Cities are taking climate action

Climate resilience plans in Indian cities focus on isolated risks rather than preparing for multiple, intersecting risks

Chandni Singh & Mythili Madhavan, [ Chandni Singh is a senior researcher and faculty member at the Indian Institute for Human Settlements (IIHS), Bengaluru; Mythili Madhavan is a research associate at IIHS ]

On September 23, Maharashtra’s Environment Minister, Aaditya Thackeray, announced that 43 cities across the State will join the UN-backed ‘Race to Zero’ global campaign, which aims to create jobs while meeting goals of climate change and sustainable development. This is laudable and timely – Maharashtra has repeatedly been identified as a State that experiences multiple risks (floods, drought, sea-level rise to name a few) and reports abysmally inadequate policy action on climate-resilient development.

Are cities doing enough?

Indian cities have often been singled out for not doing enough on climate change. To examine this, we assessed climate action in 53 Indian cities with a population of over one million and found, promisingly, that approximately half these cities report climate plans, i.e., they have a climate resilience plan or set of projects in place. Of these, 18 cities have moved beyond intention to implementation. These numbers highlight an encouraging first step, signalling that recurrent experiences of floods, water scarcity, cyclones and storm surges are filtering up into urban development policy.

However, a lot of interventions are being implemented through sectoral projects focusing on particular, isolated risks. For example, most cities report targeted projects to deal with heat waves and water scarcity, followed by inland flooding, extreme rainfall, and growing disease incidence. Coastal flooding, sea-level rise, and cyclones are discussed less often despite India’s long coastline and highly vulnerable coastal cities and infrastructure. This focus tends to overlook how multiple risks converge and reinforce each other — for example, seasonal cycles of flooding and water scarcity in Chennai.

Importantly, solutions exist and many of them can simultaneously meet climate action and sustainable development goals. Front-runners in this space have been cities such as Ahmedabad, which has had a Heat Action Plan (HAP) since 2010, its success evident from reduced heat mortality. The HAP involves key government departments, NGOs, researchers and citizens and focuses on high-risk social groups like wage labourers, low-income groups, women and the elderly. Combining infrastructural interventions (for example, painting roofs white) and behavioural aspects (building public awareness on managing heat), the model has now been scaled up to 17 cities across the country.

Nature-based solutions such as mangrove restoration in coastal Tamil Nadu and urban wetland management in Bengaluru have demonstrated how restoring ecosystem health can sustain human systems as well. For example, urban parks provide cooling benefits and wetlands regulate urban floods.

Bottlenecks and ways forward

Many have identified how inadequate finances and political will at city scales constrain developing sustainable Indian cities. However, what is less discussed is inadequate institutional capacity in existing government departments to reorient ways of working. This would entail moving away from looking at risks in isolation and planning for multiple, intersecting risks. This would mean transforming the ways our cities operate and expand. Undertaking long-term planning needs resilience planners in every line department as well as communication channels across departments to enable vertical and horizontal knowledge sharing.

Another key aspect inherent in transforming cities is focusing on changing behaviours and lifestyles. This is tougher and less understood because the norms we adhere to, the values we cherish, and the systems we are familiar with tend to stymie change. One emerging example of slow but steady behavioural change is bottom-up sustainable practices such as urban farming where citizens are interpreting sustainability at a local and personal scale. This can mean growing one’s own food on terraces and simultaneously enhancing local biodiversity; composting organic waste and reducing landfill pressure; sharing farm produce with a neighbour, bringing communities closer and creating awareness about food growing.

India is becoming increasingly urban. Its cities or city-like villages are sites where the twin challenges of climate change and inclusive development will be won or lost. Pledges like Maharashtra’s are a welcome addition to ongoing climate plans. It remains to be seen how they translate into action. While gloom and doom dominate climate reportage, a range of solutions with co-benefits for climate action and development exists. How to leverage these solutions and equip our city planners and citizens to implement them is what we should focus on.


गहरे संकट से घिरता चीन

भरत झुनझुनवाला, ( लेखक जानेमाने अर्थशास्त्री हैं )

चीन वर्तमान में तीन गंभीर संकटों से एक साथ जूझ रहा है। पहला, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) के अंतर्गत विश्व के तमाम देशों में ढांचागत परियोजनाएं निरस्त की जा रही हैं। दूसरा, रियल एस्टेट कंपनी एवरग्रैंड पर वित्तीय संकट आ गया है। तीसरा, बिजली के उत्पादन में कमी आ रही है। इससे शहरों में पावर कट किए जा रहे हैं। इन तीनों में बीआरआइ का संकट बड़ा है। बीआरआइ को चीन ने अपनी अतिरिक्त या सरप्लस पूंजी के निवेश के लिए बनाया था। पिछले 20 वर्षों में चीन के निर्यात ऊंचे रहे हैं और घरेलू बचत दर भी ऊंची रही है। इन मदों से अर्जति रकम को उसे कहीं न कहीं निवेश करना था। इसके लिए चीन ने बीआरआइ योजना को बनाया। इसके तहत उसने विश्व के तमाम देशों को विभिन्न बुनियादी संरचना खड़ा करने के कर्ज दिए। विश्व बैंक ने 2019 में बीआरआइ का अध्ययन किया। उसने पाया कि इसके तहत बनाई जा रहीं परियोजनाओं से स्थानीय देशों को लाभ हो सकते हैं।

चीन से यूरोप के बीच बिछाई जा रही रेललाइन के कारण कजाखिस्तान और पोलैंड में विनिर्माण के बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन बीआरआइ में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है। अक्सर ज्यादा लाभ दिखाकर परियोजनाओं को स्वीकृत करा लिया जाता है। इसलिए तमाम देश इससे पीछा छुड़ाने लगे हैं। पहले मालदीव में चीन समर्थक प्रोग्रेसिव पार्टी द्वारा बीआरआइ का समर्थन किया जा रहा था, लेकिन पिछले दिनों वहां हुए चुनाव में प्रोग्रेसिव पार्टी हार गई और मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी जीती, जो कि बीआरआइ का विरोध करती है। मलेशिया के प्रधानमंत्री ने बीआरआइ को उपनिवेशवाद का नया रूप बताया है। म्यांमार ने क्यौकप्यू बंदरगाह परियोजना को निरस्त कर दिया है। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान ने भी परियोजनाओं का रूप बदलने का आग्रह किया है।स्पष्ट है कि बीआरआइ के लाभ होने के बावजूद इसमें कई खामियां हैं। यदि चीन इनको दूर करने में सफल होता है तो बीआरआइ आगे बढ़ेगी, अन्यथा इसके डूबने की आशंका है। भारत को भी इस दिशा में कदम उठाने चाहिए, अन्यथा हमारा माल विश्व बजार में चीन की तुलना में महंगा पड़ने लगेगा।

चीन का दूसरा संकट एवरग्रैंड कंपनी का है। इसके पीछे चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का मौलिक विचार है। उन्होंने कहा है कि कंपनियों के लाभ की तुलना में प्रदूषण, असमानता और वित्तीय अस्थिरता को दूर करना ज्यादा जरूरी है। इसी के चलते उन्होंने एवरग्रैंड कंपनी द्वारा अधिक ऋण लेने पर अंकुश लगाया है। उन्होंने नई वित्तीय नीति बनाई है, जिसके अंतर्गत किसी भी कंपनी को तीन मदों पर आंका जाता है। पहला यह कि लिए गए ऋण के सामने उसके पास संपत्ति कितनी है? दूसरा यह कि उसके पास अल्पकालीन कर्ज की तुलना में नगद कितनी है? तीसरा यह कि उसके द्वारा कुल लिए गए ऋण की तुलना में उसकी अपनी पूंजी कितनी है? यदि कोई कंपनी किसी एक बिंदु पर भी फेल हो जाती है, तो बैंकों द्वारा उसे ऋण नहीं दिया जा सकता। एवरग्रैंड ने तमाम परियोजनाओं को पूरा किया है, लेकिन कोविड संकट के कारण उसकी ओर से बनाए गए फ्लैटों की बिक्री कम हो गई। इसलिए भी एवरग्रैंड संकट में आ गया है। इससे देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए चीन की सरकार ने सरकारी इकाइयों को आदेश दिया है कि वे एवरग्रैंड की परियोजनाओं को खरीद लें। जिस प्रकार अपने देश में संकटग्रस्त यस बैंक का अधिग्रहण सरकारी बैंक द्वारा किया गया, उसी प्रकार चीन की सरकारी कंपनियां एवरग्रैंड की संकटग्रस्त परियोजनाओं को खरीदकर उस कंपनी को डूबने से बचाने का प्रयास कर रही हैं।देखा जाए तो चीन की सरकार ने एवरग्रैंड को सरकारी ऋण देकर बचाने का प्रयास नहीं किया है। दोनों विधाओं में मौलिक अंतर है।

2008 में अमेरिका में जब जनरल मोटर्स कंपनी संकट में आ गई थी, तो अमेरिकी सरकार ने जनरल मोटर्स को और ऋण देकर बचाया था। चीन की सरकार ने एवरग्रैंड को इस प्रकार का ऋण देकर बचाने से इन्कार कर दिया और उसे मजबूर किया कि वह अपनी कुछ संपत्तियों को बेचकर अपने ऋण को कम करे। ऐसा करने से एवरग्रैंड के बचे रहने की संभावना बढ़ जाएगी और चीन की सरकार के ऊपर अनावश्यक वित्तीय भार भी नहीं आएगा। इससे चीन की अर्थव्यवस्था भी बची रहेगी। यद्यपि वर्तमान में यह प्रक्रिया संकट के रूप में दिख रही है। जैसे समय पूर्व उपचार भी बीमारी जैसा ही लगता है।

चीन का तीसरा संकट बिजली का है। चूंकि शी चिनफिंग ने प्रदूषण, असमानता और वित्तीय अस्थिरता को दूर करने का संकल्प लिया है। लिहाजा उन्होंने प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए थर्मल बिजली संयंत्रों को आदेश दिया कि वे अपने प्रदूषण स्तर को कम करें। इन नियमों का पालन न करने के कारण कई बिजली संयंत्रों को बंद कर दिया गया। फलस्वरूप बिजली का उत्पादन कम हो गया। कई बिजली कंपनियों ने बड़ी आद्योगिक इकाइयों को बिजली देनी बंद कर दीं। कहीं-कहीं शहरों में पावर कट भी लागू करने पड़े हैं। देखा जाए तो चीन यह संकट अपने ऊपर स्वयं लाया है, क्योंकि वह स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन की ओर बढ़ना चाहता है। भारत की तुलना में चीन में सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इसलिए चीन ने यह सख्त कदम उठाया है। इसके फलस्वरूप चीन में भी सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना है। ऐसा होने पर चीन शीघ्र ही इस बिजली संकट से उबर जाएगा।

चीन के इन तीनों संकट के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष हैं। बीआरआइ में यदि चीन ने अपनी परियोजनाओं का सही आर्थिक मूल्यांकन कराकर घटिया परियोजनाओं को निरस्त कर दिया और केवल सुदृढ़ परियोजनाओं को ही बढ़ाया तो बीआरआइ सफल हो जाएगी, अन्यथा डूबेगी। एवरग्रैंड जैसी कंपनियां यदि अपनी घटिया संपत्तियों को बेचकर सुदृढ़ हो गईं तो चीन वित्तीय संकट से बच जाएगा। इसके विपरीत यदि चीन ने बड़ी कंपनियों के वित्तीय दुराचार पर अंकुश नहीं लगाया तो उसकी अर्थव्यवस्था डूबेगी। यदि सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन बढ़ गया तो बिजली संकट से भी चीन बच जाएगा। इससे उसका पर्यावरण सुधर जाएगा, जिससे अर्थव्यवस्था को पुन: गति मिलेगी। देखना है कि चीन इन कदमों को उठाने में सफल होता है कि नहीं?


प्रचुर उत्पादन भी समस्या


कृषि मंत्रालय द्वारा जारी प्राथमिक अनुमानों को देखें तो देश में खरीफ सत्र में 15.05 करोड़ टन रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन हो सकता है। पिछला रिकॉर्ड गत वर्ष 14.95 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का था। इससे मुद्रास्फीति, खासतौर पर खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलनी चाहिए। लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी है। यदि अत्यधिक उत्पादन का सही ढंग से प्रबंधन न किया जाए तो इससे कृषि उपज की कीमत सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम हो सकती है। खास तौर पर ऐसे समय, जबकि बाजार में नई फसल आनी शुरू होती है। इससे किसानों के हितों को ही नुकसान पहुंचेगा जो पहले ही न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप से प्रभावी बनाने तथा प्रमुख तौर पर विवादास्पद कृषि कानूनों को समाप्त करने की मांग के साथ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस समय भी खरीफ में उगाई जाने वाली 12 प्रमुख फसलों में से आठ की कीमत उनके तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम है। केवल चार उपज ऐसी हैं जो उत्पादकों को लाभकारी मूल्य दे रही हैं।

इनमें से पहली फसल कपास का कुल रकबा कम हुआ है क्योंकि मौसम अनुकूल नहीं है। अन्य फसलें हैं तुअर, मूंगफली तथा सोयाबीन। तुअर सबसे ज्यादा खाई जाने वाली दाल है जबकि शेष दो से तेल निकाला जाता है। बहरहाल, इन तिलहनी फसलों की कीमत में भी गिरावट आ सकती है क्योंकि सरकार ने घरेलू फसल कटाई के ऐन पहले पाम ऑयल पर आयात शुल्क कम किया है।

सरकार के समक्ष पहला काम तो यही है कि वह कम से कम प्रमुख फसलों को जरूरी मूल्य समर्थन प्रदान करे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो किसानों का संकट और गहरा होना तय है। उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ प्रमुख कृषि वाले राज्यों में अगले वर्ष के आरंभ में चुनाव होने हैं और उसके कुछ समय पश्चात अन्य राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में केंद्र तथा राज्य सरकारों को ऐसा करने का अतिरिक्त दबाव झेलना होगा। परंतु खरीद आधारित मूल्य समर्थन इतनी अधिक फसलों के लिए व्यावहारिक नहीं रहता।

ऐसे में इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए अन्य तरीके तलाश करने होंगे। अधिशेष उत्पादन का निर्यात करना फिलहाल तो दूर की कौड़ी ही लगता है। खाद्यान्न समेत अधिकांश कृषि जिंसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें मजबूत बने रहने की संभावना हैं क्योंकि अमेरिका तथा ब्राजील समेत प्रमुख निर्यात देशों में खराब मौसम के चलते फसल को नुकसान पहुंचा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के कृषि जिंस मूल्य सूचकांक में भी तेजी दिख रही है। भारत इस अवसर का लाभ अपने घरेलू बाजार और किसानों की आय बढ़ाने के लिए उठा सकता है।

बाजार समर्थन दिलाने के अन्य विकल्पों में स्थानीय खपत को बढ़ाना और प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) को दोबारा खड़ा करना शामिल हैं। इस योजना को जोरशोर से शुरू करने के बाद भुला दिया गया था। इन दोनों उपायों को अपनाने के लिए अतिरिक्त व्यय करना होगा जिसका बोझ राजकोष पर पड़ेगा। पीएम-आशा, सरकारी एजेंसियों द्वारा तय मूल्य पर सीधे फसल खरीद के अलावा बाजार हस्तक्षेप के दो और तरीके पेश करती है। ये हैं भावांतर भुगतान व्यवस्था और निजी पक्ष द्वारा खरीद भंडारण करना जिसके लिए उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य का 15 फीसदी सेवा शुल्क के रूप में दिया जाएगा। जब तक सरकार ऐसे उपाय नहीं अपनाती या कुछ अन्य व्यावहारिक उपाय या कम से कम प्रमुख फसलों के लिए प्रभावी बाजार समर्थन तंत्र नहीं विकसित करती, तब तक क्रोधित किसानों को शांत करना या उनके विरोध प्रदर्शन को रोक पाना मुश्किल होगा।


दुर्भाग्यपूर्ण घटना


उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा में चार किसानों समेत आठ लोगों की मौत से प्रदेश की सियासत तेज हो गई है। यह घटना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी चाहे जितनी भी निंदा की जाए कम है‚ लेकिन यह विडंबना ही है कि भारत के राजनीतिक दल इस तरह की दुखद और त्रासदीपूर्ण घटनाओं पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते। प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इस कारण कांग्रेस‚ समाजवादी पार्टी‚ बसपा और आम आदमी पार्टी इस मुद्दे पर प्रदेश की भाजपा सरकार को घेरने में जुट गए थे। प्रदेश की सरकार ने इस घटना की नजाकत को समझते हुए बहुत संयम से काम लिया और त्वरित कार्रवाई करते हुए किसान संगठनों की सभी मांगों को स्वीकार करके विपक्ष के मंसूबे पर पानी फेर दिया। सरकार की घोषणा के मुताबिक चार किसानों के परिवारों को 45-45 लाख रुपये मुआवजे के साथ ही परिवार के एक सदस्य को योग्यतानुसार सरकारी नौकरी दी जाएगी। घायलों को 10-10 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी तथा उच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हिंसा की जांच करेंगे। उल्लेखनीय बात यह है कि लखीमपुर में भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत की मौजूदगी में प्रदेश के अतिरिक्त महानिदेशक (कानून–व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने यह घोषणा की‚ लेकिन दूसरी ओर महत्वपूर्ण सवाल यह है कि तीन नये कृषि कानूनों को लेकर राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर पिछले 10 महीनों से चल रहे किसानों के धरना–प्रदर्शन को खत्म करने की दिशा में केंद्र सरकार नये सिरे से कोई पहल करती है या नहीं। किसान संगठनों और केंद्र सरकार के बीच 11 दौर की वार्ता का कोई परिणाम सामने नहीं आया। इससे लगता है कि दोनों पक्षों का रुख अड़ियल है। अगर इस मामले में जारी गतिरोध को खत्म करना है तो किसानों को तीनों कानूनों को वापस लेने की अपनी जिद छोड़ देनी चाहिए। दूसरी ओर सरकार को भी किसानों के अन्य प्रमुख मांगों को स्वीकार कर यह संदेश देना चाहिए कि सरकार किसान विरोधी नहीं है। सर्वोच्च अदालत तक यह मामला पहुंचा है। शीर्ष अदालत में किसान संगठनों ने कृषि कानूनों की वैधानिकता को चुनौती दी है। इस संबंध में अदालत का साफ रुख है कि किसानों को अदालत का फैसला आने तक अपना आंदोलन रोक देना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि किसान संगठन शीर्ष अदालत की राय को गंभीरता से लेंगे।