यापारिक और वित्तीय रिश्ते हैं।

तीसरी और सबसे क्षीण संभावना यह है कि यूक्रेन के प्रतिरोध और उसे पश्चिम के समर्थन के चलते कहीं रूस युद्ध को तेज न कर दे और परमाणु या नाभिकीय हमला न कर दे। यदि यह जंग नाटो के सीमावर्ती सदस्य देशों तक फैली तो पूरे यूरोप में युद्ध छिड़ सकता है। आगे चलकर यह विश्वयुद्ध में बदल सकता है जिसमें अमेरिका और चीन सीधे शामिल हो सकते हैं।

एक नतीजा ऐसा भी हो सकता है जो दीर्घावधि में गहरे असर वाला हो। वह है जर्मनी और जापान का सैन्य शक्ति के रूप में उदय जहां वे अपने सैन्य व्यय में इजाफा कर सकते हैं। उनकी आर्थिक और तकनीकी क्षमताओं को देखते हुए इसका यूरोप और पूर्वी एशिया के शक्ति संतुलन पर गहरा असर होगा।

भारत अमेरिका-नाटो और रूस-चीन के भूराजनीतिक तनाव के बीच फंसा हुआ है। रक्षा मामलों में उसकी निर्भरता भूराजनीतिक चयन के मामले में एक बड़ी बाधा है। परंतु अब तक उसने सही कदम उठाए हैं। अब उसे मध्यम से दीर्घ अवधि की एक नीति की आवश्यकता है ताकि वह नए शीतयुद्ध की स्थिति से निपट सके। इस रणनीति का सबसे अहम घटक होना चाहिए महाशक्तियों पर रक्षा निर्भरता कम करना। इसमें समय लगेगा और रूस और पश्चिम पर निर्भरता में बेहतर संतुलन कायम करने के लिए अंतरिम व्यवस्था करनी होगी। हाल के वर्षों में ऐसा हुआ भी है। इसके साथ ही घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी।

देश के स्तर पर इस रणनीति के अलावा भारत को वैश्विक गठजोड़ पर विचार करना चाहिए जो उभरते भूराजनीतिक विवाद में दोनों विरोधियों के बीच प्रतिरोधक का काम करें। संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस को मानवाधिकार परिषद से निकालने को लेकर हुए मतदान से शुरुआत कर सकते हैं। जिन 58 देशों ने किसी का पक्ष लिए बिना अनुपस्थित रहने का विकल्प चुना उनमें भारत के अलावा दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशिया के लगभग सभी देश, पश्चिम एशिया के अधिकांश देश और अहम अफ्रीकी देश तथा लैटिन अमेरिका के ब्राजील तथा मैक्सिको जैसे देश शामिल थे। जो देश अनुपस्थित थे वे क्रय मूल्य समता के मुताबिक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 25 फीसदी के हिस्सेदार हैं जबकि वैश्विक आबादी में उनकी हिस्सेदारी 50 फीसदी है। यानी पुराने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की तुलना में वे अधिक प्रभावी हैं।

ऐसे में आगे चलकर भारत ऐसी तीसरी शक्ति का नेतृत्व संभाल सकता है, जिसमें मतदान में अनुपस्थित रहे अन्य देश शामिल हों। यह तीसरी शक्ति सैन्य, कूटनीतिक तथा आर्थिक विवादों से दूर रहेगी और विवादों के वैश्विक प्रसार में प्रतिरोधक का काम करेगी। ऐसे में यूरोप में छिड़ी लड़ाइयों को तीसरा विश्वयुद्ध बनने से रोकने में मदद मिलेगी।

अगले कुछ वर्ष या शायद अगला दशक भूराजनीतिक दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं दिखता। बड़े देशों की अर्थव्यवस्थाओं के नजरिये से भी यह ठीक नहीं दिख रहा है। अगर यह लड़ाई लंबी चली तो क्या होगा? यह भी एक प्रश्न है। हमें वर्तमान घटनाक्रम जैसी और परिस्थितियां देखने को मिलेंगी, हमारी नीति इनसे दूर रहने तथा रणनीतिक संपर्क कायम करने की होनी चाहिए।