08-2-2022) समाचारपत्रों-के-संपादक



End Nativism

Haryana’s, & other states’, job quotas for locals violate fundamental rights. Courts must say so

TOI Editorials

This week the Supreme Court is expected to begin hearing a case that will test the constitutionality of Haryana’s new law that reserves 75% of private sector jobs for locals, subject to a monthly salary cap of Rs 30,000. Haryana is not alone in an attempt to promote nativism by making it mandatory for private sector entities to reserve jobs for locals. Andhra Pradesh’s assembly passed a similar law and last year Jharkhand’s assembly followed suit. Punjab is set to replicate Haryana’s approach with this idea catching on as one of the many election promises.

Other than the legal premise underpinning domicile reservation, Haryana’s law has other alarming features. Its scope covers not just corporations but also trusts, societies and partnerships. Moreover, a “designated officer” is empowered to interpret matters in a way that is straight out of India’s discredited licence-permit-quota raj playbook. There are serious flaws in this law and similar ones passed by other states. Domicilebased reservation in the private sector violates fundamental rights of citizens from other states. There is no legal case for it. From an economic standpoint, domicile-based reservation wholly undermines the spirit of other laws that seek to create a common market in India.

Labour mobility is as essential as that of goods and services. Employers need the right to choose their workforce. It’s an integral part of creating a competitive economic environment. GoI’s schemes such as production-linked incentives (PLI) to promote manufacturing through private investments are incompatible with attempts by states to erect barriers to labour mobility. It’s one reason why GoI’s solicitor general arguing Haryana’s case made for poor optics. It’s GoI’s duty to push back against nativism and attempts to erect barriers to labour mobility. However, when the solicitor general argues Haryana’s case, it will only encourage would-be nativists.

Given the controversy that governors often generate, it’s inexplicable why some of them give their assent to legislations that violate fundamental rights. The apex court should resolve this matter soon by upholding fundamental rights. India’s path to economic prosperity depends on giving the private sector the space to make appropriate choices. And migration is what runs the labour market and keeps wages competitive. Nativism, therefore, is against both labour and capital – just what an economy recovering from the pandemic doesn’t need. Therefore, Haryana’s misguided attempt must be rejected. States need to work with industry on programmes that impart skills and make local youth more employable. In that way, everyone will gain.


Don’t Get Spooked By Our Own Cultures

ET Editorials

The issue of a government pre-university college in Udupi, Karnataka, suddenly barring six students entry into classrooms last week because they wore the hijab is an unnecessary complication. By invoking Section 133(2) of the Karnataka Education Act, 1983 — enforcing compliance of rules in state educational institutions, adherence to uniform, in this case — the authorities have fuelled a controversy that had no spark to start with. As if on cue, a section of students has staged a protest — and approached the court — while a saffron scarves-wearing ‘counter-protest’ has come out of the woodwork. This must be nipped in the bud.

India is not, say, France, where not only is the idea of secularism based on the constitutional principle of ‘laïcité’ by which all religious symbols and practices are kept outside public affairs, but where the hijab also remains a symbol of the ‘outsider’. In India, secularism is constitutionally based on equal treatment of all religions under Article 25 (1), which the Karnataka government insists it has not violated. Legally, it stands on weak ground — a 2017 Kerala High Court verdict and a 2018 Bombay High Court judgment allowed candidates and a student to wear the headscarf while appearing for an entrance exam and attending lectures, respectively. What is ironic is that being concerned about the hijab — as attire that, according to the Karnataka government, ‘disturb[s] equality, integrity and public law and order’ — is more of a ‘western problem’ where hijabs, turbans and caste marks are somehow seen as threatening the social fabric.

One hopes the Karnataka High Court scheduled to hear the matter today rescinds the ban. We are in secular India, which doesn’t need to be spooked by its own multicultures.


सेवा क्षेत्र ही देगा रोजगार को सहारा

भरत झुनझुनवाला, ( लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं )

गत सप्ताह पेश बजट में कई सार्थक पहल की गई हैं। इनमें डिजिटल करेंसी पर बहुत चर्चा हुई है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दुनिया भर में मुद्रा के स्तर पर नए तकनीकी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। इसका ही एक स्वरूप डिजिटल मुद्रा है। पारंपरिक मुद्रा के लिए सरकार को नोट छापने पड़ते हैं। इसका खर्च देश पर पड़ता है। आपको नोट को अपनी जेब में रखना पड़ता है। नोट खराब भी हो जाते हैं। डिजिटल करेंसी में यह खर्च और जोखिम कम हो जाता है। जैसे नोट पर एक नंबर छपा होता है, उसी प्रकार डिजिटल करेंसी का एक नंबर रिजर्व बैंक बनाएगा। आप रिजर्व बैंक को भुगतान कर वह नंबर ले सकते हैं। वह नंबर रिजर्व बैंक के कंप्यूटर में दर्ज हो जाएगा कि इस नंबर की डिजिटल करेंसी अमुक व्यक्ति की है। जब वह व्यक्ति उसे किसी को हस्तांतरित करेगा तब रिजर्व बैंक का कंप्यूटर पुष्टि कर देगा कि डिजिटल करेंसी वास्तव में उस व्यक्ति की ही है। उसके बाद वह नंबर पाने वाले के खाते में चढ़ जाएगा। कागज बनाने, नोट छापने, गाड़ियों से देश भर में पहुंचाने और बैंक से वितरित करने आदि पर आने वाला खर्च भी घट जाएगा। हालांकि इससे अर्थव्यवस्था की मूल स्थिति में विशेष सुधार नहीं होगा, परंतु पारदर्शिता जरूर बढ़ेगी, क्योंकि इसे आसानी से ट्रैक किया जा सकता है।

पारंपरिक मुद्रा की जानकारी आरबीआइ के पास नहीं होती। जैसे रिजर्व बैंक यह जानना चाहे कि अमुक नंबर का नोट किस व्यक्ति के पास है तो उसका पता लगना मुश्किल है। वहीं डिजिटल करेंसी का नंबर कंप्यूटर में धारक के खाते में दर्ज हो जाएगा और यह पता लग सकेगा कि अभी इस नोट का मालिक कौन है? इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। इनकम टैक्स विभाग चेक कर लेगा कि किसने कितनी रकम किसको दी? वैसे भ्रष्टाचार करने वाले इसका भी कोई तोड़ निकालने का प्रयास कर सकते हैं।

वित्त मंत्री ने बजट में मेक इन इंडिया को सहारा दिया है। केमिकल्स इत्यादि जिन वस्तुओं के उत्पादन की भारत में भरपूर क्षमता है, उन पर आयात कर बढ़ाए गए हैं। सरकार चाहती है कि जो माल हम बना सकते हैं, वह हम स्वयं बनाएं और उसका आयात न करें। रक्षा क्षेत्र में पिछले साल 58 प्रतिशत घरेलू खरीद थी, जिसे इस साल 68 प्रतिशत किया गया है। यह बहुत ही सकारात्मक संकेत है। उन कच्चे माल का आयात सरल किया गया है, जिससे देश में उत्पादन बढ़े। जैसे मोबाइल फोन बनाने में एक परेशानी कैमरा लेंस की आती है। अब इस लेंस का आयात सरल किया गया है ताकि हम मोबाइल फोन बना सकें। यह भी सकारात्मक कदम है। इन कदमों के बावजूद अर्थव्यवस्था के रफ्तार पकड़ने में संशय है। बाजार का चक्का घुमाने को दो तरह की नीति चाहिए होती है। एक डिमांड साइड पालिसी और दूसरी सप्लाई साइड पालिसी। इसे ऐसे समझिए कि आलू की बिक्री बढ़ाने के दो उपाय हैं। यदि उसकी मांग बढ़ जाए तो किसान ज्यादा आलू ले आएंगे, क्योंकि सब बिक जाएगा। यह डिमांड साइड पालिसी हुई। दूसरा उपाय यह कि आलू की सप्लाई बढ़ जाए और उसका दाम घट जाए तो जो खरीदार अभी तक आलू नहीं खरीद रहे थे, वे भी आलू खरीदने लगेंगे। इससे भी आलू बिक जाएगा। यह सप्लाई साइड पालिसी हुई। दोनों तरह से बाजार चल सकता है। अंतर यह है कि डिमांड साइड पालिसी में निश्चिंतता ज्यादा होती है। आलू की मांग होगी तो विक्रेता कहीं न कहीं से आलू ले ही आएगा, लेकिन सप्लाई साइड पालिसी में अनिश्चितता बनी रहती है। सप्लाई बढ़ गई और दाम घट गए तो जरूरी नहीं कि खरीदार आ ही जाएगा। ऐसे तमाम उदाहरण हैं। इसलिए डिमांड साइड पालिसी को अपनाना चाहिए, लेकिन सरकार उसी सप्लाई साइड पालिसी को लागू कर रही है, जो अनिश्चित रहती है।

सरकार छोटे उद्योगों के लिए कर्ज सस्ता कर रही है। उद्योगों को ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ दिया गया है। इससे माल सस्ता हो गया, लेकिन बाजार में मांग ही नहीं है। इसलिए ऐसे कदम अपेक्षित सफलता नहीं दिला पाएंगे। जैसे आलू सस्ता हो गया, लेकिन खरीदार नहीं है तो सस्ता आलू किस काम का? हमारी आर्थिक वृद्धि दर कोविड से प्रभावित है और इसी कारण सरकार मांग नहीं पैदा कर पा रही है। आम आदमी के हाथ में क्रय शक्ति नहीं दे पा रही है। सरकार कह रही है कि लोगों की क्रय शक्ति कम है तो हम माल सस्ता कर देंगे। गरीब आदमी बोलता है कि मेरे पास पैसे नहीं है और जब आटा ही नहीं खरीद पा रहा हूं तो मैं कपड़े का क्या करूंगा? यह बजट की मौलिक कमी है। यह विषय रोजगार से भी जुड़ा है। यदि आपको बाजार में मांग पैदा करनी है तो आम आदमी को रोजगार देना होगा। उसे वेतन मिलेगा तो वह बाजार से कपड़ा खरीदेगा। बजट में रोजगार पैदा करने की ठोस नीति नहीं दिखती।

रोजगार पैदा करने के लिए सेवाओं के बाजार का विस्तार करना होगा। आने वाला समय इंटरनेट का है। युवाओं को अपनी उन कुशलता को बेचने का रास्ता सरल करना होगा, जिन्हें वे इंटरनेट के माध्यम से भुना सकें। अपने यहां गणित में बीएससी करने वाले लाखों युवा बेरोजगार हैं। पूरी दुनिया में गणित के अध्यापकों का अभाव है। यदि वे इंटरनेट के माध्यम से गणित पढ़ा सकें तो घर बैठे ही काम कर सकते हैं। इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भी खतरा नहीं है। टीचिंग में अध्यापक और विद्यार्थी का वन टू वन कनेक्शन होता है। हमारे तमाम एमबीए 15 से 20 हजार रुपये की नौकरी कर रहे हैं। वे टेलीमेडिसन बेच सकते हैं। गृहिणी अच्छा खाना बना लेती हैं तो वे र्कुंकग कोर्स दे सकती हैं। सरकार को इस दिशा में बुनियादी ढांचे को मजबूती देनी होगी, लेकिन बजट में बड़े उद्योगों के लिए लाभप्रद संरचना जैसे हाईवे और हवाई अड्डों पर जोर दिया गया है। इससे बाजार में मांग बढ़ना संभव नहीं दिखता और अर्थव्यवस्था की गति सपाट रह सकती है।

डिजिटल करेंसी और मेक इन इंडिया इस बजट का प्लस प्वाइंट है। रोजगार इस बजट का माइनस प्वाइंट है। सरकार को सोचना चाहिए कि 2014 से आज तक रोजगार के वादे किए जा रहे हैं। कोरोना के पहले भी और बाद में भी, लेकिन रोजगार की स्थिति संभल नहीं रही है। आंकड़े बता रहे हैं कि मैन्यूफैक्र्चंरग में रोजगार बढ़ने के बजाय घट रहे हैं। इसलिए आम आदमी के लिए उपयोगी सेवा क्षेत्र की बुनियादी संरचना को और मजबूत करना चाहिए।


निजी रोजगार में आरक्षण


हरियाणा का वह विवादास्पद कानून अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है जिसमें उसने प्रावधान किया है कि 30,000 रुपये से कम के मासिक वेतन वाले रोजगारों में से 75 प्रतिशत राज्य के मूल निवासियों के लिए आरक्षित रहेंगे। इस मामले में राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील की है जो पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा 3 फरवरी को लगाए गए स्थगन आदेश के खिलाफ है। उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश औद्योगिक समूहों की ओर से लगायी गयी रिट याचिकाओं पर आया है। महान्यायवादी तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जल्द सुनवाई का आग्रह करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने महज 90 सेकंड के भीतर निर्णय सुना दिया जबकि तब तक वह दो वाक्य भी नहीं बोल पाए थे। बहरहाल उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह एक अहम मसला है कि क्या कोई राज्य मूल निवास के आधार पर निजी क्षेत्र में भी रोजगार को रोक सकता है।

यह सवाल केवल हरियाणा तक सीमित नहीं है बल्कि कई अन्य राज्य भी इससे जुड़े हुए हैं, ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश में लोगों को काम पर रखने के कानूनों के लिए काफी अहम होगा। यह सच है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन करते हैं। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि रोजगार के मामले में देश के नागरिकों के बीच धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश परंपरा, जन्म स्थान, निवास आदि के आधार पर भेद नहीं किया जा सकता। परंतु बीते कुछ वर्षों में कई राज्यों ने ऐसे कानून बनाए हैं। आंध्र प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश ने 70 से 75 फीसदी कोटा तय करने वाले कानून पारित किए हैं।

अहम बात यह है कि तेलंगाना जिसने अगस्त 2020 में निजी क्षेत्र के अद्र्धकुशल रोजगार में 80 फीसदी तथा कुशल रोजगारों में 60 फीसदी स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने का कानून बनाया था, उसका हृदय परिवर्तन हो गया है। एक वर्ष बाद राज्य के सूचना प्रौद्योगिकी तथा उद्योग मंत्री के टी रामाराव ने विधानसभा को बताया कि राज्य सरकार रोजगार में आरक्षण के खिलाफ थी। उनकी दलील का संवैधानिक अधिकारों से लेनादेना कम था और निवेश खासकर सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश की दिक्कतों से ज्यादा। जैसा कि रामा राव ने कहा भी, एक प्रतिस्पर्धी विश्व में गूगल, एमेजॉन अथवा कोई भी निजी कंपनी ऐसे राज्य में निवेश नहीं करेगी जहां उसके रोजगार विकल्प स्थानीय लोगों तक सीमित हों। इसके बजाय राज्य स्थानीय युवाओं को बाजार मांग के अनुरूप कौशल सिखाने की नीति पर काम कर रहा है ताकि उन्हें निजी औद्योगिक नौकरियों में सरकार के कोटा के बिना भी रोजगार मिल सके।

तेलंगाना सरकार को बहुत जल्दी समझ में आ गया कि राजनीति से प्रेरित उपराष्ट्रवाद में कई दिक्कतें हैं। उसने इस मसले से निपटने के लिए जो हल निकाला है उससे अन्य सरकारों को भी मजबूत संदेश मिलना चाहिए। यह सही है कि हरियाणा के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी इस कानून से राजनीतिक फायदा लेना चाहती थी और अब उसे बेरोजगारी की बड़ी समस्या का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि राज्य का जीवंत स्टार्टअप और विनिर्माण क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अपेक्षाकृत अनुकूल पड़ोसी इलाकों दिल्ली और नोएडा में स्थानांतरित हो सकता है। हरियाणा में पहले ही बेरोजगारी बहुत ज्यादा है और ऐसा हुआ तो राज्य के लिए बहुत मुश्किल होगी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय चीजों को स्पष्ट करेगा लेकिन यह भी अहम है कि राज्य भी इसे समझें कि भीषण बेरोजगारी के इस दौर में भारत ऐसी सूक्ष्म अति राष्ट्रीयता झेल नहीं पाएगा।


दागी जनप्रतिनिधि


राजनीति के अपराधीकरण को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है और इस फिक्र को सार्वजनिक करने में देश की लगभग सभी पार्टियां आगे रहना चाहती हैं। लेकिन क्या व्यवहार में यही राजनीतिक दल इस बात के लिए सचेतन प्रयास करते हैं कि आपराधिक तत्त्वों का राजनीति में और खासतौर पर विधायिका में प्रवेश न हो? इसके उलट पिछले कई दशक इस बात के गवाह रहे हैं कि राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दबदबे को एक गंभीर समस्या बताए जाने के बावजूद लगातार वैसे लोग जनप्रतिनिधि के तौर पर संसद और विधानसभाओं में अपनी जगह बनाते रहे हैं, जिनका अतीत आपराधिक घटनाओं में संलिप्त होने का रहा है। सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों के शीघ्र निपटारे और विशेष अदालतों के गठन के मामले में अदालत की सहायता के लिए नियुक्त न्याय मित्र ने बीते हफ्ते उच्चतम न्यायालय को बताया कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या दो साल में 4,122 से बढ़ कर 4,984 हो गई है। इनमें 1,899 मामले पांच वर्ष से ज्यादा पुराने हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2018 तक कुल लंबित मामले 4,110 थे और अक्तूबर 2020 में ये 4,859 थे।

इससे साफ पता चलता है कि इस प्रवृत्ति की रोकथाम के दावों के बरक्स आपराधिक पृष्ठभूमि वाले काफी लोग अब भी संसद और विधानसभाओं की सीटों पर कब्जा कर रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि एक ओर सभी पार्टियां अपने प्रतिपक्षियों को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा करती हैं कि उन्होंने आपराधिक अतीत या छवि वाले लोगों को टिकट देकर समस्या को जटिल बनाया है, जबकि अक्सर मौका मिलने पर ऐसा करने में वे खुद भी पीछे नहीं रहती हैं। यह बेवजह नहीं है कि आज संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग जनता के नुमाइंदे बन कर बैठे हैं, जिनके अपराधों से आम लोग कभी परेशान रहे होते हैं। हर अपराध के खिलाफ बढ़-चढ़ कर बोलने और अपराधियों पर लगाम लगाने का दावा करने वाली पार्टियां आखिर किन वजहों से ऐसा कर पाती हैं? क्या इसके पीछे एक बड़ा कारण यह नहीं है कि उन्हें न केवल आपराधिक छवि वाले लोगों से पार्टी का कोष मजबूत करने में मदद मिलती है, बल्कि उनके इलाके में भय पर आधारित समर्थन भी हासिल होता है? इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि राजनीतिक दल अपराधियों के प्रभाव वाले इलाकों में जनता के बीच अपने सिद्धांतों, विचारों के जरिए लोगों के बीच अपने लिए समर्थन हासिल करने में नाकाम होते हैं और इसलिए उन्हें वोट हासिल करने का यह आसान रास्ता दिखाई देता है।

सवाल है कि देश की नियति तय करने वाली राजनीतिक पार्टियों के ऐसे रुख की वजह से राजनीति के अपराधीकरण का जो खमियाजा आम जनता को उठाना पड़ता है, समूचे शासन का स्वरूप प्रभावित होता है, उसकी जिम्मेदारी किस पर आती है! मसले की जटिलता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सार्वजनिक रूप से चिंता जताए जाने के साथ-साथ सांसदों-विधायकों के खिलाफ मामलों के निपटारे के लिए कुछ राज्यों में विशेष अदालतों के गठन किए जाने और कुछ अन्य राज्यों में संबद्ध क्षेत्राधिकार की अदालतों में सुनवाई के बावजूद दागी नुमाइंदों की तादाद संसद और विधानसभाओं में बढ़ी ही है। एक मुश्किल यह भी है कि ऐसे मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों के पास कई स्तरों पर कुछ बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और इस बारे में अब तक केंद्र सरकार की ओर कोई ठोस पहल नहीं हुई है। जाहिर है, इस समस्या से निपटने के लिए अदालतों में तेजी से सुनवाई के साथ-साथ सिर्फ दिखावे के वादों और दावों के बरक्स सभी पार्टियों को अपने स्तर पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनावों में उम्मीदवार बनाने से बचना होगा।


हिजाब पर हंगामा


कर्नाटक में कुछ छात्राओं के हिजाब पहनने को लेकर विवाद गंभीर होता जा रहा है। उडु़पी के एक जूनियर कालेज से शुरू हुए इस विवाद में राजनीति शुरू हो जाने से माहौल बिगड़ रहा है और इसके सांप्रदायिक रूप ले लेने का खतरा है। विवाद अन्य कालेजों तक फैलने लगा है। जिले में कुंड़ापुर के कई जूनियर कॉलेज में हिजाब के जवाब में भगवा शॉल निकल आई हैं। दो कॉलेज के विद्यार्थियों ने राज्य शिक्षा विभाग के ड्रे़स कोड़ अनिवार्य करने वाले आदेश की अवहेलना करने की कोशिश की। शहर के वेंकटरमण कॉलेज के छात्रों का एक समूह भगवा शॉल पहने जुलूस निकालते हुए कॉलेज पहुंचा। छात्रों का कहना था कि कि यदि छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षाओं में आने की अनुमति दी जाएगी‚ तो वे भी शॉल पहनेंगे। सरकारी पीयू कॉलेज में भी प्राचार्य ने हिजाब पहनकर आई छात्राओं को सरकार का ड्रे़स कोड़ समझाया‚ लेकिन छात्राएं हिजाब हटाने पर राजी नहीं हुई‚ इसके बाद उन्हें एक निर्धारित अलग कक्ष में भेज दिया गया। आहिस्ता–आहिस्ता यह विवादास्पद मुद्दा राज्य भर में फैलता जा रहा है। विजयपुरा जिले के इंडी शहर में‚ मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने के विरोध में शांतेश्वर पीयूसी कॉलेज और जीआरबी कॉलेज के हिंदू छात्र भगवा शॉल पहनकर आए। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों कॉलेजों के प्रबंधन ने छुट्टी घोषित कर दी। विजयपुरा को भाजपा का गढ़ माना जाता है और यह सांप्रदायिक रूप से भी संवेदनशील है। भद्रावती में भी सरकारी कॉलेज में छात्रों ने हिजाब के खिलाफ भगवा गमछा पहन कर विरोध जताया। हिजाब विवाद के बारे में परेशान करने वाली घटनाओं के बारे में खुफिया एजेंसियां और शिक्षा विभाग हाई अलर्ट पर हैं। उडुपी पुलिस ने 5 फरवरी को हिजाब–केसर शॉल विरोध के दौरान चाकू दिखाने के आरोप में दो लोगों को हिरासत में लिया है। कर्नाटक उच्च न्यायालय मंगलवार को हिजाब विवाद पर मुस्लिम छात्राओं की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। राज्य सरकार ने कहा है कि उच्च न्यायालय के आदेश के बाद वे यूनिफॉर्म पर एक नीति तैयार करेंगे। राज्य में हिजाब पहनने पर विवाद की शुरुआत जनवरी महीने में हुई थी। उडुपी जिले के प्री–यूनिवर्सिटी कॉलेज में 7 छात्राओं को हिजाब पहनने के कारण कक्षा में प्रवेश नहीं दिया गया था। एकाएक शुरू हुआ यह विवाद उचित नहीं है। पढ़ाई में परंपरा के नाम पर खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। सभी राजनीतिक दल इस मामले में निष्पक्ष रवैया अख्तियार करेंगे‚ यही उम्मीद है।