News Clipping on 07-07-2018

07-07-2018 (Important News Clippings)

07-07-2018 (Important News Clippings)


Morality’s Hostages

Gambling is better above ground than under

TOI Editorials

The Law Commission of India’s recommendation to legalise betting on sports and gambling, since bans have only succeeded in driving these habits into flourishing underground businesses, should be accepted by government. Moralistic positions on gambling and betting have clashed with personal choice for millennia but translating them into bans has only engendered criminalisation and corruption. If brought into the formal economy and regulated properly, these could become income earners for the government and boost tourism.

When criminalised, they become avenues for criminal rackets to take over, black money to proliferate, innocents falling victim to fraud and a temptation for law enforcers to make a fast buck. Kerala’s government, a perpetually revenue deficit one, which burned its fingers experimenting with a liquor ban recently, earned nearly Rs 10,000 crore from lottery sales in 2017-18, over a decade after banning all lotteries in 2005. The revenues from legalised gambling could even be used to fund social goods like Modicare and fighting climate change.

As for concerns about the impact of legalised betting on sports, especially on sportspersons, past instances of match fixing reveal that tackling malpractices really depends on effective investigating agencies. If betting on horse racing is permissible as a game of skill, it beats reason why other sports are treated differently. Bans in the guise of eliminating vice are a hallmark of paternalistic states. Mature democracies, in contrast, trust adult citizens with responsible exercise of rights. State governments must display more confidence in people and their potential. States could look at best practices in jurisdictions where gambling tourism is legal and is a money spinner. The recognition that tourism contributes significantly to the country’s GDP should spur measures that help the sector grow further.


DNA Evidence Fine, Protect Data Privacy

ET Editorials

The government decision to move ahead with the DNA Technology (Use and Application) Regulation Bill, 2018, is a welcome measure that will strengthen the criminal justice system. In the making for the last 15 years, the Bill will, by establishing regulatory institutions and standards for DNA testing, be an important step to bring India’s criminal justice system up to date.

DNA profiling has proved to be an invaluable and basic tool in exonerating innocents and identifying missing persons, besides solving crimes such as murder, rape, human trafficking, theft and burglary. Figures from the National Crime Records Bureau suggest that more than three lakh such crimes take place every year in the country. However, the conviction rate is about 30%. Expanding the use of DNA testing will improve conviction rates, and speed up justice delivery. At the same time, concerns about misuse and invasion of privacy need to be addressed. Therefore, the language of the Bill specifying whose DNA picked up from a crime scene would be stored should be more specific as to exclude all other than the eventual convicts, the data on suspects who are cleared being removed from storage. Under the Bill, the DNA profiling board would advise the central and state governments on issues related to DNA laboratories, and make recommendations on ethical and human rights, including privacy, issues related to DNA testing. The data protection law in the making should override the advice of this body.

Of course, DNA profiling would help only if the police maintain the integrity of crime scenes by disallowing contamination. That calls for greater training and behavioural change. The success of any advance in investigative technique depends on how it is wielded. Investigators must keep up with their tools.


कठिन समस्या से निपटने के क्रम में साहसी प्रयोग

तेलंगाना में कृषि कार्य में लगे लोगों का औसत देश के औसत से अधिक है। राज्य सरकार ने किसानों के लिए दो रोचक योजनाएं पेश की हैं।

नीलकंठ मिश्रा

दशकों तक कृषि उपज की बढ़ी हुई कीमतों के रूप में देश के अमीरों (प्राय: गैर कृषि क्षेत्र के) से गरीबों (अक्सरखेती से जुड़े) की ओर आय का स्थानांतरण होता रहा। इसकी कमियां भी हैं: उच्च मुद्रास्फीति, राजकोषीय चुनौतियां, उच्च ब्याज दर और समय-समय पर मौद्रिक कमजोरी। परंतु सरकारी नियंत्रण वाली कोई अन्य ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था थी ही नहीं जिसके तहत अमीरों द्वारा चुकाए जा रहे कर को गरीबों तक स्थानांतरित किया जा सके। बीते कुछ वर्षों में तमाम खाद्य श्रेणियों में कीमतें कम हुई हैं। इस दौरान आय में होने वाला स्थानांतरण रुक गया है। खासतौर पर फसलों की खेती के क्षेत्र में जबकि इस क्षेत्र में कृषि श्रमिकों का 92 फीसदी हिस्सा निर्भर है। यह एक राजनीतिक समस्या भी है क्योंकि देश की श्रम शक्ति का आधा हिस्सा खेती करता है। यह आर्थिक नीति के क्षेत्र में भी बड़ी चुनौती है क्योंकि कम आय गरीबों में खपत को कम करती है जबकि अमीरों के लिए व्यय से बची आय केवल बचत बढ़ाती है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने अब तक इस समस्या से निपटने के लिए किसानों की कर्ज माफी और ढेर सारी सब्सिडी का रास्ता अपनाया है। इसमें उर्वरक, बिजली, बीज और मशीन खरीद पर दी जाने वाली सब्सिडी शामिल है। इसमें कर्ज माफी की निगरानी करनी मुश्किल है जबकि सब्सिडी का आकार ऐसा नहीं कि इससे कुछ खास लाभ हासिल हो। तेलंगाना में कृषि कार्य में लगे लोगों का औसत देश के औसत से अधिक है और वहां कपास और तिलहन जैसी उपज का रकबा भी ज्यादा है। इन जिंसों की वैश्विक कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। बीते चार सालों में राज्य सरकार ने ऋण माफी और सब्सिडी का तयशुदा मार्ग अपनाया। इसके अलावा बड़ी सिंचाई परियोजनाएं लाई गईं और गोदाम भंडारण क्षमता में इजाफा किया गया। अब अगले चुनाव में एक वर्ष बचा है और सरकार ने दो रोचक योजनाएं पेश की हैं।

पहली योजना है किसानों के सामूहिक जीवन बीमा की योजना। इसके तहत 40 लाख किसानों को 5 लाख रुपये का जीवन बीमा उपलब्ध कराया जाएगा। अगर किसी भी वजह से उनकी मौत होती है तो उन्हें यह राशि दी जाएगी। इस योजना की 9 अरब रुपये की प्रीमियम राशि का बोझ सरकार वहन करेगी। दूसरी और ज्यादा महत्त्वाकांक्षी योजना है रैयतु बंधु योजना। यह कृषि निवेश समर्थन योजना है। इस वर्ष मई के मध्य में यानी खरीफ की बुआई शुरू होने के एक महीना पहले राज्य सरकार ने करीब 60 लाख किसानों को 4,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से चेक वितरित किए। इस वर्ष के अंत में रबी के मौसम में भी इसे दोहराया जाएगा। माना जा रहा है कि इसमें कुल 120 अरब रुपये का खर्च आएगा जो राज्य के सालाना उत्पादन का 1.5 फीसदी और सरकारी व्यय का 7 फीसदी होगा। इसके चलते अन्य सब्सिडी या हस्तांतरण में कोई कटौती नहीं की जाएगी।

यह सार्वभौमिक आधारभूत आय नहीं है। इस मामले में खेत मालिक को पैसा मिलेगा, भले ही वह फसल बोए या नहीं। यह भी जरूरी नहीं कि इस रकम का इस्तेमाल खेती में ही हो। सरकार के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया है ताकि निचले स्तर पर किसी तरह की लीकेज न हो। चूंकि दोनों योजनाओं के लिए भूस्वामित्व ही शर्त है इसलिए राज्य के राजस्व विभाग ने 100 दिन का मिशन शुरू किया ताकि कंप्यूटरीकृत भू रिकॉर्ड का साफ सुथरा डेटाबेस तैयार किया जा सके। कई स्तरों पर जांच की व्यवस्था की गई जिसमें हर गांव में जन सुनवाई की व्यवस्था शामिल थी। भू प्रशासन के मुख्य आयुक्त के मुताबिक 90 प्रतिशत से अधिक भू अधिकारों पर कोई विवाद नहीं है और उनके मामले में स्थानांतरण किया जा रहा है। प्रत्येक को आधार से जोड़ा गया है।

लीकेज पर तो रोक लगी है लेकिन तीन बातें हैं जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। पहली बात, इससे केवल भूस्वामियों को लाभ होता है। परंतु वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक तेलंगाना के 91 लाख कृषि श्रमिकों में से दो तिहाई भूमिहीन थे। कम कीमत और बढ़ती लागत का बोझ ज्यादातर किसानों पर पड़ा लेकिन भूमिहीन श्रमिक अधिक गरीब होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनताना बढऩे की गति भी धीमी पड़ी। दूसरा, इससे भाड़े पर खेती करने वालों को फायदा नहीं होता। परिचालन की दृष्टिï से भी देखें तो इसे समझा जा सकता है क्योंकि राज्य सरकार के पास इसके आंकड़े ही नहीं हैं।

बहरहाल, कमजोर कृषि आय का दबाव किसानों पर होता है, न कि भू स्वामी पर क्योंकि वह तो कहीं और भी हो सकता है। तीसरा, 91 फीसदी किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है लेकिन उनके पास कुल मिलाकर राज्य की समस्त भूमि का दो तिहाई हिस्सा है। यानी केवल 9 फीसदी भूस्वामी 40 अरब रुपये पाते हैं। राजकोषीय घाटे के सीमा में रहने की उम्मीद है। तो योजना की फंडिंग कहां से हो रही है? चालू वित्त वर्ष में तेलंगाना में करीब दो तिहाई व्यय कृषि, समाज कल्याण और सिंचाई के लिए आवंटित है। राज्य का कर संग्रह भी सुधरा है। राज्य सकल घरेलू उत्पाद और कर का अनुपात 2016 के 7 प्रतिशत से बढ़कर 8.4 प्रतिशत हो गया है। इस साल इसके 8.8 फीसदी रहने की उम्मीद है।

रैयतु बंधु योजना बहुत व्यापक है। इसके असर का अग्रिम अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके असर के आकलन के लिए अकादमिक अध्ययन किए गए हैं लेकिन अभी इसके वास्तविक नतीजों की शुरुआत होनी है। 4,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से खरीफ की फसल की 18 से 34 फीसदी लागत शामिल हो जाती है। उम्मीद है इससे महाजनों से उधार लेने की प्रक्रिया रुकेगी। लगता यही है कि इसका अधिकांश हिस्सा खपत में इस्तेमाल होगा। अब जमीन की कीमत भी बढ़ सकती है और भूस्वामियों के लिए सकारात्मक संपत्ति प्रभाव उत्पन्न हो सकता है।

क्या अन्य राज्य इस योजना को अपनाएंगे? अगर तेलंगाना सरकार दोबारा सत्ता में आती है तो अन्य राज्यों में ऐसी होड़ लग सकती है। परंतु इस योजना के लिए पर्याप्त राजकोषीय गुंजाइश के साथ साफ सुथरे भू रिकॉर्ड भी चाहिए। अधिक गहन प्रश्न ये हैं कि क्या ऐसी योजनाएं श्रमिकों के स्वाभाविक रूप से खेती से दूर होने को रोकती हैं और अधिक उत्पादक फंड को इस क्षेत्र में व्यय करने से क्या अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर होता है? दूसरी ओर क्या यह सही नहीं कि लोग अपने पैसे खर्च करने की वजह खुद तय करें न कि सरकार? क्या बिना अवरोधों के उचित वितरण नहीं हो सकता? इन सवालों के स्पष्टï जवाब नहीं हैं। इन पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।


खुदरा की बहार

टी. एन. नाइनन

कृषि क्षेत्र संकट में उलझा हुआ है। विनिर्माण में गतिशीलता का अभाव है। नितिन गडकरी के राजमार्ग निर्माण कार्यक्रम को छोड़ दें तो निर्माण कार्य भी शिथिल है। वित्तीय क्षेत्र बैंकिंग संकट में घिरा हुआ है। सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा क्षेत्र है जहां से उजाले की किरण आ रही है? इसका उत्तर आपको चकित कर सकता है लेकिन वह क्षेत्र है व्यापार। ज्यादा विशिष्टï उत्तर दें तो वह है संगठित खुदरा कारोबार। हाल की घटनाओं पर विचार कीजिए। रिलायंस (जिसका इतिहास बिज़नेस टु बिज़नेस कारोबार का रहा है) ने कहा है कि कंपनी अब उपभोक्ता आधारित कारोबार के दम पर विकास करेगी। वॉलमार्ट फ्लिपकार्ट में 16 अरब डॉलर का निवेश कर रही है। आइकिया हैदराबाद में अपना पहला स्टोर खोलने जा रही है। स्टॉक मार्केट पर भी खुदरा कारोबार की खुमारी है। डीमार्ट खुदरा शृंखला चलाने वाली कंपनी ने गत वर्ष जिस दर पर प्रारंभिक निर्गम उतारा था, उससे कई गुना पर कारोबार कर रही है। कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब एक लाख करोड़ रुपये के आसपास है और वह देश की 30 शीर्ष कंपनियों में से एक है।

देश में बड़े खुदरा कारोबारियों का प्रभावी असर हो सकता है। वे बेहतर आपूर्ति शृंखला, भारी भरकम उत्पादन, वैश्विक कारोबार के साथ एकीकरण और उच्च कर संग्रह (अब कोई फर्जी बिल नहीं) के माध्यम से अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। ऑनलाइन और मुख्य धारा की बिक्री भी एक साथ आ सकती है। कम से कम रिलायंस चेयरमैन मुकेश अंबानी की बातों से और आइकिया से तो यही संकेत निकलता है। फ्लिपकार्ट में वॉलमार्ट का निवेश भी यही बताता है। देश में अधिकांश खुदरा कारोबार अभी भी 1.2 करोड़ छोटे किराना कारोबारियों के हाथ में है, ऐसे में बदलाव तो काफी समय से लंबित है। दुनिया की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की बात करें तो संगठित खुदरा कारोबार में भारत की हिस्सेदारी सबसे कम है। एशियाई देशों में शायद दक्षिण कोरिया ही इकलौता ऐसा देश है जहां हिस्सेदारी 25 फीसदी से कुछ कम है। भारत की हिस्सेदारी 7 फीसदी है।

यह प्रतिशत दोगुना या तीन गुना हो जाए और शॉपिंग मॉल पनपते चले जाएं तो भी निकट भविष्य में खुदरा कारोबार में किराना कारोबारियों की हिस्सेदारी कम होती नहीं नजर आती। ऐसा केवल उनकी ठोस विरासत की वजह से नहीं है बल्कि इसलिए भी क्योंकि बाजार के तेज विस्तार से हर किसी के लिए ज्यादा गुंजाइश बनेगी। यही वजह है कि देश में एक के बाद एक ऐसी खुदरा शृंखलाएं आईं जिन्होंने खाने, कपड़े, दवा, चश्मे, फर्नीचर, सोने के गहने, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, घरेलू उपकरण और जूते आदि हर सामान बेचना शुरू कर दिया। इसके बावजूद बाजार के स्वरूप में बदलाव की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। ऐसा भी हो सकता है कि भारतीय बाजार की जटिलताओं को देखते हुए शुरुआती कारोबारियों ने सतर्कता बरती हो। परंतु अब जबकि इस कारोबार में भारी निवेश हो रहा है तो बदलाव की गति तेज होनी तय है।

कुछ अन्य घटनाएं हैं जो ढांचागत बदलाव को अंजाम देंगी। राजमार्गों और फीडर सड़कों के तेज विकास के साथ ट्रकों की गति बढ़ेगी और आपूर्ति के केंद्र बड़े शहरों से दूर अधिक किफायती जगहों पर स्थापित किए जा सकेंगे। आपूर्तिकर्ता भी कहीं अधिक दूरदराज जगहों पर उत्पादन और खपत केंद्र स्थापित कर सकेंगे। वस्तु एवं सेवा कर भी एकदम सही वक्त पर आया है। इससे बड़े कारोबारियों को फायदा है और नकदी कारोबार मुश्किल हो गया है। यह बात भी संगठित खुदरा कारोबार के पक्ष में जाएगी।

सबसे अधिक संभावित लाभ मेक इन इंडिया से जुड़ा हुआ है। मारुति के वेंडर विकास कार्यक्रम ने देश में वाहन कलपुर्जा उद्योग को जन्म दिया। यह अब एक बड़े निर्यात क्षेत्र में बदल चुका है। संगठित खुदरा कारेाबार की मदद से सफलता की इस कहानी को तमाम क्षेत्रों में दोहराया जा सकता है। सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियम काफी जटिल बना रखे हैं। उसका कहना है कि विदेशी खुदरा कंपनियों के माध्यम से बेची जाने वाली कम से कम 30 फीसदी वस्तुएं स्थानीय रूप से बनी होनी चाहिए। हालांकि इससे पार पाया जा सकता है। वॉलमार्ट का मौजूदा कारोबार पहले ही 90 प्रतिशत तक स्थानीय स्रोतों पर आधारित है। जबकि आइकिया को भी उम्मीद है कि उसके अपने स्टोरों पर स्थानीय उत्पादों की हिस्सेदारी को 15 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी किया जा सकेगा। उधर, तैयार वस्त्र और साज सज्जा क्षेत्र की खुदरा कंपनी फैब इंडिया भी दूसरे देशों में अपने स्टोर खोलने की उम्मीद जता रही है।


आक्रोश जरूरी है पर भीड़ की हिंसा शर्मनाक

बच्चों की सुरक्षा को लेकर डर में जी रहा हमारा समाज क्रूर और हिंसक बनता जा रहा है।

कैलाश सत्यार्थी

देश में बच्चा चोरी के नाम पर मॉब लिंचिंग यानी उन्मादी भीड़ द्वारा निर्दोषों की हत्याएं लगातार बढ़ रही हैं। पिछले करीब डेढ़ महीने में त्रिपुरा, असम, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक में ऐसी 20 हत्याएं हो चुकी हैं। सिर्फ हत्यारी भीड़ को ही नहीं, बल्कि इलाके के आम लोगों को शक था कि बच्चा चोर किडनियां बेचने, वेश्यावृत्ति कराने और शहरों में भीख मंगवाने के लिए बच्चे चुरा रहे हैं। दूसरी ओर मरने वालों का शायद सबसे बड़ा कसूर यह था कि वे गरीब थे। शरीर और कपड़ों से वे मैले-कुचैले नज़र आते थे या फिर पेट पालने के लिए भीख मांगते थे।

हमारे देश में हर घंटे में आठ बच्चे गुम हो जाते हैं, जिन्हें ट्रैफिकिंग यानी मानव दुर्व्यापार का शिकार बनाया जाता है। हर घंटे चार बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं, जबकि दो बच्चों के साथ दुष्कर्म होता है। ऐसे में पूरे देश में डर का वातावरण बना हुआ है। गुमशुदगी, ट्रैफिकिंग और दुष्कर्म के खिलाफ हमने पिछले साल 11 हजार किलोमीटर लंबी देशव्यापी भारत यात्रा आयोजित की थी। उसमें हमने लोगों की चुप्पी और उदासीनता को धिक्कारते हुए भारत को सुरक्षित बनाने के लिए ‘सुरक्षित बचपन’ बनाने का आह्वान किया था। यात्रा में शामिल होने वाले 12 लाख लोगों ने, जिनमें ज्यादातर युवा थे, इस महामारी के खिलाफ लड़ने की प्रतिज्ञा की थी। तब मैंने उनकी आंखों में जबर्दस्त गुस्सा देखा था। इसलिए हमने और गुमशुदगी या दुष्कर्म से पीड़ित बच्चों के माता-पिता ने अपने भाषणों और मीडिया को दिए गए साक्षात्कारों में लोगों से अपील की थी कि वे कभी भी कानून को अपने हाथ में न लें। मुझे अंदेशा था कि अगर बाल हिंसा के खिलाफ समाज और सरकार त्वरित और सख्त कदम नहीं उठाएगी, तो लोग हिंसक हो उठेंगे। आज डर और गुस्से से बौराई भीड़ की दरिंदगी देखकर हमें गहरी शर्मिंदगी है।

हमने महाराष्ट्र के रानीपारा में मार डाले गए पांच आदिवासियों की पत्नियों, बच्चों और बूढ़ी मांओं की दिल दहला देने वाली कहानियां सुनी हैं। टेलीविजन के माध्यम से गुजरात, असम और दूसरे राज्यों में मारे गए लोगों के अनाथ बच्चों की चीत्कारें और उनके अंधेरे भविष्य की चिंताओं को भी महसूस किया है। मैं हत्यारों के बच्चों से भी उतनी ही सहानुभूति रखता हूं, क्योंकि उनमें बहुत से ऐसे हैं, जिनके पिताओं के जेल चले जाने के बाद उनकी पढ़ाई-लिखाई, सुरक्षा यहां तक कि रोजी-रोटी का सहारा भी छिन जाएगा।

मैं और बचपन बचाओ आंदोलन पिछले कई वर्षों से देश में बच्चों की गुमशुदगी के खिलाफ सड़क से लेकर संसद और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ते हुए देश को जगाने की कोशिश कर रहे हैं। 2011 तक हमारे देश में बच्चों की गुमशुदगी के आधिकारिक आंकड़े तक नहीं थे। इसके लिए कोई कानून भी नहीं था, इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं होती थी। मां-बाप थानों में धक्के खाकर अपमानित और निराश होते रहते थे। हमने सूचना के अधिकार के तहत देश के हर जिले से ऐसी शिकायतें इकट्‌ठी कीं। फिर उन्हें लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील की। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को आदेश दिया कि हर शिकायत पर एफआईआर दर्ज करके तत्काल जांच शुरू की जाए। इस कार्रवाई और सामाजिक जागरूकता के परिणामस्वरूप हर साल गुमशुदा होने वाले बच्चों की संख्या 1.20 लाख से घटकर 44 हजार रह गई है। इस सबके बावजूद हम समाज में बच्चों की सुरक्षा का भरोसा पैदा नहीं कर सकें।

मॉब लिंचिंग के मामले में देश में कई लोग गिरफ्तार किए गए हैं। इन अपराधियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन, क्या सिर्फ वे ही लोग अपराधी हैं? हमने पिछले 70 वर्षों में सड़कें, इमारतें, स्कूल, अस्पताल, कारखानें, मोटर गाड़ियां और न जाने क्या-क्या बनाने में बहुत तरक्की की है। लेकिन क्या इन्हीं घरों, सड़कों, स्कूलों, बाजारों आदि में हमारे बच्चे सुरक्षित हैं? क्या देश के ज्यादातर लोग अपने बच्चों की हिफाजत के बारे में डरे हुए नहीं हैं? डर के साये में जीने वाला समाज जितनी तरक्की करता है, खुद को बचाने के लिए वह उतना ही क्रूर और हिंसक भी बनता जाता है। भारत को भय ग्रस्त बनाने की नैतिक जिम्मेदारी किसी को तो लेनी ही होगी। हिंसक भीड़ बन जाने वाले ज्यादातर लोग तरक्की के हाशिये से बाहर छोड़ दिए गए लोग होते हैं। यह समाज और सरकार की संस्थाओं की घोर विफलता नहीं तो और क्या है?

सरकार ने वाट्सएप को अफवाहें रोकने के लिए जिम्मेदारी और जवाबदेही से काम करने की सलाह दी है। हर तरह की अफवाहों पर पाबंदी लगना भी जरूरी है। लेकिन, क्या महज अफवाहें ही अकेली इतनी गंभीर हालत के लिए जिम्मेदार हैं? अफवाहें कभी आग में घी का काम करती हैं, तो कभी चिंगारी का लेकिन, हिंसा की आग का ईंधन चारों तरफ फैले डर, असुरक्षा की भावना, पुलिस और न्याय व्यवस्था पर घोर अविश्वास, असहिष्णुता, सरकारी तंत्र से निराशा या उसे प्रभावित करने का दंभ और मानवीय गरिमा के लिए असम्मान जैसी चीजों से बनता है। इस ईंधन को नष्ट किए बगैर हिंसा की आग को नहीं रोका जा सकता। वह तो किसी न किसी रूप में फूटती रहेगी। बच्चों की गुमशुदगी, दुर्व्यापार और यौन उत्पीड़न के खिलाफ सामाजिक जागृति पैदा कर, अच्छा कानून और उनका क्रियान्वयन के साथ पुलिस व दूसरी सरकारी एजेंसियों को संवेदनशील, सक्रिय और जवाबदेह बनाकर, बच्चों की सुरक्षा को राजनीतिक प्राथमिकता देकर और अदालतों की कार्रवाई को गति देकर इस उन्मादी हिंसा पर काबू पाया जा सकता है।

मैं जन-आक्रोश का सम्मान करता हूं और व्यक्तिगत गुस्से का भी। इनमें समाज के नवनिर्माण की ऊर्जा और संभावनाएं होती हैं। लेकिन, इस ऊर्जा का सदुपयोग बुराइयों और अन्याय के खिलाफ लड़ने में होना चाहिए, सकारात्मक सामाजिक बदलाव में होना चाहिए, न कि हत्या और हिंसा में। ऐसे हालात में राजनीतिक दलों, नेताओं, कार्यकर्ताओं, धर्मगुरुओं और मीडिया की सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारी है कि वह आम लोगों में व्यवस्था और संस्थाओं के प्रति बढ़ रही अनास्था को रोकने के लिए जरूरी पहल करें। जब तक लगातार बढ़ रही बच्चों की असुरक्षा हमारी राजनीतिक और सामाजिक चिंता का विषय नहीं बनती, तब तक हम एक सभ्य, सुसंस्कृत और विकसित भारत नहीं बना सकते।


उच्च शिक्षा में नए प्रयोग से शिक्षाविद दूरगामी बनाम प्रतिगामी के रूप में विभाजित

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाने के लिए सर्च कमेटी जो पैनल तैयार करे उसका चयन अकेले सरकार न करे। इससे विवाद की गुंजाइश कम होगी।

निरंजन कुमार , ( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं )

उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर पिछले एक दशक से चल रही बहसों का एक निष्कर्ष यह रहा है कि इसमें एक क्रमबद्ध परिवर्तन की आवश्यकता है। शायद इसी के मद्देनजर भारत सरकार ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी को समाप्त कर उसकी जगह ‘भारतीय उच्च शिक्षा आयोग’ के गठन का फैसला किया है। इससे संबंधित मसौदे को लेकर शिक्षाविद दो फाड़ हो गए हैं। एक तरफ इसे प्रगतिशील, दूरगामी और प्रभावकारी बताया जा रहा है तो दूसरी ओर इसे प्रतिगामी, अदूरदर्शी और राजनीतिक हस्तक्षेप को बढ़ावा देने वाला भी बताया जा रहा है।

अच्छी बात यह है कि सरकार ने मसौदे पर सुझाव और टिप्पणियां मांगी हैं ताकि अंतिम विधेयक में उचित सुझावों को शामिल किया जा सके। इस मसौदे की धारा-24 के तहत एक परामर्शदात्री परिषद की स्थापना का प्रावधान है। यह कदम उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सहकारी संघवाद का एक अच्छा उदाहरण होगा। यूजीसी व्यवस्था में यह प्रावधान नहीं था। इस परामर्शदात्री परिषद के अध्यक्ष केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री होंगे। अन्य सदस्यों में नए आयोग के सभी सदस्यों के अतिरिक्त सभी राज्यों के उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष भी इसमें शामिल होंगे। यह बिंदुु इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ मामलों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र से कहीं अधिक बड़ी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है।

देश में लगभग 70 प्रतिशत विश्वविद्यालय और 90 प्रतिशत कॉलेज राज्य सरकारों के अधीन हैं। जबकि अब तक उच्च शिक्षा संबंधित नीति निर्माण में राज्यों की भूमिका लगभग नगण्य थी। प्रस्तावित परामर्शदात्री परिषद में केंद्र और राज्य सरकारें उच्च शिक्षा से संबंधित समन्वय के बिंदुओं की पहचान करेंगी। बेहतर होगा कि इसे और व्यापक एवं समावेशी बनाते हुए केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक संघों ‘फेडक्यूटा’ और ‘एआइफुक्टो’ से एक-एक प्रतिनिधि भी इसमें शामिल किए जाएं। नया आयोग ‘न्यूनतम दखल और अधिकतम काम’,‘अनुदान कार्यों को अलग करना’, ‘इंस्पेक्टर राज का अंत’, ‘अकादमिक गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना’, ‘नियमन और लागू कराने का अधिकार’ के सिद्धांतों पर  आधारित होगा। इन सिद्धांतों में ‘नियमन और लागू कराने का अधिकार’ उल्लेखनीय है। यूजीसी इस मामले में सर्वथा दंतहीन था। अगर कोई संस्थान उसके आदेशों का अनुपालन नहीं करता था तो वह अधिक से अधिक उसका अनुदान रोक सकता था।

निजी क्षेत्र के संस्थानों की मनमानी पर तो उसका और भी कोई जोर नहीं था, लेकिन अब नियमों एवं मानकों का जानबूझकर अथवा लगातार उल्लंघन कर रहे स्तरहीन संस्थानों को बंद करने का अधिकार उच्च शिक्षा आयोग के पास होगा। अनुपालन नहीं करने की स्थिति में जुर्माना और जेल का भी प्रावधान है। इसी तरह से ‘इंस्पेक्टर राज’ के अंत की भी घोषणा कर दी गई है।

नया आयोग संस्थानों को शुरू और बंद करने के लिए मानक और नियम तय करेगा और इस आधार पर उन्हें चलाने अथवा बंद करने का आदेश दे सकेगा। नई व्यवस्था में सारी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी और सूचनाएं संस्थानों की वेबसाइट पर उपलब्ध होंगी ताकि सभी को संस्थान संबंधित पूरी जानकारी हो सके और जरूरत पड़ने पर शिकायत भी की जा सके। यह समूची प्रक्रिया ‘न्यूनतम दखल और अधिकतम काम’ के सिद्धांत पर ही आधारित है। मसौदे की धारा-15(4)(एल) के तहत नया आयोग शिक्षण संस्थानों द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क को निर्धारित करने के लिए मानक और प्रक्रिया भी बनाएगा। इस प्रावधान के महत्व को ऐसे समझा जाए कि इससे निजी संस्थानों द्वारा अनाप-शनाप फीस निर्धारित करने और वसूलने पर एक बड़ी हद तक नियंत्रण लग सकेगा। साथ ही आयोग केंद्र और राज्य सरकारों को शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने के लिए जरूरी कदमों की जानकारी भी देगा।

सैद्धांतिक रूप से तो यह सही है कि एक ही निकाय में दो शक्तियां नहीं होनी चाहिए, लेकिन समस्या यह है कि अनुदान का यह कार्य मंत्रालय के अधीन किया जाना है। यह अनेक जटिलताओं को जन्म देगा, क्योंकि अनुदान प्रणाली को राजनीतिक हस्तक्षेप के साथ-साथ नौकरशाही की लालफीताशाही की दोहरी मार सहनी पड़ेगी। पहले भी अनुदान कार्य राजनीतिक हस्तक्षेप और लालफीताशाही से अछूते नहीं रहे हैं, लेकिन स्वायत्त यूजीसी के हाथ में होने से अनुदान संबंधी कामकाज अपेक्षाकृत ठीक-ठाक चलते रहे हैं। दरअसल उच्च शिक्षा में प्रोजेक्ट, रिसर्च से लेकर आधारभूत संरचना में धन का आवंटन नौकरशाही के चश्मे से नहीं किया जा सकता। खास तौर से तब और भी नहीं जब भारतीय नौकरशाही का पुराना रिकॉर्ड बहुत उत्साहवर्धक न रहा हो । अनुदान कार्यों के लिए चाहे एक अलग स्वायत्त निकाय हो अथवा यह नए आयोग के पास ही रहे, यह बहुत जरूरी है कि मंत्रालय से यह स्वतंत्र ही हो। यह भी जरूरी है कि अनुदान की प्रक्रिया पूर्णतया पारदर्शी होनी चाहिए।

प्रस्तावित उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों को लेकर भी कुछ समस्याएं हैं। मसौदे की धारा 3(6)(ए) के अनुसार एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद एवं शैक्षिक प्रशासक जिसमें उच्च शिक्षा संस्थानों के निर्माण और शासन की सिद्ध क्षमता हो, वह भी अध्यक्ष बन सकता है। यह अपने आप में अत्यंत खतरनाक प्रावधान है। इस व्यवस्था से तो कोई शक्तिशाली राजनेता या व्यवसायी और उद्योगपति, जिनके अपने कॉलेज/ विश्वविद्यालय हों अथवा शिक्षा विभाग से जुड़ा हुआ कोई प्रभावशाली नौकरशाह भी अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हो सकता है। उच्च शिक्षा की इससे जो दुर्दशा होगी उसका अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

यह प्रावधान स्पष्ट होना चाहिए कि अध्यक्ष सिर्फ और सिर्फ विश्वविद्यालय का प्रोफेसर ही होगा, क्योंकि उच्च शिक्षा की जटिलता एवं उसे समग्रता में केवल एक प्रोफेसर ही समझ सकता है। यह भी चिंताजनक है कि आयोग के 12 सदस्यों में केवल दो प्रोफेसर होंगे जबकि यूजीसी अधिनियम में 10 सदस्यों में न्यूनतम चार प्रोफेसरों का प्रावधान था। यह जरूरी है कि नए बनने वाले आयोग में कम से कम पांच प्रोफेसर हों और न्यूनतम चार सरकारी विश्वविद्यालयों से हों। बेहतर होगा कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनाने के लिए सर्च कमेटी जो पैनल तैयार करे उसका चयन अकेले सरकार न करे। इससे विवाद की गुंजाइश कम होगी। और भी अच्छा होेगा कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक उच्च प्राधिकार समिति ही इसका चयन करे। समिति के अन्य सदस्यों में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एचआरडी मंत्री शामिल हो सकते हैं।