02-08-2019

| August 3rd, 2019

शासन व्यवस्था

सर्वोच्च न्यायालय में बढ़ेगी न्यायाधीशों की संख्या

चर्चा में क्यों?

लगातार बढ़ते मुकदमों की संख्या और उनके बोझ को देखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ाने का निर्णय लिया है।

प्रमुख बिंदु :

  • वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की कुल संख्या 31 (मुख्य न्यायाधीश सहित) है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल के निर्णय के बाद बढ़ाकर 34 (मुख्य न्यायाधीश सहित) कर दिया जाएगा।

क्यों लिया गया निर्णय?

  • वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 59,331 मामले लंबित हैं ।
  • मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India-CJI) रंजन गोगोई के अनुसार, भारत में न्यायाधीशों की कमी के कारण कई महत्त्वपूर्ण मामलों का फैसला करने के लिये उचित संवैधानिक पीठों की संख्या भी पूरी नहीं हो पा रही है।
  • न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ाने के लिये CJI ने भारतीय प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था जिसके बाद सरकार ने यह निर्णय लिया है।

न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का इतिहास :

  • वर्ष 1950 में स्थापना के समय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या कुल संख्या 8 थी, परन्तु बाद में वर्ष 1956 में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के माध्यम से इसे 10 कर दिया गया।
  • तब से भारत में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के तहत ही निर्धारित की जाती है।
  • इस संख्या को सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 1960 के तहत बढ़ाकर 13 कर दिया गया था।
  • इसके बाद वर्ष 1977 में एक अन्य संशोधन के द्वारा यह संख्या 17 कर दी गई और बाद में वर्ष 1986 में इसे 25 कर दिया गया।
  • अंत में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2009 के माध्यम से इस संख्या को बढ़ाकर 25 से 30 किया गया था, जिसे अब पुनः बढ़ाया जा रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय

  • सर्वोच्च न्यायालय भारतीय न्याय व्यवस्था के शीर्ष पर है।
  • इसके गठन, न्याय-क्षेत्र, शक्तियों और स्वतंत्रता आदि का वर्णन संविधान के भाग 5 (अनुच्छेद 124 से 147) में किया गया है।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हेतु अर्हताएँ :
    • वह भारत का नागरिक होना चाहिये।
    • कम-से-कम 5 वर्ष तक उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पद पर कार्य कर चुका हो।
    • उच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय में कम-से-कम 10 वर्षों तक अधिवक्ता (Advocate) के रूप में कार्य कर चुका हो।

स्रोत: द हिंदू


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

INF मिसाइल संधि

चर्चा में क्यों ?

संयुक्त राज्य अमेरिका ने आधिकारिक रूप से शीत युद्ध के दौरान की गई इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस (Intermediate-Range Nuclear Forces-INF) संधि से हटने की घोषणा की है।

INF मिसाइल संधि क्या है?

  • यह संधि अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव के बीच वर्ष 1987 में शीतयुद्ध के दौरान पारंपरिक और परमाणु दोनों प्रकार की मध्यम दूरी की मिसाइलों की शक्तियों को सीमित करने के लिये हुई थी।
  • इस संधि से हटने के लिये 6 महीने पहले सम्मिलित पक्षों को जानकारी देना अनिवार्य था, इसीलिये अमेरिका ने 1 फरवरी, 2019 से ही संधि से हटने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
  • इसके तहत 500 से 5500 किमी. रेंज की सभी प्रकार की बैलेस्टिक और क्रूज़ मिसाइल के विकास, उत्पादन और तैनाती पर प्रतिबंध लगाए गए थे।
  • यह संधि अमेरिका और रूस के बीच एक द्विपक्षीय समझौता था, यह किसी भी अन्य परमाणु संपन्न देशों पर कोई प्रतिबंध नही लगाती है।
  • अमेरिका ने रूस पर संधि के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया, जबकि रूस ने इस प्रकार के आरोपों को निराधार बताया ।
  • नाटो ने अमेरिका के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि रूस की 9M729 मिसाइल ने INF समझौते का उल्लंघन किया है।
  • INF समझौते के तहत 500 से 5500 किमी. की दूरी तक की मिसाइलों को समाप्त करने का वादा किया गया था। इस संधि से यूरोप में रूसी SS-20 मिसाइलों और अमेरिका के M26 पर्शिंग टैंकों की तैनाती पर रोक लगाई गई थी।

रूस की RSD-10 पायनियर मिसाइलों को यूरोप में SS-20 मिसाइल कहा जाता था। रूस के द्वारा इनका प्रयोग शीतयुद्ध के दौरान किया गया था। वही अमेरिका के M26 पर्शिंग टैंकों का प्रयोग द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी पर आक्रमण के लिये किया गया था।

अमेरिका के संधि से हटने के प्रभाव

  • एशिया में चीन के बढ़ते सैन्य वर्चस्व का मुकाबला अमेरिका हथियारों के आधुनिकीकरण के माध्यम से करने में सक्षम होगा क्योंकि चीन के पास इन्वेंट्री इंटरमीडिएट रेंज मिसाइल की क्षमता है। अमेरिका द्वारा इस प्रकार की क्षमता विकसित करने में INF संधि बाधा बन रही थी।
  • इस तरह के कदम से दक्षिण चीन सागर में चीन का मुकाबला करने में अमेरिका को मदद मिलेगी, विशेष रूप से जहाँँ चीन की सेना ने कई विवादित द्वीपों को अपने नियंत्रण में ले लिया है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूरोप में नई परमाणु-सशस्त्र मिसाइलों को तैनात नहीं करने का वादा किया है। लेकिन इसने पारंपरिक हथियारों की तैनाती पर ऐसा कोई वादा नहीं किया है।
  • अमेरिका अब अपने और अपने सहयोगियों द्वारा नियंत्रित प्रशांत तथा अन्य क्षेत्रों के द्वीपों पर मध्यम दूरी के पारंपरिक हथियारों को तैनात कर सकेगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस संधि से अमेरिका के हटने के कदम को अत्यंत विनाशकारी कहा है, क्योंकि अब परमाणु हथियारों और बैलिस्टिक मिसाइलों की वैश्विक होड़ बढ़ जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप परमाणु निशस्त्रीकरण के लक्ष्यों को भी प्राप्त करना आसान नहीं होगा।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड

चर्चा में क्यों?

भारत के घरेलू बाज़ार को महत्त्वपूर्ण खनिजों की सप्‍लाई सुनिश्चित करने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र के तीन केंद्रीय प्रतिष्‍ठान- राष्‍ट्रीय एल्‍यूमि‍नियम कम्‍पनी लिमिटेड (NALCO), हिन्‍दुस्‍तान कॉपर लिमिटेड (HCL) तथा मिनरल एक्‍सप्लोरेशन कम्‍पनी लिमिटेड (MECL) की भागीदारी से खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (Khanij Bidesh India Ltd.-KABIL) की स्थापना की जाएगी।

‘KABIL’ के कार्य

  • ‘KABIL’ वाणिज्यिक उपयोग और घरेलू आवश्‍यकताओं के लिये विदेशों में महत्त्वपूर्ण खनिजों की पहचान, अधिग्रहण, खोज, विकास, खनन और प्रसंस्करण का कार्य करेगी।
  • यह नई कम्‍पनी ऑस्‍ट्रेलिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका जैसे खनिज सम्‍पन्‍न देशों के साथ साझेदारी बनाने का भी कार्य करेगी, जिससे नए आर्थिक अवसर पैदा होंगे।

‘KABIL’ की स्थापना के लाभ

  • इसकी सहायता से भारत के घरेलू बाजार में महत्त्वपूर्ण खनिजों की सप्‍लाई सुनिश्चित की जा सकेगी।
  • यह खनिजों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करेगी।
  • इसके अतिरिक्त यह आयात विकल्‍प के समग्र उद्देश्यों की पूर्ति में भी सहायक होगी।

‘KABIL’ की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य

  • भारत में परिवहन और विनिर्माण के लिए खनिज और धातु सामग्रियों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है और इसकी पूर्ति के लिये निरंतर स्रोत आवश्‍यक हैं।
  • संयुक्त राष्‍ट्र जलवायु परिवर्तन सम्‍मेलन, पेरिस, 2015 में ग्रीन हाउस गैस उत्‍सर्जन कम करने और परिवहन के हरित उपाय अपनाने के बारे में भारत की वचनबद्धता है और इसी के तहत इलेक्‍ट्रिक वाहन मोबिलिटी पर अधिक बल दिया जा रहा है।
  • इसके अतिरिक्त विमानन, रक्षा तथा अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भी कम भार की और उच्‍च मैकेनिकल शक्ति के खनिजों की आवश्‍यकता होती है।

NALCO, HCL तथा MECLके बीच इक्विटी भागीदारी 40:30:30 अनुपात में होगी।

स्रोत: पीआईबी


शासन व्यवस्था

सभी जल विवाद समाधानों के लिये एक स्थायी ट्रिब्यूनल का प्रस्ताव

चर्चा में क्यों?

लोकसभा ने एक ऐसे स्थायी न्यायाधिकरण (Tribunal) का गठन करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है, जो पानी के बँटवारे से संबंधित सभी अंतर्राज्यीय विवादों की सुनवाई करेगा।

  • इस प्रस्ताव के तहत अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 में संशोधन किया जाएगा, जिसमें जल संबंधी विवाद उत्पन्न होने पर हर बार एक अलग अस्थायी ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाती है।
  • कानून का रूप लेने के बाद यह विधेयक नए स्थायी ट्रिब्यूनल में सभी पुराने मामलों के हस्तांतरण को भी सुनिश्चित करेगा और वर्तमान में सभी अस्थायी ट्रिब्यूनल समाप्त हो जाएंगे।

इस परिवर्तन की आवश्यकता क्यों है?

  • इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य अंतर्राज्यीय जल विवादों की निपटान प्रक्रिया को अधिक कुशल और प्रभावी बनाना है, क्योंकि अब तक 1956 के अधिनियम के तहत कुल 9 ट्रिब्यूनल गठित किये जा चुके हैं, जिनमें से मात्र 4 ही अब तक किसी नतीजे पर पहुँचे हैं।
  • वर्ष 1990 में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के जल विवाद का निपटारा करने के लिये एक ऐसे ही ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी। इस ट्रिब्यूनल को अपना अंतिम निर्णय देने में तकरीबन 17 वर्ष लगे थे और इस विवाद को सुलझाने में कुल 28 वर्ष लगे थे।
  • इसके अलावा रावी और ब्यास नदी के जल विवाद में ट्रिब्यूनल की स्थापना अप्रैल 1986 में की गई थी और अभी तक उसका अंतिम निर्णय नहीं आया है।
  • अभी तक किसी भी ट्रिब्यूनल ने अपने विवाद को सुलझाने में जो समय लिया है वह न्यूनतम 7 वर्ष है।

क्या-क्या परिवर्तन किये जाएंगे?

  • राज्यों से संबंधित जल विवाद के लिये एक स्थायी ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाएगी।
  • वर्तमान में कार्य कर रहे सभी अस्थायी ट्रिब्यूनलों को समाप्त कर दिया जाएगा और उनके मुकदमे स्थायी ट्रिब्यूनल को हस्तांतरित कर दिये जाएंगे।
  • संशोधन में इस बात की व्यवस्था की गई है कि सभी विवादों को अधिकतम साढ़े चार वर्ष में सुलझा लिया जाए।
  • वर्तमान पाँच ट्रिब्यूनलों को एक साथ स्थायी ट्रिब्यूनल में मिलाने से कर्मचारियों की संख्या में लगभग 25 प्रतिशत की कमी होगी तथा इससे 4.27 करोड़ की बचत का भी अनुमान है।

कैसे काम करेगा नया ट्रिब्यूनल?

  • मौजूदा व्यवस्था में जब राज्य जल संबंधी कोई विवाद उठाते हैं तो केंद्र सरकार उस विवाद को सुलझाने के लिये एक अस्थायी ट्रिब्यूनल का गठन कर देती है।
  • वर्तमान नियमों के अनुसार, केंद्र द्वारा गठित किसी भी ट्रिब्यूनल को अपना अंतिम निर्णय 3 वर्षों में देना होता है और इस अवधि को अतिरिक्त 2 वर्षों के लिये बढ़ाया जा सकता है, परन्तु यदि व्यवहार में देखें तो लगभग सभी ट्रिब्यूनलों ने अपने निर्णय देने में काफी अधिक समय लगाया है।
  • नई व्यवस्था के तहत यदि कोई भी राज्य जल संबंधी कोई विवाद उठता है तो केंद्र सरकार सर्वप्रथम उसके लिये एक विवाद समाधान समिति (Disputes Resolution Committee-DRC) का गठन करेगी।

केंद्र द्वारा जो DRC गठित की जाएगी उसकी अध्यक्षता एक ऐसा व्यक्ति करेगा जिसके पास जल क्षेत्र में काम करने का अनुभव होगा और जो सेवारत या सेवानिवृत्त सचिव रैंक का अधिकारी होगा। इसके अतिरिक्त इसमें कुछ अन्य विशेषज्ञ और संबंधित राज्य के प्रतिनिधि भी होंगे।

  • केंद्र द्वारा गठित DRC एक साल के भीतर बातचीत के माध्यम से विवाद को हल करने का प्रयास करेगी। इस अवधि को अधिकतम 6 महीनों तक बढ़ाया जा सकेगा।
  • यदि DRC विवाद को सुलझाने में असफल रहती है तो उस विवाद को स्थायी ट्रिब्यूनल को हस्तांतरित कर दिया जाएगा।
  • इस ट्रिब्यूनल में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और अधिकतम 6 सदस्य (तीन न्यायिक सदस्य और तीन विशेषज्ञ सदस्य) होंगे।
  • ट्रिब्यूनल में विवाद आने पर अध्यक्ष तीन सदस्यीय पीठ का गठन करेगा और वह पीठ जाँच करने से पूर्व DRC की रिपोर्ट पर विचार करेगी।
  • उस पीठ को अपना अंतिम फैसला 2 वर्ष के भीतर देना होगा, जिसे एक और वर्ष के लिये बढ़ाया जा सकेगा।
  • ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के समान होगा और उसके विरुद्ध अपील करने का भी कोई प्रावधान नहीं होगा।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

इज़राइल से सीखा जा सकता है नवाचार

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जारी वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत को 130 देशों में 52वाँ स्थान प्राप्त हुआ।

प्रमुख बिंदु:

  • भारत ने लगातार 9वें वर्ष मध्य और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में शीर्ष स्थान हासिल किया।
  • भारत का इस सूचकांक में वर्ष 2015 में 81वाँ रैंक था। इसके बाद सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की अपेक्षा तेज़ी से वृद्धि करते हुए उसने वर्ष 2018 में 52वाँँ स्थान प्राप्त किया।

इज़राइल में नवाचार की स्थिति

  • इस वर्ष रैंकिंग में स्विट्जरलैंड प्रथम स्थान पर रहा, वही इज़राइल ने ड्रिप सिंचाई, USB ड्राइव, साइबर सुरक्षा और अनुकूलित कृषि (Precision Farming) इत्यादि क्षेत्रों में बढ़िया काम करते हुए उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया क्षेत्र के किसी भी देश में से पहली बार शीर्ष 10 की सूची में स्थान प्राप्त किया।
  • अलग देश के रूप में इज़राइल का जन्म वर्ष 1948 में भारत की स्वतंत्रता के आस-पास ही हुआ। ऐसे में कम जनसंख्या के कारण छोटा घरेलू बाज़ार, पड़ोसी देशों से शत्रुता और प्राकृतिक संसाधनों का अभाव जैसी चुनौतियों के बीच यह उपलब्धि हासिल करना बेहद प्रशंसनीय है।
  • इज़राइल के नीति-निर्माताओं ने मानव बौद्धिक पूँँजी में निवेश और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था के लिये प्रौद्योगिकी आधारित उद्योगों पर ध्यान दिया और प्राकृतिक संसाधनों पर अपनी निर्भरता कम कर दी। ऐसे उत्पाद तैयार किये गए जिसे विश्व में कहीं भी निर्यात किया जा सकता है।
  • आज इज़राइल अपने सकल घरेलू उत्पाद का 7% शिक्षा और 4.2% अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है। इज़राइल में 45% से अधिक वयस्क तृतीयक शिक्षा पूरी करते हैं।
  • इज़राइल विश्वविद्यालय, आज अमेरिका में पेटेंट आवेदनों में शीर्ष पर हैं। इज़राइल के कॉलेजों में फेसबुक, गूगल, ऐप्पल, HP और माइक्रोसॉफ्ट जैसे 250 से अधिक वैश्विक कंपनियों ने अनुसंधान और विकास लैब खोल रखी हैं।
  • इज़राइल के पास विश्व के किसी भी देश की तुलना में प्रति व्यक्ति उच्च प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स की संख्या सबसे अधिक है तथा इसके कुल निर्यात में 45% उच्च प्रौद्योगिकी उत्पाद शामिल होते हैं। सिलिकॉन वैली के बाद तेल अवीव दूसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इको-सिस्टम है।
  • इज़राइल का योज़मा वेंचर फंडिंग प्लान (Yozma Venture Funding Plan) और तकनीकी इनक्यूबेटर प्रोग्राम (Technological Incubator Programme) जैसे कार्यक्रम विश्व के अन्य देशों के लिये एक प्रकार के केस स्टडी का कार्य करते हैं।
  • इज़राइल ने लवणीय जल का विलवणीकरण कर स्वयं को सबसे शुष्क देश से अधिशेष जल वाले देश के रूप में बदला तथा साथ ही ड्रिप सिंचाई और अनुकूलित कृषि के माध्यम से रेगिस्तान को भी जैतून और खजूर की कृषि के अनुकूल कर लिया।
  • इज़राइल ने दुश्मनों से घिरे होने और लगातार आतंकवाद से लड़ने के लिये रक्षा के क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीकों में भारी निवेश किया है।
  • विश्व की सबसे बड़ी साइबर सुरक्षा कंपनी चेक पॉइंट (Check Point) इज़राइल में स्थित है। वास्तव में वैश्विक साइबर सुरक्षा बाज़ार का 10% हिस्सा इज़राइल के नियंत्रण में है।

नवाचारों में भारत की स्थिति

  • भारत में खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, जल और राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियाँ मौजूद हैं, साथ ही देश में स्थिरता को मज़बूत करना और स्वास्थ्य सेवा में भी काफी सुधार की ज़रूरत है। इन सब के लिये भारत के पास पर्याप्त धन का अभाव है।
  • भारत में अनुसंधान और विकास में GDP का मात्र 0.7% खर्च किया जा रहा है तथा इस निवेश का बहुत कम हिस्सा विश्वविद्यालयों में जाता है, क्योंकि सार्वजनिक अनुसंधान और विकास का एक बड़ा हिस्सा अंतरिक्ष, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में चला जाता है। भारत के विपरीत चीन ने अनुसंधान और विकास पर खर्च वर्ष 2006 में GDP के 1.3% से बढ़ाकर वर्ष 2018 में 2.18% कर दिया है।

भारत को अपने स्वदेशी नवाचार में कम लागत/कीमत पर लोगों को उत्पाद और सेवाएँ उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। भारत की चुनौतियों का समाधान होने के बाद स्वदेशी उद्यमियों के लिये वैश्विक अवसर उपलब्ध हो जाएंगे। इज़राइल ने ठीक ऐसा ही किया है।

स्रोत: द हिंदू (बिज़नेस लाइन)


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

जापान में मानव अंग विकसित करने की अनुमति

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में जापान सरकार ने अपने वैज्ञानिकों को जानवरों में मानव अंगों को विकसित करने की विवादस्पद तकनीक को विकसित करने की अनुमति दी है।

प्रमुख बिंदु 

  • जापान और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्त्ता मानव स्टेम सेल की मदद से जीवित जानवरों के भीतर इंसान के अंगों को विकसित करने की प्रक्रिया में हैं।
  • शोधकर्ताओं ने कहा कि इस प्रकार के प्रयासों के सफल होने के बाद भविष्य में प्रत्यारोपण के लिये मानव अंगों को जानवरों के अंदर विकसित जा सकेगा।
  • इस अत्याधुनिक किंतु विवादास्पद अनुसंधान में ह्यूमन इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम (Induced Pluripotent Stem- IPS) कोशिकाओं के साथ संशोधित पशु भ्रूण का प्रत्यारोपण शामिल है, जिसे शरीर के किसी भी अंग के बिल्डिंग ब्लॉक्स के निर्माण में इस्तेमाल किया जा सकेगा।

विवादास्पद प्रयोग

  • विश्व के कई देशों में इस प्रकार के प्रयोगों पर प्रतिबंध लगाए गए है, लेकिन जापान सरकार के इस निर्णय के बाद यह मुद्दा पुन: चर्चा में आ गया है। जापान सरकार की अनुमति के बाद अब जीवित जानवरों के भीतर मानव अंग विकसित किये जाएंगे। इस प्रकार के प्रयोग सफल होने पर इसे चूहे के बाद सुअर जैसे बड़े स्तनधारी जानवरों पर भी आज़माया जाएगा।
  • हालाँकि अभी इस वैज्ञानिक इस बात को लेकर आशस्वत नहीं हैं कि इस तकनीक से तैयार किये गए अंग मानव के इस्तेमाल लायक होंगे भी या नहीं। इस विषय में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं ऐसा न हो ऐसे अनुप्रयोगों से जानवरों का मस्तिष्क मानव की भाँति विकसित न हो जाए, यदि ऐसा होता है तो यह मानव के अस्तित्व के लिये खतरा उत्पन्न कर सकता है।
  • नीतिगत मुद्दे
  • इससे पहले भी जापानी शोधकर्त्ता हिरोमित्शु नाकाउची द्वारा यह प्रयोग किया गया, लेकिन मानव और जानवर की कोशिका से तैयार होने वाला भ्रूण अस्तित्व में नहीं आ सका। इससे पूर्व के जापान सरकार के निर्णय में इस प्रकार विकसित भ्रूण को दो सप्ताह के भीतर खत्म करने की बात की गई थी। वर्तमान नीति में परिवर्तन करने हुए मानव और जानवर की कोशिका से बने भ्रूण को 14 दिन से अधिक (परिपक्व होने तक) रखा जा सकेगा।

अन्य देशों की बात करें तो

  • यदि इस संबंध में अन्य देशों की बात करें तो ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा और फ्राँस में जानवरों के भ्रूण में मानव कोशिकाओं को प्रत्यारोपित करने की अनुमति नहीं है।
आई.पी.एस. कोशिकाएँ 

(Induced Pluripotent Stem-IPS) Cells

  • आई.पी.एस. सेल प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल होते हैं, अर्थात् ये मानव शरीर में कोई भी कोशिका बनाने में सक्षम होते हैं तथा एक एम्ब्रियोनिक स्टेम सेल (Embryonic Stem Cell) की भाँति व्यवहार करती हैं।
  • ये वयस्क सेल की पुन: प्रोग्रामिंग द्वारा उत्पन्न होती हैं।
  • स्टेम सेल में प्रारंभिक जीवन और विकास के दौरान शरीर में कई अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं के रूप में विकसित होने की उल्लेखनीय क्षमता होती है।
  • जब एक स्टेम सेल विभाजित होता है, तो प्रत्येक नए सेल में या तो स्टेम सेल के रूप में बने रहने अथवा कुछ विशिष्ट गुणों (माँसपेशी सेल, लाल रक्त कोशिका अथवा सेल या फिर मस्तिष्क सेल) के साथ अन्य नए सेल के रूप में विकसित होने की संभावना होती है।
  • आई.पी.एस. सेल स्वयं नवीनीकरण करने में सक्षम होते हैं तथा अतिरिक्त प्लेसेंटा जैसे भ्रूण ऊतकों में कोशिकाओं को छोड़कर शरीर के सभी सेल प्रकारों में अंतर कर सकते हैं।
  • यह चिकित्सकीय उद्देश्यों के लिये आवश्यक किसी भी प्रकार की मानव कोशिका के असीमित स्रोत के विकास को सक्षम बनाता है।

जानवरों के अंगों का मानवों में प्रत्यारोपण संभव

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में क्रिसिल का पूर्वानुमान

चर्चा में क्यों?

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (Crisil) ने वित्तीय वर्ष चालू वित्त वर्ष के लिये भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विकास दर के अनुमान में 20 आधार अंकों की कमी है। क्रिसिल द्वारा भारत की GDP विकास दर के 6.9 फीसदी रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है।

प्रमुख बिंदु

  • GDP के पूर्वानुमान में यह कटौती कमज़ोर मानसून, धीमी वैश्विक वृद्धि और हाई फ्रीक्वेंसी डेटा (High-Frequency Data) की खराब गुणवत्ता के कारण की गई है।
  • क्रिसिल के पूर्वानुमान के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की प्रथम तिमाही (अप्रैल-जून) में मंदी के प्रभाव अधिक स्पष्ट परिलक्षित होंगे जबकि दूसरी छमाही में अपेक्षित मौद्रिक छूट (Monetary Easing), उपभोग में वृद्धि और सांख्यिकीय आधार प्रभाव में कमी (Statistical Low-Base Effect) के कारण अर्थव्यवस्था में सुधार होने का अनुमान है।
    • इसके अनुसार कॉर्पोरेट क्षेत्र की वृद्धि दर में धीमापन आने का (8%) तक कम होने का अनुमान है जो पिछले दो वर्षों की तुलना में कम है। इसके अनुसार कॉर्पोरेट लाभ (Corporate Profits) में वृद्धि होने जबकि राजस्व वृद्धि में कमी का अनुमान है।
  • क्रिसिल जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2016-17 में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 8.2 प्रतिशत की शानदार वृद्धि की थी।
  • रिपोर्ट के अनुसार बैंकिंग क्षेत्र के NPA में वित्तीय वर्ष 2019-2020 के अंत तक 8% तक की कमी आने का अनुमान है जिसका आधार पुनर्प्राप्तियों में वृद्धि और अतिरिक्त NPA में कमी होना है। क्रेडिट वृद्धि दर के 14% तक रहने की उम्मीद है जो पिछले पाँच वर्षों में सबसे अधिक है।
  • इसके अनुसार पूंजी निवेश सामान्यतः मध्यमावधि में सार्वजनिक व्यय (सरकार और सार्वजनिक उद्यमों द्वारा व्यय) द्वारा संचालित किया जाएगा जबकि समग्र निवेश में निजी निवेश की हिस्सेदारी में कमी रहने की उम्मीद है।

भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार

  • गौरतलब है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी जून माह में वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिये आर्थिक वृद्धि के अनुमान को 7.2 प्रतिशत से घटाकर सात प्रतिशत कर दिया था। घरेलू गतिविधियों में सुस्ती और वैश्विक व्यापार युद्ध को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने यह कदम उठाया था।
  • इससे पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (CSO) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2018-19 में भारत की GDP वृद्धि पाँच साल के न्यूनतम स्तर पर रही और जनवरी-मार्च तिमाही में यह 5.8 प्रतिशत तक पहुँच गई थी।
हाई फ्रीक्वेंसी डेटा

  • हाई फ्रीक्वेंसी डेटा अत्यंत शुद्ध पैमाने पर एकत्रित समयबद्ध डेटा को संदर्भित करता है।
  • हाल के दशकों में उन्नत कम्प्यूटेशनल तकनीक के परिणामस्वरूप इस डेटा को विश्लेषण के लिये एक कुशल दर पर सटीक रूप से एकत्र किया जा सकता है।
  • इस डेटा का प्रयोग वित्तीय विश्लेषण और बाज़ार के व्यवहार को समझने में किया जाता है।

स्रोत: द हिंदू


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