04-2-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक

Date:04-02-22

Winter is here
The games in China have taken on political significance, domestically and globally
Editorial

On the eve of the opening of the Winter Olympics in Beijing on Friday, India announced a diplomatic boycott of the games. The MEA said no Indian official will be present at the opening or closing ceremonies of the games, which run from February 4 to 20. The decision for an official boycott of the games — a lone Indian athlete who qualified, skier Arif Khan, will still take part in both the games and in the opening ceremony along with support staff — followed China’s move this week to choose a PLA commander as one of the participants of the traditional torch relay. The commander was involved in the June 15, 2020 clash in Galwan Valley. He was subsequently given military honours by Beijing. The MEA said the commander’s participation in the torch relay was “regrettable”. Until this week, New Delhi was considering having its top diplomat in Beijing attend the games. Only in November, India joined Russia in expressing support for the games, following a meeting of the Foreign Ministers of Russia, India and China. If India, dealing with its own long list of problems with China and a continuing stand-off along the Line of Actual Control, had initially planned to not involve itself in the politics surrounding the games, Beijing’s torch relay changed that calculus. The broader context of the selection of the PLA commander is an on-going campaign by China to publicise Galwan and highlight the “bravery” of PLA troops.

India’s statement of support for the games in November had come amid the U.S. and its allies announcing a diplomatic boycott because of rights violations in Xinjiang, where minority Uighurs have been sent to “reeducation” camps. China first denied the existence of the camps, but later said they were for “vocational training”. China denounced the diplomatic boycott by around a dozen countries — which India has now joined albeit for different reasons — as “politicising” the games. It is another matter that Olympic Games, through history, have been inherently political events. For host nations, holding a successful games carries the promise of burnishing the legitimacy of the government of the day. The games within China have certainly taken on particular political significance domestically, in the context of the country’s battle against COVID-19. Last month, President Xi Jinping noted that the 2022 Olympics would be “the first international multi-sport event to be held as scheduled since the outbreak of the COVID-19 pandemic”. The underlying message is that the successful holding of the games amid the pandemic is another example of the superiority of the Chinese political model, which has been highlighted as a sharp contrast especially with how the U.S. handled the pandemic. Last year, the IOA added the word “together” to the official Olympic motto of “faster, higher, stronger”. If that is certainly a laudable aspiration, it is clear that as far as the Olympics are concerned, the politics is never far away. That will certainly be the case in Beijing as the latest games, both on and off the ski slopes, begin.

Date:04-02-22

चीन को सख्त संदेश
संपादकीय

भारत ने चीन में आयोजित शीतकालीन ओलिंपिक का राजनयिक स्तर पर बहिष्कार करने का फैसला करके बिल्कुल सही किया। यद्यपि प्रारंभ में भारत ऐसे किसी फैसले को लेकर दुविधा में था, लेकिन जब चीन ने गलवन में हुए सैन्य संघर्ष में घायल अपने कमांडर को शीतकालीन ओलिंपिक समारोह का मशाल वाहक बनाने का निर्णय किया, तब फिर भारत के लिए उसे उसी की भाषा में जवाब देना आवश्यक हो गया था। चीन की यह ओछी हरकत न केवल भारत की दुखती रग पर हाथ रखने, बल्कि खेल भावना का निरादर करने वाली भी थी। अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को संकीर्ण कूटनीति से परे रखने की परंपरा है, लेकिन चीन ने उसका सम्मान करने के बजाय धृष्टता दिखाई। आज का भारत चीन की दादागीरी को स्वीकार करने को तैयार नहीं और न हो सकता है। चीन ने शीतकालीन ओलिंपिक को राजनीतिक रंग देने की जो भद्दी कोशिश की, उसके जवाब में भारत ने केवल इस खेल आयोजन का राजनयिक स्तर पर बहिष्कार करने का ही कदम नहीं उठाया, बल्कि यह भी तय किया कि दूरदर्शन इन खेलों के उद्घाटन एवं समापन समारोह का प्रसारण नहीं करेगा। खेल भावना के सर्वथा विपरीत जाकर मनमानी करने वाले चीन को ऐसा सख्त संदेश देना आवश्यक था।

यह अच्छा हुआ कि भारत ने यह स्पष्ट करने में कोई संकोच नहीं किया कि ताली दोनों हाथ से बजती है। यदि चीनी नेतृत्व भारत के मामले में संवेदनशीलता का परिचय देने से इन्कार करता है तो फिर भारतीय नेतृत्व के लिए भी यह जरूरी हो जाता है कि वह न तो उसके हितों की परवाह करे और न ही साख की। कोरोना के कारण पहले से ही दुनिया भर में बदनाम चीन ने भारत को चिढ़ाने वाली हरकत करके एक तरह से अपनी फजीहत का ही इंतजाम किया। ज्ञात हो कि अमेरिका के साथ यूरोप के कई देश पहले ही यह तय कर चुके हैं कि वे बीजिंग में होने जा रहे शीतकालीन ओलिंपिक का राजनयिक स्तर पर बहिष्कार करेंगे। हैरानी नहीं कि मोदी सरकार के फैसले के बाद कुछ और देश भारत की राह पर चलें। इसकी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि राहुल गांधी को अमेरिका ने यह कहकर आईना दिखा दिया कि वह उनके इस दावे का समर्थन नहीं करता कि भारत सरकार की नीतियों के कारण चीन और पाकिस्तान निकट आ रहे हैं।

 

Date:04-02-22

अब कार्रवाई का वक्त
संपादकीय

सोशल मीडिया अब भारत में खुलकर रंग दिखाने लगा है। इसकी हरकतों से सरकार भी परेशान हो उठी है। तमाम कोशिशों के बाद इन पर जितना भी नियंत्रण लग पाया है, उसे आंशिक ही कहा जा सकता है। आजिज आकर भारत सरकार ने अमेरिकी टेक कंपनियों को अपने प्लेटफार्म से फेक न्यूज न हटाने पर कड़ी फटकार लगाई है। फेक न्यूज और अन्य मुद्दों को लेकर केंद्र के अफसरों और अमेरिकी टेक कंपनियों गूगल, ट्विटर, और फेसबुक के प्रतिनिधियों के बीत सोमवार को हुई वचरुअल बैठक में कई बार माहौल गरम हो गया। अफसरों ने इन कंपनियों के प्रतिनिधियों को कई बार फटकारा। नाराजगी इस बात पर थी कि इन मंचों से खबरों के नाम पर हो रहा फर्जीवाड़ा तुरंत रोकने के कोई इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। कंपनियां फेक न्यूज हटाने के उपायों को लेकर कोई तत्परता नहीं दिखा रही हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों के इस पर टेक कंनियों की कड़ी आलोचना की। सोशल मीडिया को प्लेटफार्म उपलब्ध कर रही इन कंपनियों की निष्क्रियता के कारण भारत सरकार को सामग्री हटाने का आदेश देना पड़ता है। इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में संशय का माहौल बनता है और कई मंचों से अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने के आरोप लगते हैं। लगभग ढीठ हो चुकी इन कंपनियों के प्रतिनिधियों ने अपनी सफाई में साफ कह दिया कि वे पूरे नियम-कायदों के साथ काम करती हैं। हालांकि टेक कंपनियों को कोई अंतिम चेतावनी नहीं दी गई है, लेकिन यह सच है कि अमेरिकी टेक कंपनियों के साथ भारतीय अधिकारियों की इतनी तनावपूर्ण बैठक इससे पहले कभी नहीं हुई। भारत सरकार लगातार इन कंपनियों को काबू में लाने का प्रयास कर रही है और कामकाज के नियम कायदों को सख्त कर रही है। भारत सरकार चाहती है कि इन मंचों से परोसी जा रही सामग्री पर ये कंपनियां खुद नजर रखें और फेक न्यूज पर काबू पाने के उपाय करें। बैठक में भारतीय मीडिया प्लेटफार्मो के नुमाइंदे भी मौजूद थे। हालांकि बैठक को लेकर किसी ने भी कोई बयान जारी नहीं किया है, लेकिन ये कंपनियां लगातार दावा करती हैं कि वे नियमों के तहत चलती हैं, जो कि वास्तविकता से कोसों दूर है। समय आ गया है कि इन टेक प्लेटफार्मो पर बात न मानने पर सख्त कार्रवाई की जाए।

 

Date:04-02-22

दागी उम्मीदवार बनाम स्वच्छ चुनाव
एस वाई कुरैशी, ( पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त )

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की शुचिता और स्वच्छता पर खतरा लगातार गहराता जा रहा है। बेशक, कभी सार्वजनिक जीवन में बेदाग लोगों की वकालत की जाती थी, लेकिन अब यह आम धारणा है कि राजनेता और अपराधी एक-दूसरे के पर्याय हो चले हैं। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ यानी एडीआर की रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है। एडीआर की ताजा अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, 10 फरवरी को उत्तर प्रदेश की जिन 58 विधानसभा सीटों पर मत डाले जाएंगे, वहां से कुल 623 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इसमें से 615 उम्मीदवारों के बारे में एडीआर को सूचनाएं मिली हैं। इन 615 प्रत्याशियों में से 156, यानी करीब 25 फीसदी उम्मीदवार दागी हैं। 121 पर तो गंभीर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, जिनमें दोषसिद्ध होने पर पांच साल या इससे भी अधिक की सजा वाले गैर-जमानती जुर्म शामिल हैं। जैसे, हत्या-अपहरण-बलात्कार आदि।

विडंबना यह है कि हरेक सियासी पार्टी राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जाहिर करती है और इसे रोकने के दावे करती है, लेकिन जब चुनाव में टिकट बांटने का वक्त आता है, तब दागी छवि वाले प्रत्याशियों पर भरोसा किया जाता है। यही वजह है कि चुनाव-दर-चुनाव ऐसे सांसदों-विधायकों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिन पर आपराधिक मामले चल रहे होते हैं। उत्तर प्रदेश में ही 2017 के विधानसभा चुनाव में जीतकर आए 402 विधायकों में से 143 (36 प्रतिशत) ने अपने चुनावी हलफनामे में खुद के ऊपर आपराधिक मामले चलने की बात कही, जबकि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना करने वाले विधायकों की संख्या 107 थी, यानी विधानसभा सदस्यों का 26 प्रतिशत। 2012 की राज्य विधानसभा में ये आंकड़े क्रमश: 47 प्रतिशत (189 विधायक दागी छवि वाले) और 24 प्रतिशत (98 विधायक गंभीर मामलों में आरोपी) थे।

यह महज एक राज्य का मसला नहीं है। एडीआर की ही रिपोर्ट बताती है कि संसद के निचले सदन में दागी छवि वाले सांसदों की मौजूदगी हर चुनाव में बढ़ रही है। मौजूदा लोकसभा के लिए 2019 में जीतने वाले 539 सांसदों में से 233, यानी 43 प्रतिशत सदस्यों ने खुद पर आपराधिक मामले होने की जानकारी दी है, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में 542 विजेताओं में से 185 दागी चुनकर आए थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत (543 सांसदों में से 162) था। यानी, 2009 से 2019 तक आपराधिक छवि वाले सदस्यों की लोकसभा में मौजूदगी 44 फीसदी बढ़ गई थी। इसी तरह, गंभीर आपराधिक मामलों में मुकदमों का सामना करने वाले सांसदों की संख्या 2009 में 76, 2014 में 112 और 2019 में 159 थी, यानी 2009 से 2019 तक इसमें 109 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।

चूंकि चुनाव-दर-चुनाव आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों की जीत का ग्राफ ऊपर चढ़ रहा है, इसलिए राजनीतिक दल भी मानो अब यह मान चले हैं कि दागी छवि जीत की गारंटी है। वैसे भी, चुनावों में हर हाल में जीत हासिल करना ही राजनीतिक पार्टियों का मकसद होता है। इसके लिए वे हर वह तरीका अपनाने को तैयार रहते हैं, जिनसे उनकी मौजदूगी सदन में हो।

कुछ जन-प्रतिनिधि यह तर्क देते हैं कि राजनीति से प्रेरित मुकदमे उनके ऊपर लादे गए हैं। यह कुछ हद तक सही भी है। मगर चुनाव आयोग और अदालत, दोनों का यह मानना रहा है कि जिन उम्मीदवारों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, उनको तो चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए। चुनाव आयोग ने तो इसके लिए तीन मापदंड बनाए हैं- मुकदमा अगर साल भर से ज्यादा पुराना हो, उम्मीदवार पर पांच साल या उससे अधिक वर्ष की सजा वाले अपराध के आरोप हों और तीसरा, निचली अदालत में चार्जशीट पेश कर दी गई हो और कोर्ट ने उसे स्वीकार कर लिया हो। आयोग का मानना है कि इस तरह के उम्मीदवारों को चुनाव में टिकट नहीं मिलने चाहिए। मगर मुश्किल यह है कि राजनीतिक दल इन सिफारिशों को अपनाने को तैयार नहीं दिखते।

दागी छवि वाले एक और तर्क गढ़ते हैं कि कानूनन जब तक दोष साबित न हो जाए, वे निर्दोष हैं। मैं इसका जवाब एक अन्य सवाल से देता हूं। प्रश्न यह है कि हिन्दुस्तान की जेलों में चार से सवा चार लाख कैदी बंद हैं, जिनमें से 2.71 लाख के करीब विचाराधीन हैं। अदालत में उन पर मामले चल रहे हैं और वे अभी तक दोषी साबित नहीं हुए हैं, यानी निर्दोष हैं। ऐसे ‘निर्दोष’ लोगों के हमने कई मूल अधिकार छीन रखे हैं, जैसे कोई भी जीविकोपार्जन या व्यवसाय करने की आजादी का अधिकार, स्वतंत्र आवाजाही का अधिकार, सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार आदि। उनको तो मत देने का भी अधिकार नहीं होता। जब कानूनी दायरे में इन 2.71 लाख विचाराधीन कैदियों के कई अधिकार छीन लिए गए हैं, तब दागी छवि वाले उम्मीदवारों को कुछ दिनों तक चुनाव लड़ने से रोक देने में भला क्या दिक्कत है? वैसे भी, चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। अगर हम इनको कथित निर्दोष होने के आधार पर चुनाव लड़ने की छूट दे सकते हैं, तो इसी तर्क पर विचाराधीन कैदियों को रिहा क्यों नहीं कर सकते? उनसे उनके मौलिक अधिकार हम क्यों छीन रहे हैं?

राजनीति में अपराधीकरण को रोकने का एक उपाय नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) भी है। यह भारतीय मतदाताओं को मिला ऐसा अधिकार है, जिसके जरिये वे दागी उम्मीदवारों को आईना दिखा सकते हैं। जब चुनाव में नोटा में ज्यादा वोट आएं, तो चुनाव रद्द करके वहां दोबारा चुनाव कराने पड़ेंगे। इससे राजनीतिक दलों को भी यह एहसास होगा कि वे चुनावी समर में जिन उम्मीदवारों पर दांव लगा रहे हैं, मतदाता उनको पसंद नहीं करते। इससे वे आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों से दूरी बना सकते हैं। नोटा के दायरे में ही ‘नकारने का अधिकार’ लाया जाना चाहिए। जाहिर है, इसके लिए जन-जागरूकता की सख्त जरूरत है।

आदर्श स्थिति तो यही है कि राजनीतिक दल दागी प्रत्याशियों को टिकट ही नहीं दें। मगर कटु सच्चाई यही है कि विधायी सदनों में दागी सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। तो क्या जनता भी ऐसे उम्मीदवारों को पसंद करती है? फिलहाल इसका जवाब ठीक-ठीक नहीं दिया जा सकता, लेकिन एशियाई देशों को छोड़ दें, तो राजनीति में अपराधीकरण की प्रवृत्ति शायद ही कहीं और देखने को मिलती है।

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